लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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chintan shivir of congressसोनिया कांग्रेस के सभी बड़े लोग सिर झुकाए बैठे थे। समझ नहीं आ रहा था कि वे चिन्ता कर रहे हैं या चिंतन; वे उदास हैं या दुखी; वे शोक से ग्रस्त हैं या विषाद से; वे निद्रा में हैं या अर्धनिद्रा में; वे जड़ हैं या चेतन; वे आदमी हैं या इन्सान ?

आधा घंटा बीता फिर एक घंटा। ऊपर से तो सब चुप और शांत थे; पर मन में हाहाकार मचा था। क्या होगा इस देश और पार्टी का ? देश की चिन्ता तो उन्हें कभी विशेष नहीं रही, पर पार्टी की चिंता जरूर थी। क्योंकि पार्टी के कारण ही उनका अस्तित्व था। पार्टी न रही, तो वे क्या ओढ़ेंगे और क्या बिछाएंगे ? यद्यपि कई लोग मानते थे कि पार्टी के कारण ही देश का अस्तित्व है। पार्टी रही, तो देश न जाने कितने बन जाएंगे। एक देश तो 1947 से अब तक लगातार बन ही रहा है। इसलिए पार्टी का बचे रहना बहुत जरूरी है। और पार्टी के बचने का अर्थ है ‘खानदानी नेतृत्व’ का बचे रहना।

लेकिन पिछले कुछ समय से चारों ओर से संकट छा रहे हैं। नेतागण समझ नहीं पा रहे हैं कि भारत की जनता इतनी कृतघ्न कैसे हो गयी ? पहले केन्द्र की सरकार गयी, और फिर एक-एक कर राज्य भी हाथ से निकल रहे हैं। ले-देकर एक बड़ा और कुछ छोटे राज्य बचे हैं। इनसे तो चाय-पानी का खर्च भी नहीं चलेगा ? खतरा ये भी है कि पहाड़ी राज्य अगले चुनाव में पार्टी को कहीं सदा के लिए हिमालय पर ही न भेज दें। या फिर दक्षिणी राज्य कर्नाटक वाले उसे समुद्र में न धकेल दें ? यदि ऐसा हुआ, तो.. ? बस यह सोच-सोचकर ही नेताओं को बुखार आ रहा है।

इसीलिए आज सब फिर बैठे हैं; लेकिन बैठे-बैठे एक घंटा हो गया, कोई शुरुआत करने को तैयार नहीं है। वही चिरन्तन प्रश्न कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ? इसलिए एक-दूसरे को आंखों ही आंखों में इशारा कर रहे हैं कि तू बोल, तू बोल। कुछ को चाय और सिगरेट की तलब लग रही थी। कुछ लोग प्राकृतिक दबावों से मुक्त होना चाहते थे; पर बैठक समाप्त हो, तब तो वे उठें। और बैठक समाप्त तब होगी, जब वह शुरू हो। इसी असमंजस में समय बीत रहा था। कुछ लोग बार-बार घड़ी देख रहे थे, तो कुछ अपने स्मार्टफोन पर वीडियो देखकर ‘टाइमपास’ करने में लगे थे।

यह सन्नाटा तब टूटा, जब एक भारी-भरकम नेता जी ऊंघते हुए कुर्सी से ही गिर गये। इस पर अध्यक्षता कर रहे मौनमोहन सिंह जी ने ‘फ्रैश’ होने के लिए आधा घंटा दे दिया। सबने चैन की सांस ली।

आधे घंटे बाद फिर बैठे। इस बार सोनिया जी बोलीं, ‘‘लोकसभा चुनाव से हमारी हार का जो क्रम शुरू हुआ है, वह लगातार जारी है। हम क्या करें, जिससे इस हार की बजाय गले में फूलों के हार का सिलसिला शुरू हो ? कृपया आप सब खुलकर अपनी बात रखें, जिससे कुछ निष्कर्ष निकल सके।’’

हिम्मत करके कुछ लोग मंच पर चढ़े। बातें वही पुरानी थीं – आजादी दिलाने में पार्टी का योगदान। परिवार का त्याग, बलिदान और नेतृत्व क्षमता। आज हारे हैं, तो कल जीतेंगे भी। परिवार के बिना पार्टी का भविष्य नहीं.. आदि। एक ने नया नेतृत्व परिवार से बाहर खोजने की बात कही, तो सब हल्ला करने लगे। फिर किसी की ये कहने की हिम्मत नहीं हुई। अतः अगले दो घंटे तक पूरा बैठक कक्ष ‘अहो रूप, अहो ध्वनि’ के स्वर से गंूजता रहा।

तीसरे सत्र की अध्यक्षता राहुल बाबा कर रहे थे। एक प्राचीन नेता ने सलाह दी कि समय-समय पर होने वाले चिंतन शिविरों में पूरे देश से जमीनी कार्यकर्ता आकर व्यापक विचार-विमर्श करते हैं। उनके उत्साह से पार्टी में फिर पुनर्जीवन आ जाता है। अतः हमें एक बार फिर चिंतन शिविर लगाना चाहिए।

बाबा बोले – ये शिविर कितने साल बाद होते हैं ?

– कोई नियम तो नहीं है; पर हारने के बाद तो होते ही हैं।

– अब तक कितने चिंतन शिविर हुए हैं ?

– पहला शिविर नवम्बर, 1974 में उ.प्र. के नरौरा में हुआ था। उस समय जयप्रकाश आंदोलन के कारण देश में हमारे विरुद्ध वातावरण बना हुआ था। शिविर में उस पर ही विचार हुआ था।

– तो उस विचार का परिणाम क्या हुआ ?

– परिणाम ये हुआ कि 1975 में आपातकाल लगाना पड़ा। उसके बाद 1977 में जो चुनाव हुए, उसमें हम जीत नहीं सके।

– आप तो कह रहे थे कि हारने के बाद ‘चिंतन शिविर’ होता है; पर यहां तो शिविर के बाद हार गये ?

– जी ये पहला शिविर था। लेकिन 1980 में हुए चुनाव में हम जीत गये और फिर अगले सोलह साल तक कभी कांग्रेस, तो कभी कांग्रेसी सत्ता में बने रहे। इसमें व्यवधान पड़ा 1996 में, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। पहले उनकी सरकार तेरह दिन चली, फिर तेरह महीने और फिर..।

– मुझे उनकी सरकार की नहीं, चिंतन शिविर की बात बताओ ?

– अगला चिंतन शिविर 1998 में पचमढ़ी में हुआ। उसमें 1996 की हार, हिन्दुत्व के उभार और बदलते समय की राजनीति को समझने का प्रयास हुआ था। उसमें तय हुआ कि परिवार के बिना पार्टी नहीं बच सकती। अतः सबके आग्रह से सोनिया जी राजनीति में आ गयीं और 2003 में उनकी अध्यक्षता में शिमला में चिंतन शिविर हुआ। इसमें विचार हुआ कि कांग्रेस अब अकेले दम पर सरकार नहीं बना सकती। अतः अन्य पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन बनाया जाए। इससे बहुत लाभ हुआ और 2004 में हमारी सरकार बन गयी।

– फिर.. ?

– फिर 2013 में जयपुर में शिविर हुआ। उसमें सबने मिलकर विचार किया कि कांग्रेस की कमान अब युवा हाथों में आनी चाहिए। तबसे पार्टी आपके कहने से चल रही है, और इसका परिणाम भी..।

– तो आप क्या चाहते हैं ?

– एक चिंतन शिविर और हो जाए, तो ठीक रहेगा।

– अच्छा तो ये रहता कि लोकसभा या दिल्ली विधानसभा की हार के बाद ही शिविर हो जाता। वैसे समय तो अब भी ठीक है, चूंकि असम और केरल में हम हारे हैं; पर जब इतना रुके हैं, तो थोड़ा और रुक जाएं। अगले साल भी कई राज्यों में चुनाव हैं। वहां हार जाने के बाद एक साथ ही चिंतन कर लेंगे।

राहुल बाबा के ‘अमूल्य वचन’ सुनकर सबके साथ-साथ मम्मीश्री ने भी सिर पकड़ लिया।

– विजय कुमार

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