लेखक परिचय

अनुश्री मुखर्जी

अनुश्री मुखर्जी

श्रीमती अनुश्री मुखर्जी, महिला सशक्तीकरण की दिशा में कार्य को लेकर वह नाम हैं, जो पिछले 20 वर्षों से लगातार गैर-सरकारी संगठनों से जुड़कर महिलाओं के अधिकार व प्रशिक्षण को लेकर प्रयासरत रही हैं। श्रीमती मुखर्जी मानती हैं कि देश में महिलाओं को पुरुषों से बराबर कहा तो जाता है, लेकिन आज भी हमारा समाज उस पुरानी मानसिकता में ही जी रहा है, बस शब्द और कहने के मायने बदल गए हैं। महिलाओं को समानता का अधिकार तभी मिल सकता है जब उन्हें बराबर शिक्षा देकर तथा कुशल कामगार बनाकर प्रोत्साहित करेंगे।

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अंततः वो नाम सामने 18 मार्च की शाम को आया, जिसका पूरे देश क्या, भारत की हर गतिविधि पर नज़र गड़ाए कई पड़ोसी मुल्कों को इंतज़ार था। लेकिन नतीजा सामने आया तो देश में सब चौंक गए और सोशल मीडिया समेत टीवी चैनलों पर अजब-गजब चर्चाएं शुरू होने लगीं। जाहिर है, योगी आदित्यनाथ के जरिए राजनीतिक बदलाव की सोच पहली बार उसी राजनीति को शह-मात दे गई जिसके दायरे में लगातार भाजपा को अंदर ही अंदर कटघरे में खड़ा करते संघ परेशान था। 50 के दशक में तो गोरखपुर मंदिर तक नानाजी देशमुख को इसलिये छोड़ना पड़ा था, क्योकि तब गोरखपुर मंदिर में हिन्दू महासभा के स्वामी दिग्विजय से वैचारिक टकराव हो गया था। और तभी से ये माना जाता रहा कि हिन्दुत्व को लेकर जो सोच सावरकर की रही, उससे बचते-बचाते हुये ही संघ ने खुद का विस्तार किया। लेकिन इस बार कहीं ना कहीं संघ और सरकार के बीच पुल का काम कर रहे संघ के कृष्ण गोपाल की ही सकारात्मक सक्रियता रही, जिससे उन्होंने राजनीतिक तौर पर स्वयंसेवकों को मथा और चुनावी जीत के लिये जमीनी स्तर पर विहिप से लेकर साधु-संतों और स्वयंसेवकों को जीत के लिये गांव-गांव प्रचार किया। ऐसे में मनोज सिन्हा के जरिए दिल्ली से यूपी को चलाने की जो सोच बीजेपी में जगी, उस शह-मात के जरिए संघ ने योगी आदित्यनाथ का नाम सीधे रखकर साफ संकेत दे दिये कि ये सफलता संघ की सोच की है। सवाल लाजिमी है कि यूपी के जो तीन सवाल कानून व्यवस्था,करप्शन और मुस्लिम तुष्टीकरण के आसरे चल रहे हैं, उसे हिन्दुत्व के बैनर तले ही साधना होगा। जाहिर है, भाजपा अध्यक्ष के प्रस्ताव को आरएसएस ने नकारा तो प्रधानमंत्री मोदी आरएसएस के मत के साथ इसलिए खड़े दिखे क्योंकि एक तो राम मंदिर का मुद्दा हावी था, जो अक्सर चुनावी मुद्दा तो बनता था, लेकिन चुनाव के खत्म के साथ वो ठंडे बस्ते में चला जाता था। वहीं गौ-हत्या पर रोक और मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर असमान विकास की सोच को लेकर जो सवाल कभी विहिप तो कभी संघ के दूसरे संगठन या फिर सांसद के तौर पर साक्षी महाराज या मनोरंजन ज्योति उठाते रहे, उनपर खुद-ब-खुद रोक आदित्यनाथ के आते ही लग जायेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो अब सिर्फ बयानबाजी नहीं होगी, बल्कि उस पर अमल होगा।

सवाल है कि योगी आदित्यनाथ के बनने पर इतना हंगामा क्यों है ? मुस्लिम तो हिन्दु हो नहीं सकता। भले ही कोई न बोले लेकिन हकीकत यही है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव इन्हीं हिन्दुत्व के मुद्दे पर हुआ और हिन्दुओं का एकमत नरेंद्र मोदी के पक्ष में गया, साथ-साथ उन मुस्लिम महिलाओं के वोट भी भाजपा के पक्ष में जाने की ख़बर सामने आई जो तीन तालाक के खिलाफ थीं। जहां तक दलित या अन्य पिछड़ा तबके की बात आती है तो वो सबसे पहले हिन्दु हैं तो फिर उनका निस्संदेह वोट भी भाजपा के ही पक्ष में गया होगा, तभी प्रचंड बहुमत के साथ यूपी में भाजपा सरकार में आई। लेकिन अब योगी युग की शुरुआत होते ही मुसलमान ये कहते नज़र आ रहे हैं कि हमने तो भाजपा को विकास को लेकर वोट दिया था, लेकिन योगी का नाम पर नहीं, बल्कि विकास को लेकर। दलित या पिछड़ों में कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है उन्हें परेशानी बस उनके पिछडेपन के इलाज को लेकर है। बस वो हो जाना चाहिए। और इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश जिस कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास को लेकर चिंतित रहा है, उसे पूरा करने में योगी सफल होंगे, इसके प्रयोग का संकेत 18 मार्च ही सीएम की घोषणा के वक्त मंच दिखे शहरी विकास मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू समेत अन्य के होने से मिल गया। यानी विकास की रूपरेखा की कमान वरिष्ठों के सहयोग से होगी तो असफलता की गुंजाइश की नहीं है। ऐसे में कानून व्यवस्था भी दुरुस्त होगी, भ्रष्टाचार मुक्त भी होगा और विकास भी होगा। हां मुस्लिमों की जहां तक चिंता का सवाल है तो वो बेकार है क्योंकि योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से पहले ही प्रधानमंत्री ने ये कहा था कि व्यक्ति जब बड़ा हो जाए तो उसे महान हो जाना चाहिए। उसे झुक जाना चाहिए। ये संकेत खुद-ब-खुद स्पष्ट है। केवल योगी के नाम से निजी परेशानी होना यानि कोई जान-बूझकर अपने अंदर कट्टरता को पाल रहा हो तो इसका इलाज तो नामुमकिन है।

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