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चरखा फिचर्स

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kuposhanशैलेन्द्र सिन्हा

कुपोषण के मामले में झारखंड विभिन्न राज्यों की सूची में अंतिम से तीसरे नंबर पर है। झारखंड राज्य पोषण मिशन के तहत सितंबर 2016 से बच्चों के प्रति संवदेनशीलता दिखाते हुए सरकार ने पोषण के संबंध में नयी नीति बनायी है। मिशन के तहत 1000 प्लस दिन के कार्यक्रम तय किये हैं। पाँच साल से नीचे के बच्चे जिनका वजन बहुत कम है और उँचाई भी कम है, उसके लिए प्रयास किये जा रहे हैं। राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुरूप बच्चों का विकास नहीं हो पा रहा है। झारखंड राज्य पोषण मिशन के तहत ऐसे कुपोषित बच्चों की संख्या को घटाना प्रमुख लक्ष्य रखा गया है। कुपोषण से ग्रसित बच्चों के आंकड़े जिलावार तैयार किये जा रहे हैं। ताकि इन बच्चों का उपचार कुपोषण उपचार केंन्द्र में हो सके। राज्य में 87 कुपोषण उपचार केन्द्र कार्यरत हैं, जहां कुपोषित बच्चों को एफ 75 आहार दिया जा रहा है। बच्चों में विकास को लेकर पोषक दल का गठन किया गया है, यह दल कुपोषित बच्चों की निगरानी करता है। 3 साल के गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का विशेष रूप से ख्याल रखा जा रहा है। सरकार की ओर से महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति विशेष ध्यान दिया जा रहा है। राज्य में ज्यादातर महिलाएं एनेमिक है, महिलाओं को स्वास्थ्य संबधित जानकारी एवं बाल पोषण से संबंधित जानकारी भी दी जा रही है।

इस बारे में पोषण मिशन की महानिदेशक मृदुला सिन्हा बताती है “कुपोषण के खिलाफ मिशन 1000 अहम भूमिका अदा करेगा। जिसमें 3 साल के अंदर कुपोषित बच्चों को पूरी तरह से ठीक करने का लक्ष्य रखा है। कुपोषण के खिलाफ जंग शुरू कर दिया गया है,मिशन के तहत गर्भवती महिला एवं बच्चा होने के 2 साल तक उसकी सही देखभाल की जिम्मेवारी सरकार उठा रही है। सिन्हा ने बताया कि कुपोषित बच्चों का मानसिक विकास अधुरा रहता है, गर्भवती महिला संतुलित आहार नहीं लेती है। जिस कारण बच्चें में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलने से कुपोषण की समस्या जन्म लेती है”।

भारत में 5 साल से कम उम्र के करीब 10 लाख बच्चें हर साल कुपोषण के कारण काल के गाल में समा जाते है।  राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एन-एफ-एच-एस) की रिर्पोट के अनुसार 40 प्रतिशत बच्चों मे ग्रोथ की समस्या है एवं 60 फीसदी बच्चे कम वजन के शिकार हैं। गर्भवती महिलाओं को भरपूर पोषण नहीं मिलता और गरीबी मुख्य कारण है।महिलाओं में खून की कमी आम बात है। खून में आयरन की कमी के कारण हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है।बच्चों के खानों मे प्रोटीन,विटामिन और मिनरल्स की कमी होने से बच्चे कुपोषित होते है।बलराम जी,सुप्रीम कोर्ट के राज्य सलाहकार बताते है “झारखंड के 50 प्रतिशत आंगनबाडी केंद्रों में बच्चों का वजन करने की मशीन नहीं है,राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या साहिबगंज, चतरा और पलामू में अधिक है। वे बताते है कि कुपोषण भी बाजार का एक हिस्सा बन गया है। कुपोषण राष्ट्रीय शर्म बन चुका है,सरकार भी कुपोषण को दूर करने के लिए मल्टीनेशनल कंपनी के प्रभाव में आ गयी है। राज्य के सभी आंगनबाडी केंन्द्रों में रेडी टू फूड दिया जा रहा है। मल्टीनेशनल कंपनी कुपोषण के आहार सप्लाई के लिए सरकार पर दवाब बना रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में मिलनेवाले फल,दाल से कुपोषण दुर हो सकता है। राज्य में कुपोषण दुर करने के लिए आंगनबाड़ी सुपरवाईजर को टैब बांटे जा रहे हैं। बलराम जी ने बताया कि राज्य में 54 प्रतिशत बच्चें कुपोंषित है,आंगनबाडी केंन्दों में अंडा,दाल पोषण के तहत नहीं दिये जा रहे है।आंगनबाडी केन्द्रों में बच्चों के ग्रोथ चार्ट का रख रखाव नहीं किया जा रहा है, जिससे बच्चों का सही वजन और लंबाई का पता नहीं चल पा रहा है। जबकि बच्चों की सही स्थिति की जानकारी के लिए ग्रोथ चार्ट का भरा जाना अनिवार्य है”।

मालुम हो कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में लड़की की कम उम्र में शादी और मां बनने से बच्चे कुपोषित जन्म ले रहे हैं। कम उम्र की मां ने गर्भधारण के मानकों का पालन नहीं किया और 6 माह तक बच्चे को स्तनपान भी नहीं कराया, इस कारण बच्चे कुपोषण के शिकार हो रहे है। इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का कहना है कि 65 ग्राम दाल बच्चों को दिया जाना चाहिए लेकिन राज्य में 30 ग्राम दाल भी उन्हें नहीं मिल रहा है। झारखंड के प्रमुख प्रोटीन युक्त खाद्ध पदार्थ कोदो, मडुआ, मकई, र्कुथी एवं अरहर राज्य से विलुप्त हो रहे हैं। आगंनबाडी केंद्र में कार्यरत सेविका अप्रशिक्षित हैं, सरकार ने अब तक उन्हें प्रशिक्षण नही दिलाया है। राज्य की कल्याण मंत्री डॉक्टर लुईस मरांडी ने चरखा नेटवर्क से बात करते हुए बताया कि “कुपोषण के खिलाफ सरकार की ओर से पहल की जा रही है। राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या एक चुनौती है। कुपोषण को मिटाने के लिए मुहिम चलाई जा रही है।कुपोषित बच्चों का डाटा तैयार किया जा रहा है। कुपोषण से जुड़े सरकारी अधिकारी चुनौती के रूप में इसके विरूद्ध कार्य कर रहे है। इस लड़ाई में आम आदमी को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। राज्य में कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिए सरकार प्रतिबद्व है।कुपोषण के खिलाफ चलायी जा रही योजना का लाभ आने वाले कुछ वर्षो में दिखेंगा। सरकार का प्रयास है कि जन जागरूकता के माध्यम से इस कलंक से निपटा जा सकता है”।

झारखंड राज्य पोषण मिशन के तहत कार्यक्रम चलाये जा रहे है,जिसके तहत झारखंड के बच्चों के स्वास्थ्य पर अब ध्यान दिया जा रहा है।

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