लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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डॉ. शुभ्रता मिश्रा
भारत में चाँद को सदैव चंदा मामा के नाम से ही पुकारा गया है। भारतीय संस्क़ति में बच्चों को मामा के घर जाने में बहुत आनंद आता है, क्योंकि मामा शब्द और उसका संबंध माँ से होता है। अब भारतीय बच्चों की चंदा मामा के घर जाने की अभिलाषा पूरी हो सकती है। इसी तरह सन् 1971 में आई फिल्म पाकीजा के लिए लिखे गाने चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो को लिखते समय गीतकार कैफी भोपाली साहब को भी नहीं मालूम रहा होगा कि ऐसा कुछ आज से दशकों बाद हकीकत में भी हो सकता है। यूँ तो चांद पर मानव ने 20 जुलाई 1969 को पहली बार नासा के अपोलो 11 मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्रियों नील आर्मस्ट्रांग और एडविन ई एल्ड्रिन के रुप में अपने कदम रखे थे। तब से अंतरिक्ष में बहुत से अभियान चलाए जाते रहे हैं और अनेक अंतरिक्ष यात्री चांद की सैर कर चुके हैं। आमजनों के लिए चांद पर जाना अभी तक एक सपना ही रहा है, परन्तु अब इस सपने को एक अमेरिकी निजी कम्पनी मून एक्सप्रेस साकार करने में जुटी हुई है।
भारतीय वैदिक अवधारणाओं के अनुसार चाँद की उत्पत्ति धरती से मानी गई है और भारतीय ज्योतिषशास्त्र में गणनाओं में चंद्रमा के साथ साथ सौरपरिवार के समस्त ग्रहों को अत्यधिक महत्व दिया गया है। चाँद की महत्ता को भारत ने भारतीय वैदिक इतिहास से लेकर समुद्रविज्ञान, भौतिकशास्त्र और अंतरिक्षविज्ञान में सदैव अनुभूत किया है। इसी अनुभव की श्रृंखला में भारत के इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) ने 22 अक्टूबर, 2008 को एक मानवरहित भारतीय चंद्रयान के प्रक्षेपण में सफलता हासिल की और यह यान 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। चंद्रयान-प्रथम चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान है, जिसने चंद्रमा से 100 किमी ऊपर 525 किग्रा के एक उपग्रह को ध्रुवीय कक्षा में स्थापित कर न केवल चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र भेजे, बल्कि चंद्रमा पर जल की उपस्थिति के संकेत भी दिए। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी चांद पर जल होने की पुष्टि की थी।
अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा सहित अमेरिकी संघीय उड्डयन प्रशासन (फेडेरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन) और अमेरिका के रक्षा, राज्य और वाणिज्य विभागों ने औपचारिक रूप से अगले वर्ष 2017 में मून एक्सप्रेस नामक एक निजी कम्पनी को चंद्रमा की सतह पर अपना अंतरिक्षयान भेजने के लिए मंजूरी दे दी है। यह पहली बार होगा कि कोई प्राइवेट एजेंसी अंतरिक्ष में अपना यान भेजेगी। इसके पहले सभी अंतरिक्ष यान विभिन्न देशों की सरकारी एजेंसियों द्वारा ही भेजे गए हैं। प्राइवेट कम्पनियों के अंतरिक्षयान भेजे जाने की मंजूरी मिलने से अंतरिक्ष में पर्यटन और व्यवसाय के द्वार खुल गए हैं। इससे व्यावसायिक रुप से चंद्रमा पर सामान्यजनों का जाना भी सम्भव हो सकेगा। हाँलाकि इसके लिए बहुत अधिक धन व्यय करना होगा।
अमेरिकी अंतरिक्ष विशेषज्ञों डॉ. बॉब रिचर्ड्स, डॉ. बार्ने पेल और भारतीय मूल के श्री नवीन जैन ने सन् 2010 में मून एक्सप्रेस कम्पनी की स्थापना की थी और इस कम्पनी के अध्यक्ष नवीन जैन हैं। यह कम्पनी पहली बार सन् 2017 में एमएक्स-1ई नामक एक सूटकैस के आकार का छोटा स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा की सतह पर उतारेगी। यदि मून एक्सप्रेस चंद्रमा पर स्पेसक्राफ्ट सफलतापूर्वक उतार लेती है, तो वह 30 मिलियन डॉलर के गूगल लूनर एक्स प्राइज़ को भी जीतेगी। वास्तव में गूगल लूनर एक्स प्राइज़ एक पुरस्कार योजना है, जिसकी स्थापना पीटर एच डायमेण्डिस ने सन् 2007 में अंतरिक्ष उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए की है। इस योजना के तहत चांद की सतह पर या चांद से 500 मीटर की दूरी तक की निजी रोवर या स्पेसक्राफ्ट की यात्रा और वहाँ से उच्च विभेदन वाले छायाचित्र तथा वीडियो भेजने में सफल होने वाले दल को गूगल लूनर एक्स प्राइज़ पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। इसके अन्तर्गत प्रथम पुरस्कार 30 मिनियन डॉलर तथा द्वितीय पुरस्कार 5 मिलियन डॉलर रखा गया है।
यदि नवीन जैन की मून एक्सप्रेस सन् 2017 में अपना स्पेसक्राफ्ट चांद की धरती पर उतारने में सफल हो जाती है, तो चाँद की सैर पर जाने के द्वार खुलने की आशाओं को साकार रुप लेने में समय नहीं लगेगा। निश्चितरुप से अंतरिक्ष विज्ञान के लिए यह एक बहुत बड़ा कदम है और वह दिन दूर नहीं जब हम और आप धरती के किसी शहर की तरह चाँद की सैर करने चंद्रयानों पर बैठकर जा पाएंगे।

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