लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव 

दल अण्णा ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह समेत 15 केबिनेट मंत्रियों पर दस्तावेजी साक्ष्य पेश करके भ्रष्टाचार के जो संगीन आरोप लगाए हैं, वे प्रथम दृष्टया तो यही तय करते हैं, कि केंद्र सरकार का यह मंत्रीमण्डल अलीबाबा चालीस चोरों का समूह है। दल के सहयोगी अरविंद केजरीवाल और प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने केवल बयान देकर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और कैग जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के माध्यम से जो दस्तावेजी साक्ष्य सामने आए हैं, उन्हें ही आरोपों का जरिया बनाया है। लिहाजा इन आरोपों को एकाएक खारिज नहीं किया जा सकता। दल के आरोपों में दम है, इसीलिए दल ने मंत्रियों के खिलाफ आरोपों की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन की मांग की है। साथ ही दल ने यह भी चुनौती दी है कि यदि अण्णा दल पर किसी तरह के आरोप हैं तो उनकी जांच भी एसआईटी से कराई जाए और यदि वे दोषी पाए जाएं तो उन्हें निर्धारित सजा से दोगुनी सजा दी जाए। यह मांग अन्ना दल के नैतिक साहस और मजबूत आत्मबल का परिचायक है। अब यदि मनमोहन सिंह मंत्रीमण्डल में थोड़ा भी नैतिक साहस है तो उन्हें खुद आगे बढ़कर एसआईटी का गठन करके जांच के लिए बेहिचक आगे आ जाना चाहिए।

 

प्रधानमंत्री के कोयले की दलाली में काले हाथ होने की खबर धीमी गति से बहुत दिन से आ रही थी। लेकिन अब अण्णा दल ने अभिलेख प्रस्तुत करके तय कर दिया कि काजल की इस कोठरी में सब काले हैं। अण्णा दल का आरोप है कि कोयला मंत्री के रुप में डॉ. मनमोहन सिंह ने कौढि़यों के मोल कोयलें के खण्ड (ब्लॉक) आंवंटित किए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से इस आबंटन में बरती गई गड़बडि़यों का खुलासा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट भी इसी आधार पर कुछ तल्ख टिप्पणियां कर चुकी है। लेकिन गांधी के तीन बंदरों के एक ही अवतार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर इस रिपोर्ट और अदालतों की टिप्पणियों का असर बेअसर रहा। कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर ये सभी आवंटन 2006 से 2009 के बीच उस कालखण्ड के हैं, जब कोयला मंत्री की कमान भी प्रधानमंत्री संभाले हुए थे।

 

 

 

कोयला-खण्ड आंवटित करने में भी ठीक वही तकनीक अपनाई गई है, जो 2 जी स्पेक्टम आंवटन घोटाले के वक्त संचार मंत्री ए.राजा ने अपनाई थी। अण्णा दल के मुताबिक स्पेक्टम की कीमत तय करने में तात्कालीन वित्तमंत्री पी. चिदंबरम् की भी भागीदारी थी। क्योंकि मई 2004 से लेकर नवंबर 2008 तक वही वित्तमंत्री थे। इसीलिए जब वर्तमान वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के हाथ चिदंबरम की नोटशीट पर लिखी संदिग्ध टिप्पणियां आईं तो उन्होंने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखकर कहा भी कि चिदंबरम चाहते तो स्पेक्टम घोटाला रोका जा सकता था। इस चिट्ठी के बीच में ही प्रेस का हिस्सा बन जाने के कारण कॉफी बवाल मचा और अंत में खुद प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप करके दोनों केंद्रीय मंत्रियों के बीच सुलह कराकर इस बवाल का पटाक्षेप किया। हालांकि अन्ना दल ने जो दस्ताबेज खोजकर मंत्रियों पर आरोप लगाए हैं, उनके तहत केंद्र सरकार के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी खुद भी अब कठघरे में हैं। उन पर आरोप है कि वे जब मई 2004 से अक्टूबर 2006 तक रक्षा मंत्री थे, तब उन्होंने नेवी वार रुम लीक मामले में दोषियों को बचाया और इसी दौरान स्कॉर्पिन पनडुब्बी खरीद सौदे में 4 प्रतिशत कमीशन भी खाया।

 

 

 

कोयला घोटाला सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट से सामने आया है। सीएजी ने इसे 2जी स्पेक्टम से छह गुना बड़ा घोटाला बताया। ‘परफोर्मेंस ऑडिट ऑफ कोल ब्लॉक एलोकेशंस’ नामक इस रिपोर्ट के मसौदे में इस घोटाले को 10.67 लाख करोड़ रुपये का घोटाला बताया गया। 110 पृष्ठीय इस रिपोर्ट के मुताबिक 155 कंपनियों को कोल-खण्ड आबंटित किए गए। इस हेतु कोई खुली नीलामी की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। लिहाजा स्पेक्टम की तरह औने-पौने दाम में कोयले के भू-भण्डार बेच दिए गए। यह ऑडिट रिपोर्ट उस समय की है जब 2004 से 2009 के दौरान मनमोहन सिंह खुद कोयला मंत्री का अतिरिक्त प्रभार संभाले हुए थे।

 

इस रिपोर्ट के आने के बाद संसद में हंगामा होना तय था। हुआ भी। भाजपा ने सीधे मनमोहन सिंह को इस घोटाले का जिम्मेबार ठहराया। प्रश्नकाल के दौरान खुद प्रधानमंत्री से संसद में जवाब देने को कहा गया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने भी इस मांग का समर्थन किया। खुद मनमोहन सिंह को घोटाले के कटघरे में घिरा देख सोनिया गांधी की चिंता बढ़ गई और वे खुद सरकार के बचाव में आ गईं। उन्होंने सपा नेता रेवतीरमण सिंह से बात कर मुलायम सिंह को साधा। चूंकि मुलायम सिंह की गर्दन अनुपातहीन संपत्ति की जांच में फंसी है। इस जांच को सीबीआई कर रही है। मुलायम सिंह यदि मुलायम नहीं पड़ते तो उनकी गर्दन नपना तय थी। बहरहाल लाचार मुलायम सत्ता के पक्ष में आ खड़े हुए और मनमोहन सिंह के प्राणों में प्राण आ गए। इसी बात को लेकर अण्णा दल ने मजबूत लोकपाल के गठन के साथ सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता देने की बात भी उठाई है। क्योंकि यदि सीबीआई स्वतंत्र होती तो क्षेत्रीय दलों के मुलायम सिंह, मायावती, लालू प्रसाद, करुणानिधि और जयललिता जैसे जिन स्वयंभू नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामलों की जांच चल रही है,वह इतनी लंबी नहीं खिंचती और जांच पूरी होेकर तय समय-सीमा आरोप – पत्र संबंधित न्यायालयों में दाखिल कर दिए गए होते। लिहाजा घोटालों के आरोपी एक दूसरे के घोटोलों पर पर्दा डालने का काम नहीं कर पाते। सीबीआई के इस दुरुपयोग पर रोक लगना वक्त की जरुरत है।

 

कोयला घोटाले को स्पेक्टम घोटाले का दर्जा इसलिए दिया गया क्योंकि इसमें भी कोयले के भण्डारों से भरे भू-खण्डों पर मालिकाना हक हासिल करने के बाद कई कंपनियों ने मौके पर बिना कोई उत्खनन किए दूसरी कंपनियों को ये भू-खण्ड हाथों-हाथ बेच दिए। दूसरी कंपनियों को सौदा उतारने की इस प्रक्रिया में ही करोड़ों-अरबों के बारे न्यारे कर लिए गए। 2008 में जो 90 कोल-खण्ड आंवटित किए गए थे वे बाला-बाला करोड़ों-अरबों रुपये कमाने के लिए ही दिए गए थे। प्राकृतिक संपदा के दोहन से बाजार में फैली यही वह आवारा पूंजी है जो भ्रष्टाचार और मंहगाई का पर्याय बनी हुई है।

 

मनमोहन सिंह खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के आ जाने से बिचैलियों की भूमिका खत्म हो जाने की बात करते हैं, लेकिन क्या माननीय प्रधानमंत्री बताएंगे कि उन्होंने खुद कोयला मंत्री रहने के दौरान कोयले के खण्डों को बेचने में क्यों बिचैलियों को दलाली की भूमिका निर्वाह करने का अवसर दिया। जाहिर है चोर की दाड़ी में तिनका है। बिचैलियों द्वारा जो सौदे हुए उसमें या तो पैसा सीधे मनमोहन सिंह ने लिया या सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस ने लिया। अब यदि सोनिया और मनमोहन देश की जनता के सामने खुद को पाक साफ रखना चाहते हैं तो उन्हें इतना नैतिक साहस दिखाने की जरुरत है कि वे सर्वोच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायमूर्ति से जांच कराने के लिए खुद आगे आएं और अपने दामन पर लगे दागों का धोने का काम करें। अन्यथा जनता उन्हें माफ नहीं करेगी।

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1 Comment on "कोयले की दलाली में प्रधानमंत्री के हाथ"

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jagdishpandey
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मनमोहन सिंह इमानदार प्रधान मंत्री है उन पर आरोप लगाने वाले खुद चोर है

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