लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under समाज.


…….सामने फैला पड़ा है अखबार और कुछ पत्रिकाएं ,जिनके हर पन्ने से चीख कर पुकार रहे है कुछ दृश्य,कुछ खबरें !! कहीं पर ढ़ाई साल की बच्ची का रेप ,कहीं 4 साल की ,कहीं 5 साल की ,कहीं 16 साल की ! रोज हजारों की संख्या में रेप और रेप के बाद कहीं वक्ष पर मारी गई ब्लेड, तो कहीं गुप्तांग पर किए गए जख्म ,कहीं समुची देह पर की गई खरोंच और सबसे बढ़कर मन पर किए गए अनंत घाव बुरी तरह झकझोर देते हैं !!
हर दिन हजारों अखबारों से चीखती हुई लाखों खबरें !! जान पड़ता है कि यही हमारा असली चरित्र है !! एक नाकाम समाज !! इस भीड़ में ,इस जंगल में कहीं समाज खोजता हूँ तो बमुश्किल ही मिलता है समाज !!
सीधे तौर पर जिन्होंने बलात्कार किया है वो अवश्य बलात्कारी हैं , उनको तो सजा दी जानी चाहिए , उनको सजा दी भी जाएगी !! किंतु वह तंत्र जो इनका मानस बना रहा है !! हमारा मानस बिगाड़ रहा है ,उसका क्या ?? वह कामुक पत्र-पत्रिकाएं भला कहां बलात्कारी हैं भला ,जो रंगीन चित्रों से सज्जित, अश्लील चित्रों से सज्जित गंदी से गंदी अश्लील सामग्री लोगों तक पहुंचा रही है !! इंटरनेट की उन साईटों का क्या जिन्हें बनाने वाले कामुक से कामुक, घटिया-घटिया अश्लील से अश्लील सामग्री हम तक पहुंचा रहे हैं ! उन समूची फिल्मों का क्या जो हर रोज रिलीज़ होती हैं और जो तरह-तरह की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों द्वारा हमारी काम- इच्छा को जगाती हैं ! एक समूचा तंत्र हमारी काम की भूख को बढ़ाने के लिए प्रयासरत है !! व्यस्क लोग तो फिर भी शायद कुछ विवेकशील हों ,लेकिन यह नए बलात्कारी जो शायद12 साल के हो सकते हैं , 15 साल के हो सकते हैं, या 17 साल के ! अर्द्धव्यस्क हैं,अल्प व्यस्क हैं,नाबालिग हैं ! ऐसे-ऐसे बलात्कारी दिखाई दे रहे हैं, जो न सिर्फ बच्चियों का रेप कर रहे हैं बल्कि उनके शरीर को तरह-तरह से नष्ट भी कर दे रहे हैं !!
क्या इन बच्चों के के संस्कार नहीं हैं ? क्या इन बच्चों में कोई आत्मा नहीं है ?क्या इन बच्चों में राक्षसीपना इस कदर हावी हो गया है के एक छोटी-सी,नन्हीं-सी बच्ची भी उन्हें रेप किए जाते वक्त चीखती होगी ,चिल्लाती होगी तो ये उसका मुंह दबा देते होंगे ! मुंह में कपड़ा ठूंस देते होंगे और निर्ममता पूर्वक मिलकर बार-बार इस घृणित कार्य को अंजाम देते होंगे !!
एक भयावह प्रश्न बारम्बार मन में उभरता है कि इनका मानस ऐसा बनाने वाला कौन है ?? क्या ये मां की कोख से बलात्कारी होकर पैदा हुए है ?? शायद नहीं ना !! तो फिर दोषी है कौन !? क्या इस दिशा में भी कोई देख पा रहा है !? क्या इस वीभत्सतता के अंतर्निहितार्थ पर किसी की सूक्ष्म दृष्टि है भला ??
तो फिर संभवतः हम अपने आप को देख पाने में बिल्कुल असक्षम और असफल समाज बनते जा रहे हैं ? जहां पर समाज कहना समाज शब्द का अपमान करना है !! नंगे लोगों का हरम होता है समाज नहीं !! वहशी लोगों का नरक होता है समाज नहीं ?? पशुओं का जंगल होता है समाज नहीं !! समाज की परिकल्पना सिर्फ आदमी के लिए है ! बात-बात पर छोटी-छोटी बातों पर बेवजह लड़ते झगड़ते हम सब लोग समाज की पूरी धारणा को असफल सिद्ध करते जा रहें हैं ! आदमी में आदमीपने का होना ही उसके आदमी होने की पहचान है और मैं यह स्वीकार करता हूं कि आज की तारीख में हम आदमी भी नहीं रह गए हैं !! किसी जमाने में तर्कशास्त्र पढ़ता हुआ यह पढ़ता था कि सभी मनुष्य विवेकशील हैं ,फलाँ व्यक्ति मनुष्य इसलिए वह विवेकशील है या फिर फलाँ व्यक्ति विवेकशील है इसलिए वह मनुष्य है !! लेकिन यह विवेक क्षमता अब जैसे बहुत थोड़े से लोगों में बची हुई दिखाई देती है !
नैतिकता का डर ,धर्म का डर ईश्वर का डर ,यह सब तो जैसे सब खत्म ही हो चुका है और यह सारे भय, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दुहाई देते हुए एक-एक कर साजिशाना ढंग से समाप्त किए जा रहे हैं ! जब आदमी के अंदर आदमियत के प्रति कोई आदर भावना और साथ ही किसी तरह का कोई भय ही नहीं बचेगा तो वह ऐसा ही विद्रूप, ऐसा ही उच्छश्रृंखल ,ऐसा ही अनैतिक ,ऐसा ही राक्षसी हो जाएगा !! वह दिन अब बहुत दूर भी नहीं दिखता ,जब चारों ओर अंधेर ही अंधेर होगा !!
तो फिर रास्ता क्या है ? रास्ता सिर्फ और सिर्फ अपने व्यक्तित्व का परिष्कार है ! अपने भीतर शिक्षा से ज्यादा नैतिकता का परिष्कार है ,संस्कार का परिष्कार है ,आदर्शों का परिष्कार है ! हर तरफ बचपन से यह जागरूकता फैलानी आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है कि आदमी क्या है ,उसकी निजता क्या है ,उसके संस्कार क्या हैं, और आदमी को आदमी के साथ मिलकर जीने के लिए जरूरी प्राथमिकताएँ क्या है तथा अंत में आदमी के लिए सबसे पहली और अंतिम सलाहियत क्या है ! यदि हम सब यह सब नहीं कर पाए तो हमारी सारी शिक्षा अधूरी रह जाएगी !हमारी सारी आधुनिकता पंगु रह जाएगी ! आधुनिकता के समावेश के साथ अनैतिकता ने आदमी के चरित्र को बिल्कुल बंजर एवं भ्रष्ट कर डाला है ! उसी का परिणाम है ये रेपिस्ट ! ये अनैतिक कार्य करते और उससे अकूत मुनाफा बटोरते तमाम कोरपोरेट वर्ल्ड और हम में से अनेक सारे लोग !! यह निकम्मे-काहिल और नकारा लोग ! यह धूर्त-मक्कार और भ्रष्ट लोग ! और इन सबको ऐसी दिशा प्रदान करते सफेदपोश लोग !! ऐसे में जो वास्तव में सही लोग हैं, जो वास्तव में जीवन को जीवन की तरह जीना चाहते हैं ,सबके साथ मिल कर रहना चाहते हैं, दरअसल वह अपने आप को बुरी तरह बेबस या लाचार और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं ! क्योंकि हर तरफ ताकत का बोलबाला है ! पैसे का बोल बाला है ! लालच और स्वार्थ-फरेब व मक्कारी हर जगह जीत में है ! और कोमलता की हर जगह शिकस्त ! तो वैसे में एक रेपिस्ट का तैयार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं लगती और धीरे-धीरे यह सब चीजें इतनी आम हो जाने वाली हैं कि अपने घर के बगल में हो चुके बलात्कार पर भी हम नहीं पसीज पाएंगे !! बल्कि हमारी बला से हमारे पड़ोस में कुछ भी हो ! हम तो सुरक्षित है ना !!
समाज में तेज़ी से पसरती एकांगी और व्यक्तिवादी प्रवृत्ति ने इस कदर भयावह हद तक आदमी को व्यैक्तिक बना दिया है और बनाती जा रही है कि अपने स्वार्थ के अलावा अपने आदमी होने की कोई और मूल्य ही आदमी को नजर नहीं आता ! यह सब अपने जीवन में सिर्फ और सिर्फ स्व-लाभ को ही प्राथमिक मान लेने के कारण हुआ है ! यह अंधी संस्कृति और मानवताविहीन संस्कृति है यह चाहे पश्चिमी हो या दक्षिणी !! कैसी भी-कहीं की भी संस्कृति हो ,इस संस्कृति को व्यक्ति का परिष्कार करके ही बदला जा सकता है ! सामूहिक रूप से भले हम कुछ भी सोच ले लेकिन व्यक्तिगत रूप से यदि हम अपने भीतर सामूहिकता का भाव न ला पाए तो ऐसा कभी भी संभव न हो सकेगा !!

राजीव थेपरा

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz