लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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salman-khanसलमान खान द्वारा दिए गए एक बयान पर आजकल देश भर में काफी बवाल मचा हुआ है ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी शख्सियत की ओर से महिलाओं के विषय में कुछ आपत्तिजनक कहा गया हो इससे पूर्व चाहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव हों जो बिहार की सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से करते हों चाहे मघ्य प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री बाबू लाल गौर जो भरी सभा में कहते हों कि वे महिलाओं को धोती  बाँधना तो नहीं किन्तु धोती खोलना सिखा सकते हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस काटजू हों जो कहते हैं कि रेप महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है यह तो होता रहता है और होता रहेगा चाहे उत्तर प्रदेश के नेता बाबू आजमी हों ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं कि अगर सभी के बारे में लिखा जाए तो शायद तो शायद कुछ और लिखना शेष नहीं रह जाएगा। जब जब ऐसे बयान आते हैं कुछ दिन हो हल्ला मचता है बयानबाजी होती है सम्बन्धित पक्ष की ओर से माफीनामा आता है और कुछ दिन के मनोरंजन   (माफ कीजिएगा किन्तु इस शब्द का प्रयोग यहाँ आज एक कटु सत्य है) के बाद खबरों के भूखे लोगों द्वारा ऐसी ही किसी नई खबर की तलाश शुरू हो जाती है। इस पूरे प्रकरण में सोचने वाली बात यह है कि सलमान द्वारा उक्त वक्तव्य एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा गया मीडिया द्वारा जो औडियो क्लिप सुनाई जा रही है उसमें सलमान के वक्तव्य के बाद वहाँ मौजूद पत्रकारों की हँसने की आवाजें सुनाई दे रही हैं उस समय मौजूद किसी भी पत्रकार द्वारा इस वक्तव्य की आलोचना नहीं की गई शायद उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं लगा तो फिर उन्हीं के द्वारा बाद में इसे उछाला क्यों गया ? अगर वे वाकई में महिलाओं की भावनाओं के प्रति जागरूक थे और उन्हें बुरा लगा तो वे उसी समय सलमान को उनकी गलती का एहसास कराकर बात को खत्म कर देते न कि उसे खबर बनाकर पूरे देश की महिलाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते ।

मीडिया के इस कृत्य ने ऐसी अनेक पीड़ितों के नासूरों को पुनः जीवित कर दिया है । सलमान ने जो कहा वो तो बिना सोचे समझे कहा और इसकी कीमत भी चुका रहे हैं किन्तु मीडिया ने जो किया क्या वो भी बिना सोचे समझे या फिर  सोच समझ कर ?  लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि सलमान ने जो कहा सही कहा! उनका कहना है कि वे जब प्रैक्टिस करके रिंग  से बाहर निकलते थे तो उन्हें एक रेप पीड़िता की तरह महसूस होता था । यह कथन वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है काश उन्होंने बोलने से पहले सोचा होता। सलमान अपनी आने वाली फिल्म सुल्तान के लिए अपने द्वारा की गई मेहनत पर बात कर रहे थे जो पसीना उन्होंने बहाया था उसका बखान करते हुए कुछ ज्यादा ही बोल गए वे यह भूल गए कि वे अपने द्वारा भोगे गए  शारीरिक कष्ट की तुलना जिस कष्ट से कर रहे हैं वो केवल शारीरिक नहीं है बलात्कार एक महिला के शरीर का नहीं उसकी आत्मा उसके मन उसके व्यक्तित्व उसके स्वयं को एक इंसान समझने की खोखली सोच इन सभी का होता है। वे यह भूल गए कि इस मेहनत और उससे मिलने वाले कष्ट को उन्होंने स्वयं चुना था उन पर थोपा नहीं गया था जबकि बलात्कार महिला पर थोपा गया होता है कोई भी महिला किसी भी परिस्थिति में इसे चुनती नहीं है।  वे यह भूल गए कि उनके द्वारा की गई इस मेहनत ने उस किरदार को जीवित कर दिया जिसे वह परदे पर निभा रहे हैं लेकिन बलात्कार उस महिला को जीते जी मार डालता है और वह महिला अपना शेष जीवन एक जिंदा लाश की तरह बिताती है जिस पर यह बीतता है। हमारा देश अभी उस नर्स अरुणा शानबाग को भूला नहीं है जो बलात्कार के कारण 42 साल तक कौमा में चली गईं थीं और 66 साल की उम्र में कौमा में ही इस दुनिया से बिदा हो गईं। वे यह भूल गए कि उनके द्वारा एक “रेप पीड़िता” के बराबर झेले गये कष्ट  से उन्हें नाम शोहरत पैसा तालियाँ तारीफ सब मिलेगी उनकी फैन फौलोइंग बढ़ेगी लेकिन एक रेप पीड़िता को मिलती है बदनामी उसे समाज में मुँह छिपाकर घूमना पड़ता है और न्याय पाने की आस में उसकी सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती है फिर भी न्याय नहीं मिल पाता (निर्भया को ही देख लें) । वे यह भूल गए कि उनकी शारीरिक मेहनत से उपजी उनकी पीड़ा एक दिन के आराम से या किसी पेनकिलर (दर्द नाशक दवा) से कम हो जाएगी लेकिन रेप पीड़िता का जख्म और दर्द दोनों  जीवन भर के नासूर बन जाते हैं शरीर के घाव भर भी जाँए मन और आत्मा तो छलनी हो ही जाते हैं ।

कहते हैं कि समय के साथ सारे घाव भर जाते हैं लेकिन शायद यह ही एक घाव होता है जिसका इलाज तो समय के पास भी नहीं होता ।वे यह भूल गए कि कई बलात्कार पीड़िता तो आत्महत्या तक कर लेती हैं क्या उन्हें रिंग से बाहर आने के बाद  अपनी पीड़ा के कारण कभी आत्महत्या करने का विचार आया था? वे भूल गए कि बलात्कार तो महिला का होता है लेकिन उसके दंश से उपजी पीड़ा को उसका पूरा परिवार भोगता है क्या सलमान के रिंग से बाहर आने के बाद उनके दर्द से उनका परिवार भी कराहता था ?  यह सवाल इस लिए उठ रहे हैं सलमान साहब क्योंकि आप आज के यूथ आइकान हैं आपकी जबरदस्त फैन फौलोइंग है आप से आज का युवा प्रोत्साहित होता है  आप सफलता के चरम पर हैं।सफलता के साथ उसका नशा भी आता है और उससे जिम्मेदारी भी उपजती है यह तो सफलता प्राप्त करने वाले पर निर्भर करता है कि वह इसके नशे में चूर होता है या फिर उससे मिलने वाली जिम्मेदारी के अहसास से अपने व्यक्तिगत में और निखार लाता है। देश के प्रति अपने फर्ज को निभाने के लिए आवश्यक नहीं कि सीमा पर जा कर खून ही बहाया जाए।हम सब जहाँ भी हैं जिस क्षेत्र में भी हैं उसी जगह से देश हित में आचरण करना भी देश सेवा होती है।जिस देश ने  सलमान को सर आँखों पर बैठाया उस देश के युवाओं पर उनके आचरण का क्या असर होगा अगर वो इतना ही ध्यान में रखकर देश के युवाओं के सामने एक उचित एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें तो यह भी एक तरह की देश सेवा ही होगी।

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