लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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होली का पावन त्यौहार, बरसे उमंगों की फौहार।
मेरा मन कहता है, मैं किससे होली खेलूं।।
क्या उनसे जो ऊपर से हंसते हैं,
और भीतर से खंजर कसते हैं?
क्या उनसे जो दारू का भंगड़ा करते हैं,
और भीतर से ईष्र्या भाव से जले मरते हैं?
क्या उनसे जो गले मिलकर भी नही मिलते,
और जिनके हृदय कमल कभी नही खिलते?
क्या उनसे जो मन की कीचड़ में लथपथ हैं,
और खूनी जिनके दामन और भाव विकृत है?
क्या उनसे जो कुत्सित भावों की फसल उगाते हैं
और कलुषित भावों को हृदय में उसे बसाते हैं?
क्या उनसे जो बने बारूद के व्यापारी हैं,
और चारों ओर आतंक की बो रहे क्यारी हैं?
क्या उनसे जो हर तरह से भ्रष्ट हैं,
और जिनके कार्य एकदम निकृष्ट हैं?
नही? मेरा मन कहता है,
ना मैं उनसे होली खेलूं………………
फिर……
holiमैं उनको नमन करूं,
मैं उनका वंदन गाऊं,
जो मुझे गुलाल तो नही लगाते पर रोज गले लगाते हैं,
जिनका सरल हृदय है जो छल कपट को दूर भगाते हैं।
प्रभु भजन से शुरू होती है जिनकी हर प्रात:,
हर प्राणी का कल्याण चाहता है जिनका हृदय।
हर रोज मेरे लिए ही नही अपितु सबके लिए,
जिनका हृदय झुकता है उस रब के लिए।
वो इंसान इस धरा पर कहीं हो किसी वेश में हो,
दुनिया के किसी कोने में या हों किसी देश में हो।
मैं उनको शीश झुकाऊं मैं उनका वंदन गाऊं
मेरा मन कहता है…..मैं उनसे होली खेलूं
 
-राकेश कुमार आर्य

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