लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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बाजे गाजे की आवाज सुन हड़बड़ाया जाग कर बाहर निकला तो पैरों तले से जमीन खिसक गई। वे सुबह सुबह अपने फसली बटेरों के जुलूस के साथ झोटे सी गरदन को चंदे के गुड्डी कागजों की मालाओं से लक दक किए गंजे सिर पर लाल साफा बांधे, मुहल्ले के मास्टर जी की पहले तो ट्रांसफर करवा फिर उसे रूकवाने की दौड़ धूप के मानदेय के रूप में अर्जित किए झक सफेद कुरता पाजामा डाले बाजे गाजे के साथ मुहल्ले से निकल रहे थे तो ये देख कलेजा मुंह को आ गया। मुहल्ले वाले तो मुहल्ले वाले, पूरे कस्बे के लोग जिन जिनको ये दिमाग फाड़ू संगीत सुनाई दे रहा था वे वे गालियां देते हुए जाग रहे थे।

बाहर आ आंखें मलते हुए देखा तो गड्ों का पेट भरती भरती हारी सड़क पर सबसे आगे आठ दस सिरों पर फल फ्रूटों,,मेवों मिठाइयों की टोकरियां उठाए चले जा रहे थे। उनके पीछे वे मुसकराते हुए। खैर, नेता किसी भी लेबल का हो । उसकी किस्मत में हंसना ही होता है । रोता तो वह दिखावे के लिए ही है। उनकी थुल थुलाई पत्नी लाल साड़ी पहने उस वक्त किसी वीरांगना से कम नहीं लग रही थी। साथ में महिला जागरण मंच की पांच सात सदस्याएं भजन गा रही थीं। सोचा कि नेता जी अगले चुनाव का टिकट मांगने के लिए भगवान के किसी मंदिर में जा रहे हों। पर नहीं , मंदिर में तो वे टिकट मांगने जा नहीं जा सकते क्योंकि उन्हें पता है कि टिकट भगवान से नहीं, हाई कमान से लिया जाता है। अगर इस देश के चुनाव में भगवान भी खड़ा होना चाहे तो उसे भी टिकट के लिए हाई कमान के आगे नाक रगड़ा पड़े, हाई कमान को आश्वासन दिलवाना पड़े कि महाराज! मुझे केवल पार्टी का टिकट दे दो! मैं आपसे चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं मांगूगा। बल्कि उल्टै टिकट की एवज में पांच सात करोड़ पार्टी फंड में दे दूंगा। मेरे पास सबकुछ है बस, चुनाव लड़ने के लिए पार्टी टिकट नहीं। मेरे भीतर जनता को खाने का जोश हिलोरें मार रहा है। अब तक तो मेरे नाम पर पुजारी ही जनता को खाता रहा। अब मुझे भी जनता को खाने का एक चांस दे कृतार्थ करें माई बाप!

हक्का बक्का हो जब सड़क पर उतर आया तो मुझे देख वे और भी अकड़ कर मुस्कराते हुए चलने लगे। मैंने उनके नजदीक जा उनको पूछा,”नेता जी! आज सुबह सुबह!ये कौन सी यात्रा पर जा रहे हो? अमर नाथ यात्रा पर तो नहीं?’

तभी उनके साथ किराए के समर्थकों ने नेता जी अमर रहें का नारा लगाया तो वे और भी अकड़ कर बोले,’ बस, बहुत हो गया! हम दिल्ली जा रहे हैं।’

‘किसलिए? इतनी गर्मियों में वहां जाकर क्या करोगे? यहां पर कम से कम बिजली तो रह रही है।’

‘ भ्रटाचार के संरक्षण हेतु आमरण अनशन पर बैठने,’ मन बल्लियां उछलने लगा कि चलो! मुहल्ले से एक सदाबहार लफंगा तो कम होगा। नहीं तो अपने मुहल्ले की नियति तो यह है कि अगर कोई कुछ नहीं बन पाता तो सुबह नेता बना होता है,’ तो ये फलों, मिठाइयों की टोकरियां किसलिए?’

‘ अरे कलम घांचू! इतना भी नहीं जानता ! नेता जी ठहरे जन्म जात खाने वाले ! जन्म से खाने की आदत के चलते ये सबकुछ छोड़ सकते हैं पर खाना नहीं। बस इसीलिए ये टोकरियां साथ ले जा रहे हैं कि दांव लगते ही मुंह मार लिया करेंगे। इनकी देश को सख्त जरूरत है। आमरण अनशन के बाद भी इनका जिंदा रहना हर हाल में आवश्यक है,’ उनके एक कार्यकर्ता ने फलों का टोकरा अपने सिर पर से उठा मेरे सिर पर रखा और अपना सिर खुजलाने लगा।

, अब हद हो गई! पानी सिर से ऊपर जा चुका है। जिसे देखो वही भ्रटाचार के नाम पर रोटियां सेकने को उतारू हो रहा है। अब देखो न! पीएम समझाते मर गए बाबा को कि बाबा! छोड़ो भ्रटाचार के खिलाफ सत्याग्रह करने की जिद्द! योगा करते रहो, मौज करते रहो! भ्रटाचार व्यक्तिगत मुद्दा नहीं ,राष्ट्रीय मुद्दा है । यहां तो जब आदमी अपने ही खड़े किए मुद्दे हल नहीं कर पा रहा है तो राट्रीय मुद्दे को अपने हिसाब से चलने दो। अगर कल को कोई मुद्दा ही नहीं रहा तो सरकार किस लिए चुनेंगे? वह करेगी क्या?? राट्रीय मुद्दों के लिए सत्याग्रह की जरूरत नहीं होती। वे तो अगर हल हो भी रहे हों तो उन्हें हर हाल में जिंदा रखने की जरूरत होती है। ये मुद्दा तो जब तक सरकारें हैं चलता रहेगा। पर बाबा है कि हीरो बनने के चक्कर में अपनी सीमाएं लांघ रहे हैं। बाबा हैं यार तो बाबाओं की तरह रहो और ये राजनीति के लफड़े हम पर छोड़ दो! बाबा को कहां राजनीति सों काम! पर नहीं, योगा छोड़ अब सत्याग्रह करेंगे! काले धन को राट्र की संपत्ति घोाित करवाएंगे जब कि यहां राट्र की संपत्ति भी राष्ट्र की संपत्ति नहीं। तो लो भैया! अगर वे सेर हैं तो हम सवा सेर! भ्रष्टाचार के पक्ष में जंतर मंतर पर तब तक आमरण अनशन पर बैठ दांव लगते ही तब तक खाते रहेंगे जब तक भ्रष्टाचार  को देश में नैतिकता नहीं मान लिया जाता! फिर देखता हूं अन्ना हजारे और बाबा को! बैठा लें हर जिले में अपने मंच के बंदों को अपने समर्थन में अनशन पर । मैंने अगर घर से लेकर हर दफ्तर तक हर कैडर के बंदे भ्रष्टाचार के पक्ष में आमरण अनशन पर नहीं बैठाए तो मेरा नाम बदल कर रखना। फिर चारों ओर बस एक ही आवाज होगी भ्रष्टाचार जिंदाबाद! भ्रष्टाचार जिंदाबाद!! कलियुग में भ्रष्टाचार के विकास के अतिरिक्त कोई भी आंदोलन चला लीजिए, दूसरे दिन औंधे मुंह न गिरे तो मूंछे कटवा कर रख दूं। तो तुम मेरे साथ भ्रष्टाचार के पक्ष में जंतर मंतर बैठने पर किस रोज आओगे?

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1 Comment on "भ्रष्टाचार महाक्ति कलियुगे!!"

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ramesh singh
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मजा आ gaya

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