लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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ईमानदारी, सच, विश्‍वास की रूखी सूखी, आधी पौनी खाते हुए मर मर के जी रहा था कि उस दिन परम सौभाग्य मेरा एक सच्चा दोस्त मुझे पहुंचे हुए बाबा के पास जबरदस्ती ले गया, यह कहकर कि ये वे पहुंचे हुए बाबा हैं कि जो अपने भक्तों के दुख फूंक मार कर पल छिन में हवा कर देते हैं तो जीवन के प्रति मरती मरती आस्था जागी।

बाबा जीरो आवर में अशांत मुद्रा में चांदी के पलंग पर लेटे हुए। सामने तरह तरह के सोमरस। लगा ज्यों रात भर रंगरलियां मना कर थके हों। संतन को अब तो केवल सीकरी सो ही काम। कीड़े पडें इस दिमाग को भी, जब देखो साधुओं के बारे में भी हर कुछ सोचने लग जाता है। औरों के बारे में तो पता नहीं क्या क्या सोचता रहता है। सुन रे गधे दिमाग! सभी कि अपनी अपनी पर्सनल लाइफ है। प्रोफेशन के कुछ अथिक्स होते हैं, नहीं। प्रोफेशन, प्रोफेशन है साहब और अथिक्स अथिक्स। दोनों को एकसाथ मत रखिए। ईमानदार तभी तक बने रह सकते हैं जब तक दाव नहीं लग रहा। जिस दिन दाव लगा बदल दी सांप की तरह केंचुली। सभी इस लोक में कमाने आए हैं। बस फर्क केवल इतना है कि कुछ उम्र भर टांग पर आंग धरे दिमाग की खाते हैं तो कुछ को कड़ी मशक्कत के बाद भी कुछ नहीं मिलता। धंधे में जो कमाने की बात न कर रहा हो पूरे संसार में किसी एक नाम बता दीजिए, आपके जूते पानी पिऊं।

क्या कमाल का कमरा! हर चीज वहां मुहैया। इंद्र भी यहां आ जाए तो उसे भी बाबा से ईश्या हो जाए। उनके आसपास कोई न था। मित्र ने उनके चरणों में नतमस्तक होने को कहा तो मैं चाहकर भी झुक ही नहीं पाया। क्या है न कि ये रीढ़ की हड्डी अब गधी कहीं की मुड़ती ही नहीं। बहुत कोशिश की। थक हार कर महीनों पहले डॉक्टर के पास गया था तो उसका घंटों इंतजार करने के बाद जब सबसे बाद में मेरी बारी आई तो उसने मेरा मन रखने को पूछा, ‘क्या बात है?’

‘जब जब पेरशान हो किसी के चरणों में लोटने की कोशिश करना चाहता हूं तो रीढ़ की हड्डी मुड़ती ही नहीं, ‘तब उसने मेरी की रीढ़ की हड्डी पर पुर जोर घूंसा जमाते हुए कहा, ‘यार! पहला बंदा देख रहा हूं अपनी लाइफ में रीढ़ की हड्डी वाला। पर सॉरी! यह कुछ ज्यादा ही अकड़ गई है। अब झुकेगी भी नहीं। जितने दिन बचे हैं ऐसे ही जीते रहो। रीढ़ की हड्डी से ज्यादा हिल हुज्जत करोगे तो महंगा पड़ सकता है। अब इसमें लोच नहीं रही।’

बाबा ने चांदी के पलंग पर वैसे ही पसरे हुए पूछा,’ किसे लाए हो भक्त! सुंदरियों का स्पलायर है?’

‘नहीं गुरूदेव!’

‘चरस के धंधे वाला है?’

‘नहीं गुरू जी।’

‘तो अरब का भाई है?’

‘नहीं गुरू जी।’ कह मित्र उनके आगे पत्तों को डोना हो गया।

‘तो पीएम होना चाहता है??’

‘नहीं, ये तो कंप्लीट जनता भी नहीं।’

‘तो यार हमारा रेस्ट क्यों नश्ट कर रहे हो? आज तो सिर खुजलाने का भी वक्त नहीं। चार भाई, दो सीएम, चार एमपी, आठ एमएलए को मिलने का टाइम दे रखा है। कई दिनों से मिलने को कह रहे थे।’

‘पर गुरूदेव इसके रोगों को समाधान दीजिए ताकी बची जिंदगी चैन से जी सके। व्यवस्था से बहुत तंग आ चुका है। आपसे अपने दु:खों का समाधान चाहता है।’ मित्र ने कहा तो मैने उसकी हां में हां मिलाई।

‘कहो! क्या दु:ख है?’

‘बाबा !बाबा! पानी दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! वायु दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! धरती दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! अग्नि दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! पृथ्वी दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! आकाश दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! बिजली दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा बाबा! गोल्ड मेडलिस्ट बेटे की नौकरी दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! सरकारी राशन का राशन दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! तन ढकने को कपड़ा दे! जीने को कोई लफड़ा दे।’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! राशन कार्ड दे!’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! सीवरेज का कनैक्‍सन दे।’

‘उसके डेरे जा।’

‘बाबा! बाबा! बेईमानी दे।’

‘उसके डेरे जा। लोकतंत्र में जनता अनेक पर उसके दु:ख एक। चोरी कर, उसके डेरे जा। मजाल कानून बाल भी बांका कर सके। बलात्कार कर। उसके डेरे जा। कोई कुछ नहीं कर सकता। समाज में सीना चौड़ा कर जी। अत: संक्षेप में बाबा कहते हैं कि बेटा न तेरे जा, न मेरे जा । पर मजे से जीना… तो उसके डेरे जा!

तो उसके डेरे जा!

तो उसके डेरे जा!!’

-डॉ. अशोक गौतम

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1 Comment on "व्यंग्य/…..उसके डेरे जा!!!"

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समीर लाल
Guest

बहुत सटीक!!

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