लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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dataएक बार फिर भारतीय काले धन को भारत वापिस लाने के सभी प्रयासों पर पानी फिरता दिख रहा है, जिसे लेकर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा चुनावों के पूर्व एक राजनीतिक बहस प्रारंभ करने के साथ सत्ता में आ जाने पर विदेशी बैंकों मेें जमा काले धन के प्रति भारत वापिस लाने की अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी। भाजपा तो केंद्र में नहीं आई, लेकिन उस समय के जारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और तात्कालीन वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम ने भी अपने व्यक्तव्यों में इस बात की ओर खुलकर संकेत दिए थे कि कांग्रेस यदि पुन: सत्ता प्राप्त करने में सफल होगी तो न केवल स्विस बैंकों में पंडे काले धन को भारत वापिस लाया जाएगा बल्कि जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका आदि अन्य देशों की बैंकों में भी जो भ्रष्टाचार की कमाई भारतीयों की है, उसे वापिस देश में लाने की प्रक्रिया शुरू की जायेगी।

चुनावों के बाद देश में कांग्रेस की सरकार बनी किन्तु लगता है विदेशी काले धन को भारत वापिस लाने के लिए जितने संगठित और जबावदेह प्रयत्न केन्द्र सरकार को खासकर विदेश विभाग को करने चाहिए थे वह अभी तक नहीं किए गए हैं। जिस स्विस सरकार पर भरोसा था कि वह स्विस बैंकों में जमा भारतीय पूंजी के बारे में अवश्य खुलासा करेगी, बल्कि आगे बंढकर वह राशि भारत सरकार को सौंप देगी। इस विश्वास के विपरीत जाकर स्विजरलैण्ड सरकार ने सीधे-सीधे भारत को ठेंगा दिखा दिया है। जब वह अमेरिका को उसके खातेदारों की संपूर्ण जानकारी मुहैया करा रही है, फिर क्यों वह भारत को उसके खातेदारों की सूची नहीं सौपना चाहती? आखिर भारत भी एक स्वतंत्र सम्प्रभू गणराय है। भारत के साथ यह भेदभाव क्यों? प्रश्न यह है कि जब स्विस कानून और अंतर्राष्ट्रीय संगठन ओईसीडी (ऑर्गनाइजेशन फार इकनॉमिक कोआपरेशन एण्ड डेवलपमेंट) किसी भी खाताधारक की जानकारी को अन्य किसी को देना कानून सम्मत नहीं मानती है, फिर अमेरिका को किस आधार पर उसके खाते धारकों की सूची स्विस सरकार द्वारा सौंपने का काम किया जा रहा है।

कानून तो किसी के साथ भेदभाव नहीं करते, वह तो सभी को लिए एक समान होंगे। एक के लिए कुछ दूसरे देश के लिए अलग कानूनों का प्रयोग करना वह ही समान मामले की स्थिति में निश्चित ही किसी अपराध से कम नहीं है। भारत के विदेश विभाग को स्विस सरकार से जरूर पूछना चाहिए, आखिर हमारे ही मामले में ऐसा निर्णय क्यों लिया गया है? स्विस सरकार ने नियम-कानून बताकर जिस तरह भारत को उसके खाताधारकों की जानकारियाँ मुहैया कराने से मना कर दिया उससे यह तो साफ हो ही जाता है कि वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कुछ दिन पूर्व संसद में जो आश्वासन दिया था कि केंद्र सरकार विदेशी बैंकों में जमा काले धन का खुलासा करेगी और उसे हर कीमत पर वापिस भारत लेकर आयेगी। स्विस सरकार के हालिया भारत विरोधी निर्णय से अब सरकार की यह मंशा पूरी होते नजर नहीं आ रही है। इसे हम भारत की विदेश नीति की असफलता ही कहेंगे।

स्विस बैंक एसोसिएशन के दस्तावेजों के अनुसार भारतीयों का इतना धन उनके यहाँ की विभिन्न बैंकों में जमा है, जिसका अनुमात भी किसी अर्थशास्त्री के लिए असंभव है। ऑंकंडे बताते हैं कि 14.56 खरब डालर आज भारत का सिर्फ स्विस बैंकों में है। अभी अन्य देशों के बारे में तो विचार ही नहीं किया जा रहा नहीं तो पता नहीं कितनी बेहिसाब खरबों डालर की राशि का पता लगे। फिर यदि इन ऑंकंडों को भी हम स्वीकार न करे, यह बहुत यादा लगे तो जो जानकारी छन-छन कर आई है उसके अनुसार भारत का स्विस बैंकों में 25 लाख करोंड रूपया यानि 500 मिलियन डालर जमा है जो कि हिन्दुस्थान के सभी क्षेत्रों में विकास के लिए आवश्यक राशि से कई गुना यादा आकी गई है। इसके सामने फिर देखने योग्य यह है कि आज भारत का वार्षिक विकासपरक बजट क्या है? केवल चार लाख करोंड।

वैसे भी हमारे देश में जन साधारण के बीच कई बार यह बात स्वयं प्रधानमंत्रियों द्वारा कही जाती रही है कि केंद्र से विकास के लिए भेजी जाने वाली राशि का 15 प्रतिशत ही मूल विकास कार्यों पर खर्च होता है यानि रूपये में से 15 पैसे शेष राशि भ्रष्टाचार की भेट चंढ जाते हैं।

”ग्लोबल फाइनेंशल इंटेग्रिटी” आर्थिक मामलों की अमेरिकी संस्था का सर्वे जिसमें विकास शील देशों की सूची में विश्व के 160 देश सम्मलित किए गए थे। भ्रष्टाचार करने के मामलों में भारत को पाँचवें पायदान पर रखता है। हालांकि इस संस्था का सर्वे बताता है कि चीन, सउदी अरब, मेस्सिको और रूस के बाद भारत का नंबर काली कमाई को अपने देश से सबसे अधिक बाहर भेजने की सूची में है किन्तु 27 अरब डालर का काला धन हर साल भारत से बाहर जाना अत्यधिक चिंता का विषय जरूर है। जीएफआई के आंकंडों के अनुसार गैर कानूनी तरीके से औसतन 22.7 अरब अमेकिरी डालर और अधिकतम 27.3 अरब अमेरिकी डालर प्रतिवर्ष भारत के बाहर भेजा जा रहा है। जब काले धन को लेकर गहन अध्ययन किया गया, तो यह भी बात निकलकर आई कि स्विस बैंकों के अलावा पूरी दुनिया में अन्य 77 स्थान हैं जो टैक्स हैवन माने जाने जाते हैं। जहाँ चोरी की पूँजी जमा की जाती है। इसके कारण भारत जैसे विकासशील देशों को प्रतिवर्ष अरबों-खरबों का नुकसान होता है।

अध्ययन का निष्कर्ष बताता है कि भारत की कुल जीडीपी का 40 फीसदी धन ब्लैक मनी के तौर पर इस्तेमाल होता है। सरकारी आंकंडे भी इस बात को पुष्ट करते हैं कि आज जो जीडीपी में सीधे टैक्स का प्रतिशत 5.5 फीसदी है यदि काले धन पर काबू पा लिया जाए तो यह प्रतिशत 15 से 18 पर पहुँच जायेगा।

आखिर कौन लेगा इसकी जिम्मेदारी? केंद्र में जिसकी सरकार है वह कांग्रेस पार्टी जिसे देश की 32 फीसदी जनता भ्रष्ट मानती है, 21 प्रतिशत लोग बहुजन समाज पार्टी को तथा 19 प्रतिशत समाजवादी पार्टी को भ्रष्ट मानते हैं। हाँ यह कह सकते हैं कि कांग्रेस जैसी राष्ट्ीय पार्टी की तुलना में भारतीय जनता पार्टी कम भ्रष्ट है। किन्तु इस पर उसे क्लीन चिट नहीं दी जा सकती है। आखिर आज देश में 16 प्रतिशत लोग उसे भी भ्रष्ट मानते ही हैं। भ्र्र्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए क्या किया जाए? प्रात: सभी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों पर तो भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होते रहे हैं

वस्तुत: इन परिस्थितियों के विरोध में आम आदमी को अपनी आवास बुलंद करने की जरूरत है। आज जो लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था में 30 प्रतिशत वोटों के बल पर 100 प्रतिशत क्षेत्र की जनता का नेतृत्व करने का अधिकार विधायक और सांसद को मिल जाता है। उसके स्थान पर चुनावों में 50 प्रतिशत मत प्राप्त करना प्रत्येक प्रत्याशी को जीतने के लिए अनिवार्य किए जाने की आवश्यकता है। सरकार एक बार बने तो फिर मध्यावति चुनाव होने का कोई भय न रहे। एक बार विधायक या सांसद चुने जाने वाले प्रतिनिधि को यह हक भी नहीं दिया जाए कि विधायक रहते हुए वह सांसद का चुनाव लंडे या सांसद रहते हुए विधायक का। प्रत्येक नेता को अपना कार्यकाल पूरा करना आनिवार्य बना देना चाहिए। वहीं दो स्थानों से चुनाव में खंडे होने की अनुमति भी किसी को नहीं मिले। जिसमें दोनों स्थानों पर जीतने पर एक स्थान छोंडना पंडता है। इन राजनीतिक सुधारों के अलावा भी शिक्षा, व्यवसाय, विधि क्षेत्रों में आज अनेक सकारात्मक-गुणात्मक सुधारवादी परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

भारत की आम जनता जब तक जन जागरण का शंखनाद नहीं करेगी न भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सकती है और न ही वैश्विक स्तर पर भारत कभी सशक्त बन सकेगा। ऐसी अनेक दुस्साहस पूर्ण घटनाएँ घटती रहेंगी। यह भारत की सीधी-सीधी सम्प्रभुता पर चोट करना ही कहा जाएगा, जो स्विस सरकार नियमों का हवाला देकर अपने यहाँ के भारतीय खाता धारकों के पते भारत को देना नहीं चाहती है जबकि वह अमेरिका को इसी मामले में निरंतर हर संभव मदद दे रही है।

-मयंक चतुर्वेदी

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1 Comment on "स्विस सरकार के खिलाफ अब क्या नीति अपनाएगा भारत"

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R.Kapoor
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मयन्क जी नॆ बहुत सारगर्भित,तथ्यपूर्ण‌ लॆख लिखा है. एक सूचना कॆ अनुसार कॆन्द्र सरकार का वार्शिक बजट सात लाख का है, ज़रा जाचलॆ. वर्तमान सरकार जनता नॆ शायद् नही बनाई, ई.वी. ऎम. पर‌ कयी दॆशॊ मे प्रतिबन्ध है.
वह अकरण नही;सकारण‌ है.अत: इसपर विचार् हॊनाचाहियॆ.

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