सीमा विवाद के बहाने उन्माद में चीन

प्रमोद भार्गव

पिछले एक माह से सिक्किम की सीमा पर जारी तनाव से चीन लगातार उन्मादी तेवर दिखा रहा है। उसकी यह बौखलाहट इसलिए भी है, क्योंकि भारत भी पीछे हटने की बजाय सख्ती बरत रहा है। लिहाजा चीनी विदेश मंत्रालय में जहां पंचशील समझौता तोड़ने का आरोप भारत पर मढ़ा है, वहीं चीन का अंग्रेजी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स‘ भारत को निरंतर गीदड़ भभकी देने में लगा है। चीन के भारत में स्थित राजदूत ने यहां तक कह दिया है कि भारत की सेना पीछे नहीं हटी तो सीमा पर चल रहे विवाद के परिप्रेक्ष्य में चीन सैन्य विकल्प का रास्ता भी चुन सकता है, लेकिन यह भारत को तय करना है कि वह शांति चाहता है अथवा सैन्य विकल्प। दूसरी तरफ ‘ग्लोबल टाइम्स‘ ने अपनी संपदकीय में उन्मादी तेवर दिखाते हुए लिखा है कि भारत को इस बार 1962 के युद्ध से भी ज्यादा हानि उठानी पड़ सकती है। चीन के इस रुख से साफ है कि चीन बीच का रास्ता निकालने की बजाय केवल अपनी शर्त थोपने का इच्छुक है। यही रवैया वह अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी अपनाता रहा है। हालांकि मौजूदा विवाद से भारत का कोई सीधा संबंध नहीं है। यह विवाद चीन और भूटान के बीच है। लेकिन भारत और भूटान के बीच विदेश और रक्षा नीति में अपना मित्र मानता है, इसलिए भारत का यह नैतिक तकाजा है कि वह छोटे से देश भूटान की मदद करे।

ताजा विवाद चीन की तरफ से डोकलम क्षेत्र में सामरिक सड़क के निर्माण को लेकर है। डोकलम क्षेत्र को चीन ने चीनी नाम डोगलांग दिया है, जिससे यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है। चीन इस पर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थाई घुसपैठ की कोशिश में है। जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। दरअसल चीन अर्से से इस कवायद में लगा है कि चुंबा घाटी जो कि भूटान और सिक्किम के ठीक मघ्य में सिलीगुड़ी की ओर 15 किलोमीटर की चौड़ाई के साथ बढ़ती है, उसका एक बड़ा हिस्सा सड़क निर्माण के बहाने हथिया ले। चीन ने इस मकसद की पूर्ति के लिए भूटान को यह लालच भी दिया था, कि वह डोकलम पठार का 269 वर्ग किलोमीटर भू-क्षेत्र चीन को देदे और उसके बदले में भूटान के उत्तर पश्चिम इलाके में लगभग 500 वर्ग किलोमीटर भूमि लेले। लेकिन 2001 में जब यह प्रस्ताव चीन ने भूटान को दिया था, तभी वहां के शासक जिग्में सिग्ये वांगचूक ने भूटान की राष्ट्रिय विधानसभा में यह स्पष्ट कर दिया था कि भूटान को इस तरह का कोई प्रस्ताव मंजूर नहीं है। छोटे से देश की इस दृढता से चीन आहत है। इसलिए घायल सांप की तरह वह अपनी फुंकार से भारत और भूटान को डस लेने की हरकत करता रहता है।

भारत और भूटान के बीच 1950 में हुई संधि के मुताबिक भारतीय सेना की एक टुकड़ी भूटान की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भूटान में हमेशा तैनात रहती है। इसी कारण जब चीन भूटान और सिक्किम सीमा के त्रिकोण पर सड़क निर्माण को आगे बढ़ा रहा था, तब भूटान ने इसे अपनी भौगोलिक अखंडता एवं संप्रभुता पर हस्तक्षेप माना। नतीजतन संधि के अनुसार भारतीय सेना का दखल अनिवार्य हो गया। सेना ने भी सड़क निर्माण का कार्य रोकने में शक्ति का प्रयोग न करते हुए, मानव श्रृंखला बनाकर कार्य बाधित किया। किसी विवाद को तत्काल रोकने का शालीनता से भरा इससे अच्छा कोई और उपाय सीमा पर संभव ही नहीं था ? बावजूद चीन का सरकारी अखबार और विषेशज्ञ इस उदार स्थिति को युद्ध की पूर्व भूमिका बता रहे है।

मई 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुशल कूटनीति के चलते सिक्किम भारत का हिस्सा बना था। सिक्किम ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी चीन के साथ सीमा निर्धारित है। यह सीमा 1898 में चीन से हुई संधि के आधार पर सुनिष्चित की गई थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन और ब्रिटिश भारत के बीच हुई संधि को 1959 में एक पत्र के जरिए स्वीकार लिया था। इस समय चीन में प्रधानमंत्री झोऊ एनलाई थे। इसके बाद भारत में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकारें रही, जो नेहरू के पत्र की स्वीकरता को द्विपक्षीय संधि की तरह ढोती रही है। अब राजग की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है, जो अब कांग्रेस के ऐसे आश्वासनों को मानने को कतई तैयार नहीं हैं, जो वस्तुस्थिति को टालने वाले हों। हालांकि 1998 में चीन और भूटान सीमा-संधि के अनुसार दोनों देश यह शर्त मानने को बाध्य है, जिसमें 1959 की स्थिति बहाल रखनी है। बावजूद चीन इस स्थिति को सड़क के बहाने बदलने को आतुर तो है ही, युद्ध के हालात भी उत्पन्न कर रहा है। भारत इस विवादित क्षेत्र डोकाला, भूटान डोकलम और चीन डोगलांग कहता है। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां आबादी का घनत्व न्यूनतम है। पिछले एक दशक से यहां पूरी तरह शांति कायम थी, लेकिन पड़ोसियों से हरकत की प्रवृत्ति रखने के आदी चीन ने सड़क का निर्माण कर इस शांत क्षेत्र में अशांति ला दी है।

अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की जून-2016 में आई रिपोर्ट ने भारत को सचेत किया था कि चीन भारत से सटी हुई सीमाओं पर अपनी सैन्य शक्ति और सामरिक आवागमन के संसाधन बढ़ा रहा है। अमेरिका की इस रिपोर्ट को भारत ने तत्काल गंभीरता से लेकर आपत्ति जताई होती तो शायद मौजूदा हालात निर्मित नहीं होते। भारत और चीन के बीच अक्साई चिन को लेकर करीब 4000 किमी और सिक्किम को लेकर 220 किमी सीमाई विवाद है। तिब्बत और अरुणाचल में भी सीमाई हस्तक्षेप कर चीन विवाद खड़ा करता रहता है। 2015 में उत्तरी लद्दाख की भारतीय सीमा में घुसकर चीन के सैनिकों ने अपने तंबू गाढ़कर सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया था। तब दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच 5 दिन तक चली वार्ता के बाद चीनी सेना वापस लौटी थी। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर पानी का विवाद भी खड़ा करता रहता है। दरअसल चीन विस्तारवादी तथा वर्चस्ववादी राश्ट्र की मानसिकता रखता है। इसी के चलते उसकी दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार को लेकर वियतनाम, फिलीपिंस, ताइवान और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ ठनी हुई है। यह मामला अंतरराष्ट्रिय पंचायत में भी लंबित है। बावजूद चीन अपने अड़ियल रवैये से बाज नहीं आता है। दरअसल उसकी मंशा दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधन हड़पना है। इसीलिए आज उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को छोड़ ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जिसे चीन अपना पक्का दोस्त मानता हो।

लिहाजा चीन को यह समझाना जरूरी है कि अब अंतरराष्ट्रिय स्थितियां 1962 जैसी नहीं है और न ही भारत उन दिनों जैसी लाचार स्थिति में है। अब वह एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है और नरेंद्र मोदी ने अनेक देशों से नए मजबूत राजनयिक संबंध बनाए हैं। बावजूद इस मोर्चे पर राजनयिक सक्रियता की और जरूरत है। मोदी का पहले यूरोप, फिर अमेरिका और अब इजराइल दौरा होने के साथ, भारत, जापान और अमेरिका की सेनाओं का बंगाल की खाड़ी में साझा मालाबार अभ्यास इसी रणनीति का हिस्सा कही जा सकती है। इस युद्धाभ्यास में तीनों देशों के श्रेष्ठतम जंगी बेड़े शामिल होंगे। चीन से फिलहाल दक्षिण-पश्चिम एशिया के भी कई देश खुश नहीं है। गोया, भारत इनसे अच्छे संबंध विकसित करके चीन की कुटिल रणनीति को जबाब दे सकता है। चीन के बरक्ष भारत-अमेरिका-इजराइल गठबंधन को भी  अिस्तत्व में लाया जा सकता है। चीन से जापान की नाराजी जगजाहिर है, लिहाजा जापान भी यदि इस गठजोड़ का हिस्सा बन जाता है तो चीन को दिन में तारे दिखने लग जाएंगे। हालांकि मौजूदा समस्या का सामाधान न तो युद्ध में है और न ही लगातार राष्ट्रिय संप्रभुता का झण्डा बुलंद किए रहने में है, गोया, दोनों देशों के बीच संतुलन और शांति बनी रहती है तो यह एशिया ही नहीं समूची दुनिया के लिए बेहतर स्थिति होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,173 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress