लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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america( अंतर्राष्ट्रीय सहयोग दिवस)
डा.राधेश्याम द्विवेदी
अमेरिकी क्रान्ति से आशय अठ्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में घटित घटनाओं से है, जिसमें तेरह कालोनियाँ ब्रितानी साम्राज्य से आजाद होकर संयुक्त राज्य अमेरिका(United States of America / USA) के नाम से एक देश बना। इस क्रान्ति में सन 1775 एवं 1783 के बीच तेरह कालोनियाँ मिलकर ब्रितानी साम्राज्य के साथ सशस्त्र संग्राम में शामिल हुईं। इस संग्राम को ‘क्रान्तिकारी युद्ध’ या ‘अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम’ कहते हैं। इस क्रान्ति के फलस्वरूप सन 1776 में अमेरिका के स्वतन्त्रता की घोषणा की गयी एवं अन्ततः सन 1781 के अक्टूबर माह में युद्ध के मैदान में क्रान्तिकारियों की विजय हुई। इसके दौरान जनरल जार्ज वाशिंगटन द्वारा अमरीकी सेना का नेतृत्व करते हुए की गयी थी। वाशिंगटन ने अमरीकन उपनिवेशों को एकीकृत करके संयुक्त राज्य अमरीका का वर्तमान स्वरूप प्रदान किया। बाद में उन्हें 1789 में अमरीका का पहला राष्ट्रपति चुना गया। 14 दिसम्बर 1799 को वाशिंगटन की मृत्यु हो गयी। उन्हें वर्तमान अमरीका का राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। आज भी अमरीका में उनके ही नाम पर वाशिंगटन शहर है। इससे पूर्व अमरीका भी हिन्दुस्तान की तरह अनेक (तेरह) उपनिवेशों में बँटा हुआ था और ब्रिटिश राज के अधीन था। मुख्यत: अमरीकी क्रान्ति सामाजिक, राजनीतिक व सैनिक क्रान्ति का मिला-जुला परिणाम थी किन्तु सफलता सैनिक क्रान्ति से ही मिली जिसका श्रेय वाशिंगटन को जाता है।
अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा (Declaration of Independence) एक राजनैतिक दस्तावेज है जिसके आधार पर इंग्लैण्ड के 13 उत्तर-अमेरिकी उपनिवेशों ने 4 जुलाई 1776 ई. को स्वयं को इंग्लैण्ड से स्वतंत्र घोषित कर लिया। इसके बाद से 4 जुलाई को यूएसए में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। अमरीका के निवासियों ने ब्रिटिश शासनसत्ता के अधिकारों और अपनी कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए जो संघर्ष सन् 1775 ई. में आरंभ किया था वह दूसरे ही वर्ष स्वतंत्रता संग्राम में परिणत हो गया। इंगलैंड के तत्कालीन शासक जॉर्ज तृतीय की दमननीति से समझौते की आशा समाप्त हो गई और शीघ्र ही पूर्ण संबंधविच्छेद हो गया। इंगलैंड से आए हुए उग्रवादी युवक टॉमस पेन ने अपनी पुस्तिका “कॉमनसेंस” द्वारा स्वतंत्रता की भावना को और भी प्रज्वलित किया। 7 जून, 1776 ई. को वर्जीनिया के रिचर्ड हेनरी ली ने प्रायद्वीपी कांग्रेस में यह प्रस्ताव रखा कि उपनिवेशों को स्वतंत्र होने का अधिकार है। इस प्रस्ताव पर वादविवाद के उपरांत “स्वतंत्रता की घोषणा” तैयार करने के लिए 11 जून को एक समिति बनाई गई, जिसने यह कार्य थॉमस जेफ़रसन को सौंपा। जेफ़रसन द्वारा तैयार किए गए घोषणापत्र में ऐडम्स और फ्रैंकलिन ने कुछ संशोधन कर उसे 28 जून को प्रायद्वीपी कांग्रेस के समक्ष रखा और 2 जुलाई को यह बिना विरोध पास हो गया।
जेफ़रसन ने उपनिवेशों के लोगों की कठिनाइयों और आवश्यकताओं का ध्यान रखकर नहीं, अपितु मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों के दार्शनिक सिद्धांतों को ध्यान में रखकर यह घोषणापत्र तैयार किया था जिसके निम्नांकित शब्द अमर हैं :
“हम इन सिद्धांतों को स्वयंसिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य समान पैदा हुए हैं और उन्हें अपने स्रष्टा द्वारा कुछ अविच्छिन्न अधिकार मिले हैं। जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज इन्हीं अधिकारों में है। इन अधिकारों की प्राप्ति के लिए समाज में सरकारों की स्थापना हुई जिन्होंने अपनी न्यायोचित सत्ता शासित की स्वीकृति से ग्रहण की। जब कभी कोई सरकार इन उद्देश्यों पर कुठाराघात करती है तो जनता को यह अधिकार है कि वह उसे बदल दे या उसे समाप्त कर नई सरकार स्थापित करे जो ऐसे सिद्धांतों पर आधारित हो और जिसकी शक्ति का संगठन इस प्रकार किया जाए कि जनता को विश्वास हो जाए कि उनकी सुरक्षा और सुख निश्चित हैं।”
इस घोषणापत्र में कुछ ऐसे महत्व के सिद्धांत रखे गए जिन्होंने विश्व की राजनीतिक विचारधारा में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। समानता का अधिकार, जनता का सरकार बाने का अधिकार और अयोग्य सरकार को बदल देने अथवा उसे हटाकर नई सरकार की स्थापना करने का अधिकार आदि ऐसे सिद्धांत थे जिन्हें सफलतापूर्वक क्रियात्मक रूप दिया जा सकेगा, इसमें उस समय अमरीकी जनता को भी संदेह था परंतु उसने इनको सहर्ष स्वीकार कर सफलतापूर्वक कार्यरूप में परिणत कर दिखाया। जेफ़रसन ने ब्रिटिश दार्शनिक जॉन लॉक के “जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति” के अधिकार के सिद्धांत को भी थोड़े संशोधन के साथ स्वीकार किया। उसने संपत्ति को ही सुख का साधन न मानकर उसे स्थान पर “सुख की खोज” का अधिकार माँगकर अमरीकी जनता को वस्तुवादिता से बचाने की चेष्टा की, परंतु उसे कितनी सफलता मिली इसमें संदेह है।

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