लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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 राजीव गुप्ता

स्वतंत्रता-पश्चात भारत में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. देश से व्याप्त भ्रष्टाचार को ख़त्म करने हेतु जनता सडको पर उतरकर सरकार पर दबाव बनाकर उससे क़ानून बनवायेगी यह लगभग अशोचनीय सी-ही स्थिति थी. परन्तु गत दो वर्षो से भारत में ऐसा हुआ. जनता हाथो में मशाल थामे सडको पर उतरी, कई – कई दिनों तक समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में अनशन हुए. ऐसा लगने लग गया कि भारत में इस भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन का “राष्ट्रीयकरण” हो गया है क्योंकि इस आन्दोलन में समाज के हर वर्ग ने बढ़-चढ़कर भाग लिया परिणामतः भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन की लहर पूरे देश में चली. इस आन्दोलन ने एक बार तो महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलनों की याद दिला दी क्योंकि सन 1920 के बाद के आंदोलनों की प्रकृति बिलकुल बदल गयी थी और गांधी जी के आह्वान पर समाज के सभी वर्ग ने अंग्रेजो की पराधीनता से स्वतंत्रता-प्राप्ति की साफ़ नियति से घर से निकल पड़े थे.

 

दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में 3 जून को बाबा रामदेव के अनशन पर हुई पुलिसिया कार्यवाही से पूरा देश में सरकार के खिलाफ आक्रोश था अतः जनता के इस आक्रोश का प्रस्फुटन उस समय हुआ जब 16 अगस्त, 2011 को अन्ना हजारे को अनशन न करने देने के लिए षड्यंत्र के तहत सरकार ने उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया. उसकी परिणति यह हुई कि जनता के साथ-साथ लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया ने अन्ना हजारे को अपना भरपूर समर्थन दिया परिणामतः अन्ना टीम द्वारा संचालित भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन का राष्ट्रीयकरण-सा हो गया ऐसा प्रतीत होने लगा. उनके इस आन्दोलन को अगस्त क्रांति तक का नाम दिया जाने लगा और सरकार से जनलोकपाल बनाने की मांग जोर – शोर से उठाई गयी. जनता की इस मांग से सरकार दबाव में आ गयी और संसद से लिखित आश्वासन के बाद ही यह अनशन का आन्दोलन थमा. इस आन्दोलन के साथ जुड़े जन सैलाब के प्रमुख दो कारण ही थे- एक स्वतंत्रता – पश्चात जनता को अन्ना टीम नहीं “सिर्फ अन्ना ही” एक मात्र साफ़ छवि एवं नियति वाले समाजसेवी के रूप में आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता के रूप में मिले थे और दूसरा इस आन्दोलन को आधुनिकतम तकनीकी और मीडिया की सहायता से दूरदराज क्षेत्र में रहने वाले लोगो तक इस आन्दोलन की खबर मिली. समाचार चैनल चौबीस घंटे बस इसी आन्दोलन से सम्बंधित खबरों को दिखाते रहे और ऐसा प्रतीत होने लगा कि इस आन्दोलन को सफल बनाने की कमान मीडिया पर ही है.

 

परन्तु हाल के अन्ना टीम के अनशन ने जनता के सारे अरमानो को धता बताकर एक अलग प्रकार का ही अविश्वसनीय कदम उठाया. अगर हम अन्ना और अन्नाटीम के बयानों पर नजर दौडाए तो पता चलता है कि कलतक अन्ना टीम बिना चुनाव लड़े जिस राजनीति की शुद्धिकरण की बात करती थी उसने अपना एकदम से पैतरा कैसे बदल लिया यह एक यक्ष प्रश्न जनता के सामने खड़ा हो गया है. अभी हाल ही में अन्नाटीम के तीन सदस्यों द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन शुरू करने के लगातार दो दिन बाद तक यह घोषणा होती रही कि जब तक हमारी मांगे नहीं मनी जाती हम बलिदान हो जायेंगे पर अनशन से पीछे नहीं हटेंगे पर रातोरात ऐसा क्या हो गया कि 23 लोगो की बातो का आधार बनाकर जनता को राजनैतिक विकल्प देने के लिए राजनैतिक पार्टी बनाने की घोषणा के साथ अनशन ख़त्म कर दिया गया. इसी घोषणा के साथ अन्ना टीम की नियति भी सवालो के घेरे में आ गयी और जनता में यह सन्देश गया कि क्या ये सारे अनशन अन्ना टीम की महत्वकांक्षा का यह कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम का हिस्सा थे और जनता को यह दिखाने की कोशिश थी कि सरकार उनकी नहीं सुन रही है जबकि सरकार का रवैया तो पहले से ही जग – जाहिर था हालाँकि सरकार का रवैया इस बार जरूर आश्चर्यजनक रहा कि पिछले साल अगस्त में सरकार जिस अन्ना की उंगलियों पर नाच रही थी, उसने इस बार उनकी टीम से प्रत्यक्ष तो क्या अप्रत्यक्ष संवाद की भी जरूरत नहीं समझी और आन्दोलन को अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया.

 

यहाँ सवाल अब जनलोकपाल का नहीं बल्कि नियति का है. जब संसद में जनलोकपाल बनाने के लिए अपनी राजनैतिक पार्टी ही बनानी थी तो दो-वर्ष तक क्या अन्ना टीम ( हालाँकि अब यह टीम बर्खास्त हो चुकी है ) राजनैतिक पार्टी बनाने की भूमिका के साथ-साथ जन समर्थन प्राप्त करने के लिए अनशन की बिसात पर राजनीति कर रही थी. व्यवस्था परिवर्तन हेतु जन-आन्दोलन करना और खुद चुनाव लड़कर व्यवस्था परिवर्तन करना दो अलग – अलग ध्रुवो के मिलन जैसी बात है . इससे पहले साफ़ और स्पष्ट नियति से जनता को विकल्प देने के लिए जयप्रकाश नारायण ने भी “जनता पार्टी” का गठन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री को चुनाव में हराया था हालाँकि वह पार्टी मात्र तीन सालो में ही टूट गयी थी. ध्यान देने योग्य है इससे पहले जयप्रकाश नारायण ने भी 25 जून 1975 को एमरजेंसी अर्थात आपातकाल के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा था. उस समय भी जनता राजनेता जयप्रकाश नारायण की अगुआई में सत्ता के खिलाफ सरकार विरोधी सामग्रियों तथा मीडिया पर प्रतिबंधो के बावजूद सडको पर उतरी और 1977 के लोकसभा चुनाव में अपने मतदान के जरिये सत्ता के मद में चूर सत्ताधारियो को अर्श से फर्श पर ला दिया था.

 

यह सर्वस्वीकार्य है कि भारत में भ्रष्टाचार की सड़क चुनाव-प्रणाली से ही गुजरती है अतः चुनाव-सुधार की नितांत आवश्यकता है पर चुनाव जीतने की महत्वकांक्षा के साथ – साथ राजनैतिक विकल्प देने का रास्ता जमानत जब्त होने की तरफ भी जाता है. जनता बड़ी भावुक प्रवृत्ति होने की वजह से मतदान भावुकता के वशीभूत होकर मतदान करती है. भले ही अन्ना और उनके शुभचिंतक चुनाव न लड़े और किसी बड़े नाम की बजाय आम जनता के बीच से कोई अपना उमीदवार खड़ा करे पर इतना तो तय है कि आगामी लोकसभा का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होने वाला है. भविष्य में राजनीति के दांव – पेच का ऊँट किस करवट बैठेगा व सरकार किस पार्टी की बनेगी यह तो समय के गर्भ में है पर हाँ इतना जरूर है कि जनता के लिए अब किसी आन्दोलन पर विश्वास करना बड़ा मुश्किल हो जायेगा.

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