लेखक परिचय

अतुल मोहन सिंह

अतुल मोहन सिंह

राष्ट्रीय समाचार फीचर अभिकरण विज़न इंडिया न्यूज़ नेटवर्क के कार्यकारी संपादक हैं. राजनीति, समाज, प्रशासन, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण विषयों पर बेहतर हस्तक्षेप करते हुए दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन कार्य करते रहते हैं. नया मीडिया और वैकल्पिक पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों पर शोध कार्य कर रहे हैं

Posted On by &filed under टॉप स्टोरी, विविधा.


रवि उपाध्याय/अतुल मोहन सिंह

“बेदम, बदनसीब, बीहड़ और अब बंजर में तब्दील हो चके बुंदेलखंड की यही किस्मत है. न जाते कितने ही बाग़ी और रहनुमाओं को ख़त्म होते देख चुके बुन्देली माटी के बाशिंदे अब उपेक्षा का स्यापा नहीं करते बल्कि अपने हालात को नियति मानकर स्वीकार कर चुके हैं कभी अतिवृष्टि कभी ओलावृष्टि तो अनवरत सूखे से निपटने हुए संगर्श्रत बुंदेलखंड को एक साल बाद भी मुआवजे के लिए लाठियां कहानी पड़ रही हैं. सियासी उफान भी चरम पर, बयानबाजी भी. भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सहित अन्य सियासी कुनबों के लिए वक्त-वक्त पर संजीवनी बनने वाला यह इलाका आज भी अभिशप्त है. बीहड़ों के बागियों के दौर लेकर राहुल की पदयात्रा तक इसकी छाती पर हमेशा ही मूंग दलने का काम हुआ है. जनवरी महीने में यहाँ पर सियासी हलचलें और घोषणाएं भी खूब हुईं. कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लेकर केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती तक के दौरे हो चुके हैं तो वहीं केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की यात्रा अभी पाईपलाइन में है”

सूबे की सियासत को समय-समय पर खाद-पानी देता रहा बुंदेलखंड आज ख़ुद बेजान है. किसानों द्वारा कर्ज के बोज्ग तले दबकर आत्महत्या करने, मानव अंगों की तस्करी करने, खनन के नाम पर जबरन हथियाए गए पट्टों, ठेकेदारों की आपसी भिडंत, डकैतों की कहानियों को लेकर बुंदेलखंड तो अक्सर सुर्ख़ियों में रहता है. एक बार फ़िर से सुर्खियाँ इसके हाथ लग रहीं हैं, इस बार यहाँ सियासी रहनुमाओं का जमघट लगता दिखाई पड़ रहा है. गरीबी, भुखमरी और पलायन के लिए मजबूर बुंदेलखंड एक बार फ़िर से 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए राजनैतिक रणभूमि बनता जा रहा है. पिछली बार की तरह ही इस बार भी राहुल गांधी इसको लेकर गंभीर दिख रहे हैं. राहुल ने चुनावी शंखनाद के लिए एक बार फ़िर बुंदेलखंड को चुना है. इसके लिए विद्रोही बाँदा से ही यलगार की तैयारी लग रही है.

अकालग्रस्त घोषित हो बुंदेलखंड : कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी 23 जनवरी को बुंदेलखंड के महोबा में पदयात्रा और किसान चौपाल के बहाने नरेन्द्र मोदी तथा अखिलेश सरकार पर निशाना साधा है. इस दौरान उन्होंने किसानों को ललकारते हुए कर्जमाफी का मुद्दा भी उठाया उनका कहना था कि कर्ज माफ़ किये बिना मेक इन इंडिया का सपना कभी पूरा नहीं होगा. मोदी को सरकारों की जऱा भी फिक्र नहीं है. उन्होंने किसानों को भरोसा दिलाया है कि वह संसद के जरिये बुंदेलखंड की त्रासदी को पूरे देश को बतायेंगे. बुंदेलखंड के लिए सड़क से संसद तक लड़ेंगे. करीब 8 किलोमीटर की पदयात्रा के दौरान वह लाडपुर गाँव में मातादीन कुशवाहा के घर रुके, खाना खाया और लाडपुर की चौपाल को संबोधित किया.

मनरेगा पर मुग्ध दिखे राहुल : राहुल गांधी ने सूपा और लाडपुर गाँव में धुप के बीच ग्रामीणों का दर्द सुना. किसी ने बिरोजगारी का मुद्दा उठाया तो किसी ने खाद्यान्न का. पेयजल और भूख का मुद्दा भी सबकी जुबां पर स्थाई भाव की तरह विराजमान था. तीनों स्थानों पर करीब 35 मिनट के भाषण मोदी, किसान और गरीबी पर ही केन्द्रित दिखे. यूपीए की उपलब्धियों को याद करते हुए मनरेगा पर मुग्ध हुए. बताया बुंदेलखंड का दर्द देखने के बाद ही मनरेगा को बनवाया गया था. उन्होंने यह भी जोड़ा कि 2008 में बुंदेलखंड की दुर्दशा देखने के बाद केंद्र सरकार से 4000 करोड़ का सूखा पैकेज दिलवाया और 77000 करोड़ की कर्ज माफी करवाई. इसके बावजूद आज हालात और बदतर हो चुके हैं.

मोदी-मुलायम पर दिखे हमलावर : महंगाई का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष ने बताया कि यूपीए सरकार के दौरान पेट्रोल के 150 डालर प्रति बैरेल थे, अब 28 डालर प्रति बैरेल हैं. तेल का जो पैसा केंद्र सरकार के पास बचा है उसे किसानों में बाँट दिया जाना चाहिए. सियासी तीर छोड़ते हुए उनका आरोप था कि चुनाव के वक्त सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और नरेद्र मोदी ने बुंदेलखंड में चुनावी सभा कर वोट तो हासिल किये लेकिन अब भुखमरी की नौबत है तो इस तरफ़ देख भी नहीं रहे हैं.

पदयात्रा से उत्साहित कांग्रेस : कांग्रेस को लगता है कि राहुल गांधी की पदयात्रा के बाद अब सूखे और भूखे बुंदेलखंड से कांग्रेस में जान आ सकती है. कांग्रेस नेताओं की एक टीम ने अभी हाल ही में बुंदेलखंड के बाँदा का दौरा किया था. इसीलिये उसने यहाँ के ऐसे हिस्सों पर ही राहुल गांधी की पदयात्रा कराने पर विचार किया जो बुरी तरह से सूखे से प्रभावित थे. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने इस टीम का नेतृत्व किया था. इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि सूखे की समस्या एक गंभीर मुद्दा है, राहुल गांधी ने इस क्षेत्र में पदयात्रा करके केंद्र और राज्य सरकार पर किसानों की समस्याएं सुनने के लिए दबाव बनाने का प्रयास किया है.

कांग्रेस ने निभाई गंभीर विपक्ष की भूमिका : उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ, निर्मल खत्री का मानना है कि राहुल गांधी कि दौरे से पार्टी को एक बार फ़िर से जीवन्तता मिलेगी. लोकसभा की 545 सीटों में से मात्र 45 सांसदों के साथ की मुद्दों पर कांग्रेस ने सफ़ल विपक्ष की भूमिका निभाई है. जिसके प्रेरित होकर उत्तर प्रदेश इकाई ने अपने 28 विधायकों के दम पर विधानसभा में भी अपना प्रतिरोध दर्ज कराने की योजना पर काम किया जा रहा है. डॉ. जोशी आगे बताती हैं कि हम बुंदेलखंड के किसानों के मुद्दों पर विधानसभा का संचालन नहीं चलने देंगे. वे लोग आजीविका की तलाश में दूसरे प्रदेशों का पलायन कर रहे हैं. प्रदेश की अखिलेश सरकार और केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार किसानों के मुद्दे पर असंवेदनशील हो गयीं हैं.

कांग्रेस के लिए उपजाऊ है क्षेत्र : बुंदेलखंड की मिट्टी कांग्रेस के लिए काफ़ी उपजाऊ रही है. पिछले विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने बुंदेलखंड की लम्बी पदयात्रा की थी. राहुल गांधी ने साल 2008 में बुंदेलखंड में एक पदयात्रा के दौरान 70 हजार वर्ग किमी क्षेत्र के लिए 7266 करोड़ रुपये का विशेष पॅकेज घोषित किया था. इसमें 3506 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश के झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, बाँदा, महोबा और चित्रकूट सहित 7 जिलों के लिए थे. बाक़ी 3760 करोड़ मध्य प्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दामोह और सागर सहित 6 जिलों के लिए थे. साल 2011 को छोड़ दें जब यहाँ भीषण बाढ़ आयी थी. उसके बाद बुंदेलखंड क्षेत्र में 2003 से 2015 के दौरान 12 वर्षों में 300 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. इनके पीछे सूखा और फ़सल बर्बादी ही मुख्य वजह बतायी जा रही है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आलोक चांटिया का मानना है कि इस बार कांग्रेस को ऊर्जा मिलने के आसार कम ही नज़र आते हैं. पिछली बार केंद्र में कांग्रेस सरकार थी और राहुल उसके अघोषित नेता. इसलिए तब उनकी सत्ता पर पकड़ ज्यादा थी इस बार नरेन्द्र मोदी पर केवल दबाव की रणनीति के अलावा कोई ख़ास असर होने वाला नहीं है. बुंदेलों को भी इस बात का भान होगा कि राहुल गांधी की यात्रा इस बार कोई बारिश करने जैसा करिश्मा नहीं करने वाली.

केंद्र की भी सख्त निगरानी : केंद्र सरकार भी इस क्षेत्र में अपनी गतिविधियों को तेज कर रही है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह जल्दी ही इस क्षेत्र का दौरा करने वाले हैं. तो वहीं बीते दिनों केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री और स्थानीय सांसद उमा भारती ने वाटर प्रोजेक्ट परियोजना की शुरुआत के लिए 500 करोड़ रुपये की घोषणा कर चुकी है. विश्वस्त सूत्रों की मानें तो केन्द्रीय कृषि मंत्रालय खासकर बुंदेलखंड के लिए एक परियोजना आरम्भ करने की तैयारी कर रहा है. बुंदेलखंड के ही एक बड़े बीजेपी नेता के अनुसार सिंचाई और स्वच्छ पेयजल मुहैय्या कराने वाली यह योजना इस वर्ष मई माह तक घोषित की जा सकती है.

भावनाओं को बेचने वाले भी कम नहीं : अलग राज्य की मांग करने वाला संगठन बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा ने अपनी प्रथक राज्य निर्माण की मांग को एक बार फ़िर से दोहराया है. साथ ही वह इस वर्ष अपने आन्दोलन को और धारदार बनाने वाले हैं. अलग राज्य की मांग का सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी लगातार विरोध करती रही है. जबकि बसपा प्रमुख मायावती बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने का समर्थन करती हैं. वहीं बीजेपी और कांग्रेस ने अभी तक इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है. मोर्चा के प्रवक्ता डॉ. चित्रगुप्त इस सम्बन्ध में बताते हैं कि यह वर्ष बुंदेलखंड के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण होगा. क्योंकि 2017 में चुनावी राजनीति के लिए वे लोग किसानों को वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करना चाहेंगे. उनका कहना था कि बिना राजनीतिक ताकत के कोई भी हमारी बात नहीं सुनेगा. चित्रगुप्त आगे बताते हैं कि हर राजनीतिक दल को सिर्फ़ हमारे वोटों की जरुरत है. इसलिए सभी राजनीतिक दल किसानों के मुद्दों को उठाना चाहते हैं. लेकिन हम इस क्षेत्र के हर गाँव पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.

राज्य मांगने वालों ने धोखा किया : बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का माना है कि अलग राज्य की मांग करने वालों ने ही अपने निजी स्वार्थ की आड़ में क्षेत्र के साथ गद्दारी की है. बीते चुनाव के रिकार्डों को देखते हुए यह मोर्चा स्थानीय राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है. ऐसे में यह मोर्चा अकेले ही चुनाव का सामना कर रहा है. वर्ष 2002 में बालीवुड कलाकार राजा बुन्देला ने ही इस मोर्चे का गठन किया था. वहीं 2004 में वह कांग्रेस में शामिल होकर कांग्रेस के टिकट पर झांसी से लोकसभा चुनाव में उतरे थे. उसके बाद बुंदेलखंड कांग्रेस नाम से उन्होंने एक लग मोर्चा बनाया और 2014 के चुनावों में बीजेपी में शामिल हो गए. हालांकि बीजेपी से उन्हें टिकट नहीं मिला. फ़िलहाल उनकी राजनीतिक नैय्या बीजेपी और कांग्रेस के बीच तैर रही है.

हर गरीब बुन्देली को मिलेगी पेंशन : अखिलेश यादव

सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी विधानमंडल सत्र से पहले ही बुन्देलखंड मोर्चे पर तैयार नजाए आये. उन्होंने बाकायदा इसके लिए बुंदेलखंड के जालौन, उरई और हमीरपुर जिलों का दौरा किया. लगातार उपेक्षित चल रहे बुन्देलखंड के लिए उन्होंने 27 जनवरी को एक बड़ा सियासी और विकासी पासा फेका. जनसभा में ऐलान किया कि बुंदेलखंड के हर गरीब को समाजवादी पेंशन दिए जाने की घोषणा की. बजट में व्यवस्था करने और बिजली-पानी संकट दूर करने के वाडे के साथ पूरी तरीके से चुनावी बहाव में नज़र आये. जनपद की छौंक ग्राम पंचायत में बताया कि नेताजी ने साड़ी बांटने की घोषणा की थी पर नकद देकर हमने महिलाओं की पसंद का भी ख्याल रखा. अब हर पात्र को 500 रुपये की राशि पेंशन के रूप में मिलेगी. सभी जिलों में इसके लिए सीमित लाभार्थियों का चयन किया जाता है पर बुंदेलखंड में यह सबको दी जायेगी. अखिलेश यादव बस यहीं नहीं रुके उन्होंने केंद्र सरकार से पूरे बुंदेलखंड के लिए केंद्र सरकार से खाद्य सुरक्षा दिए जाने की भी मांग दोहराई. बुंदेलखंड को खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत उन्होंने केंद्र सरकार पत्र लिखने की बात उठाई.

बसपा पर अखिलेश का जवाबी हमला :  इस दौरान अखिलेश यादव पिछली बसपा सरकार पर पलटवार करना भी नहीं भूले. पिछली सरकार ने सिर्फ़ कागजों पर डैम बनवाये हैं अगर डैन निर्माण में गड़बड़ी न हुई होती यहाँ जलसंकट कभी न होता. हम संसाधन जुटा रहे हैं. बेतवा नदी पर 10 महीने में डैम बनकर तैयार हो जाएगा. बसपा सरकार ने कृषि विश्वविद्यालय तो बनवा दिया पर सिंचाई के लिए पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. बिना सिंचाई के विश्वविद्यालय में कैसे शोध कार्य हो पायेंगे. यह कहकर कि उनकी सरकार ने पिछले साल ओलावृष्टि में पीड़ितों की सबसे ज्यादा मदद कर किसानों को भी साधने की कोशिश की. अब सूखे की स्थिति पैदा हो गयी है तो इसमें भी मदद में पीछे नहीं हटेंगे.

172 करोड़ की सौगात, 22 घंटे बिजली गारंटी : बुंदेलखंड के समीकरण को साधने के सपा सरकार की ओर से बाकायदा ठोस रणनीति बनाई गई है. जालौन में हमीरपुर-जोल्हूपुर फोरलेन का उदघाटन करते बुंदेलखंड को ऊर्जा हब बनाने और अप्रैल तक 22 घंटे बिजली आपूर्ति वादा किया गया. अखिलेश ने कहा कि बुंदेलखंड को लेकर हम हमेशा गंभीर रहे. केंद्र ने नीति आयोग के माध्यम से योजना बनाकर प्रदेश को मिलने वाली निधि में कटौती कर प्रदेश के साथ धोखा किया है. अखिलेश यादव ने जालौन के शाहजहांपुर में 50 मेगावाट के सोलर प्लांट के उद्दघाटन के बाद 33 हजार केवीए के 10 सब स्टेशन और ट्रांसमिशन लाइनों को लगाने का ऐलान किया. केंद्र पर यह आरोप कि ओलावृष्टि पीड़ित किसानों को केंद्र ने कुछ नहीं दिया जबकि सपा सरकार ने 2000 करोड़ रुपये का राहत वितरित की.

10 महीने में ख़त्म होगा संकट : कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव का मानना है कि बुंदेलखंड में पानी का संकट 10 महीने में ख़त्म हो जाएगा. 13 बांधों में से 9 का निर्माण पूरा हो चुका है. बाक़ी के 4 बांधों का काम भी जल्द पूरा कर लिया जाएगा. उन्होंने बताया कि हमारी पिछली सरकार ने भी इस क्षेत्र के लिए अपना खजाना खोला था आकस्मिक निधि से राहत बांटी गई थी. वहीं यूपीए ने केवल 300 करोड़ रुपये ही दिए. मोदी सरकार ने वह भी नहीं दिया. इस सम्बन्ध में झांसी से सांसद और केन्द्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती से भी बात करने से भी कोई समाधान नहीं निकला. बसपा सरकार ने ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के अलावा कुछ भी नहीं किया था.

प्रशासन लगातार ले रहा सुध : सूबे के मुख्य सचिव आलोक रंजन बुंदेलखंड की उपेक्षा के आरोप को खारिज करते हुए कहते हैं कि शासन पूरी तरह से मुस्तैद है हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं. बुंदेलखंड में बन रहे सियासी समीकरणों पर प्रदेश सरकार भी अपनी नज़र गड़ाए हुए है. सूबे के मुख्य सचिव आलोक रंजन ने अपने दो दिवसीय क्षेत्रीय दौरे में बाँदा और महोबा में की जगह चौपाल कार्यक्रमों का आयोजन किया. आलोक रंजन के इस दौरे को प्रदेश सरकार ने बड़े पैमाने पर मीडिया में प्रचारित प्रसारित भी करवाया.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी सम्भाला मोर्चा : बसपा की ओर से बुंदेलखंड की कमान राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन ने संभाल रखी है. वैसे प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर हैं लेकिन सिद्दीकी का गृह जनपद बाँदा होने के चलते पूरे क्षेत्र पर उनको नज़र रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गयी है. सूत्र बताते हैं कि उनको आगे कर मायावती ने क्षेत्र में जोखिम उठाया है. क्योंकि उनकी इस क्षेत्र में ग़लत छवि भी प्रचारित है. उन पर बुंदेलखंड राहत पॅकेज में किसानों को वितरण के लिए आये ट्रैक्टर घोटाले में शामिल होने का आरोप भी लग चुका है, जिसका बसपा को नुकसान भी हो सकता है.

चुनावी मौसम में बुंदेलखंड की याद : लगातार तीसरे साल बुंदेलखंड की मार झेल रहे बुंदेलखंड की ओर फ़िर से नेताओं का रुख होने लगा है. हर चुनाव से पहले सियासी दलों और नेताओं को बुंदेलों की धरती की याद जो आती है. उमा भारती, राहुल गांधी, अजित सिंह के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी दौरे पर पहुंचे. वहीं केन्द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह की यात्रा फरवरी में ही प्रस्तावित है. प्रदेश का सर्वाधिक पिछड़ा इलाका बुंदेलखंड भयंकर सूखे की चपेट में है. फ़सलों की बुवाई नहीं हो पायी है. पशुओं के चारे की समस्या मुंह बाए खड़ी है. युवाओं की बड़ी आबादी काम की तलाश में पलायन कर चुकी है. लोकसभा चुनाव से पहले भी बुंदेलखंड को लेकर खूब सियासत हुई थी. अब, जबकि विधानसभा चुनाव 2017 का बिगुल बजने में महज साल भर शेष रह गया है. बुंदेलखंड के भयावह हालत से लोगों को उबारने की चिंता के बजाय फ़िर राजनीती शुरू हो गयी है. 23 जनवरी को राहुल गांधी बुंदेलखंड में पदयात्रा कर वहां की समस्याओं को लेकर केंद्र और प्रदेश की सरकार को कटघरे में खड़ा कर चुके हैं. इसके बाद 24 जनवरी को रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित सिंह ने एक बार फ़िर अलग राज्य का जिन्न जगाते हुए यह बयान दिया कि अलग राज्य के बिना बुंदेलखंड की मूलभूत समस्याओं के समाधान में गंभीरता नहीं आयेगी.

सभी दलों को दिख रहीं संभावनाएं : उमा भारती, राहुल गांधी, अजित सिंह, अखिलेश यादव और राधामोहन सिंह की यात्राओं ने इस इलाके को एक बार फ़िर सुर्ख़ियों में ला दिया है. सिर्फ़ सपा ही नहीं, बल्कि बीजेपी, बीएसपी, रालोद और कांग्रेस भी कई महीनों से बुन्देलखण्ड को लेकर जब-तब चिंता सार्वजनिक करती रहीं हैं. दरअसल इस बुंदेलखंड की धरती ने सियासी समीकरण ही कुछ ऐसे बना दिए हैं. विधानसभा में सपा-बसपा दोनों यहाँ बराबरी पर खड़ी हैं, जबकि भाजपा सबसे कमजोर नज़र आती है. हालांकि लोकसभा चुनावों पर नज़र डालें तो यहाँ की पथरीली धरती कमल खिलाने वाले खाद-पानी की संभावनाओं को भी बेहतर दिखाने लगती है. मायावती जहां बुंदेलखंड की बदहाली को लेकर प्रदेश और केंद्र सरकारों पर आये दिन निशाना साधकर अपने लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती  रहती हैं. तो सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव भी बुंदेलखंड को लेकर केंद्र और पिछली बसपा सरकार पर ही आरोप लगाते रहे हैं. यही नहीं उन्होंने बकायदा बुंदेलखंड के सभी जिलों में मंडियों का निर्माण शुरू कराया है. यहाँ के किसानों को तिल की बुवाई पर अनुदान बढ़ाया है. वहीं नरेन्द्र मोदी सरकार ने डॉ. मनमोहन सरकार की तरह कोई पैकेज तो घोषित नहीं किया है, लेकिन जब-तब केन्द्रीय मंत्रियों की ओर से इस इलाके के लिए विकास योजनाओं का ऐलान जरूर होता है. साथ ही केंद्र इस बात को लगातार कह रहा है कि उसकी विभिन्न योजनाओं का लाभ बुंदेलखंड के लोगों को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाए.

सियासी दलों की अपनी-अपनी गणित : बुंदेलखंड में विधानसभा की 19 सीटें आती हैं, जबकि लोकसभा की 4 सीटें हैं. विधानसभा के लिए पछली बार हुए चुनाव नतीजों पर नज़र डालें तो यहाँ बसपा 7, सपा 5, कांग्रेस 4 और भाजपा 3 सीटों पर जीती थी. बाद में भजपा की उमा भारती चरखारी और साध्वी निरंजन ज्योति हमीरपुर से सांसद चुने जाने के बाद हुए उपचुनाव में ये दोनों सीटें भाजपा के हाथ से निकलकर सपा की झोली में चली गईं थीं. इस तरह विधानसभा में सीटों के आधार पर इस समय सपा-बसपा सात-सात सीटों से साथ बराबरी पर खड़े हैं. सबसे कमजोर भाजपा है जिसके पास सिर्फ़ एक सीट बची है. वहीं लोकसभा चुनाव नतीजों को आधार बनाएं तो भाजपा भी यहाँ कमजोर नहीं दिखती है बुंदेलखंड में लोकसभा की बाँदा-चित्रकूट, हमीरपुर-महोबा, जालौन-गरोठा और झांसी-ललितपुर सीटें हैं. इन चारों पर इस समय भाजपा के सांसद काबिज हैं. इस नाते भजपा के रणनीतिकारों को बुंदेलखंड बहुत निराश नहीं करता. जहां तक बात कांग्रेस की है तो विधानसभा में चार सीटों के साथ उसके लिए भी इस धरती से उम्मीदों पर अभी विराम नहीं लगा है.

बुंदेलखंड से सरकारों की वादाखिलाफी : रेमन मैग्सेसे विजेता और जल पुरुष के तौर पर लोकप्रिय राजेन्द्र सिंह सरकार के प्रयासों को सियासी स्टंट बताते हैं, सरकार ने बुंदेलखंड के लिए सिर्फ़ वादे किये ही किये हैं. जलपुरुष बुंदेलखंड के लिए अब-तक किये गए सरकारी प्रयासों से संतुष्ट नहीं हैं. जितनी घोषणाएं हुईं हैं उसका कुछ भी असर जमीन पर होता नहीं दिख रहा है. जन-जल जोड़ो अभियान के तहत जल संकट एवं सूखे से उत्पन्न हालात के समाधान पर आयोजित एक कार्यशाला में भाग लेने 28 जनवरी को वह लखनऊ में थे. उन्होंने बताया कि युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को संवेदशील मानते हैं उनसे भी बुंदेलखंड की उम्मीदें न पूरी होना दुखद है. मुख्यमंत्री को बुंदेलखंड को वादा नहीं, इरादा दिखाना चाहिए. पुराने तालाबों को पुनर्जीवित करने, भूजल दोहन रोकने और जल साक्षरता के लिए गंभीर प्रयास नहीं किये गए. चंद्रावल, लखेरी और सेंगर जैसी नदियों के पुनुरुद्धार करने की घोषणा तो सरकार ने की लेकिन इस पर भी कोई काम नहीं किया. सरकार संवेदनशील है तो तो पुराने और प्राकर्तिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए विशेष बजट की व्यवस्था करके जल्द काम शुरू कराए.

मां गंगा बीमार और मोदी बेटा बेकार : बुंदेलखंड के सन्दर्भ में पूछने पर राजेन्द्र सिंह ने बताया कि सभी योजनायें ठेकेदारों और उद्योगपतियों के फ़ायदे के लिए बन रहीं हैं. जब-तक जनता को ध्यान में रखकर योजनायें नहीं बनेंगी, बुंदेलखंड का विकास संभव नहीं है. उन्होंने प्रधानमंत्री पर सवालिया निशाँ लगाते हुए कहा कि जब कोई मां बीमार होती है तो बेटा बेहतरीन चिकित्सक से इलाज कराता है, लेकिन मोदी ने ऐसा नहीं किया. मोदी गंगा को अपनी मां बताते हैं तो अब-तक मां के इलाज के लिए कोई बेहतर वैद्य क्यों नहीं लगा पाए. गंगा आज भी बीमार है और उनका बेटा बेकार साबित हुआ है.

बीज अनुदान लेने में बुंदेलखंड रहा पीछे :  सरकार की लचर व्यवस्था और उदासीनता के चलते बुंदेलखंड के किसानों को बिज अनुदान का भी पूरा लाभ नहीं मिल पाया है. बीज पर सीधे अपने बैंक खातों में अनुदान प्राप्त करने को लेकर बुंदेलखंड फिसड्डी साबित हुआ है. व्यापक और बेहतर प्रचार-प्रसार न हो पाने के कारण सूबे गेंहूं बीज वितरण लक्ष्य 12 लाख 30 हजार 300 क्विंटल में से सिर्फ़ 6 लाख 66 हजार 777 क्विंटल बीज ही बांटा जा सका है. इसके चलते किसानों को योजना का पूरा लाभ नहीं मिल सका है. इसे विभाहीय उदासीनता ही कहें जो कि किसानों में बीज अनुदान वितरण का लाभ बुंदेलखंड को भी नहीं मिल सका. डीबीटी योजना में प्रदेश के सबसे पिछड़े मंडलों की सूची में चित्रकूट और झांसी का नाम सबसे ऊपर आता है. बीज अनुदान वितरण में सबसे पिछड़े जिलों में सोनभद्र में लक्ष्य के सापेक्ष 23.84, ललितपुर में 25.70, बाँदा में 40.28 और महोबा में 40.98 फ़ीसद ही पूर्ति हो सकी. बुंदेलखंड इस योजना को पिछड़ने का कारण पीछे कृषि अधिकारी ख़राब मौसब होना बटा रहे हैं.

मुआवजा मांगते किसानों पर बरसतीं लाठियां : बुंदेलखंड की सूखी धरती के हताश-निराश किसानों को अपनी फसलों के ओलावृष्टि, अतिवृष्टि और सूखे में ख़त्म हो जाने के बाद मुआवजे मांगने के लिए भी लाठियां खानी पड़ रही हैं. सूखे से कराह रहे किसानों ने मुआवजे की मांग को लेकर अनसन शुरू किया तो पुलिस ने लाठियां भांजनी शुरू कर दीं. किसानों ने विरोध किया तो दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया. किसानों को पीएसी की गाड़ी से भरकर जिले की सीमा से बाहर ले जाकर छोड़ दिया गया. बुंदेलखंड किसान यूनियन के बैनर तले 50 से अधिक किसानों 20 जनवरी से बाँदा कलेक्ट्रेट के बाहर फुटपाथ पर तम्बू लगाकर बैठे थे. मुआवजे के तौर पर पूरे बुंदेलखंड के किसानों को मुआवजा दिये जाने, कर्जमाफी, बिजली, पानी और सिंचाई की मुफ़्त सुविधा जैसी मूलभूत जरूरतों की मांग कर रहे थे. 27 जनवरी को मुख्यमंत्री के बुंदेलखंड आगमन से उनमें कुछ आस जगी थी. अपनी मांगों पर ध्यान ना दिए जाने से निराश होकर किसानों ने उसी दिन अनिश्चितकालीन अनशन पर जाने की घोषणा कर दी. देर रात अचानक पहुंची पुलिस और पीएसी ने तम्बू में सो रहे किसानों को लाठी-डंडों से पीटकर खदेड़ दिया और तम्बू उखाड़ फेंका. कुछ ने विरोध किया तो उनको दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया. फ़ोर्स की पिटाई से 2 महिलाओं सहित 6 किसान बुरी तरह चोटिल हो गए. इसके बाद पुलिस ने बाक़ी अनशनकारी किसानों को वाहनों में भरकर जिले की सीमा से बाहर ले जाकर छोड़ दिया. इतना ही नहीं किसानों का नेतृत्व कर रहे संगठन के अध्यक्ष विमल शर्मा को जिला अस्पताल के नेत्र वार्ड में नज़रबंद कर दिया गया.

शीतकालीन सत्र को गरमाएगा बुंदेलखंड : बुन्देल्ख्नद की बदहाली और सूखे की मार पर हाय तौबा करने वाले माननीय 29 जनवरी से आहूत विधानसभा के शीतकालीन सत्र में नज़र आयेंगे. इस मुद्दे पर भाजपा के तेवर आक्रामक रहेंगे. भाजपा विधानमंडल के नेता सुरेश खन्ना और विधान परिषद में पार्टी के नेता ह्रदयनारायण दीक्षित ने बताया कि बुंदेलखंड में अकाल जैसी स्थिति है लोग तालाबों का पानी पीने तक को तरस रहे हैं.

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz