लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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naxisप्रवीण दुबे
ऐसा लगता है कि केरल सहित तमाम दक्षिण के वामपंथी प्रभाव वाले क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी के बढ़ते प्रभाव से कामरेडों की नींद उड़ी हुई है। यही वजह है कि ये कामरेड केरल जैसे राज्यों में राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगातार हमले कर रहे हैं। पिछले महीने पंपीसेरी में एक संघ कार्यकर्ता को मौत के घाट उतारा गया। इस घटना की जांच में जो चेहरे सामने आए हैं वह माकपा से जुड़े बताए जाते हैं। इन लोगों ने संघ कार्यकर्ता को पहले घेरा और फिर बमों से हमला कर उसे घायल कर दिया जिसकी कि बाद में मौत हो गई। यह कोई इकलौती घटना नहीं है । यह सिलसिला 1999 के पहले से ही चला आ रहा है। एक नहीं अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब कम्युनिस्टों ने कई स्थानों पर संघ कार्यालयों में सामूहिक हमला बोलकर दहशत फैलाने की कोशिश की है। हमलों में कई स्वयंसेवकों की जान भी गई है। कौन भूल सकता है 1999 की उस घटना को जब भाजपा नेता केपी जयकृष्णन को माकपा कार्यकर्ताओं ने मार डाला था। ताजी घटना मंगलवार को सामने आई है जब कन्नूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता एवी बीजू पर मंगलवार को दिनदहाड़े जानलेवा हमला बोला गया। यह हमला उस समय बोला गया जब बीजू स्कूली बच्चों को विद्यालय छोडऩे जा रहे थे। कम्युनिस्टों ने उन पर चाकुओं और तलवारों से वार किया। बीजू को बेहद गम्भीर अवस्था में कोझीकोड के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। कम्युनिस्टों ने इस हमले में मानवीयता की हदों को किस तरह से पार किया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस समय बीजू के ऑटो को घेरकर हिंसा का खूनी खेल खेला जा रहा था उस समय स्कूल के छोटे-छोटे बच्चे ऑटो में बुरी तरह सहमे हुए रो रहे थे। आखिर क्या हैं यह मानसिकता? इसे क्या कहा जाए? एक तरफ इसी वामपंथी मानसिकता से प्रेरित कुछ लोग देश की राजधानी दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में खुलेआम देशद्रोहिता पूर्ण गतिविधियों का संचालन करने के आरोप में चर्चा में हैं तो दूसरी ओर इसी वामपंथी विचारधारा के लोग केरल में राष्ट्रभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों पर लगातार हमले कर रहे हैं। यह भारत ही है जहां इस तरह की अराजक व अराष्ट्रवादी गतिविधियों को अंजाम देने के बावजूद भी वामपंथी विचारधारा को देश में अराजकता फैलाने की खुली छूट मिली हुई है। यदि और कोई देश होता तो इस तरह के हिंसाचार और राष्ट्रद्रोही गतिविधियों के आरोप में इनकी गतिविधियां बलपूर्वक रोकने के निर्देश सरकार दे देती। इसके बावजूद वामपंथी खुलेआम अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध का आरोप लगाकर आजादी-आजादी के नारे लगा रहे हैं। आखिर कब तक यह सब कुछ बर्दाश्त किया जाता रहेगा? कब तक केरल जैसे राज्यों में संघ स्वयंसेवकों की हत्या होती रहेगी? अब समय आ गया है कि हमारे देश के नीति निर्धारक वामपंथियों और राष्ट्रविरोधी ताकतों के षड्यंत्रों पर एक साथ माथा जोड़कर चर्चा करें। यह तय करना बेहद आवश्यक है कि जो लोग कश्मीर की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं, जो देश की रक्षा करने वाले सेना के जवानों तक पर बेहूदा आरोप लगाते हैं, जो खुलेआम भारतीय संविधान में निहित बातों का मखौल बनाते हैं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि छत्तीसगढ़ हो या केरल हिंसा का खूनी खेल खेलते हैं उनके साथ क्या व्यवहार किया जाए, ऐसी विचारधारा और उससे जुड़े लोगों को कैसे रास्ते पर लाया जाए?

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2 Comments on "दिल्ली में देशद्रोह, केरल में हिंसाचार : वामपंथी प्रभाव"

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mahendra gupta
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जब तक सशस्त्र बालों को नक्सलियों का दमन करने की छूट नहीं दी जाएगी तब तक इस समस्या से निजात नहीं पाई जा सकती , लेकिन इसके साथ साथ उस इलाके में लोगों के रोजगार के पायस करने होंगे उनके जीवन पार्जन की सभी सुविधाएँ जुटानी होंगी तब नक्सलवाद , माओवाद के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी , माओवाद , नक्सलवाद गरीबी व शोषण की वजह से पनपता है , नक्सली उन लोगों को केवल सपने ही दिखाते हैं , वहां कौनसी समृद्धि दिखाई देती है , उलटे वे उनका शोषण ही करते हैं इसलिए सरकार को इस विषय… Read more »
kapil mahendra
Guest

praveen bhai sahi kaha hi

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