लेखक परिचय

तेजवानी गिरधर

तेजवानी गिरधर

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। हाल ही अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।

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तेजवानी गिरधर

जिस अन्ना टीम ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन खड़ा किया, उसी ने अपनी नादानियों, दंभ और मर्यादाहीन वाचालता के चलते उसे एक अंधे कुएं में धकेल दिया है। यह एक कड़वी सच्चाई है, मगर कुछ अंध अन्ना भक्तों को यह सुन कर बहुत बुरा लगता है और वे यह तर्क देकर आंदोलन की विफलता को ढ़ंकना चाहते हैं कि टीम अन्ना ने देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरण तो पैदा किया ही है। बेशक देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार को लेकर बड़ी भारी पीढ़ा थी और उसे टीम अन्ना ने न केवल मुखर किया और उसे एक राष्ट्रीय आंदोलन की शक्ल दी, मगर जिस अंधे मोड़ पर ले जाकर हाथ खड़े किए हैं, वह आम जनता की आशाओं पर गहरा तुषारापात है। एक अर्थ में यह जनता के साथ विश्वासघात है। जिस जनता ने उन पर विश्वास किया, उसे टीम अन्ना ने एक मुकाम पर ला कर ठेंगा दिखा दिया। अब हम भले ही आशावादी रुख अपनाते हुए आंदोलन की गर्म राख में आग की तलाश करें, मगर सच्चाई ये है एक बहुत बड़ी क्रांति का टीम अन्ना ने सत्यानाश कर दिया।

टीम अन्ना में चूंकि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लोग थे, इस कारण उनमें कभी भी मतैक्य नहीं रहा। उनके मतभेद समय-समय पर उजागर होते रहे, जिसकी वजह से कई बार सामूहिक नेतृत्व के मुद्दे पर उनसे जवाब देेते नहीं बना।

जहां तक स्वयं अन्ना हजारे का सवाल है, वे खुद तो पाक साफ हैं और बने रहे, मगर उनकी टीम कई बार विवादों में आई। कभी अरविंद केजरीवाल पर आयकर विभाग ने उंगली उठाई, तो कभी किरण बेदी पर विमान की टिकट का पैसा बचाने का आरोप लगा। भूषण बाप-बेटे की जोड़ी पर भी तरह-तरह के आरोप लगे। सबसे ज्यादा विवादित हुए अपने घटिया बयानों की वजह से।

टीम अन्ना कितने मतिभ्रम में रही, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी जिन बाबा रामदेव से वह कोई संबंध नहीं रखना चाहती थी, बाद में उसी से मजबूरी में हाथ मिला लिया। उसके बाद भी बाबा रामदेव को लेकर भी टीम दो धड़ों में बंटी नजर आई। यही वजह रही कि जब टीम से बाबा से गठबंधन किया तो न केवल उनके विचारों में भिन्नता बनी रही, अपितु मनभेद भी साफ नजर आता रहा। एक ओर बाबा रामदेव गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से गलबहियां करते रहे तो दूसरी और टीम अन्ना के सदस्य इस मुद्दे पर अलग-अलग सुर उठाते नजर आए। हालत ये हो गई कि जो बाबा रामदेव अपने वायदे के मुताबिक टीम अन्ना के ताजा अनशन के पहले दिन कुछ घंटे नजर आए, बाद में गायब हो गए और आखिरी दिन अनशन तुड़वाने के लिए आने पर कहने पर साफ मुकर गए। टीम अन्ना कभी सभी राजनीतिक दलों से परहेज करती रही तो कभी पलटी और कांग्रेस को छोड़ कर अन्य सभी दलों के नेताओं के साथ एक मंच पर आई। टीम अन्ना की नीयत और नीति सदैव अस्पष्ट ही रही। यही कारण रहा कि शुरू में जो संघ व भाजपा कांग्रेस विरोधी आंदोलन होने की वजह से साथ दे रहे थे, वे खुद को भी गाली पडऩे पर अलग हो गए।

टीम अन्ना दंभ से इतनी भरी है कि वह अपने आगे किसी को कुछ नहीं गांठती। उसने कई बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व अन्य मंत्रियों और नेताओं पर अपमाजनक टिप्पणियां कीं। पिछले साल स्वाधीनता दिवस पर खुद अन्ना ने मनमोहन सिंह पर टिप्पणी की कि वे किस मुंह से राष्ट्रीय झंडा फहरा रहे हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान तो प्रणव मुखर्जी पर आरोप लगाए ही, उनके चुने जाने पर इसे देश का दुर्भाग्य करार दिया। यह बेशर्म सदाशयता ही कही जाएगी कि पहले जानबूझकर प्रणब मुखर्जी का चित्र अपने मंच पर लगाया और बाद में खीसें निपोरते हुए उसे कपड़े से ढंक दिया।

जहां तक टीम की एकता का सवाल है, अन्ना हजारे कहने मात्र को टीम लीडर थे, मगर भीतर अरविंद केजरीवाल तानशाही करते रहे। अकेले उनके व्यवहार की वजह से एक के बाद एक सदस्य टीम से अलग होते गए। एक ओर तो टीम अन्ना लोकतंत्र और पारदर्शिता की मसीहा बनती रही, दूसरी ओर खुद कुलड़ी में गुड़ फोडऩे की नीति पर चलती रही। मौलाना शमून काजमी की टीम से छुट्टी उसी का ज्वलंत उदाहरण है। यह वही टीम है, जिसने सरकार के साथ शुरुआती बहस की वीडियो रिकार्डिंग करवाने की जिद की और दूसरी ओर अन्ना हजारे केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद से गुप्त वार्ता करने से नहीं चूके। पोल खुलने पर उनका चेहरा देखने लायक था, जो हर एक ने टीवी पर देखा।

जो आखिरी अनशन आंदोलन के पटाक्षेप और राजनीति की ओर पहल का सबब बना, वह भी बिना किसी रणनीति के शुरू हुआ। इसका दोष भले ही सरकार को दिया जाए कि उसने उनको इस बार गांठा ही नहीं, मगर यह टीम अन्ना की रणनीतिक कमजोरी ही मानी जाएगी कि नौवें दिन तक आते-आते किंकतव्र्यविमूढ़ हो गई। वजह साफ थी। टीम अन्ना की बेवकूफियों व अपरिपक्वता की वजह से आंदोलन जनाधार खो चुका था। जब भीड़ नहीं जुटी तो उस टीम के होश फाख्ता हो गए, जो कि सबसे पहले व दूसरे अनशन के दौरान अपार जनसमर्थन की वजह से बौरा गई थी। जब मीडिया ने भीड़ की कमी को दिखाया तो अन्ना के समर्थक बौखला गए। उन्हीं मीडिया कर्मियों से बदतमीजी पर उतर आए, जिनकी बदौलत चंद दिनों में ही नेशनल फीगर बन गए थे। यहां तक कि सोशल मीडिया पर केजरवाल को भावी प्रधानमंत्री तक करार दिया जाने लगा।

असल में मीडिया किसी का सगा नहीं होता। वो तो उसने इसी कारण टीम अन्ना को जरूरत से ज्यादा उभारा क्योंकि उसे लग रहा था कि टीम एक अच्छे उद्देश्य के लिए काम कर रही है, मगर टीम अन्ना ने समझ लिया कि मीडिया उनका अनुयायी हो गया है। जैसे ही मीडिया तटस्थ हुआ और आंदोलन की कमियां भी उजागर करने लगा तो आंदोलन की रही सही हवा भी निकल गई। इसी के साथ यह भी साफ हो गया था कि पूरा आंदोलन टीवी व इंटरनेट पर की जा रही शोशेबाजी पर टिका हुआ था।

इस बार बलिदान होने की घोषणा करके अनशन पर बैठे अरविंद केजरीवाल की बुलंद आवाज तब ढ़ीली पड़ गई, जब आठ दिन बाद भी उन्हें सरकार ने तवज्जो नहीं दी। हालत ये हो गई कि अपना अनशन खुद ही तोड़ लेने का फैसला करना पड़ा। और बहाना बनाया इक्कीस लोगों की उस चि_ी को, जिस में पार्टी बनाने की कोई सलाह या उस में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं लिखी गई थी। आंदोलन एक ऐसे मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया, जहां मुंह बाये खड़ी जनता को जवाब देना जरूरी था। जवाब कुछ था नहीं, सो आखिर विकल्प के लिए वही रास्ता चुना, जिसके लिए वे लगातार आनाकानी करते रहे। अर्थात सत्ता परिवर्तन की मुहिम। व्यवस्था परिवर्तन तो कर नहीं पाए। हालांकि अधिसंख्य अन्ना समर्थक सहित खुद टीम अन्ना भी यह जानती है कि ये रास्ता कम से कम उनके हवाई संगठन के लिए धन के अभाव में कत्तई नामुमकिन है, मगर नकटे बन कर यही कह रहे हैं कि हम सत्ता परिवर्तन कर दिखाएंगे। अनेक ऐसे भी हैं, जो आंदोलन से जुड़ कर अब पछता रहे हैं कि यदि इसी प्रकार राजनीति में आना था तो काहे को समय बर्बाद किया। जिन्हें लोग असली राष्ट्रभक्त के रूप में सम्मान दे रहे थे, उन्हें अब उसी तरह हिकारत की नजर से देखा जाएगा, जैसा कि वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं व नेताओं को देखा करते थे।

कुल मिला कर आंदोलन की निष्पत्ति ये है कि गलत रणनीतिकारों की मदद लेने से लाखों लोगों की आशा का केन्द्र अन्ना हजारे की चमक फीकी हो गई है, अलबत्ता उनकी छवि आज भी उजली ही है। बाकी पूरी टीम तो एक्सपोज हो गई है। शेष रह गया है आंदोलन, जो आज भी आमजन के दिलों में तो है, मगर उसे फिर नए मसीहा की जरूरत है

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23 Comments on "टीम अन्ना ने ही अंधे कुएं में धकेल दिया आंदोलन"

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गंगानन्द झा
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गंगानन्द झा
राजनीति में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति का प्रेशरकूकर के तंत्र की तरह सह अस्तित्व है.प्रेशरकूकर में दबाव(भ्रष्टाचार) एक हद तक बढ़ता है तो सेफ्टीवाल्व (भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम) दबाव कम करता है। जनता को इत्मीनान हो जाता है कि अब अँधेरा छटेगा। फिर और अधिक दबाव के लिए मार्ग प्रशस्त होता है, खाद्य पकता रहता है। सन १९७४ ई में जयप्रकाश की जन प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार और सम्पूर्ण क्रान्ति, १९८८ ई में विश्वनाथप्रताप सिंह का बोफोर्स, फिर टीम अण्णा-सिविल सोसायटी का लोकपाल बिल और बाबा रामदेव का कालाधन— सेफ्टी वॉल्ब के लेबल बदलते रहे हैं। नए… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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अन्ना जी के आन्दोलन के असफल होने का जो फतवा मीडिया और उसके आका नेताओं ने जारी किया है, उसके बारे में निवेदन है की—————– # अन्ना आन्दोलन को असफल कहना एक नासमझी है और या फिर एक शरारत. एक ही पक्ष को बढ़ा-चढा कर पेश करना और बाकी पक्षों की अन्देखी कर देना, इससे लगता है कि शरारत है, नीयत की खोट है. # देश की समस्याओं की मुख्य जड़ है, देश की समस्याओं के प्रति जनता का जागरूक न होना . इसका एक ही हल है- जनमत का जागरूक हो जाना. फिर दुष्टों की दुष्टता चल नहीं पाएगी.… Read more »
आर. सिंह
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सामयिक विश्लेषण.ऐसी आशावादिता ही भविष्य के लिए मार्ग दर्शक साबित हो सकती हैआपने ठीक कहा कि ” आवश्यक नहीं कि अन्ना, विशेष कर उनके बाकी के साथी कसौटी पर खरे ही उतरें. पर यह यथास्थिती वाले हालत बदलने चाहियें’ जब तक हम इस यथा स्थिति के चक्र व्यूह से बाहर नहीं आयेंगे,तब तक हम किसी परिवर्तन को सफल नहीं होने देंगे. भारत की जनता को अपनी प्रगाढ़ निद्रा से बाहर आना है.उसे जागना है.सचेत होना है. तभी कुछ अच्छे की उम्मीद की जा सकती है.आपने यह भी ठीक ही कहा कि,” यह क्या कि कांग्रस और भाजपा का फिक्सिंग मैच… Read more »
तेजवानी गिरधर
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तार्किक रूप से आपकी बातों में दम लगता है, मगर धरातल का सच आप भी समझ रहे हैं

aayush
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बढि़या आलेख के लिए धन्यवाद।

तेजवानी गिरधर
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आपका शुक्रिया

Rekha Singh
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अन्ना हजारे अपने जन क्रांति आन्दोलन मे सफल है |किरण बेदी पर जो आरोप था वह पूरी तरह गलत , झूठा , निराधार साबित हुआ |पिता और पुत्र की जोड़ी तो शुरु से ही उचित नहीं है टीम अन्ना मे |सरकार अपने कुकृत्य मे सफल हो गयी फिल हाल||यह समय अनसन का नहीं है , हां अहिंसात्मक आन्दोलन करना चाहिए परन्तु अपनी जान की बाजी दाव पर नहीं लगाना चाहिए अनसन और उपवास करके |इस युग की पुकार यही है की अपने को स्वस्थ रखते हुए ही हम देश के लिए काम कर सकते है |मै तो व्यक्तिगत रूप से… Read more »
तेजवानी गिरधर
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आप गलत कह रही हैं, किरण गेदी ने तो खुद की अपनी गलती स्वीकार कर ली थी

Anil Gupta
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अन्ना और जे पी की कुछ लोग तुलना कर देते हैं जो मेरे विचार में सही नहीं है. जे पी एक उच्च शिक्षित अनुभवी और तपःपूत थे जिन्होंने क्रन्तिकारी से गाँधीवादी फिर समाजवादी फिर सर्वोदयी फिर सम्पूर्ण क्रांति के लम्बे अनुभव प्राप्त किये और अपने हर दौर के विचारों को पूरी स्पष्टता के साथ लिखा और कहा.उनका सम्पूर्ण साहित्य वास्तव में एक मनस्वी की विचार यात्रा का सबल प्रमाण है.सम्पूर्ण क्रांति से पूर्व उन्हें इंदिराजी ने बंगलादेश (उस समय पूर्वी पाकिस्तान) से आये करोड़ों शरणार्थियों के विषय में और पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में चलाये गए दमन चक्र के बारे… Read more »
तेजवानी गिरधर
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बेशक अन्ना में न तो गांधी जी जैसी महानता है और ही जेपी जैसे शिक्षित हैं, इस टीम चला ही केजरीवाल रहे थे

आर. सिंह
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ऐसे आपलोग माने या न माने पर अन्ना का करिश्मा केवल गांधी से पीछे है.विद्वता में जेपी गांधी से आगे थे,पर गांधी वाला करिश्मा उनमे नहीं था.आज अन्ना हजारे में वही कुछ देखने को मिल रहा है,जो शायद लोगों को गांधी में दिखा था.अगर विश्वनाथ प्रताप सिंह ,जो कि राजीव गांधी के पाप में भागीदार थे, केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को मात दे सकते थे तो कोई कारण नहीं कि अन्ना के वरद हस्त के साथ बनने वाली नई पार्टी क्रांति नहीं ला सकती?

Anil Gupta
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वी पे सिंह अकेले कुछ नहीं कर पाए थे. उनके साथ उस समय चंद्रशेखर,रामधन, रामबिलास पासवान, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव तथा भाजपा और वामपंथी सभी शामिल थे और उनकी सर्कार भी भाजपा और वामपंथियों के बाहरी समर्थन से बनी थी. लेकिन उन्होंने समाज को तोड़ने का पाप किया और सेंकडों नौजवान जातीय संघर्ष में शहीद हो गए. वी पी सिंह का सारा भ्रष्टाचार विरोध प्रधान मंत्री बनते ही समाप्त हो गया और उन्होंने बोफोर्स कांड में कुछ नहीं किया.

आर. सिंह
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आप बताने की कृपा करेंगे कि बोफोर्स के मामले में श्री अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में एन.डी.ए सरकार ने क्या किया?

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