लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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honour kilingमर्यादाऐं स्थापित करना जितना कठिन है उतना ही इन्हें तोड़ डालना सरल है। सदपरम्पराओं के विकास में आपको पर्याप्त समय लग सकता है और उन्हें स्थापित करने में आपको पर्याप्त परिश्रम भी करना पड़ सकता है, परन्तु उन्हें तोडऩे में न तो समय लगता है और ना ही किसी विशेष परिश्रम के करने की आवश्यकता ही होती है।

भारतीय समाज में एक नई विसंगति ने जन्म लिया है। ‘ऑनर किंलिग’ के नाम से इसे पुकारा जा रहा है। समाज के लोग प्रतिष्ठा के लिए जब किसी की हत्या कर दें तो उसे ‘ऑनर किलिंग’ के नाम से पुकारा जा रहा है। लडक़े-लड़कियाँ अपनी इच्छा से जो विवाह कर रहे हैं, और विशेषत: हिन्दू समाज में वर्जित सम्बन्धों में जब वो विवाह करें तो ‘ऑनर किलिंग’ की इस सामाजिक विसंगति का उन्हें शिकार बनना पड़ जाता है।

हम ‘ऑनर किलिंग’ के समर्थक नही हैं, परन्तु जो लोग ऐसा कर रहे है उनके विरोधी भी नही हैं। भारतीय मीडिया ने इस विसंगति को जितने उत्साह से उछाला है उतने उत्साह से इस विसंगति की जड़ों को टटोलने का प्रयास नही किया है।

इस विसंगति की आलोचना करने से पूर्व भारतीय समाज की कुछ सद्परम्पराओं पर विचार करना आवश्यक है। समाज की अवधारणा पर विचार करना आवश्यक है और आधुनिक समाज के परिवत्र्तित परिवेश और परिवत्र्तित परिस्थितियों पर विचार करना भी आवश्यक है। हमारे विद्वानों का मानना है कि जिसमें सभी लोग एक होकर गति करते है उसे समाज कहते हैं। ‘‘सम अजन्ति जन: यस्मिन् स: समाज।’’ एक होकर गति करने के लिए एक व्यवस्था का होना बड़ा ही आवश्यक है। अत: समाज जहाँ एक होकर गति करने का अवसर सबको उपलब्ध कराता है वहीं किसी एक व्यवस्था की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है। समाज स्वयं में एक संस्था है, इसे सभी समाज शास्त्री और राजनीतिक मनीषियों ने स्वीकार किया है। इस संस्था का अपना एक ढांचा है, शरीर है, इसकी व्यवस्था को संचालित करने के लिए पूरी एक कार्यकारिणी है। समाज के चिन्तनशील लोग इस ढांचे को अपने ढंग से संचालित करते आये हैं। प्राचीन काल में ये चिन्तनशील लोग समाज की मुख्यधारा के स्वरूप को ठीक बनाये रखने के लिए अपना समय और श्रम समाज के लिए दिया करते थे। जिससे ये संस्था प्राणवान बनी रहती थी। आज आप इसे एक झटके में ये कहकर नकार नही सकते कि ये संस्था अनुपयोगी हो गयी है। लोगों को एक होकर गति करने के लिए इस व्यवस्था की सदा ही आवश्यकता रहेगी।

कानून का भय व्यत्तिफ को उतना नियंत्रित नही रखता जितना ‘‘समाज का भय’’ उसे नियंत्रित रखता है। मनुष्य समाज की मान मर्यादा को कानून की सूक्ष्मताओं से पहले सीख लेता है। साथ ही वह इन मान मर्यादाओं को स्वभावत: पालन करने का अभ्यासी भी बन जाता है। भारतीय समाज ने विवाह को सन्तानोत्पत्ति कर वंश वृद्घि के लिए उपयोगी माना। विवाह को व्यभिचार का प्रमाणपत्र कभी नही माना। अपितु उस पर भी कुछ ऐसी अपेक्षाऐं स्थापित कीं कि शरीर की अमूल्य जीवन शक्ति वीर्य का नाश न हो और वह हमारी प्राण शक्ति को सुदृढ़ और सबल कर हमें उन्नतिशील बनाने में सहायक हो। इसीलिए एक पत्नी और एक पति की आदर्श व्यवस्था स्थापित की। यह व्यवस्था व्यावहारिक भी है और वैज्ञानिक भी है। व्यावहारिक इसीलिए है कि समाज के तीन आश्रमों के लोग अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थ और संन्यासाश्रम के लोग इसी गृहस्थ पर अवलम्बित रहते थे।  इसीलिए एक गृहस्थी के लिए आवश्यक था कि वह अपने जोड़ा के साथ एक निश्चित स्थान घर बनाकर पर रहे और उसमें उसके बाल बच्चे हों। इस व्यवस्था को आप वैज्ञानिक इसीलिए कहेंगे कि प्रकृति ने संसार में महिला और पुरूष दोनों को बराबर-बराबर बनाया है इसीलिए एक के लिए एक का ही संग होना न्याय संगत है। कितने ही देशों में विभिन्न विभिन्न समयों पर लड़कियों को जन्म लेते ही मारने की अमानवीय परम्परा रही है और आज भी है परन्तु महिला और पुरूष की बराबर की उत्पत्ति में कोई परिवत्र्तन नही आया। कितने ही युद्घों में कई बार ऐसा हुआ है कि जब समाज में युवा लडक़े ही समाप्त हो गये, परन्तु उस सबका उपचार भी प्रकृति ने कर डाला। यूरोप में प्रथम और द्वितीय विश्व युद्घ के समय ऐसा देखा गया था, परन्तु आज वहाँ यह अनुपात बराबर हो गया है। आज कन्या भ्रूण हत्या हो रही है, तो कल को प्रकृति जब अपना खेल खेलेगी तो मानव की यह चाल भी धरी की धरी रह जायेगी।

आज के समाज ने सभ्यता के विकास के नाम पर सभ्यता का विनाश किया है। इसमें सब एक होकर गति नही कर रहे हैं। सबकी गति की दिशा विपरीत है। एक होकर गति करने का अर्थ है कि सबका लक्ष्य एक हो समाज की उन्नति में अपनी सहभागिता प्रकट करना। पर यहाँ स्वार्थवाद ने समाज की परिभाषा ही बदल दी है। सभ्यता का अर्थ लगाया जा रहा है चिकनी चुपड़ सडक़ों के निर्माण से, उन पर दौड़ती एक से एक बढक़र मूल्यवान गाडिय़ों से, घर में ऐश्वर्य के अधिक से अधिक साधनों से, हम भूल कर रहे है। वास्तव में ये सारी चीज़ें तो सभ्यता के बाहरी लक्षण हैं। हमने धर्म की भाँति सभ्यता को बाहरी रूप से ही पहचानने का प्रयास किया है। हमने इसके भीतरी और वास्तविक स्वरूप को नही पहचाना। इसीलिए हमने इसके बाहरी स्वरूप को पकडक़र उसी के पीछे भागने का अनुचित प्रयास किया है। हमने मानव को भीतर से सभ्य बनाकर उसे सुसंस्कृत बनाने और ‘एक होकर’ उन्नति करने के लिए या गति करने के लिए प्रेरित नही किया। बस यही हमारे दु:खों का

कारण है। यदि हम अपने भीतर बैठे मानव को विनाश के कार्यों और विनाश की गतिविधियों से मोडक़र विकास और प्रगति की ओर ले चलें तो ही अच्छा है। हम तभी कह सकते हैं-

‘‘असतो मा सदगमय’’-अर्थात संसार के दुख, दुर्गुण और दुरितों से बचाकर हमें सत्य की ओर ले चलो। सत्य ही जीवन की गति है और सत्य को पाना ही जीवन का उद्देश्य है।

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