लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

मतदान की अनिवार्यता कोर्इ नर्इ बहस नहीं है, लेकिन मतदाता को नकारात्मक मतदान का जो अधिकार मिला है, उस परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रसांगिकता बड़ जाती है। लालकृश्ण आडवाणी ने अनिवार्य मतदान के महत्व को अपने ब्लाग में रेखांकित कर इस बहस में नये सिरे से जान फूंक दी है।साथ ही उन्होंने मतदान नहीं करने वाले लोगों पर जुर्माना अथवा दण्ड देने के प्रावधान की मांग भी की है। हालांकि भारत में चुनाव सुधारों को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगीं राजनैतिक स्तर पर दिखार्इ नहीं दी है। इस दिशा में नकारात्मक मतदान का हक और दागी प्रत्याशियों को चुनाव से रोकने के प्रयास सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही संभव हुए हैं। अदालत के निर्देश की बदौलत ही र्इवीएम से मतदान की पर्ची देने का सिलसिला चरणबद्ध तरीके से शुरु होने जा रहा है। इस पर्ची से मतदाता को पता चल जाएगा कि उसने जिस उम्मीदवार को वोट दिया है वह उसी के खाते में गया अथवा नहीं ?

मतदाता को खारिज करने का अधिकार मिलने के साथ ही राजनैतिक दल चाहते थे कि मतदान को भी अनिवार्य किया जाए। उनकी दलील थी कि देश में मतदान का औसत प्रतिशत बहुत कम है। जहां ज्यादातर पचास फीसदी मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हों, वहां किसी क्षेत्र के उम्मीदवारों को नकारने अथवा वापस बुलाने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है ? ये अधिकार बड़े स्तर पर धनराशि की फिजूलखर्ची का भी कारण बनेगें। लिहाजा पहले मतदान की अनिवार्यता के प्रति मतदाताओं को जागरुक किया जाए, ताकि विकल्प की सार्थकता साबित हो सके।

अनिवार्य मतदान की कोशिश गुजरात सरकार एक विधेयक के जरिये पहले ही कर चुकी है, लेकिन राजपाल ने इसे नामंजूर कर दिया। देश में पहली बार लोकतांत्रिक प्रकि्रया मजबूत करने की दृशिट से मतदान की अनिवार्यता संबंधी विधेयक लाकर नरेंन्द्र मोदी ने एक साहसिक कदम 2010 में उठाया था। विधेयक के कानून में तब्दील होते ही यहां नगरीय निकाय और ग्राम पंचायतों में प्रत्येक मतदाता को मतदान करना बाध्यकारी बना दिया गया था। वोट न डालने की स्थिति में मतदाता को दंडित करने के अधिकार का प्रावधान भी इस विधेयक के प्रारुप में है। कांग्रेस इसने विधेयक का सिर्फ इसलिए विरोध किया क्योंकि इसे भाजपा शासित सरकार ने पेश किया था ।

किसी भी देश के लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब शत-प्रतिशत मतदान से जनप्रतिनिधि चुने जाएं। मौजूदा दौर में हमारे यहां मत-प्रतिशत 35-40 से 65-70 तक रहता है। आतंकवाद की छाया से ग्रसित रहे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यह प्रतिशत 20 तक भी रहा है। लेकिन लोकतांत्रिक प्रकि्रया की बहाली के साथ इन प्रदेशो में भी मतदान में उम्मीद से ज्यादा इजाफा हुआ है।

फिलहाल दुनिया के 32 प्रजातांत्रिक देशो में अनिवार्य मतदान की पद्धति प्रचलन में है। इनमें से 19 ही ऐसे देश हैं जहां सभी चुनावों में यह पद्धति अपनार्इ जाती है। आस्टेलिया, अर्जेटीना, ब्राजील, सिंगापुर, तुर्की और बेलिजयम इन देशो में प्रमुख हैं। बेलिजयम व कुछ अन्य देशो में मतदान न करने पर सजा का भी प्रावधान है। अलबत्ता इतना जरुर है कि कुछ देशो में 70 साल से ज्यादा उम्र के बुज़ुर्गों को अनिवार्य रुप से मतदान न करने की छूट मिली हुर्इ है।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए आदर्श स्थिति यही है कि हरेक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करे। इस नाते 2005 में भाजपा के एक सांसद लोकसभा में ‘अनिवार्य मतदान संबंधी विधेयक लाए थे, लेकिन बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। कांग्रेस व अन्य दलों ने इस विधेयक का उस समय विरोध का कारण बताया था कि दबाव डालकर मतदान कराना संविधान की अवहेलना है। क्योंकि भारतीय संविधान में अब तक मतदान करना मतदाता का स्वैछिक अधिकार तो है, लेकिन वह इस कर्तव्य-पालन के लिए बाध्यकारी नहीं है। यही वजह है कि वह इस राश्टीय दायित्व को गंभीरता से न लेते हुए उदासीनता बरतता है। कर्इ जनसुदाय मतदान का इसलिए भी बहिश्कार करते है, क्योंकि परखे गए प्रतिनिधि उनकी समस्याओं का समाधान करने में अक्षम साबित हो चुके होते है। क्या इनको भी दण्ड मिलना चाहिए ? हमारे यहां आर्थिक रुप से संपन्न सुविधा भोगी जो तबका है, वह अनिवार्य मतदान को संविधान में दी निजी स्वतंत्रता में बाधा मानते हुए इसका मखौल उड़ाता है। दरअसल इस बहुमूल्य अधिकार का उपहास करने वाले ऐसे ही लोगों को दंडित करने की जरुरत है।

गुजरात विधानसभा में अनिवार्य मतदान का जो विधेयक पारित हुआ था, उसमें यह स्पष्ट नहीं था कि मतदान न करने पर मतदाता को किस रुप में दंडित किया जाएगा ? जबकि इस तथ्य का खुलासा होना जरुरी है। दण्ड का प्रावधान केवल उन मतदाताओं के लिए सुनिशिचत होना चाहिए जो जान-बूझकर मतदान में हिस्सा नहीं लेते। लोकतंत्र के इस महाकुंभ में ऐसे लोग भी भागीदारी नहीं करते जो लोकतांत्रिक प्रकि्रया से स्वयं को उपर मानते हुए इस ऐंठ और अहंम में रहते हैं कि कोर्इ भी प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाए अथवा किसी भी दल की सरकार बन जाए, हमें क्या फर्क पड़ने वाला है। इन अहंकारियों की नकेल जरुर दण्ड के प्रावधानों से कसी जानी चाहिए।

अनिवार्य मतदान के सिलसिले में सवाल यह भी खड़ा होता है कि हमारे देश में लाखों लोग केवल मतदाता सूचियों की खमियों के चलते मतदान नहीं कर पाते। मतदान के लिए अनिवार्य पहचान पत्र के अभाव में भी लाखों लोग मतदाता सूची में नाम होने के बावजूद मतदान से वंचित रह जाते हैं। ऐसे मतदाताओं को संबंधित मतदान केंद्र प्रभारी केंन्द्र पर ही मतदान की इच्छा से उपसिथत होने का प्रमाणीकरण दें। जिससे मतदाता दोष मुक्त रहे। 75 साल से ज्यादा उम्र के मतदाता को स्वेच्छा से मतदान की छूट मिले। बीमारी से लाचार मतदाता को चिकित्सक, ग्रामसेवक, पटवारी और सरपंच द्वारा जारी प्रमाणीकरण के मार्फत मतदान की छूट मिले। सजा के प्रावधान ऐसे हों, जिसकी भरपार्इ गरीब से गरीब मतदाता सरलता से कर पाये।

मतदान की अनिवार्यता अल्पसंख्यक व जातीय समूहों को ‘वोट बैंक की लाचारगी से भी छुटकारा दिलाएगी। राजनीतिक दलों को भी तुशिटकरण की राजनीति से निजात मिलेगी। क्योंकि जब मतदान करना जरुरी हो जाएगा तो किसी धर्म, जाति या क्षेत्र विशेष से जुड़े मतदाताओं की अहमियत खत्म हो जाएगी। नतीजतन उनका संख्याबल जीत अथवा हार को प्रभावित नहीं कर पायेगा। लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रुवीकरण की जरुरत नगण्य हो जाएगी। ऐसे हालात यदि निर्मित होते हैं तो भारतीय राजनीति संविधान के उस सिद्धांत का पालन करने को विवश होगी जो सामाजिक न्याय और समान अवसर की वकालात करता है।

इस विधेयक का महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह मतदाता को सभी प्रत्याशियों को नकारने का भी अधिकार देता है। लेकिन इसमें दोश यह है कि यह निर्वाचन की उस व्यवस्था को चुनौती नहीं देता जिसका आधार ‘बहुमत है। मसलन 60 प्रतिशत मतदाता उम्मीदवारों को खारिज करने के पक्ष में मतदान करते हैं, तब षेश रहे 40 प्रतिशत मतदान से उस प्रत्याशी को चुन लिया जाएगा, जिसको ज्यादा वोट मिले हों। बहरहाल इस दिशा में बहस के जरिये ऐसे तथ्य तलाशने होंगे जो अनिवार्य मतदान की जरुरत पूरी करने के साथ नागरिक अधिकारों के उल्लंघन का कारण न बन पाएं।

 

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