लेखक परिचय

कुमार सुशांत

कुमार सुशांत

भागलपुर, बिहार से शिक्षा-दीक्षा, दिल्ली में MASSCO MEDIA INSTITUTE से जर्नलिज्म, CNEB न्यूज़ चैनल में बतौर पत्रकार करियर की शुरुआत, बाद में चौथी दुनिया (दिल्ली), कैनविज टाइम्स, श्री टाइम्स के उत्तर प्रदेश संस्करण में कार्य का अनुभव हासिल किया। वर्तमान में सिटी टाइम्स (दैनिक) के दिल्ली एडिशन में स्थानीय संपादक हैं और प्रवक्ता.कॉम में सलाहकार-सम्पादक हैं.

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हम हमेशा से मानते हैं कि ‘प्रवक्ता’ केवल प्रवक्ता ही नहीं, वैचारिक क्रांति का प्रतिरूप है। ‘प्रवक्ता’ एक परिवार की तरह है, जिसका सदस्य इस वैचारिक वेब-क्रांति का हर वो लेखक है, जो हर दिन प्रवक्ता से जुड़े रहते हैं। आलेख भेजते हैं, त्वरित टिप्पणी करते हैं… दूसरे शब्दों में कहें तो जिनकी सहानुभूति ‘प्रवक्ता’ के प्रति होती है। इसी का उदाहरण रहा दिन 20 मई दिन मंगलवार। ‘प्रवक्ता’ के लेखक व पिछले वर्ष ‘प्रवक्ता’ लेखकों के सम्मान समारोह में सम्मानित पंकज झा ‘प्रवक्ता’ के दफ्तर पहुंचे। प्रवक्ता डॉट कॉम के संपादक संजीव सिन्हा व भारत भूषण की मौजूदगी में श्री झा के साथ ‘प्रवक्ता’ के प्रतिदिन कदम-दर-कदम बढ़ रहे दूरगामी उपलब्धियों पर चर्चा हुई। ‘प्रवक्ता’ के हर अच्छे-बुरे पहलू पर विमर्श के बाद इसे और आगे कैसे प्रतिबिंबित किया जाए, उस पर भी मंत्रणा हुई। श्री झा के अलावा संजीव सिन्हा और भारत भूषण ने उन तमाम लेखकों के प्रति आभार प्रकट किया, जो निष्पक्ष और निश्छल भाव से ‘प्रवक्ता’ को वेब-समाज का उद्घोषित ‘वक्ता’ बनाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। ‘प्रवक्ता’ परिवार के हर विश्लेषक सदस्य की अलग-अलग अंदाज में तारीफ की गई।

सनद रहे, वेब-क्रांति हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह पूरे राष्ट्र में फैली है, वो सर्वविदित है। वहीं, ‘प्रवक्ता’ के लेखकों ने जिस उद्गार और निडरता के साथ शब्दों की सारगर्भिता को बनाए रखते हुए समाज को एक स्वस्थ संदेश दिया है, वो अतुलनीय है। इसके लिए धन्यवाद के पात्र पूरा ‘प्रवक्ता परिवार’ है। वो चाहे किसी भी क्षेत्र की बात हो, प्रवक्ता के लेखक जितने सजग और साहसी हैं, कह सकते हैं कि जिनका अपना एक क्लास है, उन्होंने हर मुकाम पर, हर मुद्दे पर बेबाकी से उन बातों को रख डाली है, जिसे कहने की हिम्मत अमूमन बड़े-बड़े अखबारों के मठाधीशों को नहीं होती। वो चाहे हाल का लोकसभा चुनाव ही क्यों न हो। कुछ राजनीतिक दलों के तानाशाहों ने प्रवक्ता के लेखकों की वैचारिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर दिए। चुनाव आयोग से शिकायत कर दी गई, लेकिन यह जीत हम ‘प्रवक्ता परिवार’ की है कि हमने झुकना नहीं सीखा तो झुके नहीं, कलम से लड़ते रहना सीखा तो किसी से डरे नहीं। आप लेखक धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने हाल के चुनाव के दौरान झूठे वादे करने वाले राजनीतिक दलों की ‘प्रवक्ता’ पर पोल खोली। कभी व्यंग्य भाव में तो कभी कविता के माध्यम से, आपने वैचारिक क्रांति की एक डोर को थामे रखा। जीत सत्य की होती है। मुझे विश्वास है कि ‘प्रवक्ता परिवार’ जल्द ही हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा परिवार होगा। इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ ‘प्रवक्ता परिवार’ के प्रत्येक सदस्य का आभार सहित सहृदय धन्यवाद।

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