लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

हमारे देश में वैसे तो लगभग सभी प्रकार के जुर्म के ग्राफ में लगातार इज़ाफा होता जा रहा है। परंतु गत कुछ वर्षों से बलात्कार तथा बलात्कार के बाद हत्या, सामूहिक बलात्कार एवं महिला यौन उत्पीडऩ जैसे अपराधों की संख्‍या में कुछ ज्य़ादा ही बढ़ोतरी देखी जा रही है। इन अपराधों से निपटने के लिए भारत सरकार महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम प्रकार के उपाय कर रही है जैसे कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए विशेष कानून बनाया जाना, महिला थाने स्थापित करना, महिलाओं की शिकायतों को सुनने के लिए विशेष महिला सेल बनाना, महिलाओं के लिए विशेष रूप से ट्रेन, मैट्रो तथा बसें आदि चलाना। इसके अतिरिक्त सरकार महिला आयोग के रूप में एक ऐसी संस्था संचालित कर रही है जोकि महिलाओं पर होने वाले सभी प्रकार के ज़ुल्मो-सितम की सुनवाई करता है तथा सरकार को अपनी रिपोर्ट, सुझाव एवं सिफारशें प्रेषित करती है।

वहीं दूसरी ओर हमारा देश बलात्कार जैसी मानसिक बीमारी कही जा सकने वाली भीषण समस्या से भी इस कद्र जूझ रहा है कि आज हम इस बुराई को लेकर पूरी दुनिया में बदनाम होते जा रहे हैं। कई विभिन्र देशों से ऐसी खबरें अक्सर आती रहती हैं कि किसी भारतीय नागरिक ने बलात्कार किया तथा उसके जुर्म में उसे सज़ा काटनी पड़ रही है। भारत में विदेशी पर्यटकों के साथ बलात्कार किए जाने के भी समाचार प्राय: आते रहते हैं। अब तो अक्सर इस प्रकार के आलेख भी कई विशेषज्ञों द्वारा लिखे जाने लगे हैं जिनमें यह प्रश्र उठाया जा रहा है कि बलात्कार अथवा यौन उत्पीडऩ जैसे अपराध की ओर भारतीय लोगों के बढ़ते रुझान का कारण आखिर है क्या? इसे मानसिक बीमारी समझा जाए,दिवालियापन कहा जाए, पागलपन समझा जाए या कुछ और? जो भी हो इस दुष्प्रवृति का बढ़ता चलन हमारे समाज को अत्यधिक प्रदूषित,बदनाम तथा दागदार करता जा रहा है। खासतौर पर उस समय हमारे देश की छवि को और अधिक धक्का पहुंचता है जबकि हमारे देश की कानून व्यवस्था,संविधान,शासन या प्रशासन से जुड़ा कोई जि़ मेदार व्यक्ति ऐसी घिनौनी हरकतों में संलिप्त पाया जाता है।

पिछले दिनों बिहार के पूर्णिया जि़ले में हुई घटना ने तो न केवल पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया बल्कि विदेशों में भी इस समाचार को तरह-तरह के शीर्षकों के साथ प्रकाशित किया गया। बिहार के पूर्णिया जि़ले के सदर हल्के से निर्वाचित हुआ विधायक राजकिशोर केसरी चौथी बार भारतीय जनता पार्टी जैसे तथाकथित ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी दल से निर्वाचित हुआ था। रूपम पाठक नामक एक स्कूल की संस्थापिका एवं प्रधानाचार्य ने चाकुओं से उसकी हत्या उसी के निवास पर कर डाली। इस घटनाक्रम को ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी दल के तमाम सरबराह विपक्षी दलों की साजि़श का परिणाम बता रहे हैं। परंतु यह घटना अपने आप में स्वयं इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि कोई महिला और वह भी शिक्षित व स्कूल चलाने वाली महिला आखिर क्यों और किन परिस्थितियों में किसी सत्तारुढ़ दल के विधायक का उसी के निवास पर आम लोगों के सामने कत्ल कर सकती है।

आईए संक्षेप में सुनिए इस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ दल के विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या का वह कारण जिसे शायद ही कोई व्यक्ति दरगुज़र कर सकता था। रुपम पाठक के पति गोहाटी में रहते हैं तथा रुपम स्वयं पूर्णिया में राजहंस पब्लिक स्कूल नामक अपना स्कूल 2006 से संचालित कर रही है। आम लोगों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से चलाया गया यह स्कूल शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया था। 2007 में विधायक राजकिशोर केसरी इसी स्कूल में आयोजित एक कार्यक्रम में बतौर मु य अतिथि पधारे। पूरे पूर्णिया क्षेत्र में एक अय्याश प्रवृति के विधायक होने की छवि रखने वाले केसरी ने रूपम पाठक से भीनज़रें चार कर डाली। समाचारों के अनुसार उसके साथ भी यह रंगरेलियां मनाने लगा। धीरे-धीरे उसके साथी भी रूपम पर अपनी मनमर्जी करने का दबाव बनाने लगे। होत-होते यौन शोषण के अपराध का यह सिलसिला आगे बढ़कर ब्लैक मेलिंग व धन उगाही के रूप में तब्दील होने लगा। अब रूपम पाठक स्वयं को परेशान व आतंकित महसूस करने लगी। आखिरकार वह राजकिशोर केसरी की काली करतूतों व उसके तथा उसके साथियों द्वारा की जाने वाली ज़ोरज़बरदस्ती की शिकायतें लेकर स्थानीय पुलिस की शरण में जा पहुंची। भारतीय व्यवस्था को जानते व पहचानते हुए यह बखूबी सोचा जा सकता है कि एक साधारण महिला की शिकायत पर पुलिस विभाग किसी स्थानीय विधायक और वह भी सत्तारुढ़ दल के विधायक के विरुद्ध क्या कदम उठा सकती है। यहां भी वही हुआ। न्याय और व्यवस्था से गुहार कर चुकी रूपम पाठक विधायक के विरुद्ध पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर उसने आखिरकार विधायक केसरी व उसके गुर्गों के दबाव में आकर अपने परिवार की जान की सुरक्षा की खातिर अपने कदम पीछे खींच लिए।

परंतु रूपम पाठक द्वारा अपने कदम वापस लिया जाना विधायक केसरी की हौसला अफज़ाई का कारण साबित हुआ। अब वह विधायक तथा उसके मवाली गुंडे रुपम पाठक को और भी तंग करने लगे। कभी ब्लैक मेलिंग के द्वारा तो कभी यौन शोषण को लेकर। बताया जाता है कि पिछले दिनों रुपम पाठक अपने पति के पास गोहाटी गई हुई थी। उधर उसके घर में उसकी 13 वर्षीया बेटी तथा एक नौकर मौजूद थे। समाचारों के अनुसार अय्याश विधायक राजकिशोर केसरी अपने कुछ गुंडों के साथ रुपम पाठक के घर पहुंच गया तथा उसकी 13 वर्षीया बेटी को अपनी हवस का शिकार बना डाला। यह सूचना मिलते ही रुपम पाठक गोहाटी से पूर्णिया आ गई। उसने अपने आप पर काबू न रख पाते हुए एक बड़े धारदार हथियार के साथ विधायक केसरी के निवास की ओर कूच किया। शॉल में मुंह ढके तथा शॉल में ही खंजर छुपाए रुपम भी उस भीड़ में जाकर खड़ी हो गई जिससे विधायक मुलाकात कर रहे थे। वहां रुपम ने विधायक जी से अकेले में बात करने की बात करने का निवेदन किया। शाल में मुंह छिपा होने के कारण केसरी जी रुपम पाठक को पहचान न सके। और जैसे ही वह रुपम से एकांत में बात करने की गऱज़ से थोड़ा ही आगे बढ़े कि रुपम ने अपनी 13 वर्षीय बेटी के बलात्कारी पर चाकुओं से ताबड़तोड़ प्रहार कर उसे वहीं ढेर कर दिया।

इस घटना के बाद विधायक के गुर्गों ने उस महिला को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। परंतु वह भीड़ अपने विधायक को बचा नहीं सकी। हां राजकीय सम्‍मान के साथ बलात्कारी विधायक को बिदाई ज़रूर दी गई। इस घटना को राजनैतिक रूप देने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। क्योंकि यौनाचार जैसी दूषित मानसिकता का शिकार कोई भी व्यक्ति हो सकता है। किसी भी पार्टी का कोई भी नेता, अधिकारी, उद्योगपति, गरीब, मज़दूर, किसान, फौजी, पुलिसकर्मी कोई भी व्यक्ति। इस घटना से जो सबक हमें मिल रहा है वह यह कि आखिर नौबत यहां तक क्यों आ पहुंची कि रुपम पाठक को विधायक केसरी की हत्या तक करनी पड़ी? अभी कुछ ही वर्ष पूर्व की बात है जबकि एक पेशेवर बलात्कारी व्यक्ति को उसके द्वारा किए गए बलात्कार से पीडि़त कई महिलाओं ने इकट्ठा हो कर अदालत के बाहर ही उसे पीट-पीट कर मार डाला था। हत्या जैसे मामले में भी खासतौर पर हमारे देश में यह कई बार तथा कई मामलों में यह देखा गया है कि यदि हत्या आरोपी के विरुद्ध पुलिस या अदालत सही कार्रवाई या न्याय नहीं कर पाती तो पीडि़त पक्ष स्वयं कानून अपने हाथ में ले लेता है। परिणामस्वरूप हत्या का जवाब हत्या से दिए जाने की खबरें सुनने को मिलती हैं।

अब इसी परिपेक्ष्य में अपैल 2009 में माननीय उच्चतम् न्यायालय के एक आदेश पर गौर फरमाईए। इसमें उच्चतम् न्यायालय ने कहा है कि ‘बलात्कार व हत्या जैसे जघन्य अपराधों में शामिल अपराधियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई जानी चाहिए। अन्यथा यह न्याय व्यवस्था में लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाएगा।’ उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी उस समय दी थी जबकि मध्य प्रदेश की एक निचली अदालत द्वारा एक बलात्कारी को 7 वर्ष के सश्रम कारावास की सज़ा को घटाकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उसे 6 माह के कारावास में परिवर्तित कर दिया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले को निरस्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने ऐसी टिप्पणी दी थी। गौरतलब है कि हमारे देश में तो समय-समय पर बलात्कारी को फांसी देने तक की मांग उठती रहती है। यहां तक कि कई जघन्य हत्या एवं बलात्कार के मामलों में फांसी तथा आजीवन कारावास जैसी सज़ाएं हो भी चुकी हैं। ऐसे में यदि देश की व्यवस्था यह चाहती है कि राजकिशोर केसरी की हत्या जैसी घटनाओं की पुनरावृति न होने पाए तो पीडि़त एवं प्रभावित जनता को इस बात का यकीन दिलाना ज़रूरी है कि पुलिस, प्रशासन तथा न्यायपालिका में उसकी सुनवाई होकर ही रहेगी। और यदि यह भावना पैदा करने में हमारे देश की व्यवस्था असफल रही तो ऐसी घटनाओं को बार-बार दोहराए जाने से भी कभी रोका नहीं जा सकेगा।

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2 Comments on "विधायक की हत्या से सुलगते सवाल"

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jeengar durga shankar gahlot
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इस पूरी जानकारी के लिए लेखिका निर्मल रानी का आभार. अफ़सोस इस बात का है कि इस शर्मनाक घटना पर समूचा भाजपा संगठन खामोश बना हुआ है. २ जी स्पेक्ट्म मामले पर जेपीसी की मांग के नाम पर संसद का बहिष्कार कर देश को आर्थिक नुकसान पहुचाने तथा सारी सुविधाओं और वेतन आदि का लाभ लेने वाली भाजपा का अपने ही विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या पर मोन रहना, इनके असली मुखोटे को ही उजागर कर रहा है जो नितांत ही शर्मनाक है. लेकिन शर्म का मर्म भी नेतिकता वाले इन्सान ही समझ सकते है, अन्य तो क्या समझेगे. –… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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सही किया ,एसे लोगो के साथ ऐसे ही होना चाहिए ……………………भाजपा ने ऐसे गुंडे को टिकट ही क्यों दिया?? भारत में भी अब एसी व्यवस्था बनी चाहिए जिसमे जनता ही तय करे की किसी टिकट देना चाहिए …………जनता की अकर्मण्यता से ही ऐसे लोगो के हौसले बुलंद होते है पार्टी के tiakat व् जनता के सामने विकल्प हीनता से ऐसे लोग जीत भी जाते है ये लोग ही आगे जा कर भर्ष्टाचार अनाचार फैलाते है लेकिन ये बाद भी है की लोग एसे लोग के पास खुद ही जाते है जब तक उनको फायदा मिलता है तब तक वो चुप… Read more »
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