लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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ayodhyaहमारे अतीत का पवित्र स्मारक

अयोध्या हमारे गौरवपूर्ण अतीत का पवित्र स्मारक है, जिस पर हमें गर्व होना चाहिए। संपूर्ण विश्व इस पवित्र नगरी का ऋणी है, क्योंकि इक्ष्वाकु वंश की अनेकों पीढिय़ों ने यहां से विश्व पर शासन किया और आर्यावत्र्तीय राजाओं ने विश्वशांति की दिशा में ठोस उपाय किये।

विदेशी इतिहासकारों का एक कुचक्र

विदेशी इतिहासकारों ने हमें अपनी विरासत से काटने के लिए इस नगरी की ऐतिहासिकता को समाप्त करने का कुचक्र चलाया, जिसे कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले लेखकों ने हवा दी। इन लोगों ने अयोध्या को केवल एक धार्मिक नगरी के रूप में स्थापित किया। जब इतने से भी कार्य नही बना तो इन्होंने राम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया और कह दिया कि रामायण एक उपन्यास है और इसके सभी पात्र काल्पनिक हैं। ऐसी अवधारणा स्थापित करने वाले इतिहास लेखकों की भारत के विषय में यह बहुत गहरी चाल थी। अपनी इस चाल में सफल होने के लिए और भारत अतीत पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए इन लोगों ने वह सब कुछ किया-जो ये कर सकते थे।

यह विचार ऐसे ही नही चला, इसके पीछे हमारे अतीत की सुगंध गौरव, गर्व और वैभव को नष्ट करने का उद्देश्य कार्य कर रहा था। दुर्भाग्य से इस विचार को कई लोगों ने हमारे अपने ही भारत के लोगों ने हमारे मध्य से उठकर भी मानने का दुस्साहस किया। इससे भारतवासियों को पूर्णत: धार्मिक रूप से पाखण्डी, अज्ञानी और  बुद्घिहीन मानने की परंपरा चल पड़ी।

नागेश्वर मंदिर की साक्षी

नागेश्वर मंदिर के अनुसार रामजन्मभूमि को खोजकर महाराजा विक्रमादित्य ने वहां एक दुर्ग का भी निर्माण कराया था, जिसे रामगढ़ का नाम दिया गया था। आज के ‘कनक भवन’ और ‘कुबेरनाथ मंदिर’ उसी समय के हैं। आज की ‘हनुमान गढ़ी’ को देखकर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय के मंदिर को एक किले का रूप दिया गया था। इसी तथ्य को ‘रेती पाटन’ क्षेत्र की कथा भी प्रमाणित करती है, जिसके अनुसार विक्रमादित्य ने यहां 360 मंदिर बनवाये थे। तब यहां मंदिर ही मंदिर थे।

…..और अयोध्या बन गयी धार्मिक नगरी

इस प्रकार अयोध्या संपूर्ण देश की आस्था का केन्द्र बनती चली गयी। इसका वैभव पुन: लौटा और विभिन्न अखाड़ों के संतों तक ने यहां अपने-अपने मंदिर भवन स्थापित करने आरंभ कर दिये। इस प्रकार जो अयोध्या देश को कभी राजनीतिक रूप से शासित करती थी, वह अब सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से हमारा मार्गदर्शन करने लगी। सरयू के प्रति लोगों में श्रद्घा बढ़ी और अयोध्या का कण-कण देशवासियों के लिए वंदनीय हो उठा। कालांतर में कुछ पाखण्डी लोगों ने भारत की आर्य जनता को अज्ञान और अविद्या में धकेलकर उनकी आस्था का दुरूपयोग किया और मठाधीश बनकर धर्म का पतन करने में भी उन्होंने संकोच नही किया।

सन 700 तक भारत की राजधानी रही अयोध्या

सम्राट समुद्रगुप्त के गया ताम्र -पत्र के अनुसार अयोध्या में हस्ति, अश्व तथा नौका आदि विभागों से युक्त सम्राट का सैन्य शिविर विद्यमान था। इसका अभिप्राय है कि राजाओं और सम्राटों ने भी अयोध्या को प्रत्येक प्रकार से संरक्षित और सुरक्षित रखने की ओर ध्यान दिया। कालिदास ने अपने ‘रघुवंश’ में विल्हण ने अपने ‘विक्रमादित्य चरितम्’ में तथा महर्षि पतंजलि ने ‘पातंजलि महाभाष्यम्’ में तत्कालीन अयोध्या के वैभव का वर्णन किया है। आर.एन. दाण्डेकर, सच्चिदानंद भट्टाचार्य, स्मिथ आदि इतिहासकारों ने ई. सन 700 तक अयोध्या को भारत देश की राजधानी माना है। जिससे पता चलता है कि अयोध्या का कितना पावन, पवित्र और गौरवमयी अतीत है। इसका वैभव हमारे आत्मोत्थान की और इसके पावनता हमारे अध्यात्म की पवित्रता की कहानी कहता है, जिस पर प्रत्येक भारतीय को गर्व होना चाहिए।

चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा फाहियान ने भी अयोध्या का उल्लेखनीय वर्णन किया है। फाहियान ने साकेत को अपनी भाषा में ‘शाची’ के नाम से उल्लेखित किया है।

राजा सुहेलदेव और अयोध्या

राजा सुहेलदेव हिंदुत्व के परमोपासक और प्रतापी शासक माने गये हैं। उनकी धर्म के प्रति गहरी निष्ठा थी। इसलिए अयोध्या के प्रति भी वह आस्थावान न हों, यह कैसे संभव था? सन 1029 की घटना है, रामनवमी का दिन था। राजा सुहेलदेव अपनी पुत्री के साथ यहां स्नान करके घाट पर बैठे उससे वात्र्ता कर रहे थे। राजा सुहेलदेव पुत्री को बता रहे थे कि जब यहां (अयोध्या में) महमूद गजनवी आया और उसने यहां भयंकर विनाश का तांडव मचाया था तो राजा जयपाल ने किस प्रकार उसके छक्के छुड़ा दिये थे और पवित्र ‘रामजन्मभूमि’  की रक्षा की थी।

उन्होंने बताया कि महीपाल नामक हिंदू वीर ने सलार मसूद की नाक काट डाली थी क्योंकि वह भी रामजन्म भूमि की ओर कुदृष्टि डालकर आगे बढ़ा था। इतना ही नही सलार मसूद जैसे भयंकर शत्रु पर प्रहार कर महीपाल नामक उक्त हिंदू वीर ने उसके सामने के दो दांत भी तोड़ दिये थे। उस दिन वह बालक महीपाल दूसरे अभिमन्यु के रूप में अवतरित हुआ था। महाराजा सुहेलदेव का राज्य बहुत विस्तीर्ण था। उसे हिंदुत्व पर बड़ा गर्व था, इसलिए संस्कृति रक्षा को और धर्मरक्षा को वह अपना उद्देश्य मानता था। अयोध्या उसके विस्तृत साम्राज्य की उप राजधानी थी, जबकि मुख्य राजधानी श्रावस्ती थी। उसके अधीन बहुत से माण्डलीक राजा थे। उनकी पुत्री का नाम पदमा था। जिसे वह अयोध्या के वैभवपूर्ण गौरव के विषय में बताते-बताते हिंदू गौरव और विदेशियों के तांडव तक आ गये थे।

राजा सुहेलदेव को अपने गुप्तचरों के माध्यम से सूचना मिल रही थी कि सालार मसूद पुन: अयोध्या की ओर बढऩे की योजना बना रहा है। सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के पश्चात रामजन्मभूमि के प्रति पूरे देश में चिंता बढ़ रही थी, पूरा हिंदू समाज आंदोलित था कि अयोध्या का गौरव बना रहना चाहिए। देश में धर्म प्रचारक लोग देशवासियों में जागरण कर रहे थे कि शत्रु कभी भी आ सकता है। अत: जागते रहो,….सावधान रहो। महाराज सुहेलदेव जैसे पराक्रमी शासक को अपने सुखई नामक गुप्तचर से सूचना मिली कि सालार मसूद अयोध्या की ओर चल दिया है। हिंदुत्व के गौरव उस महानायक ने भी निर्णय ले लिया था कि इस बार उसे आने दो….उसका सर्वनाश कर दिया जाएगा।

‘फैजाबाद गजेटियर’ की साक्षी

‘फैजाबाद गजेटियर’ से ज्ञात होता है कि सालार मसूद मेरठ, फर्रूखाबाद, कन्नौज और लखनऊ की ओर से अयोध्या की ओर बढ़ रहा था। उसे इन शहरों में भी हिंदू प्रतिरोध के कारण मनोवांछित सफलता नही मिल सकी थी। मसूद सतरिख (सप्तर्षि, साकेत) तक आ गया और उसे जीतकर अपनी राजधानी बना लिया।

सालार मसूद का आक्रमण

तब उसने अयोध्या पर प्रबल प्रहार करने की योजना बनायी। वह अयोध्या को विध्वंस कर देना चाहता था और यहां से हिंदुत्व के गौरवपूर्ण अतीत के प्रत्येक स्मारक को भूमिसात कर देना चाहता था। पर अयोध्या के तत्कालीन शासक  सुहेलदेव की योजना भी बड़ी सुदृढ़ थी। वह पहले ही अपने साथ हिंदू-धर्म रक्षक राजाओं का एक संघ बना चुका था।

अत: जब मसूद अयोध्या की ओर बढक़र कुबेरनाथ के मंदिर को तोडऩे के पश्चात ‘कनक भवन’ की ओर बढ़ा तो हिंदू राजाओं के प्रबल प्रहार के सामने उसकी शक्ति क्षीण हो गयी थी। भारत में इस प्रकार राजाओं के बने इस संघ ने यह सिद्घ कर दिया था कि अयोध्या ही नही अपितु भारत के धर्म और संस्कृति से जुड़े प्रत्येक ऐतिहासिक स्थल/भवन आदि के लिए वह अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं, क्योंकि यह उनकी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है।

राजा सुहेलदेव ने खदेड़ दिया था सालार मसूद को

अयोध्या के माध्यम से भारत की संस्कृति को नष्ट करने का उद्देश्य लेकर आये सालार मसूद को हिंदू गौरव राजा सुहेलदेव ने सीतापुर तक खदेड़ा था। सिंधौली के निकट स्थित ‘बड़ी’ नामक ग्राम में राजा ने मसूद के पांच सिपहसालारों को मार दिया था। उनकी कब्रें आज भी पंचपीर के नाम से वहां स्थित हैं।

इस बार सोमनाथ जैसी भूल न करने के लिए कृतसंकल्प हिंदू समाज ने शत्रु को हर प्रकार से घेरकर क्षति पहुंचाने की रणनीति पर काम किया। पाठकवृन्द! कृपया ध्यान दें कि सोमनाथ के मंदिर के तोड़े जाने की घटना 1026 ई. की है, और उसके तीन, चार वर्ष पश्चात ही भारत में राजाओं का संघ बन रहा है, केवल इसलिए कि शत्रु पुन: सोमनाथ के मंदिर का इतिहास अयोध्या में न दोहरा दे। इसका अभिप्राय है कि हमने समय रहते सचेत होकर घटनाओं से शिक्षा ली और सोमनाथ की पुनरावृत्ति अयोध्या में नही होने दी।

दिगंबरी अखाड़े के महंत शिव की वीरता

कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ से हमें ज्ञात होता है कि दिगम्बरी अखाड़े के महंत उस समय शिव थे जो कि राजा सुहेलदेव के लिए चाणक्य की भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने स्वयं ने भी अपने अनेकों संतों के साथ मिलकर सालार मसूद से युद्घ किया था। इसे आप भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष नही कहेंगे तो क्या कहेंगे?

संतों ने भी लिया युद्घ में भाग

जहां धार्मिक और वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति जनता मौन धारण कर लेती है वहां राजनीतिक स्वतंत्रता पर अपने अपने आप ही ग्रहण लग जाता है।

इसलिए भारत में अपनी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षार्थ पग-पग पर संघर्ष किये गये। मसूद के साथ संतों ने भी युद्घ क्षेत्र में कूदकर शिव के नेतृत्व में तांडव नृत्य किया और शत्रु को पराजित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया, ऐसे उदाहरण विश्व इतिहास में कम ही हैं, पर मेरा भारत तो भारत ही है जिसकी उपमा किसी अन्य देश से नही दी जा सकती। तभी तो समय आने पर और देशकाल परिस्थिति को समझते हुए साधु-संत भी धर्म की रक्षार्थ युद्घ में कूद पड़े।

हिंदू राजाओं को मिली सफलता

शिव के साथ-साथ हरदेव कायस्थ, राजा शंकर, रतन पांडेय आदि ने भी राजा त्रिलोचनपाल के साथ मिलकर सालार मसूद के विरूद्घ संघर्ष किया। युद्घ में निर्णायक सफलता हिंदू राजाओं को और संतों को मिली, सालार मसूद 1033 ई. में रामजन्म भूमि का बाल भी बांका नही कर पाया था। सर्वत्र प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी कि विदेशी धर्मावलंबी मसूद को हिंदू शक्ति के प्रबल प्रतिरोध के कारण अयोध्या से पराजित होकर लौटना पड़ गया।

राजा त्रिलोचन पाल का किया गया सम्मान

महंत शिव ने बड़ी प्रसन्नता की अभिव्यक्ति करते हुए त्रिलोचनपाल को ‘समरधीर’ की उपाधि से सम्मानित किया। महंत शिव की सेना के विषय में शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती ने कहा है-‘‘वे नाकूस बजाते थे, घण्टा हिलाते थे, बड़े सोहरके आतफाक थे। उनके कान घोंघे घडिय़ाल की आवाज के मुश्ताक थे। बड़े महंत जो मोहक भोग लगाते थे, वे बढक़र तलवार का वार भी करते थे। चोटी के जरार थे। हिंदू में नामूदार थे। लात वमनात पर जान से फिदा थे।’’ (संदर्भ: ‘मीरात-ए-मसूदी’)

इस वर्णन से पता चलता है कि विदेशी और विशेषत: मुसलमान लेखक हमारे इन संत महंतों और महात्माओ के युद्घ कौशल से कितने प्रभावित हो गये थे? यह दुर्भाग्य रहा है इस देश का कि इसके प्रचलित इतिहास में हमने ही इन वर्णनों को कोई स्थान नही दिया है।

संतों ने बनाया राष्ट्रवादी परिवेश

स्पष्ट है कि इस बार संतों ने भी शास्त्र की रक्षार्थ शस्त्र हाथ में लिये और एक क्रांति का बिगुल फूंक दिया। जिससे एक राष्ट्रवादी परिवेश देश में चारों ओर बना और शत्रु के विरूद्घ हिंदू शक्ति में एकता का भाव जागृत हुआ। यह क्रांति इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है, जिसे हमने भुला दिया है। आर्य परंपरा में यह प्रत्येक नागरिक का पावन कत्र्तव्य माना गया है कि जब देश पर शत्रु या उग्रवादी या आतंकी हमला कर रहे हों या देश की संस्कृति का विनाश कर रहे हों तो उस समय उनको देशरक्षा के लिए आगे आना चाहिए। उस समय देश रक्षा का अभिप्राय धर्म रक्षा ही होता है।

सालार मसूद प्राण बचाकर भाग गया

कहा जाता है कि सालार मसूद का पिता सालार शाह भी इस समय एक विशाल सेना लेकर अपने पुत्र की रक्षार्थ आ गया था, परंतु सालार मसूद का साहस इतना टूट चुका था कि वह रामजन्म भूमि की ओर बढ़े बिना ही भाग गया। उसे उस समय अपनी सेना की नही, अपने प्राणों की पड़ी थी।

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि भारतवासियों की एकता और देशधर्म के प्रति मर मिटने की भावना के कारण शत्रु यहां से किस प्रकार भाग गया था?

सत्रह हिंदू राजाओं ने बनायी थी राष्ट्रीय सेना

‘मीरात-ए-मसूदी’ से ही हमें ज्ञात होता है कि सुहेलदेव के साथ उस समय हिंदू राजाओं ने अपना संगठन बनाया था। जिसका उल्लेख यद्यपि हम पूर्व में इस इतिहास लेखमाला के प्रथम खण्ड (भारत का 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम-भाग-1) में कर चुके हैं,  परंतु प्रसंगवश उन सत्रह हिंदू राजाओं में से प्रमुख राजाओं के नाम एक बार पुन: दे रहे हैं। यथा-राय रईब, राय अर्जुन, राय जयपाल, राय भिखन, राय कनक, राय बीरबल, राय सबरू, राय भकरू, राय कल्याण, राय श्रीपाल, राय हरपाल, राय प्रभू, राय देवनारायण और राय नरसिंह आदि।

इन हिंदू राजाओं ने सामूहिक रूप से महासमर की तैयारी की थी और मुस्लिम सेना का इस बार कड़ा प्रतिरोध करने का निर्णय लिया था। सबका एक ही संदेश था और एक ही उद्देश्य था कि भारत भूमि हमारी है, इसे किसी भी विदेशी आततायी को लूटने नही देंगे, सोमनाथ का इतिहास अयोध्या में दोहराने नही दिया जाएगा, इसलिए देश की रक्षार्थ सब एक हो जाओ।

राजाओं के राष्ट्रवादी संदेश

मसूद का जीवनीकार लेखक शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती कहता है कि-‘‘हिंदू राजाओं ने इस बार परस्पर ऐसे संदेशों का आदान प्रदान कर लिया था, जिससे उनके मध्य एकता का प्रबल भाव जागृत हो उठा था। अत: राम जन्मभूमि के प्रति सबका सहयोग और सदभाव उस समय देखते ही बनता था।’’

वह हमें बताता है कि-‘‘मसूद के सैनिकों द्वारा एक भारतीय दूत पकड़ा गया जिसके पास से एक संदेश मिला उसमें लिखा था-अनादिकाल से यह भूमि साम्राज्य हमारा और हमारे पूर्वजों का रहा है। यहां कोई मुसलमान नही रहा है, लेकिन तुम दूसरे की संपत्ति के अधिकार का सम्मान किये बिना ऐसे देश में टिक गये जो तुम्हारा नही है। तुमने हमारे धार्मिक श्रद्घास्थान (सोमनाथ जैसे मंदिरों की ओर संकेत है) नष्ट किये हैं। साकेत बड़ा स्थान है लेकिन तुम्हारे रहने के लिए उपयुक्त नही है। तुम्हारे (मुसलमानों के लिए) लिए यही उपयुक्त होगा कि जैसे आये हो वैसे ही लौट जाओ।’’

यह संदेश कड़ा मानिकपुर के राय की ओर से था, जो स्पष्ट कर रहा था कि उस समय के राजाओं में और समाज के प्रमुख लोगों में अयोध्या को लेकर कितना जोश भरा हुआ था? किसी भी मूल्य पर हमारे आर्य हिंदू राजा अयोध्या को नष्ट होती देखना नही चाहते थे। उसी राय का एक अन्य संदेश भी पकड़ा गया था, चिश्ती के अनुसार उसमें भी स्पष्ट लिखा था-‘‘मुसलमानों ने हमें दुखी किया है। हमारा देश हमसे छीन लिया है। यदि हम तुम मिल जायें तो अंतिम जीत हमारी होगी।’’

ये संदेश वैसे ही एक दूसरे के लिए भेजे जा रहे थे जैसे कभी आगे चलकर 1857 की क्रांति के समय हमारे नायकों -राजाओं ने एक दूसरे के लिए भेजे थे। इस समय भी सर्वत्र क्रांति का सा वातावरण था, कोई भी राजा अपने आप को अकेला नही समझ रहा था, सभी के भीतर भारतीय संस्कृति के आप्त पुरूष मर्यादा पुरूषोत्तम राम रम गये थे और वह भीतर से ही ऐसे उत्साह का संचार कर रहे थे कि शत्रु युद्घ क्षेत्र में आकर भी सामना करने का साहस नही कर पा रहा था।

कुटिला के निकट हुआ था संघर्ष

सरयू की एक सहायक नदी है कुटिला। इसके तट पर ही विदेशी आक्रांता से पहली टक्कर हुई। हिंदू राजा बड़ी वीरता से शत्रु सेना से भिड़ गया वह परास्त होकर भी युद्घ क्षेत्र से भागा नही, अपितु वहीं बड़े साहस के साथ शत्रु का सामना करता रहा। उसे गुप्त संदेशों से किये गये सहयोग और गठबंधन के आदान-प्रदान पर पूर्ण विश्वास था कि हिंदू सेना के लोग उसकी सहायता के लिए अवश्य आएंगे। राजा ने बड़े भारी भारी बलिदान देकर भी शत्रु को किसी प्रकार रोके रखा। अंत में उसकी सहायता के लिए हिमालय के पर्वतीय राजा सिंहभूमि के राजा सहारदेव (सुहेलदेव) बलूना से राय हरदेव और त्रिलोकचंद की सेनाओं के आने की सूचना मिल ही गयी। ये नदी के दूसरी ओर आकर डट गये। इतिहासकार लिखता है कि बहराइच से सात कोश दूर पयागपुर के पास घाघरा के तट पर महायुद्घ हुआ। हिंदू वीरों ने वही सिद्घ करके दिखा दिया जिसकी आशंका शत्रु सेना को कड़ा मानिकपुर के राय के गुप्तचर के पास से मिले संदेशों से हो रही थी। शत्रु को अपने सामने अपनी पराजय का दुर्जेय पहाड़ दिखाई देने लगा। वह सारी चतुराई भूल गया था।

बुरा फंसा सालार मसूद

शत्रु पर हिंदू वीर भूखे शेर की भांति टूट पड़े, सर्वत्र ‘त्राहिमाम् त्राहिमाम्’ मच गया था।

चारों ओर मुस्लिम सेना में भगदड़ का दृश्य बन गया था। सालारमसूद के स्वयं के इतिहासकारों ने भी इस युद्घ के दृश्यों का वर्णन करते हुए हिंदू वीरता का लोहा माना है। युद्घ जितना लंबा खिंचता जाता था उतनी ही मुस्लिम सेना घटती जा रही थी उसका मनोबल टूट गया था।

सालारमसूद को अनुभूति हो गयी थी कि वह भयंकर कठिनाई में फंस चुका है। अब वह अपने खुदा से अपनी जान बख्शवाने की प्रार्थना कर रहा था। उसकी और सैफुद्दीन आदि की सेना को चारों ओर से हिंदूवीरों ने घेर लिया। आज मां भारती की सेवा के लिए आर्य राजाओं ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए शत्रु को परास्त कर उसे यह अनुभव करा दिया था कि भारत को मिटाना किसी के वश की बात नही है, जब तक भारत की रक्षा के लिए हम जैसे वीर उत्पन्न होते रहेंगे तब तक मां भारती को पराधीनता की बेडिय़ों में जकड़ पाना सर्वथा असंभव है।

‘जान बख्शी’ की प्रार्थना कर रहे थे मुस्लिम सैनिक

सालारमसूद को अपने सैनिकों को गाजर मूली की भांति कटते देखकर असीम दुख हो रहा था। उसके इतिहासकार चिश्ती ने जो कुछ हिंदुओं की वीरता के संबंध में लिखा है, उसे पढक़र कुछ और लिखने के लिए शेष नही रह जाता है। उसने लिखा है-

‘‘मौत का सामना है, फिराक सूरी नजदीक है। हुनूदों (हिंदुओं) ने जमाव किया है। इनका लश्कर बेइन्तिहा है। सुदूर नेपाल से, पहाड़ों के नीचे घाघरा तक फौज मुखालिफ का पड़ाव है। यह कहकर वह बिलख बिलखकर रो पड़ा। या खुदा रहम कर जान बख्शी दे।’’

चिश्ती ने आगे लिखा है-‘‘इस समय कौन रहम दिल इंसान हो सकता था जो ऐसी स्थिति में सालार मसूद का साथ छोड़ता। रजब मास की 14वीं तारीख (14 जून 1033) के दिन मसूद सहित उसकी संपूर्ण सेना का हिंदुओं द्वारा सर्वनाश कर दिया गया। कोई पानी देने वाला भी न रहा।’’

यह था हमारे वीर पूर्वजों का चमत्कार, जिनकी वीरता को देखकर शत्रु कहने लगा कि या खुदा इस बार किसी तरह बख्श दे, अगली बार हिन्दुस्थान की तरफ पैर करके भी नही सोएंगे।

अजमेर के मुजफ्फर खान की भी यही स्थिति हुई थी

सालारमसूद की मृत्यु के पश्चात अजमेर से मुजफ्फर खान तुरंत आया पर वह भी मारा गया। यही नही उसके उत्तराधिकारियों को भी हिंदुओं ने मार भगाया। जो मूर्तियां मुस्लिम हमलावरों ने तोड़ी थीं वे पुन: स्थापित की गयीं और हिंदुस्थान की जमीन पर मंदिरों की घंटियां पुन: निष्कंटक बजने लगीं।

यह था हिंदू गौरव-जो अयोध्या की अस्मिता के लिए अपनी पूर्ण आभा का प्रदर्शन कर रहा था। रामजन्म भूमि की ओर को कोई विदेशी आततायी झांक भी न पाया और हर भारतीय ने राम की मर्यादा की रक्षा के लिए अपनी जीवन मर्यादा को दांव पर लगा दिया। बलिदानी परंपरा में हर भारतीय ने बढ़-चढक़र भाग लिया, कितने ही बलिदान दिये गये, पर अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने में देश सफल रहा। राम की मर्यादा ने

सत्रह देशीय शासकों को एकता के सूत्र में बांधकर राष्ट्रीय मर्यादा का पाठ पढ़ाया। अयोध्या के ऊपर आया इस्लामिक अंधड़ किसी एक छोटे से पौधे का भी कुछ नही बिगाड़ पाया। राम की मर्यादा की जीत हुई और आर्य राजाओं ने जय-विजय का संगीत गाकर एक दूसरे का अभिवादन किया।

इस युद्घ में अरब, ईरान के हर घर का चिराग बुझ गया

शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती लिखता है-‘‘इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या, बहराइच तक जा पहुंचा था वह सब नष्ट हो गया। इस युद्घ में अरब, ईरान के हर घर का चिराग बुझ गया। यही कारण है कि दो सौ वर्षों तक से अधिक समय यहां बुत परस्ती जारी रही। हुनूद की अमलदारी रही।’’

हमारे प्रचलित इतिहास में हिंदुओं के साहस और वीरता को सराहने वाली इन पंक्तियों का सर्वथा लोप मिलता है। गहरा षडय़ंत्र है। जिन लोगों को यह चिंता सताती है कि ऐसी पंक्तियों के उल्लेख से दो समुदायों में कटुता बढ़ेगी उन्हें यह भी समझना चाहिए कि मुस्लिम समुदाय द्वारा हिंदुओं को काटने के बार-बार के उद्वरणों के प्रस्तुत करने से कौन सी मित्रता बढ़ेगी? क्या उनसे देश के बहुसंख्यक वर्ग को हम हीनभावना का शिकार नही बना रहे हैं? निस्संदेह मिथ्या वर्णनों से एक समुदाय को हीनता का बोध होता है। जिसका परिणाम यह होता है कि देश का युवा अपने सांस्कृतिक गौरवमयी इतिहास के सच से काट दिया जाता है और उसके भीतर यह ग्लानि का भाव भर दिया जाता है कि भारत कभी विजय का इतिहास लिखने वाला देश नही रहा, अपितु यह सदा पराजय देखता आया है, और पराजय ही इसे सदा मिलती रही है।क्रमश:

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