लेखक परिचय

अन्नपूर्णा मित्तल

अन्नपूर्णा मित्तल

एक उभरती हुई पत्रकार. वेब मीडिया की ओर विशेष रुझान. नए - नए विषयों के लेखन में सक्रिय. वर्तमान में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में परस्नातक कर रही हैं. समाज के लिए कुछ नया करने को इच्छित.

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सिनेमा की एक अनमोल देन है राजकपूर. राजकपूर निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के रूप में भारतीय सिनेमा जगत में पहचाने जाते रहेंगे. आज़ादी के बाद के हिंदी सिनेमा में राजकपूर ही सबसे अधिक ताकत से कहते हैं की “कलाकार किसी की तरह नहीं बन सकता. वह कलाकार होता ही नहीं जो किसी की तरह बनना चाहता है. उसे सिर्फ अपनी राह चलने की जिद रही है. इसीलिए वह गिर-गिर कर उठा और उठ-उठ कर गिरा.”

राजकपूर का जन्म पेशावर(पाकिस्तान) में 14 दिसम्बर सन 1924 में हुआ था. राजकपूर के पिता अभिनेता पृथ्वीकपूर थे. उनके दो छोटे भाई अभिनेता शशि कपूर और शम्मी कपूर और एक बहन उर्मिला सेन थीं. 22 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कृष्णा मल्होत्रा से हुआ.

राजकपूर पहली बार सन 1935 में फिल्म ‘इंक़लाब’ में दिखाई दिए. बारह वर्षों तक बहुत सी फिल्मों में काम करने के बाद सन 1947 में ‘नील कमल’ में मुख्य भूमिका की. 24 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना स्टूडियो आर.के.फिल्म्स बनाया और अपने वक़्त के सबसे काम उम्र के निर्देशक बन गए. उनकी पहली फिल्म बतौर निर्माता, निर्देशक और अभिनेता के रूप में ‘आग’ (1948) थी जिसको सफलता नहीं मिल सकी. आग की एक उपलब्धि थी, राजकपूर की फिल्मों में नायिका के तौर पार नर्गिस का आगमन. 1948 में आग में राजकपूर और नर्गिस की जो जोड़ी बनी वह हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक और विलक्षण स्टार जोड़ी साबित हुई. राजकपूर ने 1948 से 1988 तक निर्देशक के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बहुत सी फिल्मों से यादगार बन गए. उनमें बरसात (1949), आवारा (1951), श्री 420 (1955), और जिस देश में गंगा बहती है (1960) है. 1964 में निर्माता निर्देशक के रूप में ‘संगम’ प्रदर्शित हुई जो उनकी पहली रंगीन फिल्म थी. यह उनकी अभिनेता के रूप में आखिरी सबसे बड़ी सफलता थी.

1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ प्रदर्शित हुई जो असफल रही. इस फिल्म को बनाने में 6 वर्ष से अधिक समय लगा. यह फिल्म राजकपूर के जीवन का सपना थी. उनको इस असफलता से गहरा आघात लगा. इसके बाद उनकी फिल्म निर्माण की दिशा में परिवर्तन आया. 1973 में निर्माता-निर्देशक के रूप में ‘बॉबी’ फिल्म प्रदर्शित हुई जिसने अपर सफलता अर्जित की. बॉबी फिल्म से उनके पुत्र ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की. डिम्पल को इस फिल्म से काफी प्रसिद्धी मिली. यह फिल्म युवा पीढ़ी के रोमांस पर आधारित थी. डिम्पल की इस फिल्म में जो वेशभूषा थी वह उस वक़्त की भारतीय फिल्मों से अलग थी. राजकपूर ने फिर औरतों की भूमिकाओं को प्रधानता देकर ‘सत्यम शिवम् सुन्दरम ;1978 (जीनत अमान), ‘प्रेमरोग ;1982 (पदमिनी कोल्हापुरे), ‘और राम तेरी गंगा मैली ; 1985 (मन्दाकिनी) फ़िल्में बनाई. राजकपूर की आखिरी सबसे बड़ी फिल्म जिसमें वे दिखे ‘वकील बाबू’ (1982) थी.

राजकपूर अस्थमा के रोगी थे. 1988 में अस्थमा के कारण उनकी मृत्यु हो गई. उस वक़्त वे 63 वर्ष के थे. अपनी मृत्यु के समय वे ‘हिना’ फिल्म पर काम कर रहे थे जो बाद में ऋषि कपूर ने पूरी की और यह 1991 में प्रदर्शित हुई. इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पार अपार सफलता मिली.

फिल्म समीक्षक और साधारण फिल्म दर्शक सभी ने राजकपूर को खूब सराहा. फिल्म इतिहासकार और फिल्मों के दीवाने सब उन्हें भारतीय फिल्म का ‘चार्ली चैपलिन’ कहते हैं. उनकी प्रसिद्धी विश्व भर में है. अफ्रीका, मध्य-पूर्वी, रूस (सोवियत संघ), चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया आदि हर जगह पर उनकी खूब प्रशंसा हुई. राजकपूर भारतीय सिनेमा के पथ प्रदर्शकों में से एक हैं. उनके अन्दर लोगों की दिलचस्पी और फिल्मों की गहरी समझ थी. ‘आग’, ‘श्री 420′ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ जैसी फिल्मों में देशभक्ति का सन्देश मिलता है जिसने फिल्म निर्माताओं को देशभक्ति फ़िल्में बनाने के लिए प्रेरित किया.

राजकपूर की फिल्मों में गीतों के चित्रांकन को देखना एक विशिष्ट अनुभव है. गानों को उन्होंने अपनी फिल्मों में ‘फिलर’ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया. उनकी फिल्मों के गीत जिन्दा ताक़त होते थे. राजकपूर की अधिकतर फिल्मों में मुख्यतः संगीत निर्देशक शंकर-जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी तथा शैलेन्द्र थे. निमी, डिम्पल कपाड़िया, नर्गिस और मन्दाकिनी ने अपने फ़िल्मी जीवन की शुरुआत राजकपूर की फिल्मों से की. राजकपूर ने पुत्रों ऋषि कपूर, रंधीर कपूर और राजीव कपूर का फ़िल्मी जीवन निखारने में पूरी तरह से मदद की.

राजकपूर को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें 9 फिल्फेयर अवार्ड और 19 नोमीनेशंस मिले हैं. 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पदम् भूषण से सम्मानित किया. 1987 में उन्हें सिनेमा जगत के सबसे बड़े पुरस्कार ‘दादा साहेब फाल्के अवार्ड’ मिला. 2001 में उन्हें ‘स्टारडस्ट अवार्ड’ द्वारा ‘बेस्ट डायरेक्टर आफ मिलेनियम’ की उपाधि से नवाजा गया. 2002 में उन्हें ‘स्टार स्क्रीन अवार्ड’ में ‘शोमैन आफ मिलेमियम’ की उपाधि दी गई.

 

 

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1 Comment on "“राजकपूर” भारतीय सिनेमा को एक महान देन"

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niharika
Guest

राजकपूर की संपूर्ण जानकारी देने वाला लेख.
धन्यवाद आगे भी ऐसे लेख लिखती रहें.

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