लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

(घटोत्कच का बलिदान)

घटोत्कच – मायावी युद्ध का विशेषज्ञ। भीम और हिडिम्बा के इस महाबली पुत्र को श्रीकृष्ण के साथ हम सभी पाण्डवों ने आशीर्वाद देकर युद्ध के लिए विदा किया।

मशालों के प्रकाश में घटोत्कच का रौद्र रूप देख कौरव सेना में भय की लहरें उठने लगीं। अत्यन्त विशाल शरीर का स्वामी घटोत्कच का मुख तांबे जैसा और आंखें रक्तवर्ण की थीं। पेट धंसा हुआ और सिर के बाल उठे हुए, काली-काली दाढ़ी-मूंछें, कान खूंटी जैसे ठोढ़ी बड़ी और मुंह का छेद कान तक फैला हुआ था। भौंहें बड़ी-बड़ी, नाक मोटी, शरीर का रंग काला, कण्ठ लाल और देह पर्वताकार थी। उसकी भुजाएं विशाल थीं और मस्तक का घेरा बहुत बड़ा था। कर्कश हुंकार करते हुए जब वह अपने राक्षस सैनिकों के साथ कौरव सेना पर टूट पड़ा, तो समस्त शत्रु सेना स्तब्ध रह गई। बकासुर का भ्राता अलायुध उसका पहला शिकार बना। भयभीत कौरव सेना “बचाओ-बचाओ” पुकारती हुई, जिधर मार्ग मिला उधर ही भागने लगी। पूरी युद्धभीमि में घटोत्कच और उसकी सेना ही विचरण कर रही थी। न पहचान पाने के कारण अमर्ष में भरे घटोत्कच ने साथ चल रही हमारी सेना को शत्रु सेना समझ संहार करना आरंभ कर दिया। बड़ी कठिनाई से अपनी सेना को हम उसके पीछे ले आए। समुद्र के ज्वार की तरह आगे बढ़ते हुए घटोत्कच दुर्योधन की ओर बढ़ा। वह अपने पिता के सबसे बड़े वैरी को ढूंढ़ रहा था। अबतक मूक दर्शक बने कर्ण को बीच में आना पड़ा। सभी सैनिक अवाक होकर, दोनों महारथियों का, मृत्यु को कंपा देनेवाला महासंग्राम सांस रोककर प्रेक्षकों की भांति देखने लगे।

घटोत्कच उस दिन प्रलयंकारी युद्ध कर रहा था। क्षण भर में आकाश तो क्षण भर में धरती पर। कभी विराट रूप धारण कर बाण वर्षा से सबको सम्मोहित कर देता, तो कभी अदृश्य रहकर मेघ की तरह गरजता हुआ प्रचण्ड पाषाण, भारी गदाएं और रथ के विशाल चक्र और मृत हाथियों के शव कर्ण और उसके सैनिकों पर बरसाता। अपने दिव्यास्त्रों के प्रयोग से कर्ण अपनी रक्षा करने में येन-केन-प्रकारेण सफल रहा। लेकिन अपनी सेना का संहार अपनी आंखों से देखना उसकी विवशता बन गई। असंख्य घावों को हंसते-हंसते झेलते हुए कर्ण तनिक भी विचलित नहीं हुआ। पर्वत की भांति अविचल रह अपने प्रहारों से उसने घटोत्कच के सारथि और घोड़ों को मारकर उसके रथ को चकनाचूर कर दिया। वह गोलाकार घूमते हुए बाणों के प्रपात बरसा रहा था। लेकिन घटोत्कच को वश में करना असंभव था। उसे रथ की भी आवश्यकता नहीं थी। वह अन्तर्धान हो गया। कर्ण लाचार था। उसे कहीं कुछ सूझ नहीं रहा था। लक्ष्य अदृश्य, बाण चलाए तो किस पर? उसे एक युक्ति समझ में आई। अपने सायकों के जाल से उसने संपूर्ण दिशाओं को आच्छादित कर दिया, आकाश में अंधेरा छा गया। अब कर्ण अपनी और सेना की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त दीख रहा था। लेकिन यह क्या? एक मुहूर्त्त बाद ही सारा आकाश लाल बादलों से प्रकाशित हो उठा। फिर जलती हुई आग की भयंकर लपटें सर्वत्र दिखाई देने लगीं। अचानक बिजली चमकी और उल्कापात होने लगा। आकाश जल-बूंदों के स्थान पर बाण, शक्ति, प्रास, मूसल, फरसा तलवार पट्टिश, तोमर, परिघ, गदा, शूल, शतघ्नियों की मूसलाधार वर्षा करने लगा। हजारों की संख्या में पत्थरों की बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरने लगीं, वज्रपात होने लगे। कर्ण ने अपने पास उपलब्ध सभी दिव्यास्त्रों के प्रयोग से उस अस्त्र-शस्त्र वर्षा को रोकने का अथक प्रयास किया, पए सफलता नहीं मिली। वज्रों की मार से हाथी धराशाई होने लगे, बाणों से आहत होकर घोड़े गिरने लगे और अन्य प्राणघातक अस्त्रों के अचूक प्रहार से बड़े-बड़े महारथियों का संहार होने लगा। सेना की चीत्कार से सारी युद्धभूमि गूंज उठी। सर्वत्र हाहाकर मच गया। किसी को भागने का मार्ग नहीं मिल रहा था। घटोत्कच क्षण भर के लिए पकट हो अट्टहास करता और फिर अन्तर्धान हो जाता। ऐसा लग रहा था कि युद्ध ब्राह्म मुहूर्त्त तक भी नहीं खिंच पाएगा। हताश दुर्योधन को अपना अंत अत्यन्त निकट दिखाई पड़ने लगा। बचे हुए सभी कौरव कर्ण के बाणों के साये में उसके पास पहुंचे। विकल दुर्योधन ने चिल्लाकर प्राण रक्षा की याचना की –

“अंगराज! इन्द्र द्वारा प्रदत्त अमोघ शक्ति का प्रयोग कर इस घटोत्कच का अन्त करो, अन्यथा कुरु सेना कल का सूरज नहीं देख पाएगी। समस्त भ्राताओं के साथ मेरे प्राण संकट में हैं। यह दुष्ट राक्षस कब का मेरे प्राण ले चुका होता लेकिन अपने पिता की प्रतिज्ञा को याद कर यह हमें सिर्फ पीड़ित कर रहा है। हमारे सारे महारथी एक-एक कर वीरगति को प्राप्त हो रहे हैं। अमोघ वैजन्ती छोड़ो कर्ण, शीघ्रता करो।”

नहीं दुर्योधन, मैं ऐसा नहीं कर सकता। यह अमोघ वैजन्ती शक्ति मैंने अर्जुन के वध के लिए सुरक्षित रखी है। इसे सिर्फ एकबार ही छोड़ा जा सकता है। अपना सर्वस्व इन्द्र को अर्पित करने के पश्चात यही एक अस्त्र मेरे पास बचा है जिसके बल पर मैं यह महासमर लड़ रहा हूं।” कर्ण ने दुर्योधन के प्रस्ताव पर अपनी सहमति नहीं दी।

“आज रात्रि-युद्ध के पश्चात तुम, मैं और हमारी सेना घटोत्कच के प्रलयंकारी प्रहारों से बच पाएगी, तब न तुम अर्जुन पर अमोघ शक्ति का प्रहार कर पाओगे। हमलोगों में से जो इस प्रलयंकारी संग्राम के बाद बच जाएगा, वह भीम, अर्जुन समेत सभी पाण्डवों से युद्ध करेगा। इस रात्रि-युद्ध में हम सभी अपने सैनिकों के साथ मारे जांय, इसके पूर्व अमोघ शक्ति का प्रयोग कर इस राक्षस का संहार करो। विलंब न करो राधेय। हमलोगों की रक्षा करो।” दुर्योधन ने लगभग याचना करते हुए कर्ण से गुहार की।

निशीथ की बेला थी। घटोत्कच कर्ण पर निरन्तर प्रहार कर रहा था। समस्त कौरव सेना पर आतंक छाया हुआ था। कौरव वेदना से कराह रहे थे। एक शक्ति कर्ण के वक्षस्थल से टकराई। क्षण भर के लिए उसकी चेतना ने भी उसका साथ छोड़ दिया। घटोत्कच के आघात कर्ण के लिए भी असहनीय हो रहे थे। विवश हो कर्ण ने वैजन्ती नाम वाली अमोघ शक्ति हाथ में ली। यह वही शक्ति थी जिसे न जाने कितने वर्षों से उसने मेरे वध के लिए सुरक्षित रखा था। वह नित्य उसकी पूजा किया करता था। आंखें मूंद उसने क्षण भर चिन्तन किया और मृत्यु की सगी बहन के समान लपलपाती हुई काल की जिह्वा सदृश उस अमोघ शक्ति को राक्षस राज घटोत्कच को लक्ष्य कर प्रक्षेपित कर ही दिया।

महाबली घटोत्कच चीत्कार करता हुआ पीठ के बल युद्ध्भूमि में गिर पड़ा। उसके प्राण पखेरू उड़ गए। विशाल वटवृक्ष गिरने से उसके नीचे जैसे असंख्य कीट-पतंग कुचलकर मर जाते हैं, वैसे ही उसके विशाल शरीर के नीचे कुचलकर बहुत से कौरव सैनिक गतप्राण हो गए।

अपने शत्रु को पराजित कर या वध कर कर्ण सदैव अपने दंभपूर्ण अट्टहास से अपनी विजय की घोषणा करता था। लेकिन आज वह मौन था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसका जीवन अक्षरशः रिक्त तूणीर जैसा हो गया हो। कौरव योद्धा हर्षनाद कर रहे थे, शंख, भेरी, ढोल और नगाड़े बजा रहे थे। कर्ण के पास आकर बधाई देने और प्रशंसा करने वालों की पंक्तियां लग गईं लेकिन वह चुपचाप सूनी आंखों से आकाश में टिमटिमाते तारों को देख रहा था। शीघ्र ही दुर्योधन के रथ में सवार हो अपने शिविर की ओर चल दिया। रात्रि-युद्ध रोक दिया गया। थकी सेना ने राहत की सांस ली।

अभिमन्यु की मृत्यु के एक दिवस पश्चात ही हमें घटोत्कच की मृत्यु के आघात को सहना पड़ा। हमारी आंखों से अश्रुवर्षा थमने का नाम नहीं ले रही थी। लेकिन दूर खड़े श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे।

क्रमशः

 

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