लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-     congress

गुजरात दंगों को बार-बार कुरेदने की प्रवृत्ति न केवल कांग्रेस को संकट का सबब बनने जा रही है, बल्कि संप्रग के घटक दलों के मोहभंग के संकेत भी मिलने लगे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक खबरिया चैनल को साक्षात्कार देते हुए 2002 के गुजरात तथा 1984 के सिख विरोधी दंगों में अंतर को नए सिरे से परिभाषित करते हुए कहा था कि यह सही है कि सिख विरोधी दंगों में कुछ कांग्रेसी शामिल थे, लेकिन इन दंगों में फर्क था, गुजरात सरकार जहां दंगों को उकसाने में शामिल थी, वहीं केंद्र की कांग्रेस सरकार सिख विरोधी दंगों को रोकने की कोशिश में लगी थी। राहुल का यह कहना इसलिए अतार्किक है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय गुजरात दंगों की जांच स्वमेव निगरानी में विशेष जांच दल से कराकर नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे चुकी है।
जाहिर है, राहुल के बयान ने में आग में घी डालने का काम किया है। नतीजतन संप्रग के पुराने सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने राहुल के बयान पर न केवल असहमति जताई, बल्कि ऐसे मुद्दों को हमेशा के लिए खत्म करने की सलाह भी दे डाली। दूसरी तरफ नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूख अबदुल्ला ने भी मोदी के प्रति नरम रूख प्रकट करते हुए, मोदी की जीत-हार के फैसले को जनता पर छोड़ दिया है। जाहिर है, आम चुनाव के ठीक पहले संप्रग घटक दलों का बदला रूख संप्रग गठबंधन के चुनाव पूर्व ही टूटने का संकेत दे रहे है। दूसरी तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच एसआईटी से कराने की मांग उठाकर कांग्रेस को सकते में डाल दिया है। तय है, दंगों की रणनीति अब कांग्रेस के गले का फंदा बनने जा रही है।
लगता है, अब कांग्रेस खुद के ही बुने जाल में उलझती जा रही है। अर्से से दंगों को लेकर दोहरे मापदण्ड अपना रही कांग्रेस के लिए अरविंद केजरीवाल ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के जांच की पहल करके कांग्रेस के सामने नई मुसीबत खड़ी कर दी है। इस मकसद पूर्ति के लिए अरविंद ने दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग से सलाह मशविरा किया। इसके बाद अरविंद ने पत्रकारों से रूबरू होते हुए कहा कि कैबिनेट की अगली बैठक में एसआईटी के गठन और उसकी समय सीमा का फैसला ले लिया जाएगा। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा गुजरात और सिख विरोधी दंगों में फर्क जताने के बाद अरविंद की पहल ने 1984 के दंगों को एक बार फिर सुर्खियों में लाकर लगे घावों को कुरेदने का काम किया है। हालांकि आम आदमी पार्टी ने अपने घोशणा-पत्र में भी इन दंगों की जांच एसआईटी से कराने का वादा किया है। इस नजरीए से आप अपने वादे पर अमल करने जा रही है। दूसरी तरफ राहुल की दंगों में कांग्रेसियों की भागीदारी संबंधी स्वीकारोक्ति गले की हड्डी बन गई है। इस बयान के बाद कांग्रेस कार्यालय के बाहर अकाली दल ने धरना दिया। दल के नेता मंजीत सिंह का कहना है कि राहुल गांधी ने दंगों में कांग्रेस कार्यकाताओं की भागीदारी स्वीकारी है तो उन्हें कानूनी कार्रवाही भी आगे बढ़ानी चाहिए? जाहिर है,कांग्रेस की गति सांप-छछूंदर जैसी हो गई है।
यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि जब मौजूदा केंद्र सरकार सिख विरोधी दंगों को रोकने में लगी थी तो इंदिरा गांधी की हत्या के तत्काल बाद पूरे देश में दंगे कैसे भड़के? इन दंगों में नानावटी आयोग की रिर्पोट के मुताबिक अकेले दिल्ली में 3006 लोग मारे गए थे। इस सिलसिले में पहला आयोग 1985 में रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में गठित किया गया था। जिसने अपनी जांच में हुड़दंगी कांग्रेसियों और पुलिस को क्लीन चिट दे दी थी। हालांकि दंगों के बाबत 587 एफआईआर दर्ज की गईं थीं,जि नमें से कालांतर में 241 एफआईआर रद्द भी कर दी गई। सिख विरोधी दंगों में अब तक 442 लोगों को सजाएं हुई हैं, इनमें से 49 को आजीवन कारावास की सजा मिली है। 1984 के दंगों में प्रमुख विडंबना यह थी कि दंगों के दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही, उसने कहीं भी दंगों को रोकने की कोशिश भी नहीं की, जबकि गुजरात दंगों के दौरान पुलिस कार्रवाई में करीब 300 लोग मारे गए थे। राहुल का यह कहना गलत है कि गुजरात सरकार दंगों को भड़काने का काम कर रही थी। जाहिर है, कांग्रेस अभी भी मोदी का हौवा खड़ा करके मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण में लगी है। लिहाजा वोटों के लिए कांग्रेस की संकीर्ण सोच अब उसके घटक दलों को भी रास नहीं आ रही है। नतीजतन राकांपा और नेशनल कांफ्रेंस के मोहभंग के संकेत मिलने लगे हैं। यह टकराव गठबंधन के टूटने की भी स्थिति निर्मित कर सकता है।
राकांपा के नेता प्रफुल्ल पटेल ने साफ तौर से कहा है कि उनकी पार्टी राहुल के बयान का समर्थन नहीं करती है। 2002 के दंगों पर जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है तो इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए। ऐसा होता है तो न्यायालय के आदेश का सम्मान भी होगा और जख्म हरे भी नहीं बने रहेंगे। साफ है राकांपा कांग्रेस से किनारा कर सकती है। क्योंकि प्रफुल्ल पटेल की राय यदि निजी राय होती तो अब तक पार्टी अध्यक्ष शरद पावर इसका खंडन कर चुके होते। संभव है आम चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही राकांपा संप्रग से छिटककर अलग हो जाए? यदि ऐसा होता है तो यह कांग्रेस को बड़ा झटका होगा। इधर राहुल गांधी के बयान के बाद नेशनल कांफ्रेस का भी सुर बदला है। फारुख अब्दुल्ला ने मोदी की जीत-हार का फैसला जनता पर छोड़ देने का बयान दिया है। अब्दुल्ला ने दो टूक शब्दों में कहा है कि लोग ही तय करेंगे कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा। यदि मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह लोगों की मंशा से ही संभव होगा और उनकी पार्टी इस जनादेश को सम्मान के साथ मंजूर करेगी। जाहिर है, कांग्रेस के दो प्रमुख घटक दलों ने साफ संकेत दे दिया है कि वे गुजरात दंगों के लिए मोदी को दोषी नहीं मानते और जनादेश का सम्मान करेंगे। नेशनल कांफ्रेस की कांग्रेस से नाराजगी इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में प्रशासनिक इकाइयों के गठन को लेकर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच मतभेद गहराए हैं। मालूम हो ये दोनों दल मिलकर जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार चला रहे हैं। किंतु अब हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने पर आमादा हैं। तय है, कांग्रेस अपने ही बुने जाल में बुरी तरह उलझती जा रही है।

हैरानी यह भी है कि कांग्रेस सहयोगियों से उलझी है। राकांपा और नेशनल कांफ्रेंस जहां उसके सप्रंग गठबंधन के सहयोगी हैं, वहीं दिल्ली में ‘आप’ की सरकार कांग्रेस की वैसाखियों पर ही टिकी है। बावजूद आप कांग्रेस को 1984 के दंगों में दोषी ठहराने की दृष्टि से एसआईटी से जांच कराने पर उतारू हैं। ‘आप’ के इस पैंतरे को सिख वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति भी माना जा रहा है। इस संभावना की पुष्टि इस बात से भी होती है कि अरविंद केजरीवाल ने कुटिल चाल चलते हुए उप राज्यपाल से जेल में बंद खालिस्तानी आतंकवादी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा खत्म करने की मांग भी की है। बहरहाल, कांग्रेस को आतंकियों को समय पर फांसी न देने का खामियाजा भी उठाना पड़ सकता है। सब कुल मिलाकर दंगों के जंजाल में अब भाजपा और नरेंद्र मोदी नहीं, कांग्रेस और राहुल उलझते नजर आ रहे हैं।

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1 Comment on "दंगों के फंदे में कांग्रेस"

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mahendra gupta
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कांग्रेस खुद ही अपने मायाजाल में ही फंस गयी है. यह भी जाहिर होता है कि राहुल अभी कितने अपरिपक्व हैं. पर पार्टी चापलूसी में उन पर यह बोझ लाद रही है.पर अब कांग्रेस कू इस बयान की कीमत तो चुनाव में चुकानी पड़ेगी ही.यदि संतुष्ट करने के लिए उसने कुछ न किया.इसीलिए बुजुर्गों ने कहा है ‘नादान की दोस्ती जी का जंजाल.

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