लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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leadership१८५७ में प्रथम स्वातंत्र्य समर में दश के हिन्दू और मुसलमान एक साथ मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़े थे! उनकी इस एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेज़ों ने षड्यंत्र करने शुरू किये! सबसे पहले उनके जाल में आये सय्यद अहमद खान जिन्हे बाद में अंग्रेज़ों ने सर की उपाधि देकर यह साबित कर दिया कि वो अंग्रेज़ों के वफादार थे! १८७१ में डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर ने एक पुस्तक लिखकर यह समझाने की कोशिश की कि मुसलमान स्वयं को यहाँ का शासक कहने की बजाय हिन्दुओं द्वारा शोसित और उत्पीड़ित कहना शुरू करें और अपने लिए सुविधाओं की मांग करें! जबकि तथ्य यह था कि इससे पूर्व लगभग सात सौ साल के मुस्लिम शासन में हिन्दुओं को हर प्रकार के अत्याचार झेलने पड़े थे!और मुसलमानों का कोई शोषण करने की स्थिति में हिन्दू थे ही नहीं!सर सय्यद अहमद ने कहा कि हिन्दू और मुस्लमान दो अलग क़ौमें हैं जिनका कोई मिलन बिंदु नहीं है!अर्थात वो एक साथ नहीं चल सकते हैं! इसी में से आगे चल कर आगा खान के नेतृत्व में मांग पत्र पेश किया गया और मुस्लिम लीग का जन्म हुआ! १९१५ में भारत आने के बाद गांधीजी ने हिन्दू मुस्लिम एकता पर जोर देना शुरू किया और १९१६ में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन एक साथ कराये गए लेकिन इससे हिन्दू मुस्लिम एकता की बजाय अलगाव को ही बल मिला क्योंकि इसी सम्मलेन में सबसे पहले कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया और पाकिस्तान की मांग की नींव रखी!१९२० में नागपुर अधिवेशन में खिलाफत आंदोलन को कांग्रेस द्वारा चलाये जाने का निर्णय लिया जिसका कांग्रेस के राष्ट्रवादी धड़े द्वारा विरोध भी किया गया था!जिस दिन खिलाफत आंदोलन शुरू होना था उससे एक दिन पहले ही कांग्रेस के प्रमुख राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक का स्वर्गवास हो गया! प्रसिद्द पत्रकार दुर्गादास ने इस पर लिखा कि शायद यह नियति का संकेत था कि अब कांग्रेस में राष्ट्रवाद का युग समाप्त हो गया है और समझौता वाद का युग शुरू हो गया है!अनेकों विचारकों का मत रहा है कि खिलाफत आंदोलन के कारण देश में राष्ट्रवादी मुस्लिम नेतृत्व विकसित नहीं हो पाया और जो था भी वह गांधीजी द्वारा रूढ़िवादी मुस्लिमों को तरजीह दिए जाने के कारण समाप्त हो गया!
ऐसा नहीं है कि मुसलमानों में सभी रूढ़िवादी या कट्टरपंथी रहे हों! लेकिन आज़ादी से पहले भी और बाद में भी देश के तत्कालीन नेतृत्व ने कट्टरपंथियों को ही तरजीह दी है! सम्भवतः उनको लगता रहा की कट्टरपंथी रूढ़िवादियों का ही असर अधिकांश मुसलमानों पर है और उन्हें साथ रखने से ही राजनीतिक लाभ रहेगा! अगर आधुनिक विचारों वाले प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व को आगे लाया जाता तो स्थति बिलकुल भिन्न होती! स्व.राजीव गांधी के समय एक सुअवसर मिला था इस गलती को सुधारने का!शुरू में राजीव गांधी ने उस दिशा में चलने का प्रयास भी किया और शाहबानो के मामले में सर्वोच्च न्यायाल के निर्णय के बचाव में एक प्रगतिशील युवा नेता आरिफ मोहम्मद खान को आगे किया गया! लेकिन बाद में रूढ़िवादियों के दबाव में और कांग्रेस के कुछ समझौतावादी नेताओं के परामर्श पर राजीव गांधी ने पलटी मारी और कट्टरपंथी रूढ़िवादी मुस्लिम नेताओं को आगे कर दिया तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए कानून में संशोधन कर दिया!
आज स्थिति यह हो गयी है कियदि कोई स्वतंत्र चिंतक मुस्लिम कोई बात कहता है तो तुरंत फ़तवा दे दिया जाता है कि वो तो मुसलमान ही नहीं है! तारीख फतह, तुफैल अहमद, तस्लीमा नसरीन और ऐसे ही कुछ और प्रगतिशील मुसलमान जब कोई बात कहते हैं तो कट्टर पंथी मुस्लिम उन पर टूट पड़ते हैं! कल राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने नाम लेकर तारीख फतह और तस्लीम नसरीन की आलोचना की!
आज जिस प्रकार की चुनौतियों का सामना मुस्लिम जगत को करना पड़ रहा है उसमे समझदारी की बात करने वाले मुस्लिम नेतृत्व की बड़ी तादाद में आवश्यकता है! लेकिन उनको रोकना न केवल लोकतंत्र के विरुद्ध है बल्कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति के कानून का भी उल्लंघन है!उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्तमान केंद्र सरकार दबावों में न आकर प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व को स्वाभाविक रूप से उभरने का अवसर देंगे ताकि मुस्लिम समाज को कट्टरपंथियों की जकड़न से मुक्ति मिल सके!

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