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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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 मिकिन कौशिक

राजधानी दिल्ली का स्वरूप पहले ऐसा नहीं था जैसा आज है। महाभारत काल की सुंदर इंद्रप्रस्थ नगरी को सदियों पहले आकार दिया गया था। इसे बसाने वाले राजा महाराजाओं की चर्चा इतिहास में मिल जाती हे, लेकिन उसका नाम इतिहास में नहीं मिलता जिसके पसीने से सींची गई र्इंटें आज भी इस्पात की तरह मजबूती से खड़ी हैं। आज की दिल्ली आधुनिक दिल्ली है। देश का सबसे विकसित शहर, जिस पर राजधानी के रूप में हम गर्व करते हैं। कभी सोचिए कि, दिल्ली की पहचान वो इमारतें, लाल किला, जामा मस्जिद, इंडिया गेट और आज के आधुनिक भवन और इमारतें अगर न होतीं तो क्या खाली सपाट दिल्ली पर हम आप गर्व कर पाते? हमे गर्व किस पर करना चाहिए? सरकार पर या बिल्डर्स पर या फिर नेताओं पर। अगर दिल्ली की शानोसौकत पर आप किसी के प्रति आभार व गर्व व्यक्त करना चाहते हैं तो इसका सबसे बड़ा हकदार भवन निर्माण श्रमिक होंगे। आज दिल्ली में अंदर-बाहर हर तरफ निर्मांण कार्य चल रहे हैं। इन कामों में बहुत बड़ा श्रमिक वर्ग जी जान से जुटा है। दिल्ली से आगे बढ़ कर अगर पूरे देश के नजरिए से देखें तो आज के विकासशील भारत में आज के समय में सबसे बड़ा कार्य है अधोसंरचना निर्माण। यानि किसी भी विकास के लिए आधार खड़ा करना। हमारे देश के श्रमवीर जो नमक-भात और प्याज खाकर शहरों को बसाने का नायाब करिश्मा गढ़ते हैं, उनकी शक्ति पर आज शोध की आवश्यक्ता है। जब किसी निर्मांण साईट पर रॉ मटेरियल पहुंचता है तो उसके साथ श्रमिकों की अस्थायी बस्ती भी बसती है। पहले तिरपाल और प्लास्टिक सीट से झोपड़ियां बनती हैं, जिनमें सर्दी, गर्मी और बरसात हर तरह के मौमस में पूरी अनुकूलता के साथ ये श्रमिक परिवार रहते हैं। संघर्ष के साथी अपनी मेहनत के बूते बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी करने वाले इन श्रमिक परिवारों की बस्ती इमारत बनने के बाद उजड़ जाती है। आज देश की विडंबना है कि लोगों के लिए घर बनाने वाले इन मजदूरों के एक तिहाई तकबे के पास खुद के घर नहीं हैं। सरकार अपने बजट का 75 प्रतिशत हिस्सा वेतन भत्तों पर खर्च करती है, पर देश के 60 करोड़ श्रमिकों के लिए कोई “आय आयोग” नहीं है।

श्रमिक कर्ज में पैदा होता है और कर्ज में ही मर जाता है उसकी मेहनत का मूल लाभ विचोलिए ले जाते हैं। श्रमिक किसी भी पार्टी को चन्दा नहीं देता। हमारे देश में जगत के तात की ऐसी दयनीय स्थिति सिर्फ पूर्ववर्ती सरकारों की गलत नीतियों की वजह से है। श्रमिक सिर्फ नारे लगाते समय ही याद आते हैं। इन दिनों नई सरकार ने एक बार फिर श्रम सुधारों की दिशा में सोचना शुरू किया है। हाल ही में सरकार ने प्रचलन से बाहर हो चुके 44 औचित्यहीन श्रम कानूनों को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। इससे निश्चित ही श्रम कानूनों में सरलता आएगी और मजदूरो का हित हो सकेगा। तमाम अध्ययनों से ज्ञात होता है कि श्रम कानून को सख्ती से लागू करने से रोजगार घटते हैं। ब्राजील में ऐसा करने से बेरोजगारी में वृद्धि हुई। इंडोनेशिया में न्यूनतम वेतन में दो गुना वृद्धि किए जाने से बेरोजगारी में दो प्रतिशत की वृद्धि हुई। यूरोपियन यूनियन में जिन देशों में श्रम बाजार लचीले थे उनमें 2008 की मंदी का प्रभाव कम हुआ। जिन देशों में पुराने श्रम कानून लागू थे उन्हें ज्यादा परेशानी हुई। जर्मनी में बेरोजगारी भत्तो में कटौती की गई। इससे कंपनियों पर वेतन का कुल भार कम हुआ और रोजगार में वृद्धि हुई। इन कारणों से बेल्जियम, फ्रांस, ग्रीस, इटली, पुर्तगाल, स्पेन तथा नीदरलैंड ने श्रमिकों को बर्खास्त करने के नियमों को सरल बनाया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि श्रम कानून में ढील देने से देश में रोजगार उत्पन्न होंगे। उद्यमियों के लिए मशीनों की तुलना में श्रमिकों से काम लेना लाभप्रद हो जाएगा।

श्रम कानूनों के सरलीकरण की इस सार्थकता के बावजूद अपने देश में इससे बेरोजगारी पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। वर्तमान में संगठित क्षेत्र में लगभग 3 करोड़ लोग कार्यरत हैं। इनमें दो करोड़ सरकारी कर्मी हैं, जबकि एक करोड़ प्राइवेट कंपनियों में कार्यरत हैं। बेरोजगारी की समस्या इससे बहुत ज्यादा विकराल है। देश की आबादी लगभग 125 करोड़ है। इसमें लगभग 60 करोड़ कार्य करने के इच्छुक वयस्क होंगे। संगठित क्षेत्र के तीन करोड़ को छोड़ दें तो शेष 57 करोड़ को संगठित क्षेत्र में रोजगार देना है। प्राइवेट कंपनियों पर लागू श्रम कानून में ढील देने से यहां वर्तमान में एक करोड़ के स्थान पर सवा या डेढ़ करोड़ करोड़ लोगों को रोजगार मिल जाए तो भी हमारी परिस्थितियों में यह ऊंट के मुंह में जीरा ही होगा।

केवल श्रम कानून के सरलीकरण से काम नहीं चलेगा। रोजगार सृजन को सीधे प्रोत्साहन देना होगा। वर्तमान में मनरेगा पर लगभग 40 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष खर्च किए जा रहे हैं। इस रकम को यदि 40 हजार रुपए प्रति वर्ष की दर से उद्यमियों को नए रोजगार पर सब्सिडी दी जाए तो एक करोड़ रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं। मनरेगा के तहत मजदूर वर्ग को खुद का घर बनाने की योजना भी लाकर सरकार एक नई पहल कर सकती है।

देश में हर राज्य में राज्य सरकारों ने निर्माण श्रमिको के लिए विभिन्न योजनायें चला रखी है, इसी के अंतर्गत हर राज्य में अपने अपने भवन एवं अन्य सन्निर्माण कल्याण बोर्ड कार्य कर रहे है जिनका उद्देश्य कार्यरत निर्माण मजदूरों का पंजीकरण कर उनको श्रम कल्याण और सामाजिक सुविधाएं उपलबध कराना है | कई राज्यों में ये बोर्ड काफी अच्छा कार्य कर रहे है और वहीँ कुछ राज्यों में इनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है, इस आधुनिक युग में इनमे भी अत्याधिक परिवर्तन की आवश्यकता है अगर इन्हें सफल होना है तो सुचना प्रोधोगिकी का प्रयोग कर देश के सभी बोर्ड व् अन्य कल्याणकारी योजनायों को आपस में जोड़ना होगा ताकि निर्माण श्रमिकों को इन योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सके |

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