लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा.राधेश्याम द्विवेदी
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, समूची दुनिया की छ: प्रतिशत आबादी मधुमेह से पीड़ित है। भारत को विश्व मधुमेह की राजधानी कहा जाता है। इस समय भारत में लगभग पांच करोड़ मधुमेह रोगी हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 के अंत तक यह बढ़कर सात करोड़ हो जाने की आशंका है अर्थात तब हर पांचवां मधुमेह रोगी भारतीय होगा। मधुमेह वृध्दि की दर चिंताजनक है। विश्व भर में इस रोग के निवारण में प्रति वर्ष 250से 400 मिलियन डॉलर खर्च हो जाता है। हर साल लगभग 50लाख लोग नेत्रों की ज्योति खो देते हैं और दस लाख लोग अपने पैर गंवा बैठते है। मधुमेह के कारण प्रति मिनट छ: मौते होती हैं और गुर्दे नाकाम होने का यह प्रमुख कारण है। आज विश्व के लगभग 95 प्रतिशत रोगी टाईप 2 मधुमेह से पीड़ित है।
मधुमेह के आंकड़े चौंकाने वाले हैं और हमें सोचना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। शोध बताते हैं कि भारत में आनुवांशिक तौर पर मधुमेह की आशंका बलवती है। इसका संबंध किसी विशेष आयु,वर्ग या लिंग से नहीं है बल्कि आधुनिक जीवन शैली ने ही युवाओं और छोटे बच्चों तक को इस रोग से पीड़ित कर दिया है। आजकल होटलों और फास्ट फूड़ सेंटर्स में जाने का चलन बढ़ा है। लोग आवश्यकता से अधिक कैलोरी का भोजन करके मोटापे का शिकार हो रहे हैं जबकि उनकी दिनचर्या में व्यायाम और शारीरिक श्रम का अभाव है। युवाओं और बच्चों में यह प्रवृत्ति आम है। इस कारण कम उम्र के मधुमेह रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
साधारण भाषा में इसे शुगर या शक्कर की बीमारी कहते हैं। यहां शक्कर से आशय हमारे शरीर में व्याप्त ग्लूकोज से है। रक्त ग्लूकोज शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और कार्बोहाइड्रेट आंतों में पहुंचकर ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाता है फिर अवशोषित होकर रक्त में पहुंचता है। रक्त से कोशिकाओं के भीतर उसका प्रवेश होता है और इसके लिए इंसुलिन की आवश्यकता होती है। इंसुलिन एक हार्मोन है जो शरीर के पेंक्रियाज (अग्नाशय)नामक ग्रंथि से निकलता है। इंसुलिन की कमी से रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है जोकि मूत्र के साथ बाहर निकलता है और मधुमेह रोग का सूचक माना जाता है। मतलब यह कि मधुमेह इंसुलिन की कमी से होता है न कि किसी अन्य कारण से। और मधुमेह की चिकित्सा का उद्देश्य है रक्त में शुगर की मात्रा को सामान्य रखना, अन्यथा शरीर के अंगों-नाक, कान, गला, आंख, दांत और पैरों को क्षति पहुंचती है। ध्यान रहे कि मधुमेह किसी भी उम्र में हो सकता है और इसके दो प्रकार हैं।
टाइप वन मधुमेह:- पहले प्रकार का मधुमेह प्राय: बचपन या युवावस्था में होता है जिसे टाइप वन मधुमेह कहते हैं। इसमें अग्नाशय ग्रंथि से बहुत कम मात्रा में इंसुलिन उत्पन्न होती है या बिल्कुल उत्पन्न नहीं होती। इसके रोगी को नियमित रूप से रक्त ग्लूकोज़ के नियंत्रण के अलावा जीवित रहने के लिए इंसुलिन लेनी पड़ती है।
टाइप-2 मधुमेह:- टाइप-2 मधुमेही अधिक आयु के लोगों में होता है। यह बीमारी तब होती है जब शरीर के ऊतक इंसुलिन की सामान्य या अधिक मात्रा के लिए बहुत संवेदनशील या प्रतिरोधक होते हैं। इस स्थिति में अग्नाशय से कम इंसुलिन उत्पन्न होती है। इस मधुमेह के कुछ रोगियों के लिए भी इंसुलिन लेना आवश्यक होता है। मधुमेह के पीड़ितों में लगभग 90 प्रतिशत टाइप 2 मधुमेह के रोगी होते हैं। इन रोगियों में रक्त ग्लूकोज अनियंत्रित होने पर शरीर में पानी की अधिकता और नमक की कमी हो जाती है। अन्य जटिलताओं में आंखों की रोशनी जाना, मूत्राशय और गुदे का संक्रमण तथा खराबी, धमनियों में चर्बी के जमाव के कारण चोटों में संक्रमण तथा हाथ-पैरों में गैंग्रीन और हृदय रोग होने का ख़तरा रहता है। अत: ऐसे रोगियों का सिर्फ़ मधुमेह का उपचार नहीं होता बल्कि उनके तमाम अंगों की कार्यप्रणाली भी नियंत्रित करनी पड़ती है।
खान पान व स्वस्थ जीवन अपनाना चाहिए: – चूंकि मधुमेह अब भारत में आम बीमारी का रूप ले चुकी हैं, हर घर में इसका एक न एक मरीज अवश्य है। इस रोग को ठीक नहीं किया जा सकता पर दवाओं, व्यायाम और सही खान पान से नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। एक समय था जब अधेड़ावस्थ में ही किसी को मधुमेह होता था पर अब यह बीमारी भी बदलती जीवनचर्या और जागरूकता के अभाववश ‘युवा’हो गई है। यानी बच्चे और युवा वर्ग इससे अधिकाधिक पीड़ित हो रहे हैं। अत एवं बच्चों को स्वस्थ रहने के लिए खेद-कूद एवं शारीरिक श्रम वाली गतिविधियों के लिए प्रेरित करना नितांत आवश्यक है। ख़ास तौर पर जिनके माता-पिता मधुमेह से ग्रस्त हैं उन्हें मोटापे से बचना चाहिए और गरिष्ठ एवं अधिक वसायुक्त भोजन, चिप्स, पिज्जा, बर्गर, नूडल्स आदि से परहेज करना चाहिए। युवाओं को भी इस रोग से बचने के लिए स्वस्थ जीवन-शैली अपनानी चाहिए और स्वास्थ्यवर्ध्दक पोषक आहार का सेवन करना चाहिए। आहार में वसायुक्त पदार्थों और शक्कर की मात्रा कम लेनी चाहिए। इसके अलावा प्रति वर्ष एक बार रक्त परीक्षण एवं अन्य जांच भी करवानी चाहिए।
स्मरण रहे कि मधुमेह जड़ से खत्म होने वाला रोग नहीं है, इसे व्यायाम, संतुलित आहार व प्राकृतिक उपचार से नियंत्रित किया जा सकता है। चूंकि यह आनुवंशिकी के साथ-साथ गलत जीवनचर्या से उपजने वाली बीमारी हैं, अत: इसकी चिकित्सा में व्यायाम एवं प्राकृतिक उपायों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। सच तो यह है कि संतुलित आहार विहार और स्वस्थ जीवन शैली अपनाकर जीवन पर्यंत निरोग रहा जा सकता है। अत:बाल्यावस्था से ही इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। रोगग्रस्त होने के बाद रोगमुक्ति हेतु प्रयास करने से कहीं बेहतर है कि निरोगी काया के लिए स्वाभाविक रूप से सदैव सजग रहा जाये।
अनुवांशिक कारणों के आलावा अनियमित जीवन शैली, तनाव, शारीरिक व्यायाम का ना होना इस बीमारी का मुख्य कारण है। इस गंभीर बीमारी के प्रति लोगों में चेतना जागृत करने के लिए प्रत्येक वर्ष 27 जून को विश्व मधुमेह जागृति दिवस मनाया जाता है. अतः इस बीमारी से बचने के लिए आवश्यक है कि हम सब स्वस्थ जीवन-शैली अपनाएं, स्वास्थ्यवर्ध्दक पोषक आहार लें एवं आहार में वसायुक्त पदार्थों और शक्कर की मात्रा कम लेने का प्रयास करें। इसके अलावा प्रति वर्ष एक बार रक्त परीक्षण एवं अन्य जांच भी करवानी चाहिए।और जो मधुमेह से पीड़ित हैं वो व्यायाम, संतुलित आहार व प्राकृतिक उपचार से ही इस बीमारी पर नियंत्रित पा सकते हैं।

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