लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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बलूचिस्तान

बलूचिस्तान

संजय द्विवेदी

देर से ही सही भारत की सरकार ने एक ऐसे कड़वे सच पर हाथ रख दिया है जिससे पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को मिर्ची लगनी ही थी। दूसरों के मामले में दखल देने और आतंकवाद को निर्यात करने की आदतन बीमारियां कैसे किसी देश को खुद की आग में जला डालती हैं, पाकिस्तान इसका उदाहरण है। बदले की आग में जलता पाकिस्तान कई लड़ाईयां हारकर भारत के खिलाफ एक छद्म युद्ध लड़ रहा है और कश्मीर के बहाने उसे जिलाए हुए है। पड़ोसी को छकाए-पकाए और आतंकित रखने की कोशिशों में उसने आतंकवाद को जिस तरह पाला-पोसा और राज्याश्रय दिया, आज वही लोग उसके लिए भस्मासुर बन गए हैं।

दुनिया के देशों के बीच पाकिस्तानी वीजा एक लांछित और संदिग्ध वस्तु है। वहां के नागरिक जीवन में जिस तरह का भय और असुरक्षा व्याप्त है, उससे पाकिस्तान के जनजीवन के हालत का पता चलता है। सही मायने में वह अपनी ही लगाई आग में सुलगता हुआ देश है। जिसका खुद की ही कोई मुकाम और लक्ष्य नहीं है, वह भारत की तबाही में ही अपनी खुशी खोज रहा है। बावजूद इसके भारतीय उपमहाद्वीप के देश कहां से कहां जा पहुंचे हैं पर पाकिस्तान नीचे ही जा रहा है। अमरीकी और चीनी मदद और इमदाद पर वहां का सत्ता प्रतिष्ठान जिंदा है एवं लोग परेशान हाल हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस समय बलूचिस्तान, पीओके तथा गिलगित के सवाल उठाए हैं, यह वक्त ही इसके लिए सही समय है। यह समय पाकिस्तान को आईना दिखाने का भी है और कश्मीरी भाईयों को यह बताने का भी है कि पाकिस्तान के साथ होकर उनका हाल क्या हो सकता है। यहां सवाल नीयत का है। विश्व जानता है कि भारत ने कश्मीर की प्रगति और विकास के लिए क्या कुछ नहीं किया। आप पीओके से भारत के कश्मीर की तुलना करके प्रसन्न हो सकते हैं कि यहां पर भारत ने अपना सारा कुछ दांव पर लगाकर विकास के हर काम किए हैं।

कश्मीर में लगातार बंद, हिंसा और आतंक की वजह से विकास की गति धीमी होने के बावजूद भी भारत सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, आवागमन और व्यापार हर नजरिए से कश्मीर को ताकत देन की कोशिशें की हैं। कश्मीर की वादियों में आतंक के बाद भी वहां विकास की गतिविधियां निरंतर हैं। अराजकता के बाद भी इरादे चट्टानी हैं। भारत की संसद ने हर बार उसे अपना अभिन्न अंग माना और नागरिकों को हो रहे कष्टों पर दुख जताया। यह नागरिकों को मिले दर्द से उपजी पीड़ा ही थी कि कश्मीरी नागरिकों को पैलेट गन से लगी चोटों पर संसद से लेकर न्यायपालिका तक चिंतित नजर आई। इस संवेदना को क्या बलूचिस्तान और पीओके में रह रहे लोग महसूस कर सकते हैं? क्या पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और पाक सेना के द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से दुनिया अनभिज्ञ है? बलूच नेताओं की वाणी से जो दर्द फूट रहा है, वह वहां के आवाम का दर्द है, उनकी पीड़ा है जो वे भोग रहे हैं। पाकिस्तान के अत्याचारों से कराहते ये इलाके उनकी सेना के बूटों से निकली हैवानियत की कहानी बयान करते हैं। बलूचिस्तान के भूमि पुत्र अपनी ही जमीन पर किस तरह लांछित हैं, यह एक काला अध्याय है। जबकि भारत का कश्मीर एक लोकतांत्रिक जमीन का हिस्सा है। भारत का दिल है, भारत का मुकुट है। हमारे कश्मीर में पाक प्रेरित आतंकियों ने बर्बर कार्रवाई कर कश्मीरी पंडितों पर भीषण अत्याचार किए, उन्हें कश्मीर घाटी छोड़ने के लिए विवश कर दिया, किंतु फिर भी हर हिंदुस्तानी कश्मीरी की माटी और वहां के लोगों से उतनी ही मुहब्बत करता है जितनी पहले करता था।

हर भारतीय को पता है कश्मीर में जो कुछ चल रहा है वह आम कश्मीरी हिंदुस्तानी का स्वभाव नहीं है। उसके नौजवानों को बहला-फुसला कर जेहाद के बहाने जन्नत के ख्वाब दिखाए गए हैं। उन्हें बताया गया है कि पाकिस्तान के साथ जाकर वे एक नई दुनिया में रहेंगें जहां सुख ही होगा, विकास होगा और वे एक नयी जमीन तोड़ सकेंगे। पाकिस्तान प्रेरित आतंकी कभी धन से कभी, आतंकित कर कश्मीरियों का इस्तेमाल कर उनकी जिंदगी को जहन्नुम बना रहे हैं। जबकि उनके द्वारा कब्जा किए गए कश्मीर की हालत लोगों से छिपी नहीं है। बलूचियों का जिस तरह पाकिस्तान ने भरोसा तोड़ा और उनके मान-सम्मान और जीवन जीने के हक भी छीन लिए, वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में भारत में रहकर पाकिस्तान का सपना देखने वालों की आंखें खुल जानी चाहिए, क्योंकि भारत में होना एक लोकतंत्र में होना है। जहां कोई भी नागरिक- ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति, पुलिस या सेना के खिलाफ अपनी बात कर सकता है। उचित मंचों पर शिकायत भी कर सकता है। लेकिन पाकिस्तान में होना सेना और आतंकियों के द्वारा पोषित ऐसे खतरनाक लोगों के बीच रहना है जहां किसी की जान सलामत नहीं है। जो देश अपने नागरिकों में भी भेद रखता है, उनके ऊपर भी दमन चक्र चलाए रखता है। पाकिस्तान की जमीन इन्हीं पापों से लाल है और वहां असहमति के लिए कोई जगह नहीं है। भारत और पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के चरित्र का आकलन और विश्लेषण करने वाले जानते हैं कि भारत ने खुद को पिछले सत्तर सालों में एक लोकतांत्रिक चरित्र के साथ विकसित किया है। अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत और स्थिर किया है। जबकि पाकिस्तान का लोकतंत्र आज भी सेना के बूटों तले कभी भी रौंदा जा सकता है। वहां अल्पसंख्यकों के अधिकारों का क्या हाल है? इतना ही नहीं वहां के तमाम मुसलमान आज किस हाल में हैं। हत्याएं, आतंक और खून वहां का दैनिक चरित्र है।

पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुके पाकिस्तान की सच्चाईयां सामने लाना जरूरी है। यह बताना जरूरी है कि कैसे सेना, मुल्ला और आतंकवादी मिलकर एक देश और वहां के आवाम को बंधक बना चुके हैं। कैसे वहां पर आतंकवाद को राज्याश्रय मिला हुआ है और सरकारें उनसे कांप रही हैं। पाकिस्तान का कंधा अपने मासूम बच्चों को कंधा देते हुए भी नहीं कांपा। वह आतंकवाद के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करता है, पर सच यह है कि ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने पाकिस्तान की जमीन पर ही पाया। आज भी ओसामा की मानसिकता लिए अनेक आतंकी और अपराधी वहां खुले आम घूमकर दहशतगर्दों की भर्ती करते हुए पूरी दुनिया में आतंक का निर्यात कर रहे हैं। ऐसे खतरनाक देश का टूटकर बिखर जाना ही विश्व मानवता के हित में है।

 

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