लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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और वर्षों की तरह यह वर्ष भी बीत गया| हर बार की तरह ही मैं इस बहस में उलझा हुआ हूँ कि हमने क्या खोया-क्या पाया? काफी सोचने के बाद भी मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा हूँ| मैं इतना दिग्भ्रमित हूँ कि समझ नहीं आ रहा कि बीते वर्ष को यादगार कहूँ, अच्छा कहूँ या बुरा| कुछ शानदार उपलब्धियों से हमारे देश का नाम विश्व पटल पर धूमकेतु की तरह चमका तो कुछ नकारात्मक बातों से देश की इज्ज़त और शोहरत में बदनुमा दाग भी लगा| फिर भी “बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले” की तर्ज़ पर मैं भी आशान्वित हूँ कि यह आ चुका वर्ष भारत के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा|

 

बीते वर्ष ने जहां युवा तरुणाई को हुंकार भरते देखा; वहीं भ्रष्टाचार के नित उजागर होते घोटालों ने अवाम को मनन-चिंतन हेतु बाध्य किया कि वह किस दिशा में जाना चाहती है? सरकार के लिए बीता वर्ष जहां अग्निपरीक्षा से कम नहीं रहा तो विपक्ष लाख कोशिशों के बावजूद सरकार का विकल्प नहीं बन सका| ७४ वर्षीय बुजुर्ग के युवा जोश ने देश सहित युवाओं को नई रौशनी दिखाई तो साल जाते-जाते उन्हीं युवाओं ने उसके दिल को इतना व्यथित किया कि जो लड़ाई वह देश की बेहतरी के लिए लड़ रहा था, उसे बीच में ही छोड़ना पड़ा| विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र पर संकट के बादल मंडराय और आम जनता का संसद पर से विश्वास कम होता गया| राजनेताओं की कारगुजारियों ने देश की छवि पर नकारात्मक प्रभाव डाला| चाहे सुरेश कलमाड़ी हों या कनिमोज़ी या अमर सिंह; सभी ने स्वहित को सर्वोच्चता दी और ऐसे-ऐसे कारनामे किए कि लोकतंत्र भी शर्म से झुक गया| इनकी वजह से आम आदमी के मन में घर कर गया “गुस्सा फूटेगा तो हाथ छूटेगा” पूरे वर्ष जारी रहा| आम आदमी के प्रतिनिधि आम आदमी के बीच जाने से डरने लगे| कह सकते हैं कि बीते वर्ष ने सही मायनों में आम आदमी की ताकत को पहचाना और आगामी वर्ष में इसके और पुख्ता होने की उम्मीद है|

 

बीते बरस ऐसा बहुत कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था फिर भी भारत वैश्विक परिदृश्य में अपनी बुलंदी को बरकरार रख पाया तो यह देशवासियों के अथक परिश्रम और इमानदारी का ही परिणाम है| बात चाहे खेलों की हो या चिकित्सीय सुविधाओं की; भारत ने अपनी प्रगति से पूरे साल विश्व जनमत को अचंभित किया| बस टीस सिर्फ यही रह गई कि भ्रष्टाचार के खात्मे हेतु जो मजबूत लोकपाल आना चाहिए था वह राजनेताओं की कुटिल चालों में उलझकर धोकपाल बन कर रह गया| लोकपाल को फुटवाल बनाने के चक्कर में नेताओं के असल चरित्र से भी परदा उठा जिससे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कमजोर हुई| अब इस वर्ष लोकपाल आने की उम्मीद है पर यह इतना आसान भी नहीं दिखता| दरअसल कोई भी राजनीतिक दल मजबूत लोकपाल नहीं चाहता क्यूंकि इसके अस्तित्व में आते ही कई बड़ी मछलियों के “बड़े घर” जाने की पूरी संभावनाएं हैं| फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है और इसी भरोसे पर लोकपाल का भविष्य भी टिका हुआ है|

 

आम आदमी की बात की जाए तो बीते वर्ष न तो उसे महंगाई से मुक्ति मिली न ही सुशासन ही नसीब हुआ और यह स्थिति इस वर्ष भी बरकरार रहने की उम्मीद है| २००८ में आई आर्थिक मंदी ने बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के छक्के छुड़ा दिए थे पर भारत इससे अछूता रहा था| मगर इस वर्ष की शुरुआत से ही आर्थिक मंदी की आहट भारत में भी सुनाई दी जाने लगी है| फिर जिस अनुपात में बढ़ती जनसंख्या हेतु रोजगार के अवसर प्राप्त होने चाहिए थे; वे नहीं हुए| अब जबकि भारत में भी आर्थिक मंदी दस्तक देने लगी है तो समझा जा सकता है कि युवाओं के लिए आगामी वर्ष कितना संघर्षपूर्ण होने जा रहा है? शायद यह आर्थिक मंदी आगामी वर्ष की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाली है जिसके कारगर उपाय हमें अभी से खोजने होंगे| फिर आतंकवाद और नक्सलवाद; दोनों मुद्दे बीते साल भी सरकार सहित देश के लिए चुनौती बने रहे और इस साल भी इनकी सक्रियता में कोई कमी आने की उम्मीद नहीं है| फिर सरकारें जिस तरह धर्म आधारित राजनीति करती जा रही हैं उससे देश एक बार पुनः बंटवारे की ओर अग्रसर हो चला है| इस विभाजनकारी राजनीति को पार्टियां जितना जल्दी हो सके त्याग दें वरना वैमनस्यता का ऐसा ज़हर फैलेगा जिसपर काबू कर पाना असंभव होगा|

 

समस्याएं और भी हैं और शायद उनके समाधान भी हमारे बीच मौजूद हैं| बस आवश्यकता है तो इस बात कि हम आशान्वित हों और पूरी इमानदारी से देशहित में कार्य करें| “जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी” की भावना हमें देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की याद दिलाती रहे और हम निष्काम भाव से नए वर्ष में देश की प्रगति में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें| कोई भी राष्ट्र पूर्ण नहीं होता; उसे पूर्ण बनाना पड़ता है और ज़ाहिर है यह काम कोई और नहीं हम और आप ही करते हैं| समस्याओं की गठरी लादकर चलना या उन्हें हल कर उसका बोझ कम करना; हमारे समक्ष दोनों विकल्प खुले हुए हैं| अब यह हमें तय करना है कि नए वर्ष में हम क्या चाहते हैं क्योंकि हमारी बेहतरी हमारे अपने ही हाथों में सुनिश्चित है| आइये संकल्प लें कि नए वर्ष में समस्याओं का रोना न रोते हुए सीमित संसाधनों में भी स्वयं को सिद्ध करें ताकि पूरी दुनिया हमारी इच्छा-शक्ति का लोहा माने| नया वर्ष सभी के लिए शुभ हो; ऐसी कामना है|

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