लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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politicians”भारतीय नकल में तो पूरे अभ्यस्त हैं-” यह मुहावरा भारत में बहुत प्रचलित है। प्रश्न है कि यह मुहावरा प्रचलित क्यों हुआ? इसका उत्तर यही है कि हमने अपना संविधान को नकल से बनाया, हमने अपनी शासन व्यवस्था नकली बनायी, अपने आदर्श नकली बनाये, अपने संस्थान नकली बनाये, प्रगति एवं विकास के लिए योजनाएं नकली बनाईं।

सारा कुछ ‘नकलमय’ देखकर पिछले लगभग छह दशक के इतिहास और राजनीतिज्ञों के आचरण को पढक़र उपरोक्त वर्णित यह मुहावरा भारत में प्रचलित होकर स्थान पा गया। सुरक्षा व्यवस्था, व गुप्तचर व्यवस्था सभी के लिए हम अन्योन्याश्रित हो गये। अपना उत्कृष्ट साहित्य और सर्वोत्तम शासन व्यवस्था के लिए उपयोगी चाणक्यनीति

, विदुरनीति, मनुस्मृति आदि ग्रंथों को उपेक्षा (रद्दी) की टोकरी में डाल दिया।
अमेरिका की गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. और रूसी गुप्तचर संस्था के.जी.बी. हमारे आदर्श बन गये अर्थात अपनी गुप्तचर व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए उनकी ओर देखने के लिए हम बाध्य हो गये। कारण यही था कि स्वतंत्रता की भोर में ईसाइयत को हमारे कर्णधारों ने अपना आदर्श जो माना था। उसका परिणाम यह निकला कि इंदिरा जी के कुछ सीमा तक कठोर शासनकाल में यह अमेरिकन गुप्तचर संस्था सी.आई.ए. भारत की गोपनीय सूचनाएं पाकिस्तान को देती रही।

इस जासूसी काण्ड का जाल दिल्ली के अलावा मुंबई, चेन्नई,

कोलकाता, जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर में बड़े आराम से फैल गया। हमारे तथाकथित ‘चाणक्यों’ और कर्णधारों को कुछ भी ज्ञात नही हुआ। 18 जनवरी सन 1985 को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस ‘जासूसी काण्ड’ को संसद में हमारे माननीय सांसदों को बताया। इसके पश्चात इस काण्ड में संलिप्त लोगों की धरपकड़ का क्रम आरंभ हुआ। जिसमें चपरासी से लेकर उच्चाधिकारी तक संलिप्त मिले।
प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव पी.सी. एलेक्जेंडर के निजी सचिव टी.एन.खेर तथा इन्हीं के दो निजी सहायक ‘पी.गोपालन एवं के.के. मल्होत्रा’, रक्षा उत्पादन विभाग के सचिव एस.सी. सरीन के निजी सहायक जगदीश चंद्र अरोड़ा

, राष्ट्रपति के प्रैस सचिव के. सूर्यनारायण, के निजी सहायक एस. शंकरन वित्त मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव जे.एस. बैजल, के निजी सहायक जे.एम. तिवारी जैसे कई पदासीन लोग इसमें आकण्ठ डूबे हुए मिले।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव स्वर्गीय एम.ओ. मथाई भी सी.आई.ए. के एजेंट बताये गये हैं। सी.आई.ए. ने गुप्तचरी के कार्य में राजनयिकों को लगाकर राजनय को भी कलंकित कर दिया था। 18 जनवरी सन 1985 को श्री राजीव गांधी के द्वारा संसद में खोले गये उक्त जासूसी काण्ड पर डा. मानवेन्द्र जी ने ‘पंजाब केसरी’ दैनिक में 25 जनवरी को अपना लेख प्रकाशित किया था। जिससे पता चलता है कि हमारे भीतर राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का कितना अभाव रहा है

? हमारे कर्णधार और शासक ही हमारे भक्षक और शोषक बन गये थे।
भारत की गोपनीय सूचनाओं का मूल्य दो सौ रूपये से लेकर डेढ़ लाख रूपये तक होता था। इस प्रकार चंद कौडिय़ों में देश का सौदा होता रहा और शासक बड़े आराम से सोते रहे। प्राचीन कहावत है कि ‘रोम जलता रहा और नीरो बांसुरी बजाता रहा।’ रूस स्वयं हमारी जासूसी करता रहा। सन 1960 ई. के दशक से देश में विदेशी शक्तियां जासूसी के इस घृणित कार्य में लगी हुई थीं।

हमारी सारी जासूसी होती रही और सारी की सारी भारतीय गुप्तचर एजेंसियां प्रमाद की नींद लेती रहीं। सन 1965 ई. से प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्यरत पी. गोपालन नाम का व्यक्ति भारत की गोपनीय फाइलों की जानकारी भारत के विरूद्घ उसके शत्रुओं को उपलब्ध कराकर ‘जयचंद’ की भूमिका का निर्वाह राष्ट्र के विरूद्घ करता रहा। उसके पास से बहुत सा धन पकड़ा गया। इसी प्रकार के कई अन्य छोटे कर्मचारी भारत की गोपनीय सूचनाओं को बाहर भेजने के काम में लगे रहे।

नेहरू जी के निजी सचिव एम.ओ. मथाई के पास से 9 लाख नगद व डेढ़ लाख के शेयर पकड़े गये थे। सन 1956 ई. में नेहरूजी का एक गोपनीय कागज न मिलने पर विदेश मंत्रालय के क्लर्क शादीलाल की गिरफ्तारी के साथ जासूसी जाल पकड़ा गया था। श्रीमती इंदिरा गांधी की कैबिनेट का एक मंत्री सी.आई.ए. का एजेंट रहा था। सन 1971 ई. में विधायक रहे याजदनी और बदरूज्जमा पकड़े गये थे। दिसंबर सन 1963 ई. में भारतीय पत्र सूचना विभाग के डिसूजा को रूमानिया की जासूसी करते हुए पकड़ा गया था।

सन 1977 ई. में वित्तमंत्री यशवंतराव चव्हाण के निजी सचिव महावीर प्रसाद को पकड़ा गया था। सन 1977 ई. में ही कश्मीर की सीमा बिग्रेड पकड़ी गयी थी। 23 नवंबर सन 1982 ई. को इस घृणास्पद राष्ट्रद्रोही कृत्य में संलिप्त नौसेना मुख्यालय के पंचभावे को पकड़ा गया था। सन 1983 ई. के नवंबर में वाइस एयर मार्शल लारकिंस व उसके भाई मेजर जनरल का दल पकड़ा गया था जो सी.आई.ए. के लिए कार्य कर रहा था।

इस प्रकार भारत में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति आवास सहित महत्वपूर्ण मंत्रालयों एवं प्रतिष्ठानों में जासूसों, तस्करों, दलालों की पैठ बनती रही है। अपवादों को छोडक़र सारी व्यवस्था के व्यवस्थापक अर्थात उत्तरदायी लोग अनुत्तरदायी कृत्य करते रहे। ऐसा आचरण घृणास्पद है, विशेषत: उस देश के लिए तो बहुत ही सावधान हो जाने की आवश्यकता है, जिसने सदियों की दासता अर्थात अपने पराभव का दु:खद काल इन्हीं जैसे दुष्टों और राष्ट्रघातकों के कारण झेला है।

इन राष्ट्रघातियों के पनपने और अपने घृणित क्रियाकलापों को कार्यरूप देने का एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि यहां संस्कृति घातकों को सांझा संस्कृति के नाम पर, राष्ट्रघातकों को आदर्शों के नाम पर और धर्मघातकों को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर छोड़ते रहने की निर्बल नीतियां अपनाई जाती रही हैं। इन राष्ट्रघातियों के प्रति जाति, धर्म, मजहब के सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर कठोर कार्यवाही करने की इच्छाशक्ति किसी भी सरकार ने आज तक नही दिखाई। जिन बातों को आज का कथित सभ्य और उन्नत समाज राष्ट्रोन्नति के लिए नही समझ पाया उन्हें इस देश के निर्माताओं में से एक महात्मा ‘चाणक्य’ ने बहुत पहले समझ लिया था।

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडयंत्र : दोषी कौन?’ से)

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