लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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SupremeCourtIndiaज्युडिशिअरी पर उठ रहे प्रश्नों को विराम देते हुए जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने एकमत होकर सम्पत्ति को सार्वजनिक करने का निर्णय लिया है। भ’ष्टाचार पर नकेल कसने के लिये इसे स्वागत योग्य कदम माना जाना चाहिए। लम्बे समय से यह माँग चल रही थी कि विधिवेत्ता न्यायाधीश भी अपनी सम्पत्ति का खुलासा करें। आखिर वह भी तो संवैधानिक पदों पर रहते हैं, भले ही उन्हें भारतीय संविधान में कुछ विशेष अधिकार दे रखे हैं किंतु वे संविधान से इतर नहीं हैं। निश्चित ही सफल लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि उसमें अधिक से अधिक पारदर्शिता निहित हो, ताकि कहीं भी भ’ष्टाचार पनपने की गुंजाइश न बचे। भारतीय संविधान या लोकतंत्र के जो स्तम्भ हैं उनमें लोकपालिका (संसद) कानून बनाने वाली, कार्यपालिका यानि मंत्रीपरिषद् और तीसरा जो महत्वपूर्ण स्तम्भ है वह है न्यायपालिकाअर्थात् यदि संसद में कोई कानून बनता है तो उसका, व्यवहारिक कि’यान्वयन करवाना न्यायपालिका का काम है और इसे सहयोग देने का कार्य करती है पत्रकारिता अर्थात खबरपलिका। अब संविधान के इन चार स्तम्भों में से किसी एक को हटा दिया जाए तो भारत जैसे विशाल गणराज्य वाले देश में सफल लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जब जनता के द्वारा चुने प्रतिनिधियों से लेकर आम व्यक्ति के लिए सरकार ने अपनी सम्पत्ति सार्वजनिक करने के लिए अनेक नियम-कानून बना रखे हैं फिर इस तंत्र का एक हिस्सा होने के नाते न्यायपालिका क्यों इससे अछूती रहे ? शुरू में जो खबरें आई थी उनसे जनता के बीच यही संदेश गया था कि न्यायाधीश अपने लिए सम्पत्ति की घोषणा के मामले में कुछ विशिष्ट अधिकार चाहते हैं। यह तो अच्छा है कि उच्चतम न्यायालय के मु’य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णनन की अध्यक्षता में न्यायाधीशों की जो बैठक हुई उसका यही सार निकलकर आया है कि भारत के प्रत्येक वर्ग-समुदाय के व्यक्ति को न्याय देने वाले न्यायाधीशों का समूह स्वयं की सम्पत्ति सार्वजनिक करने के मुद्दे पर एकमत है। ऐसा ही एक प्रस्ताव 1997 में पूर्व चीफ जस्टिस जे.एस. वर्मा के समय लाया गया था, जिसे न्यायाधीशों की आपसी सहमति के अभाव में अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। किंतु आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं, पहले जो प्रस्ताव था उसके अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अनिवार्य था कि वह अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा मु’य न्यायाधीश को दे। सभी जानते हैं कि आपसी सहमति के अभाव में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया था, अब जब सर्वसम्मति से न्यायाधीशों ने निर्णय लिया है कि वे अपनी सम्पत्ति सम्बन्धी समस्त जानकारी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के जरिए सार्वजनिक करेंगे तो इस पहल का चहुँओर स्वागत होना चाहिए। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की बैठक तब हो सकी है जब इस विषय को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। पहले जब चीफ जस्टिस बालकृष्णन ने यह कहा था कि कोई भी जज चाहे तो अपनी सम्पत्ति सार्वजनिक कर सकता है। इस बयान से उत्साहित होकर दो न्यायाधीशों ने अपनी सम्पत्ति की जानकारी भी सार्वजनिक की थी, लेकिन जो उत्साह आगे बनना चाहिए था वह नहीं बन सका था। इसके पीछे जो महत्वपूर्ण कारण रहा अथवा दिखता है, वह है सदन में विपक्ष का असहयोगपूर्ण रवैया। क्योंकि यूपीए सरकार ने अपनी मंशा के अनुरूप राज्य सभा में विधेयक लाने का निर्णय लिया था जिसका कि विपक्ष ने तीखा विरोध किया। कांग’ेसनीत संप्रग सरकार को भी यह भरोसा नहीं था कि न्यायाधीशों से सम्बन्धित संपत्ति के ब्यौरे को लेकर वह विधेयक के माध्यम से जो कानून बनाना चाहती है, विपक्ष द्वारा उसका इतना तीव’ विरोध किया जाएगा। आखिर न्यायाधीशों की सम्पत्ति घोषणा सम्बन्धी विधेयक राज्य सभा से वापिस ले लिया गया। विपक्ष के अनुसार न्यायाधीशों को विधेयक में सुरक्षा दिया जाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुच्छेद 19 (1) का दोहरा मानदण्ड है। जो भी हो लेकिन न्यायाधीशों ने सामुहिक निर्णय लेकर अपनी सम्पत्ति सार्वजनिक करने सम्बन्धि प्रतिबध्दाता दिखाई है, वह अत्यधिक स्वागत योग्य कदम तो है ही साथ ही इससे यह भी प्रदर्शित होता है कि न्यायपालिका के सदस्य लोकपालिका (सांसद), विधानसभा सदस्य (विधायक) जैसे जनप्रतिनिधि न होते हुए भी आम जनता की आशा-अपेक्षाओं को लेकर संवेदनशील हैं। अब उच्च न्यायालय के मु’य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन की मंशा को तभी पूर्ण किया जाना संभव होगा जब विपक्ष भी इस मुद्दे पर संप्रग सरकार के साथ मिलकर खडा हो जाए। विपक्ष द्वारा पूर्ण सहयोग दिए जाने के बाद ही यह संभव हो सकेगा कि इस सम्बन्ध में बनाए गए विधेयक पर राज्यसभा की मुहर लगे। इसका सबसे बडा लाभ यह होगा कि न्यायपालिका पर जो भ’ष्ट जजों के कारण आए दिन बदनामी के दाग लगते हैं वह इससे बच जायेगी। न्यायाधीश भी अपने उद्देश्य और कर्म से भटकने से बचेंगे क्योंकि उन्हें भी सम्पत्ति की सार्वजनिक घोषणा के द्वारा जनता से प्रत्यक्ष होना पडेगा। निश्चित ही यह न्याय व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए बढाया गया एक दूरदर्शी कदम है।

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1 Comment on "न्यायाधीशों द्वारा सम्पत्ति घोषित करने के निहितार्थ : मयंक चतुर्वेदी"

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kuldeep
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साधुवाद् न्यायपालिका कॊ, पता नाहि इन् राजनीतिग्यॊन् कॊ क्यु शरम् नहि आती , सब् कॆ सब् चॊर् हॊ गयॆ लग्तॆ है

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