लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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ramdevप्रवीण दुबे-
पूरा देश स्वामी विवेकानन्द की सार्धशती मना रहा है। वहीं स्वामी विवेकानन्द जिन्होंने 11 सितंबर को अमेरिका में आयोजित विश्व धर्मसभा में जब अपना संबोधन दिया था तो पूरी दुनिया नतमस्तक हो गई थी तो इसका अर्थ यह मान लिया जाए कि स्वामी विवेकानंद के उस संबोधन से पूर्व भारतीय विचार महान नहीं थे? ऐसा कदापि नहीं है। स्वामी विवेकानन्द तो एक माध्यम मात्र थे जिन्होंने भारतीय दर्शन की महान बातों को उस शिकागो धर्म सभा में रखा। उनसे पूर्व भी और उनके बाद भी तमाम ऐसी हिन्दुस्तानी प्रतिभाएं रही हैं जो भारतीय हिन्दू दर्शन से दुनिया को अवगत कराती रही हैं। भारत और उसका मूल दर्शन सदैव से महान था, महान है और महान रहेगा। स्वामी विवेकानन्द से लेकर वर्तमान भारत की तुलना की जाए तो हम पाते हैं कि इस दौरान यदि कुछ गुजरा है तो केवल समय 150 वर्ष पूर्व भी भारत और भारतीयों के प्रति जो भाव अमरीकी या यूरोप वासियों में था वह आज भी समाप्त नहीं हुआ है। भारतीय जीवन मूल्य, भारतीय दर्शन को लेकर उस समय भी दुनियाभर में घबराहट थी और आज भी। जरा याद कीजिए शिकागो धर्मसभा में अपना विश्व विख्यात भाषण देने से पूर्व स्वामी जी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। आज एक भारतीय होने के नाते हम विचार करें तो भारतवासियों की यह परेशानियां कम नहीं हुई हैं। पिछले एक माह के दौरान घटित तीन घटनाओं पर हम विचार करें तो बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है।
बाबा रामदेव का लंदन में अपमान -बाबा रामदेव एक योग गुरु हैं । इस देश की पुरातन परम्पराओं से जुड़े योग विज्ञान को उन्होंने पूरी दुनिया में न केवल लोकप्रिय किया है बल्कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर दी है। वही बाबा रामदेव 19 सितंबर को लंदन जाते हैं तो उन्हें हवाईअड्डे पर रोक लिया जाता है। पूछताछ होती है एक-दो नहीं पूरे आठ घंटे तक, बाबा के सहयोगी, समर्थक जब पूछताछ करते हैं  तो बताया जाता है कि बाबा के खिलाफ रेड अलर्ट नोटिस हैं। उनकी तलाशी ली जाती है जैसे बाबा कोई अपराधी हैं। यह सारा खेल आठ घंटे तक चलता है और फिर बाबा को छोड़ दिया जाता है। आखिर यह घटनाक्रम किस बात का संकेत है? साफ है बाबा रामदेव से वे शक्तियां घबराई हुई हैं जो भारतीय विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को कुचलना चाहती हैं। उनमें घबराहट है कि कहीं भारत की तरह पूरा यूरोप भारतीय योग दर्शन के आगे नतमस्तक न हो जाए। यूं तो इसका उदाहरण भारत में भी देखने को मिल चुका है जब मध्यप्रदेश जैसे प्रांत ने योग को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने की घोषणा की तो ईसाई  मिसनरीज से जुड़े तमाम विद्यालयों ने यह कहकर योग शिक्षा का विरोध किया कि यह ईसाई संस्थाओं को स्वीकार नहीं,तमाम मुस्लिम संगठनों ने भी इसको इस्लाम के खिलाफ बताया। यह उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि ईसाई और मुस्लिम जगत भारतीय योग शास्त्र से घबराया हुआ है और उसे डर है कि ईसाई और मुस्लिम धर्मावलंबी भारतीय योग परम्परा से न जुड़ जाएं। यही कारण है कि बाबा रामदेव को लंदन में रोका गया और कड़ी पूछताछ की गई ताकि कोई कमी निकालकर उनपर आरोप लगाए जाएं और उन्हें वापस भारत लौटा दिया जाए। बाबा रामदेव ने इस घटनाक्रम के दौरान जो कहा वह भी ध्यान देने योग्य है। बाबा का कहना था कि यह सारा घटनाक्रम भारत सरकार द्वारा लंदन को दी गई गलत जानकारी के कारण निर्मित हुआ है। बाबा रामदेव के सहयोगी श्री तिजारावाला ने जो खुलासा किया है वह भी बेहद चौंकाने वाला है । उन्होंने कहा कि जिस दौरान लंदन एअरपोर्ट पर बाबा रामदेव को रोका गया उसी समय उन्होंने एक पत्र भारतीय दूतावास के अधिकारियों और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को लिखा लेकिन उसकी अनदेखी कर दी गई। यह बात बाबा रामदेव के उस आरोप को मजबूत करती है जिसमें उन्होंने कहा कि लंदन में उनके साथ जो कुछ हुआ उसके पीछे भारत सरकार है।वैसे भी बाबा रामदेव को फंसाने के लिए मनमोहन सरकार ने पिछले पांच वर्षों में जो कुछ हथकंडे अपनाए हैं वह किसी से छुपे नहीं हैं। कभी दवाओं में हड्डी का चूरा मिलाने का आरोप लगाया गया तो कभी आयकर की चोरी का आरोप यह सब सिद्ध करता है कि हिन्दू मान्यताओं, परम्पराओं और दर्शन को आगे बढ़ा रहे बाबा रामदेव को बदनाम करने का षड्यंत्र लगातार जारी है।
नीना की जीत से अमरीकियों के पेट में मरोड़ – नीना दाबुलूरी भारतीय मूल की वह अमरीकी सुंदरी जिसने पिछले दिनों मिस अमेरिका का ताज अपने नाम किया। अमेरिकावासी इस बात को पचा नहीं पा रहे कि आखिर एक भारतीय मूल की लड़की ने मिस अमेरिका का खिताब कैसे जीत लिया। नीना दाबुलूरी ने इस खिताब को जीतने से पूर्व कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया और भारतीय परिधान पहनकर पूरे माहौल में हिन्दू संस्कृति की ख्ुाशबू फैला दी। यह देख दाबुलूरी पर अमरीकियों ने नस्लभेदी टिप्पणियां की और सोशल मीडिया पर लिखा कि कैसे कोई भारतीय लड़की मिस अमरीका का खिताब जीत सकती है । सच पूछा जाए तो यह विरोध नीना का नहीं बल्कि महान भारतीय विचारों, प्रतिभाओं के सामने नतमस्तक और पिछड़ते जा रहे अमरीकियों का था जो भारतीय जीत पर अपनी खीज निकाल रहे  थे। जनगणना ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में करीब 32 लाख भारतीय रहते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में पेशेवर मेडीकल डाक्टर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर और तमाम बड़ी कंपनियों के मालिक हैं। स्वयं अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने भारतीय युवकों और प्रतिभाओं की कई बार प्रशंसा की है। यही वजह है स्वयं को दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली राष्ट्र का नागरिक समझने वाले आम अमरीकी भारतीय प्रतिभा से चिढऩे लगे है और नीना की जीत पर प्रस्तुत विरोध इसका प्रगटी करण था।
सुष्मिता बनर्जी की हत्या-ऐसा कदापि नहीं है कि विश्व पटल पर उभरती भारतीय प्रतिभाओं से केवल अमेरिका, यूरोप या लंदन में ही बेचैनी है, इन प्रतिभाओं ने इस्लामी देशों खासकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान मलेशिया सहित पूरे अरब जगत में भी खलबली मचा रखी है। एक तरफ पाकिस्तान इस बात को लेकर परेशान है कि उसका पड़ोसी प्रत्येक क्षेत्र में आगे क्यों बढ़ता जा रहा है तो मलेशिया व अरब देश इस कारण से परेशान हैं कि एक गैर इस्लामिक देश की युवा प्रतिभाएं उनके यहां प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व कैसे बढ़ाती जा रही हैं । इसी बात का प्रमाण है कि कई बार यहां भारतीयों पर सामूहिक हमले हुए हैं। अफगानिस्तान जैसा देश जो कि आतंकवाद का गढ़ बना हुआ है वहां आतंकवादी भी भारतीय प्रतिभाओं से भयभीत नजर आते है। हाल ही में युवा भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी की तालिबानी आतंकवादियों ने उनके घर में घुसकर हत्या कर डाली। सुष्मिता की हत्या इस कारण की गई क्योंकि वह स्थानीय महिलाओं की जिंदगी पर एक फिल्म बना रही थी जिसमें तालिबानी मानसिकता पर चोट की गई थी। बनर्जी की किताब  काबुलीवाला बंगाली बू 1995 में भी उन्होंने तालिबान से बच भागने का वर्णन किया है। 2003 में इस पर फिल्म भी बन चुकी है, ”एसकेप फ्रॉम तालिबानÓÓ इस फिल्म में मनीषा कोइराला ने मुख्य भूमिका निभाई थी। तालिबानी आतंकवादी इस भारतीय मूल की लेखिका की लेखन प्रतिभा से भयभीत थे उन्हें डर था कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुष्मिता की कलम आतंकवाद के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय हथियार का रूप न लेले यही वजह रही कि तालिबान ने उसे मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द से लेकर सुष्मिता बनर्जी तक पिछले 150 वर्षो में भारतीय प्रतिभाओं ने अपनी बौद्धिक क्षमता से पूरे विश्व में भारत का परचम फहराया है। बड़े दुख की बात है इन 150 वर्षो में अमरीका , यूरोप या अरब राष्ट्रों ने कितना ही विकास किया हो, वह भले ही स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सबित करने का दावा करते हों लेकिन भारत की बौद्धिक प्रतिभाओं और हिन्दू दर्शन की महानता ने उन्हें सदैव भयभीत किया है और इसका जवाब वह आज तक नहीं खोज पाए हैं।

मोदी से निकटता की सजा
आगामी लोकसभा चुनाव और लगातार नीचे जाते जनाधार ने सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और उसके प्रमुख राजनीतिक घटक दल कांग्रेस के नेताओं की नींद उड़ा दी है। यही वजह है कि अब यह सरकार प्रत्येक उस व्यक्ति के साथ दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई को अंजाम दे रही है जिससे उसको भय है। इतना ही नहीं कांग्रेस नेता अपना घर सुधारने के बजाय विपक्षी भाजपा के अंदरूनी मामलों पर भी बयानबाजी करने से नहीं कतरा रहे। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह पर एक अनधिकृत अभियान के लिए तकनीकी सहयोग प्रकोष्ठ टीएसडी का दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने को लेकर जो आरोप लगाए जा रहे हैं वह वास्तव में इस सरकार की ओछी मानसिकता और घबराहट का प्रतीक हैं। जिस खुफिया रिपोर्ट का हवाला देकर जनरल वी.के. सिंह को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है उसको लेकर सेना और रक्षा मंत्रालय को इसकी जांच में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला है। इतना ही नहीं सेना ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पास बंद करने के लिए भेजा था। बड़े अफसोस की बात है कि यह सारा घटनाक्रम सैन्य मामलों से जुड़ा होने के बावजूद जनता के बीच आया और तो और जनरल वी.के. सिंह ने स्वयं यह खुलासा करके बताया कि रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव रह चुके एक व्यक्ति ने वैमनस्यता के चलते इस रिपोर्ट को लीक किया है। होना तो यह चाहिए था कि भारत सरकार इस तरह सैन्य मामलों से जुड़ी गोपनीय रिपोर्ट के लीक होने पर कड़ी कार्रवाई करते हुए इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति को कड़ी से कड़ी सजा देती, लेकिन जो कुछ सरकार कर रही है वह इसके ठीक उलट है। सैन्य दस्तावेज लीक करने वाले को सजा देना तो दूर उल्टे जनरल वी.के. सिंह पर आरोप लगाकर सैन्य दस्तावेज सार्वजनिक करने वाले की मदद की जा रही है। मनमोहन सरकार इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को लेकर पूरी दुनिया में बदनामी का शिकार हो रही भारतीय सेना की भी चिंता नहीं रह गई है और प्रकरण को समाप्त करने और सार्वजनिक बहस से बचने तक के निर्देश जारी नहीं किए जा रहे। साफ है इसके पीछे सरकार का राजनीतिक स्वार्थ मुख्य मुद्दा है जिसके चलते वह राष्ट्रहित तक को दरकिनार किए हुए है। आखिर सरकार को प्रत्येक उस व्यक्ति से डर क्यों लगता है जो राजनीतिक मंचों से मनमोहन सरकार के विरोध में आवाज बुलंद करता है। इस लिहाज से जनरल वी.के. सिंह ने बिल्कुल ठीक ही कहा है कि यह पूरा मुद्दा राजनैतिक दुर्भावना से प्रेरित है। इसके पीछे कई कारण हैं जिनमें से एक भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करना शामिल है। इससे भी ज्यादा गंभीर बात तो जनरल वी.के. सिंह ने यह कही है कि हथियारों के सौदागरों के बीच साठगांठ है और उनके कारण ही मुझे फंसाने की कोशिश की गई है। यदि वी.के. सिंह सही कह रहे हैं तो देश की सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद गंभीर बात है। देश के सामने इसकी सच्चाई आना चाहिए कि हथियारों के सौदागर कौन हैं? और सरकार में किस-किस के बीच इनकी साठगांठ है। वास्तव में मनमोहन सरकार का यह सारा कृत्य शर्मसार कर देने वाला है इससे न देश का भला होने वाला है न सरकार का पूरा देश यह भली प्रकार समझ चुका है कि जनरल वी.के. सिंह को क्यों परेशान किया जा रहा है, इससे पूर्व भी बाबा रामदेव हों या अण्णा हजारे अथवा कर्ई अन्य राष्ट्रभक्त संगठनों से जुड़े लोग जिनसे कि मनमोहन सरकार और सोनिया गांधी को खतरा लगता है, उन्हें इसी प्रकार गलत आरोप लगाकर फंसाया जाता रहा है।

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