लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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maharaniahilyabaiholkarअशोक “प्रवृद्ध”
चतुर्दिक अव्यवस्था का आलम था , और सभी दिशाओं में गड़बड़ी मची हुई थी। शासन और व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार हो रहे थे। प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान- मजदूर अत्यंत हीन अवस्था में सिसक रहे थे। उनका एकमात्र सहारा धर्म अंधविश्वासों, भय, त्रासों और रूढि़यों की जकड़न में कसा जा रहा था। न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास। ऐसे काल की उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई होलकर भारत के मालवा साम्राज्य की मराठा होलकर महारानी बनी । अहिल्याबाई किसी बड़े भारी राज्य की रानी नहीं थीं, बल्कि एक छोटे भू-भाग पर उनका राज्य कायम था और उनका कार्यक्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित था, इसके बावजूद जनकल्याण के लिए उन्होंने जो कुछ किया, वह आश्चर्यचकित करने वाला है, वह चिरस्मरणीय है। राज्य की सत्ता पर बैठने के पूर्व ही उन्होंने अपने पति – पुत्र सहित अपने सभी परिजनों को खो दिया था इसके बाद भी प्रजा हितार्थ किये गए उनके जनकल्याण के कार्य प्रशंसनीय हैं । अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर सम्पूर्ण भारत के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाये, घाट बँधवाये, कुँओं और बावड़ियों का निर्माण किया, मार्ग बनवाये, पुराने पथों का मरम्मतीकरण करवाया, भूखों के लिए अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की। और, मरते दम तक आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं । रानी अहिल्याबाई ने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाये और धर्म शालाएं खुलवायीं। कुछ इतिहासकारों ने इन मंदिरों को हिंदू धर्म की बाहरी चौंकियाँ बतलाया है। कहा जाता है कि रानी अहिल्‍याबाई भगवान शिव की अनन्य भक्‍त थीं और एक बार उनके स्‍वप्‍न में भगवान शिव आए और उन्हें प्रजा के कल्याण के लिए काशी विश्वनाथ की सुध लेने की सलाह दी । इसलिए उन्‍होंने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया। शिव की भक्त अहिल्याबाई का सारा जीवन वैराग्य, कर्त्तव्य-पालन और परमार्थ की साधना का बन गया। मुस्लिम आक्रमणकारियो के द्वारा तोड़े हुए मंदिरो को देखकर ही उन्होंने सोमनाथ में शिव का मंदिर बनवाया । जो शिवभक्तों के द्वारा आज भी पूजा जाता है । शिवपूजन के बिना मुंह में पानी की एक बूंद नहीं जाने देती थी। सारा राज्य उन्होंने शंकर को अर्पित कर रखा था और आप उनकी सेविका बनकर शासन चलाती थी। शिव के प्रति उनके समर्पण भाव का पता इस बात से चलता है कि अहिल्याबाई राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नहीं लिखती थी, बल्कि पत्र के नीचे नीचे केवल श्री शंकर लिख देती थी। उनके रुपयों पर शिवलिंग और बिल्व पत्र का चित्र ओर पैसों पर नंदी का चित्र अंकित है । कहा जाता है कि तब से लेकर भारतीय स्वराज्य की प्राप्ति तक उनके बाद में जितने नरेश इंदौर के सिंहासन पर आये सबकी राजाज्ञाऐं जब तक कि श्रीशंकर की नाम से जारी नहीं होती, तब तक वह राजाज्ञा नहीं मानी जाती थी और उस पर अमल भी नहीं होता था। अहिल्याबाई का रहन-सहन बिल्कुल सादा था। शुद्ध सफ़ेद वस्त्र धारण करती थीं। जेवर आदि कुछ नहीं पहनती थी। भगवान की पूजा, अच्छे ग्रंथों को सुनना ओर राजकाज आदि कार्य में नियमित रहती थी। उनके उत्कृष्ट विचारों एवं नैतिक आचरण के कारण अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता देवी समझने और कहने लगी थी। यही कारण है कि इंदौर में आज भी प्रति वर्ष भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव मनाये जाने की परंपरा चली आ रही है। अहिल्याबाई उस दौर में भी महिला सशक्तीकरण की पक्षधर थी और उन्होंने स्त्रियों को उनका उचित स्थान दिया तथा नारीशक्ति का भरपूर उपयोग किया। उन्होंने अपने कार्यों से यह दर्शा दिया कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से कम नहीं है। वे स्वयं भी पति के साथ रणक्षेत्र में जाया करती थीं। पति के देहान्त के बाद भी वे युध्द क्षेत्र में उतरती थीं और सेनाओं का नेतृत्व करती थीं। उस समय किसी महिला के पति के मर जाने पर और उसका पुत्र न होने पर उसकी संपूर्ण संपत्ति राजकोष में जमा कर दिए जाने का नियम था, परंतु अहिल्या बाई ने इस क़ानून को बदल दिया और मृतक की विधवा को यह अधिकार दिया कि वह पति द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति की वारिस रहेगी और अपनी इच्छानुसार अपने उपयोग में लाए और चाहे तो उसका सुख भोगे या अपनी संपत्ति से जनकल्याण के काम करे। अहिल्या बाई की ख़ास विशेष सेवक एक महिला ही थी। अपने शासनकाल में उन्होंने नदियों पर जो घाट स्नान आदि के लिए बनवाए थे, उनमें महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था भी हुआ करती थी। स्त्रियों के मान-सम्मान का बड़ा ध्यान रखा जाता था। स्त्री शिक्षा का विस्तार किया गया और दान-दक्षिणा देने में महिलाओं का विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था की गई। अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय डाक विभाग के द्वारा डाक टिकट भी जारी की गई है।
महान क्रन्तिकारी महिला शासिका महारानी अहिल्याबाई होलकर भारत के मालवा साम्राज्य की मराठा होलकर महारानी थी । महारानी अहिल्याबाई इन्दौर राज्य के संस्थापक इतिहास-प्रसिद्ध महाराज मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। वह एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ाइयाँ लड़ी। अहिल्याबाई का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के चौण्डी (छौंड़ी) ग्राम में हुआ और देहांत 13 अगस्त 1795 को; तिथि उस दिन भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी। उनके पिता मंकोजी राव शिंदे, अपने गाँव के पाटिल थे । उस समय लडकियाँ महिलाये स्कूल नही जाती थी, लेकिन अहिल्याबाई के पिता ने उन्हें लिखने -पढ़ने लायक पढ़ाया । इतिहास में उनका आना एक घटना का ही परिणाम माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मल्हार राव होलकर, मराठा पेशवा बाजीराव के कमांडर थे। वे एक बार पुणे जाते समय छौंड़ी रुके तो उन्होंने उस समय मंदिर में काम कर रही 8 साल की अहिल्याबाई को देखा। उन्हें अहिल्या का चरित्र और स्वभाव काफी पसंद आया, इसीलिये उन्होंने अपने पुत्र खांडेराव के लिये अहिल्या का हाथ माँगा और बाद में 1733 में उन्होंने खांडेराव से विवाह कर दिया। दस-बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह खंडेराव के साथ हुआ। सन् 1745 में अहिल्याबाई के पुत्र हुआ और तीन वर्ष बाद एक कन्या। पुत्र का नाम मालेराव और कन्या का नाम मुक्ताबाई था। पति के चंचल और उग्र स्वभाव को भी अहिल्याबाई ने सहा और बड़ी कुशलता से अपने पति के गौरव को जगाया। कुछ ही दिनों में अपने पिता के मार्गदर्शन में खण्डेराव एक अच्छे सिपाही बन गये। मल्हारराव को भी यह देखकर संतोष होने लगा। पुत्र-वधू अहिल्याबाई को भी वह राजकाज की शिक्षा देते रहते थे तथा उनकी बुद्धि और चतुराई से वह बहुत प्रसन्न होते थे। परन्तु दुर्भाग्यवश मल्हारराव के जीवन काल में ही उनके पुत्र खंडेराव का निधन 1754 ई. में हो गया और उनतीस वर्ष की अवस्था में अहिल्याबाई विधवा हो गईं। स्मरणीय है कि अटक के पार शिवराया की हिन्दवी पताका फहराने वाले तथा मध्यप्रदेश में हिन्दवी स्वराज्य के स्थापक महान योद्धा मल्हारराव होलकर अहिल्याबाई के श्वसुर थे । इन्होंने प्रजाहितकारी व सुखशांति पूर्ण राज्य की स्थापना की थी और राज्य के उत्तराधिकारी खंडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। ऐसे में परम्परा के अनुसार अहिल्याबाई के सती होने की नौबत आ गई, किन्तु जनता के हितार्थ राज्य को पेशवा के हाथों में चले जाने पर प्रजा को होने वाले भयंकर कष्ट को देखकर मल्हार राव होल्कर ने परम्परा को तोड़ते हुए अहिल्याबाई को सती होने से रोका और राज्य की बागडोर भी अहिल्याबाई को सौंप दिया। ससुर के मना करने पर प्रजा के हित के लिए अहिल्याबाई ने लोकनिन्दा की प्रवाह नहीं करते हुए सती होने से स्वयं को रोक लिया और राज्य की सत्ता स्वयं सँभाल ली तथा प्रजा कल्याण में राज्य का उपयोग करने लगी । ऐतिहासिक विवरण के अनुसार अहिल्याबाई के पति खांडेराव होलकर 1754 के कुम्भेर युद्ध में शहीद हुए थे। इसके बारह बाद उनके ससुर मल्हार राव होलकर की भी मृत्यु हो गयी। इसके एक साल बाद ही उन्हें मालवा साम्राज्य की महारानी का ताज पहनाया गया। वह हमेशा से ही अपने साम्राज्य को मुस्लिम आक्रमणकारियो से बचाने की कोशिश करती रही। बल्कि युद्ध के दौरान वह खुद अपनी सेना में शामिल होकर युद्ध करती थी। परन्तु दुर्भाग्यवश 1766 ई में उनके पुत्र मालेराव का भी देहांत हो गया। जब अहिल्याबाई की आयु बासठ वर्ष के लगभग थी, उनका दौहित्र नत्थू चल बसा। चार वर्ष पीछे दामाद यशवंतराव फणसे न रहा और इनकी पुत्री मुक्ताबाई दामाद के साथ सती हो गई।1767 ई. में अहिल्याबाई ने तुकोजी होल्कर को सेनापति नियुक्त किया। वे तुकोजी को के समान मानती थीं , राज्य के काग़ज़ों में जहाँ कहीं उनका उल्लेख आता है वहाँ तथा मुहरों में भी खंडोजी सुत तुकोजी होल्कर इस प्रकार कहा गया है। तुकोजी राव उनके दूर के संबंधी थे और उनके पुत्र मल्हारराव पर उनका बहुत स्नेह था; वे सोचती थीं कि आगे चलकर यही शासन, व्यवस्था, न्याय औऱ प्रजारंजन की डोर सँभालेगा; परन्तु वह अंत-अंत तक उन्हें दुःख देता रहा।

ऐतिहासिक विवरणानुसार मल्हार राव के निधन के बाद रानी अहिल्याबाई ने राज्य का शासन-भार सम्भाल लिया था और 1795 ई. में अपनी मृत्यु पर्यन्त बड़ी कुशलता से राज्य का शासन चलाया। उनकी गणना आदर्श शासकों में की जाती है। वे अपनी उदारता और प्रजावत्सलता के लिए प्रसिद्ध हैं। श्वसुर, पति, पुत्र की मृत्यु होने पर भी मनोधैर्य न खोते हुए अहिल्याबाई ने राज्य का सफल संचालन किया। प्रजा को कष्ट देने वालों को पकड़कर दंड देने के स्थान उन्हें समझाने की कोशिशें कीं तथा उन्हें जीवन- यापन के लिए भूमि देकर सुधार के रास्ते पर लाया गया, जिसके फलस्वरूप उनके जीवन सुखी व समृद्ध हुए। प्रजा से न्यूनतम कर वसूला गया ताकि प्रजा को कर बोझ समान न लगे। कर से प्राप्त धन का उपयोग केवल प्रजाहित के कार्यों में ही किया गया। अहिल्याबाई का मानना था कि धन, प्रजा व ईश्वर की दी हुई वह धरोहर स्वरूप निधि है, जिसकी मैं मालिक नहीं बल्कि उसके प्रजाहित में उपयोग की जिम्मेदार संरक्षक हूँ । उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में अहिल्याबाई ने प्रजा को दत्तक लेने का व स्वाभिमान पूर्वक जीने का अधिकार दिया। प्रजा के सुख- दुःख की जानकारी वे स्वयं प्रत्यक्ष रूप प्रजा से मिलकर लेतीं तथा न्याय-पूर्वक निर्णय देती थीं। उनके राज्य में जाति भेद को कोई मान्यता नहीं होने तथा सारी प्रजा समान रूप से आदर की हकदार होने के कारण अनेक बार लोग निजामशाही व पेशवाशाही शासन छोड़कर इनके राज्य में आकर बसने की इच्छा स्वयं इनसे व्यक्त किया करते थे । अहिल्याबाई के राज्य में प्रजा पूरी तरह सुखी व संतुष्ट थी क्योंकि उनका विचार में प्रजा का संतोष ही राज्य का मुख्य कार्य होता है। लोकमाता अहिल्या का मानना था कि प्रजा का पालन संतान की तरह करना ही राजधर्म है । यदि किसी राज्य कर्मचारी अथवा उसके नजदीकी परिवारी ने प्रजा से धनवसूली की तो उस कर्मचारी को तुरन्त सजा देकर उसे अधिकार विहीन कर दिया जाता था। समस्त प्रजाजनों को न्याय दिलाने के लिए उन्होंने गांवों में पंचायती व्यवस्था, कोतवालों की नियुक्ति, पुलिस की व्यवस्था, न्यायालयों की स्थापना था राजा को प्रत्यक्ष मिलकर न्याय दिए जाने व्यवस्था थी एवं उसी प्रकार कृषि व वाणिज्य की अभिवृद्धि पर ध्यान देते हुए कृषकों को शीघ्र न्याय देने की व्यवस्था की थी । प्रजा की सुविधा के लिए रास्ते, पुल, घाट, धर्मशालाएं, बावड़ी, तालाब बनाये गए थे। बेरोजगारों हेतु रोजगारों धंधों की योजनाएं थीं। रास्तों के दोनों ओर वृक्षारोपण किए गए थे, गरीब तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए अन्नदान क्षेत्र व रहने के लिए धर्मशालाओं के निर्माण किये गए थे। अपने ही राज्य में नहीं बल्कि अहिल्याबाई ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए संपूर्ण भारत भर में अन्य राज्यों की सीमांन्तर्गत भी इन सुविधाओं की व्यवस्था की थी।

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