लेखक परिचय

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर

एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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loveएम. अफसर खां सागर
किसी के लिए जिन्दगी जीने का सलीका तो किसी के लिए जीने की खुबशूरत वजह है। किसी को इसमें रब दिखता है तो किसी के लिए कम्बख्त इश्क है ये। प्यार शब्द तो एक है मगर इसके मायने अनेक हैं। इतिहास गवाह है कि इश्क के नाम पर न जाने कितनी बार चाकू और छुरियां चली हैं। कभी अनारकली को दीवार में चुनवा दिया गया तो कभी मजनू को पत्थरों से लहूलुहान कर दिया गया। फिर भी प्यार में न जाने कौन सी कशिश है कि वक्त ने जब भी करवट लिया है, हर बार एक न एक अफसाना बन ही गया। दौर बदला तो पैगाम-ए-मोहब्बत के अन्दाज भी बदले हैं मगर इसके जज्बात में कोई बदलाव नही आया। हर दौर में लोगों ने इसके लिए कुर्बानीयां दी हैं और देते भी रहेंगे।

फिलवक्त प्यार को बाजाब्ता एक त्यौहार के रूप में मनाने का चलन हो गया है। उसे वेलेंटाइन डे या यूं कह लें कि प्रेम दिवस का नाम दे दिया गया है। आप इसे प्यार करने का दिन या प्यार के इजार करने का दिन या कुछ और भी नाम दे सकते हैं। अब आपके जेहन में एक सवाल होगा कि प्यार में प्रदर्शन या दिखावा करने की क्या जरूरत है? प्यार तो प्यार है, बस प्यार। चाहे वह मां से हो, बहन से, भाई से या किसी और से। तो इसका यही जवाब होगा कि प्यार में पच्छिमीकरण का जो पिंक रंग लग गया है। फिर भी इबारत का ढाई आखर जो सनातन, अजर और अमर है। गौतम बुद्ध के शब्दों में प्रेम मानवता का दूसरा नाम है। विभिन्न भाषा और बोलियों की ध्वनियां अलग-अलग मगर बोध, भाव अनुभूती एक। प्यार शब्द जैसे ही हमारे जेहन में उभरता है तो उसके साथ विश्वास, भरोसा और समर्पण सब एक साथ नुमाया हो जाता है। प्यार सिर्फ एक मीठा एहसास नहीं बल्कि एक मुकम्मल फलसफा है जिन्दगी का। दौर बदलते रहे, अंदाज बदलता रहा मगर इसका रूप कभी नहीं बदला। एक रेशमी छुअन, जादुई सरसराहट। जहां न जाति का बंधन और न ही धर्म की जंजीरें सब कुछ एक समान। जज्बात एक सा, मर्म एक। तभी तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि ‘प्यार की कच्ची डोर लोहे से भी मजबूत होती है।’

इधर कई दिनों से प्रेम दिवस का चिल्ल-पों सुनाई और दिखाई दे रहा है। तरह-तरह के दिन मनाये जा रहे हैं मसलन रोज डे, चाकलेट डे वगैरह। सोशल मीडिया से लेकार प्रिंट, इलेक्टानिक और बेव मीडिया में भी इसके चर्चे खूब हैं। एक खास तबके के बीच या यूं कह लें कि युवाओं-युवतियों में वो भी कस्बाई इलाकों की बनिस्बत शहरी में ज्यादा है। अब तो गांव की गलियों तक वेलेंटाइन डे का शोर है। तोता-मैना के किस्से तमाम हो गये और वेलेंटाइन डे आम हो गया। प्यार जो रूमानी एहसास है, एक फलसफा है वह अब आर्चीव कार्ड, सोसल साइट या वर्चुवल दुनियां तक प्यार को महदूद या सीमित होता नजर आ रहा है। हम प्यार को अगर वर्चुवल दुनियां तक ही सीमित कर देंगे तो इसके जज्बे और मायने को  कहां तक बिखेर सकते हैं यह कह पाना मुश्किल होगा मगर इतना तो कहा जा सकता है कि प्यार को जब तक हम असल जिन्दगी में नहीं अपनाते तब तक इसके मूल रूप से हम परिचित ही नहीं हो सकते हैं।

आखिर प्यार सिर्फ युवाओं को ही करना चाहिए या सबको यह सवाल मेरे और शायद आपके जेहन में भी कौंध रहा होगा। प्रेम दिवस होना चाहिए, मैं भी इसके पक्ष में हूं और आज के परिवेश में इसकी सख्त जरूरत है मगर इसका मकसद सिर्फ चन्द लोगों को अपने निजी ख्यालात व इजहारात जाहिर करने की बजाय अवाम के अन्दर आपसी अखलाक/मोहब्बत पैदा करना हो। जाति-धर्म के नाम पर दंगा-फसाद कराकर कुछ लोग निजी फायदे के लिए इंसानो के बीच नफरत की खाई पैदा कर रहे हैं। आज जिस तरफ पूरे विश्व में रंग, समुदाय, धर्म-जाति, सम्प्रदाय के नाम पर विभेद दिखाई दे रहा है उसको मिटा कर सामाजिक समरस्ता का माहौल बनाने की जरूरत है जो सिर्फ और सिर्फ प्यार से ही मुमकिन है। प्यार असल में वो रोशनी है जो इंसानी जज्बात को रूहानी एहसास में पिरोता है। प्यार में बड़ा-छोटा, उंचा-नीचा और काला-गोरा जैसे अल्फाज के लिए कोई जगह नहीं। यहां मैं नहीं हम के भावना की डोर लोगों को एक में पिरोती है। प्यार को दिन व दायरे में कैद करना इसकी मूल भावना को चोटिल करना है। प्यार तो वह सागर है जिसमें पूरा विश्व समाहित हो कर मानवता के मंथन से एकता व बंधुत्व का अमृत निकालकर मानव कल्याण को सिंचित करने का संकल्प लेता है।

चन्द रोजा रिश्ता बनाने व उसका नाजायज इस्तेमाल करने के वास्ते एक लड़का व एक लड़की वेलेंटाइन-डे मनाये तो यह प्यार का मजाक उड़ाने के सिवा कुछ नहीं हो सकता। आज समाज को जरूरत है प्यार के बुनियादी मतलब समझने का। क्या कहता है प्यार? इसके जाने बिना इसका मजाक उड़ाना बेहद अफसोसनाक है। मीरा ने भी प्यार किया था, गोपियों को भी प्यार था मगर उन्हे किसी वेलेंटाइन-डे की दरकार नहीं थी! प्यार को हफ्ते भर विभिन्न रूप से इंज्वाय करके उसका उपहास उड़ाना किंचित जायज नहीं हो सकता। प्यार को जीवन में उतार कर खुद के आचरण के माध्यम से लोगों में बिखेरने की जरूरत है। ताकि समाज में सदभाव व समरस्ता का माहौल पैदा हो। आज जरूरत है प्यार को सच्चे दिल से अपनाने की, प्यार के सतरंगी फूल सबके दिलों में खिलाने की। प्यार के कोमल एहसासों को बिखेरने व पुष्पित-पल्लवित करने का दिन अगर वेलेंटाइन-डे बने तो सार्थक होगा वर्ना सिर्फ और सिर्फ चोचलों व ढ़कोसलों से ज्यादा वेलेंटाइन-डे नही हो सकता, जो प्यार का मजाक उड़ाना नही तो क्या है?

 

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