लेखक परिचय

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

प्रोफेसर जैन ने भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक, रोमानिया के बुकारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर तथा जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषा विज्ञान विभाग के लैक्चरर, रीडर, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा कला संकाय के डीन के पदों पर सन् 1964 से 2001 तक कार्य किया तथा हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार-विकास के क्षेत्रों में भारत एवं विश्व स्तर पर कार्य किया।

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dharmप्रोफेसर महावीर सरन जैन

टॉइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र में समाचार प्रकाशित हुआ है कि नरेंद्र मोदी ने “डॉटकॉम पोस्टर बॉय्ज़” राजेश जैन एवं बी. जी. महेश को यह दायित्व सौंपा है कि वे इंटरनेट पर ऐसा अभियान चलावें जिससे सन् 2014 के लोक सभा के होने वाले आम चुनावों में भाजपा को 275 सीटें मिल सकें। अभियान का एकमात्र उद्देश्य है कि नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधान मंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हो सके। वफादार राजेश जैन एवं बी. जी. महेश ने मिलकर इस अभियान को अंजाम देने के लिए कथ्य एवं कंप्यूटर की तकनीक दोनों के माहिर 100 विशेषज्ञों की टीम बनाई है। इस टीम के सदस्यों का एकमात्र कार्य इंटरनेट पर मोदी के पक्ष में वातावरण निर्मित करना तथा यदि कोई देश का नागरिक मोदी पर लगे धब्बों के बारे में टिप्पणी करता है तो उसके विरुद्ध अभद्र टिप्पणी करना तथा यह साबित करना है कि टिप्पणी करने वाले को तथ्यों की जानकारी नहीं है या वे तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है। “राजधर्म का पालन न होने” सम्बंधी अटल जी के कथन का संदर्भ आते ही टीम के कुछ सदस्य अति उत्साह में भाजपा के माननीय अटल जी को अज्ञानी (इग्नोरेंट) तक की उपाधि से विभूषित कर रहे हैं।

सम्प्रति, मेरा उद्देश्य टीम के सदस्यों के व्यवहार एवं आचरण पर टिप्पणी करना नहीं है। पिछले कुछ दिनों से टीम के सदस्यों के द्वारा अंग्रेजी के समाचार पत्रों एवं इंटरनेट पर “सेकुलर” शब्द तथा हिन्दी के समाचार पत्रों एवं इंटरनेट पर हिन्दी की साइटों पर “धर्म निरपेक्षता” शब्द का अवमूल्यन करने का प्रयास किया जा रहा है। इधर मैंने हिन्दी की एक लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका में एक विदूषी चिंतक का लेख पढ़ा जिसमें सेकुलर पर कुछ ऐसा ही टिप्पणी किया गया है। उस लेख में संदर्भित विचार की अभिव्यक्ति निम्न वाक्यों में हुई हैः

“— – –   “ रिलीजन” और “धर्म” के बीच बुनियादी अंतर को समझे-समझाए बिना न तो भक्ति और दर्शन की संकल्पना को अभिव्यक्त किया जा सकता है, न ही भारतीय साहित्य, संगीत तथा अन्य कलाओं को, न लोक जीवन को, और इन सबके बिना तो इतिहास बाहर की चीज ही रहेगा। “सेकुलर” और “कम्यूनल” जैसे शब्दों का अर्थ भी राजनैतिक पूर्वग्रह और विचारधाराओं की जकड़बंदी से मुक्त होकर ग्रहण करना होगा। – -”

इस लेख के उद्धृत अंशों को पढ़ने के बाद मुझे जनवरी, 2001 में भारत के प्रख्यात विधिवेत्ता, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के तत्कालीन अध्यक्ष एवं गहन चिंतक तथा साहित्य मनीषी श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी जी के साथ इसी विषय पर हुए वार्तालाप का स्मरण हो आया है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में 31 जनवरी, 2001 को आयोजित होने वाली “हिन्दी साहित्य उद्धरण कोश” विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन करने के लिए सिंघवी जी पधारे थे। संगोष्ठी के बाद घर पर भोजन करने के दौरान श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी ने मुझसे कहा कि सेक्यूलर शब्द का अनुवाद धर्मनिरपेक्ष उपयुक्त नहीं है। उनका तर्क था कि रिलीज़न और धर्म पर्याय नहीं हैं। धर्म का अर्थ है = धारण करना। जिसे धारण करना चाहिए, वह धर्म है। कोई भी व्यक्ति अथवा सरकार धर्मनिरपेक्ष किस प्रकार हो सकती है। इस कारण सेक्यूलर शब्द का अनुवाद धर्मसापेक्ष्य होना चाहिए। मैंने उनसे निवेदन किया कि शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से आपका तर्क सही है। इस दृष्टि से धर्म शब्द किसी विशेष धर्म का वाचक नहीं है। जिंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है। मगर संकालिक स्तर पर शब्द का अर्थ वह होता है जो उस युग में लोक उसका अर्थ ग्रहण करता है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से तेल का अर्थ तिलों का सार है मगर व्यवहार में आज सरसों का तेल, नारियल का तेल, मूँगफली का तेल, मिट्टी का तेल भी “तेल” होता है। कुशल का व्युत्पत्यर्थ है कुशा नामक घास को जंगल से ठीक प्रकार से उखाड़ लाने की कला। प्रवीण का व्युत्पत्यर्थ है वीणा नामक वाद्य को ठीक प्रकार से बजाने की कला। स्याही का व्युत्पत्यर्थ है जो काली हो। मैंने उनके समक्ष अनेक शब्दों के उदाहरण प्रस्तुत किए और अंततः उनके विचारार्थ यह निरूपण किया कि वर्तमान में जब हम हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, इसाई धर्म, सिख धर्म, पारसी धर्म आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इन प्रयोगों में प्रयुक्त “धर्म” शब्द रिलीज़न का ही पर्याय है। अब धर्मनिरपेक्ष से तात्पर्य सेक्यूलर से ही है। सेकुलर अथवा धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म विहीन होना नहीं है। इनका मतलब यह नहीं है कि देश का नागरिक अपने धर्म को छोड़ दे। इसका अर्थ है कि लोकतंत्रात्मक देश में हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का समान अधिकार है मगर शासन को धर्म के आधार पर भेदभाव करने का अधिकार नहीं है। शासन को किसी के धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसका अपवाद अल्पसंख्यक वर्ग होते हैं जिनके लिए सरकार विशेष सुविधाएँ तो प्रदान करती है मगर व्यक्ति विशेष के धर्म के आधार पर सरकार की नीति का निर्धारण नहीं होता। उन्होंने मेरी बात से अपनी सहमति व्यक्त की।

प्रत्येक लोकतंत्रात्मक देश में उस देश के अल्पसंख्यक वर्गों के लिए विशेष सुविधाएँ देने का प्रावधान होता है। अल्पसंख्यक वर्गों को विशेष सुविधाएँ देने का मतलब “तुष्टिकरण” नहीं होता। यह हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रदत्त “प्रावधान” है। ऐसे प्रावधान प्रत्येक लोकतांत्रिक देशों के संविधानों में होते हैं। उनके स्वरूपों, मात्राओं एवं सीमाओं में अंतर अवश्य होता है। भारत एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है। संविधान में स्पष्ट है कि भारत “सेकुलर” अथवा “धर्मनिरपेक्ष” लोकतांत्रिक गणराज्य है। जिस प्रकार “लोकतंत्र” संवैधानिक जीवन मूल्य है उसी प्रकार “धर्मनिरपेक्ष” संवैधानिक जीवन मूल्य है। एक बार भारत की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने देश पर आपात काल थोपकर लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत कदम उठाया था और उनको इसका परिणाम भुगतना पड़ा था। जो देश के सेकुलर अथवा  धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से छेड़छाड़ करने की कोशिश करेगा, उसको भी उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

स्वामी विवेकानन्द की डेढ़ सौवीं जयंती मनाई जा रही है। मैं देश के प्रबुद्धजनों से निवेदन करना चाहता हूँ कि वे केवल स्वामी विवेकानन्द के नाम का जाप ही न करें, उनके विचारों को आत्मसात करने की कोशिश करें। विवेकानन्द ने अपने सह-यात्री एवं सहगामी साथियों से कहा थाः “ हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि “दूसरों के धर्म के प्रति कभी द्वेष न करो”; इसके आगे बढ़कर हम सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उनको पूर्ण रूप से अंगीकार करते हैं”।

विवेकानन्द धार्मिक सामंजस्य एवं सद्भाव के प्रति सदैव सजग दिखाई देते हैं।विवेकानन्द ने बार-बार सभी धर्मों का आदर करने तथा मन की शुद्धि एवं निर्भय होकर प्राणी मात्र से प्रेम करने के रास्ते आगे बढ़ने का संदेश दिया।

पूरे विश्व में एक ही सत्ता है। एक ही शक्ति है। उस एक सत्ता, एक शक्ति को जब अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है तो व्यक्ति को विभिन्न धर्मों, पंथों, सम्प्रदायों, आचरण-पद्धतियों की प्रतीतियाँ होती हैं। अपने-अपने मत को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की विशिष्ट शैलियाँ विकसित हो जाती हैं। अलग-अलग मत अपनी विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग करने लगते हैं। अपने विशिष्ट ध्वज, विशिष्ट चिन्ह, विशिष्ट प्रतीक बना लेते हैं। इन्हीं कारणों से वे भिन्न-भिन्न नजर आने लगते हैं। विवेकानन्द ने तथाकथित भिन्न धर्मों के बीच अन्तर्निहित एकत्व को पहचाना तथा उसका प्रतिपादन किया। मनुष्य और मनुष्य की एकता ही नहीं अपितु जीव मात्र की एकता का प्रतिपादन किया।

काश, स्वामी विवेकानन्द का नाम जपने वाले विवेकानन्द का साहित्य भी पढ़ पाते तथा विवेकानन्द की मानवीय, उदार, समतामूलक दृष्टि को समझ पाते।

आज का युवा जागरूक है, सजग है। सब देख रहा है। उसे नारे नहीं चाहिए।  काम चाहिए। देश को अतीत की तरफ नहीं, भविष्य की तरफ देखना है। हमें अपने हाथों अपने देश का भविष्य बनाना है। यह आपस में लड़कर नहीं, मिलजुलकर काम करने से ही सम्भव है। यह भारत देश है। भारत में रहने वाले सभी प्रांतों, जातियों, धर्मों के लोगों का देश है। सबके मिलजुलकर रहना है, निर्माण के काम में एक दूसरे का हाथ बटाना है। समवेत शक्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता।

क्या हम ऐसे नेताओं की आरती उतारें जो वोट-बैंक की खातिर हमारे देश के समाज को समुदायों में बांटने का तथा उन समुदायों में नफरत फैलाने का घृणित काम करते  हैं। अलकायदा एवं भारत के विकास तथा प्रगति को अवरुद्ध करने वाली शक्तियाँ तो चाहती ही यह हैं कि भारत के लोग आपस में लड़ मरें। भारत के समाज के विभिन्न वर्गों में द्वेष-भावना फैल जाए। देश में अराजकता व्याप्त हो जाए। देश की आर्थिक प्रगति के रथ के पहिए अवरुद्ध हो जायें। मेरा सवाल है कि जो नेता अपनी पार्टी के वोट बैंक को मज़बूत बनाने की खातिर देश को तोड़ने का काम करते हैं,  वे क्या भारत-विरोधी शक्तियों के लक्ष्य की सिद्धि में सहायक नहीं हो रहे हैं।

देश को कमजोर करने तथा समाज की समरसता को तोड़ने वाले नेताओं का आचरण वास्तव में लोकतंत्र का गला घोटना है। नेताओं को यह समझना चाहिए कि दल से बडा देश है, देश की एकता है, लोगों की एकजुटता है। लोकतंत्र में प्रजा नेताओं की दास नहीं है। नेता जनता के लिए हैं, जनता के कल्याण के लिए हैं। वे जनता के स्वामी नहीं हैं; वे उसके प्रतिनिधि हैं।यह तो पढ़ा था कि राजनीति के मूल्य तात्कालिक होते हैं। उत्तराखण्ड की विनाश-लीला में भी जिस प्रकार की घिनोनी राजनीति हो रही है, उससे यह संदेश जा रहा है कि  राजनीति मूल्यविहीन हो गई है। लगता है कि नेताओं के लिए देश की कोई चिंता नहीं है,  उन्हें चिंता है तो बस किसी प्रकार सत्ता मिल जाए। मैं केवल दो बात कहना चाहता हूँ। जनता को सत्ता लोलुप लोगों को वोट नहीं देना चाहिए। दूसरी बात यह कि परम परमात्मा इन नेताओं को सद् बुद्धि प्रदान करे कि वे आत्मसात कर सकें कि दल से बड़ा देश होता है।

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63 Comments on "“सेकुलर” अर्थात् धर्मनिरपेक्षता: राक्षसी भावना अथवा संवैधानिक मूल्य"

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इंसान
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अंगेजी भाषा के समाचार पत्र, टाइम्ज़ ऑफ इंडिया, से लताड़े जाने के पश्चात हिंदी भाषियों से सहानुभूति की अपेक्षा में आप प्रवक्ता.कॉम पर व्यर्थ ही “बूंदी का किला”, मेरा मतलब, मोदी का किला बना उसे भेदने चले हैं| पाठकों की टिप्पणियों पर आपकी लम्बी चौड़ी अप्रासंगिक कट एंड पेस्ट प्रतिक्रियाएं अब दूभर और अहसहनीय होती जा रही है| इस से पहले कि आप मन का संतुलन पूर्णतया खो बैठें, आप श्री नरेन्द्र मोदी विरोधी अभियान के सभी लेखकों से कहें कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली क्योंकि भारत की प्रबुद्ध जनता अब जान गई है कि वास्तविक शत्रु कौन… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain

आप का वास्तविक नाम क्या है- यह ज्ञात नहीं है। टॉइम्स ऑफ इंडिया में भी छद्म नामों से प्रहार किए गए थे। आपके टिप्पणों से यह स्पष्ट है कि आप भी उन लोगों की तरह मोदी के अंध भक्त हैं। अतिवादी एवं दुराग्रही व्यक्ति विचार बिंदु सामने नहीं रखता। दूसरे पर नीचे स्तर पर उतर कर प्रहार करने लगता है। ऐसा तभी होता है जब वह मतांध हो जाता है। ऐसे मतांध व्यक्ति से विचार-विमर्श की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

insaan
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मुझे जिसका भय था मैं आपकी वैसी दशा देख रहा हूँ| आप बौखला गए हैं| मेरा वास्तविक नाम पूछे बिना आपने मुझे अतिवादी और दुराग्रही शब्दों से अलंकृत किया है| मेरे गाँव में एक छोटी बच्ची हुआ करती थी| स्वयं द्वार पर दस्तक दे पूछती थी “कौन?” अब कौन अतिवादी और कौन दुराग्रही है, यह तो कोई तीसरा व्यक्ति ही बता पायेगा| देखता हूँ कि यहाँ लगभग सभी पाठक गण आपके विचार बिंदु पर अपनी टिप्पणियों द्वारा आपको यथार्थ अवस्था से अवगत करवा रहे हैं| आप सर्वसम्मति में कोई विश्वास नहीं रखते| कह दीजिए सभी अतिवादी और दुराग्रही व्यक्ति हैं|… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain

जिस प्रकार कभी कांग्रेस में कुछ लोगों ने “इंदिरा इज़ इंडिया” का नारा लगाकर व्यक्ति पूजा की परम्परा डाली थी और लोकतंत्रात्मक दर्शन में विश्वास करने वाले लोगों ने उसकी आलोचना की थी, उसी प्रकार अब मोदी को देश के विकास के लिए एक मात्र विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा है। यह भारत के करोड़ों प्रतिभावान लोगों का अपमान है।

इंसान
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राष्ट्रवादी श्री नरेन्द्र मोदी विरोधी निबंध श्रृंखला में धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते प्रवक्ता.कॉम पर प्रस्तुत निर्मल रानी के लेख, धर्मनिरपेक्षता में ही निहित है देश का विकास, पर मेरी निम्नलिखित प्रतिक्रया आपके लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ| श्री प्रभु जी आपको मन की शान्ति व सद्बुद्धि दें| “तथाकथित स्वतंत्रता के समय से मेरी पीढ़ी “पंचपरमेश्वर” जैसी लघुकथाओं द्वारा धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ उसका अनुसरण करती रही है| आज छियासठ वर्षों पश्चात इस पाठ की क्योंकर आवश्यकता पड़ रही है? देश विभाजन के पश्चात हिन्दू सांप्रदायिकतावाद नव भारतीय समाज का आधार होना चाहिए था| यह हिन्दू धर्म है जो अनादिकाल से… Read more »
इंसान
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धर्मनिरपेक्षता की आड़ में लिखा प्रस्तुत लेख श्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा प्रहार है| मुझे खेद है कि देश में हिंदी भाषा और हिन्दुओं की वर्तमान दयनीय दशा देखते हुए लेखक न तो हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार-विकास में कोई कार्यकारी योगदान दे पाया है और न ही इस लेख को हिंदी भाषा में लिखते एक अच्छे भारतीय नागरिक की मर्यादा का पालन कर पाया है| पाठकों से मेरा अनुरोध है कि वे अपना कीमती समय व्यर्थ के वाद-विवाद में न लगा श्री मोदी को अपना समर्थन दें ताकि वे सत्ता में आ धर्म, जाति, एवं सभी भेद भावों से ऊपर… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
मैं भारत की जनता से अपील करता हूँ कि आगामी चुनाव में ईमानदार, राष्ट्र के विकास एवं प्रगति के लिए समर्पित एवं भारतीय समाज की एकजुटता में विश्वास करने वाले प्रत्याशियों को वोट प्रदान करें। साम्प्रदायिक ताकतें भारतीय समाज में नफरत फैलाने का काम कर रहीं हैं। अलकायदा जैसी आतंकवादी एवं भारत की प्रगति एवं विकास की विरोधी ताकतें तो चाहती ही यह हैं कि भारतीय समाज की एकजुटता खंडित हो जाए। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता। जो लोग हिन्दू आतंकवादी अथवा मुसलमान आतंकवादी जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं वे जाने अनजाने भारत विरोधी ताकतों के हाथ मजबूत… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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आप कहते हैं, कि,===>”मैं भारत की जनता से अपील करता हूँ कि आगामी चुनाव में ईमानदार, राष्ट्र के विकास एवं प्रगति के लिए समर्पित एवं भारतीय समाज की एकजुटता में विश्वास करने वाले प्रत्याशियों को वोट प्रदान करें।”
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====>मेरे मत में, ऐसी प्रधान मंत्री पदके लिए सर्वथा योग्य एक ही व्यक्ति है। नरेंद्र मोदी। और कोई हो, तो बताने की कृपा करें।
मात्र, विरोध ना करें। पर्याय सुझाएं।

इंसान
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महावीर भाई, आपके मूंह में घी शक्कर! यदि हम मोदी अथवा केजरीवाल नहीं बन पाते हैं, अवश्य ही हम अनुयायी की मर्यादा में रह बिना किसी भय अथवा संशय के संगठित हो उन्हें अपना समर्थन कयों नहीं देते? यदि भारतीय जनसमूह में सांप्रदायिक मनोवृति के अल्पसंख्यक नागरिक हैं तो उन्हें कुशल कानून और उनके उचित प्रवर्तन द्वारा सुधारा जा सकता है| वर्तमान शासकीय व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय समाज को विभाजित कर राष्ट्रद्रोही तत्व सत्ता में पूर्ण रूप से स्थापित, समाज और देश को खोखला किये जा रहे हैं| भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अंतर्गत फिरंगी के लिए “भारत… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain

आपसे निवेदन है कि आप मेरे आलेख को दुबारा पढ़ने की कृपा करें। श्री लक्ष्मी मल्ल सिंघवी के साथ विचार विमर्श में इस मुद्दे पर बात को विस्तारपूर्वक विवेचित किया जा चुका है। इसे आत्मसात करने का प्रयास करें। हमारे यहाँ धर्म शब्द का प्रयोग होता था। उसके पूर्व कोई विशेषण नहीं जोड़ा जाता था। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गीता, वेदांत, साख्य, योग, वैशेषिक, न्याय ग्रंथों का पहले अध्ययन करें। तब शायद आपको मेरी बात समझ में आ जाएगी।

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain

भारत में धर्म के पहले कभी भी कोई विशेषण नहीं जुड़ता था। विशेषण जुड़ने से धर्म भेदक हो जाता है। सम्प्रदाय हो जाता है। पंथ हो जाता है।

इंसान
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मैंने आपका लेख पढ़ा है और लेख और उस पर पाठकों की टिप्पणियों पर आपकी प्रतिक्रिया में आपके उद्देश्य को भी प्रतक्ष्य देखा समझा है| आज उपभोक्तावाद और वैश्विकता के युग में “धर्म” शब्द के पूर्व विश्लेषण जोड़ना अति आवश्यक हो गया है| आपकी भावभीनी भावना “आगामी चुनाव में ईमानदार, राष्ट्र के विकास एवं प्रगति के लिए समर्पित एवं भारतीय समाज की एकजुटता में विश्वास करने वाले प्रत्याशियों को वोट प्रदान करें” के साथ अपने समझौते में पूर्णतया संतुष्ट इस वाद-विवाद को अब विश्राम देता हूँ| वन्दे मातरम्|

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
मैंने आपके मोदी की वकालत के बारे में पढ़ा। आप यदि पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं तो मेरा टिप्पण करने का कोई मूल्य नहीं है। मैंने हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लिए कोई योगदान दिया है अथवा नहीं दिया – इसका प्रस्तुत लेख से कोई सम्बंध नहीं है। टिप्पणकार को लेख में व्यक्त विचार के बारे में लिखना चाहिए। लेख के लेखक की निन्दा करने का टिप्पणकार को अधिकार है या वह टिप्पणकार की नैतिक मर्यादा का अंग है या नहीं है – इस पर तटस्थ विचारक विचार करें – ऐसी मेरी कामना है। बहस विचार पर होनी चाहिए, किसी… Read more »
शैलेन्‍द्र कुमार
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श्रीमान या तो जनता अज्ञानी है और आसानी से झासों में आ जाती है और आप समझदार है जो इस तरह की तिकड़मों को दूर से ही समझ जाते है, तो कृपया राष्ट्र का मार्गदर्शन करें की क्या वो यूपीए-३ को चुने अथवा किसी अन्य राजनितिक दल अथवा नेतृत्व को
किसी की व्यक्ति के व्यक्तित्व, नीति अथवा नियत की आलोचना आसान है लेकिन विकल्प सुझाना उतना आसान नहीं होता, तो आपसे अपेक्षा करता हूँ की आप जरूर कोई बेहतर विकल्प सुझायेंगे जो आलोचना से परे होगा

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
आज के राजनैतिक फलक पर जब मैं विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि प्रत्येक राजनैतिक दल में ईमानदार एवं बेइमान दोनों तरह के लोग शामिल हैं। जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले हम यह प्रण करें कि अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव में जितने प्रत्याशी मैदान में हों हम उनमें जो सबसे ईमानदार प्रत्याशी हो अथवा उनमें जो सबसे कम बेइमान हो उसको अपना मत प्रदान करें। हमारे देश में अमेरिका की तरह की प्रणाली नहीं है। हनारे यहाँ संसदीय प्रणाली है जहाँ निर्वाचित लोक सभा के सदस्यों का जिसको बहुमत प्राप्त होता है वह प्रधान… Read more »
RTyagi
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श्रीमान, आपकी हिंदी बहुत अच्छी है. और लगता है .. की आप उस पर आत्ममुग्ध हो वही लेख के अंश हर किसी जवाब में पेस्ट कर रहे हैं…आपकी जवाब कतई भी तथ्यपरक नहीं हैं… बस उपदेशों से भरे हैं…. जो की आज के समाज में बिल्कुल भी सामंजस्य नहीं बनाते| एक भाई तो थप्पड़ मारता रहता है.. और यह उसकी प्रवत्ति में शामिल है.. उसे सिखाया ही ऐसा गया है.. और आप दूसरे भाई से अपने उपदेश में कह रहे हैं… “ऐसा नहीं करते, भाईचारा करते हैं, मिल कर रहते हैं, समाज को और भाईचारे को ख़तम किया जा रहा… Read more »
शैलेन्‍द्र कुमार
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आपके मतानुसार हमें संविधान संशोधन करके दलीय लोकतंत्र को ख़त्म करना होगा, सो आप ऐसा उपाय बता रहे जो अभी होना संभव नहीं, मेरे सवाल को टाल गए की क्या यूपीए-३ को चुना जाये

इंसान
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मैंने कहा था कि आप हिंदी पढ़ते पढ़ाते श्री नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीति में तो उतर आये हैं किन्तु आपको यह भी समझना होगा कि श्री नरेन्द्र मोदी किस वस्तु के विकल्प के रूप में लोकप्रिय हैं|

इंसान
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यदि आप हिंदी पढ़ते पढ़ाते श्री नरेन्द्र मोदी विरोधी राजनीति में कूद पड़ें हैं तो मुझे कोई अचम्भा नहीं है| नमक का मोल चुकाते हैं अन्यथा तथाकथित स्वतन्त्र भारत में हिंदी भाषा की दुर्गति पर भी कोई टिपण्णी की होती| जिस अपावन व्यवस्था में आप का भविष्य “उज्जवल” रहा है उसी परिधि से ऊपर उठ प्रोफेसर योगेद्र यादव ने नए इतिहास की रचना की है! श्री नरेन्द्र मोदी इस इतिहास की अनुपम कड़ी हैं| स्वयं मेरे लिए तो यह गर्वित इतिहास है लेकिन यह इतिहास आपको कभी क्षमा नहीं करेगा|

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
Guest
Prof. Mahavir saran Jain

हमारे समाज का ताना बाना मेल मिलाप का है, भाइचारे का है। वोट पाने के लिए जो भी हमारे समाज मे जहर घोलने का काम करता है वह देश के विकास एवं प्रगति का शत्रु है और अल कायदा जैसी नापाक ताकतों का सहायक है।

इंसान
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राष्ट्रवादी श्री नरेन्द्र मोदी विरोधी निबंध श्रृंखला में धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते प्रवक्ता.कॉम पर प्रस्तुत निर्मल रानी के लेख, धर्मनिरपेक्षता में ही निहित है देश का विकास, पर मेरी निम्नलिखित प्रतिक्रया आपके लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ| प्रभु आपको सद्बुद्धि दें| “तथाकथित स्वतंत्रता के समय से मेरी पीढ़ी “पंचपरमेश्वर” जैसी लघुकथाओं द्वारा धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ उसका अनुसरण करती रही है| आज छियासठ वर्षों पश्चात इस पाठ की क्योंकर आवश्यकता पड़ रही है? देश विभाजन के पश्चात हिन्दू सांप्रदायिकतावाद नव भारतीय समाज का आधार होना चाहिए था| यह हिन्दू धर्म है जो अनादिकाल से अल्पसंख्यक से मत भेद होते हुए… Read more »
Gyan
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मूल में जाइये ‘ केवल चिकनी बातों से विद्वता मत दिखाइए . जेहादियों का सफाया ही एक मात्र शांति की स्थापना है , हाल में नरोबी और पाकिस्तान के चर्च के हमले से स्पस्ट है . जो मुस्लिम बने ही समाज को नस्ट करने के लिए हैं उनके लिए सहनुभूति रखने से क्या समयस्य का समाधान हो जायेगा. बचपन की सीख और शिछा जीवन भर मनुष्य को नहीं भूलती. मदरसों में दो बाते बचपन में शिखा दी जाती हैं . मुहम्मद को काफिरों ने यातनाएं दे दे कर मारा था, और काफ़िर तुम्हारे दुश्मन हैं इनको मरना या मुस्लिम बनाना… Read more »
RKTyagi
Guest
एक ही बात… “परस्पर सहयोग, प्रेम, सहिष्णुता हमारी जीवन पद्धति की आधार भित्ति है।” ये.. क्या फखत हिंदुयों के लिए है? और धर्मों का कोई दायित्व नहीं है… ?? कहाँ है सहिष्णुता व हिंदू धर्म के लिए सम्मान… ?? … सिर्फ अहंकार और नीचा दिखाने की कोशिश होती है.. आप कितने हिंदू लड़कों को जानते हैं जिन्होंने मुस्लिम लड़कियों से शादी की ?… और हम देखते है की लव जेहाद के अनुसार हिंदू लड़कियों को बरगला कर मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किया जाता है… येही है प्रेम का स्वरुप?? क्या आप तैयार हैं तो जैन धर्म को भी एक दिन… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
धर्म की आड़ में अपने स्वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलाल अथवा ठेकेदार अध्यात्म सत्य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास करते हैं । इन्हीं के कारण चित्त की आन्तरिक शुचिता का स्थान बाह्याचार ले लेते हैं । पाखंड बढ़ने लगता है । कदाचार का पोषण होने लगता है । जब धर्म का यथार्थ अमृत तत्व सोने के पात्र में कैद हो जाता है तब शताब्दी में एकाध साधक होते हैं जो धर्म-क्रान्ति करते हैं। धर्म के क्षेत्र में व्याप्त अधार्मिकता एवं साम्प्रदायिकता का प्रहार कर, उसके यथार्थ स्वरूप का उद्घाटन करते हैं । इस परम्परा… Read more »
RKTyagi
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Due to mishandling of text converter the Hindi was not typed appropriately… Here is the corrected version: माननीय, मैंने न तो इतनी पुस्तके लिखी हैं और आपकी भांति मैं योग्य भी नहीं.. .. इसलिए आपकी सोच पर प्रश्न चिन्ह लगाने की गलती नहीं कर सकता….. परन्तु सर आप क्या कहना चाहते हैं… वो कतई भी साफ़ नहीं है… यह भाषा दोष है, उलझे विचार या मेरा अज्ञान इसे भी मैं समझ नहीं पा रहा हूँ … पर मेरे अनुसार (जो की आपके विचारों को प्रभावित करने के लिए नहीं)अनेकों पुस्तकों-लेखों का प्रकाशन आदमी की मानसकिता का आईना हो या उसकी… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
साम्प्रदायिक ताकतें भारतीय समाज में नफरत फैलाने का काम कर रहीं हैं। अलकायदा जैसी आतंकवादी एवं भारत की प्रगति एवं विकास की विरोधी ताकतें तो चाहती ही यह हैं कि भारतीय समाज की एकजुटता खंडित हो जाए। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता। जो लोग हिन्दू आतंकवादी अथवा मुसलमान आतंकवादी जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं वे जाने अनजाने भारत विरोधी ताकतों के हाथ मजबूत कर रहे हैं।आतंक एवं धर्म अथवा दहशतगर्द एवं मजहब परस्पर एकदम विपरीतार्थक हैं। धर्म अहिंसा, उदारता, सहिष्णुरता, उपकारिता एवं परहित के लिए त्याग सिखाता है जबकि आतंकवाद हिंस्रता,उग्रता एवं कट्‌टरता, नृशंसता, क्रूरता एवं गैर लोगों… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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सही कहा!
धर्मनिरपेक्षता हिंदु, जैन, बौद्ध इ. की ही देन है।
पाकीस्तान में, या बंगलादेश में कितनें धर्म-निरपेक्ष हैं?

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
साम्प्रदायिक ताकतें भारतीय समाज में नफरत फैलाने का काम कर रहीं हैं। अलकायदा जैसी आतंकवादी एवं भारत की प्रगति एवं विकास की विरोधी ताकतें तो चाहती ही यह हैं कि भारतीय समाज की एकजुटता खंडित हो जाए। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता। जो लोग हिन्दू आतंकवादी अथवा मुसलमान आतंकवादी जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं वे जाने अनजाने भारत विरोधी ताकतों के हाथ मजबूत कर रहे हैं।आतंक एवं धर्म अथवा दहशतगर्द एवं मजहब परस्पर एकदम विपरीतार्थक हैं। धर्म अहिंसा, उदारता, सहिष्णुरता, उपकारिता एवं परहित के लिए त्याग सिखाता है जबकि आतंकवाद हिंस्रता,उग्रता एवं कट्‌टरता, नृशंसता, क्रूरता एवं गैर लोगों… Read more »
इंसान
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आप सनातन परिस्थिति की ओर संकेत करते हैं लेकिन लेखक का सविराम इतिहास तो केवल फिरंगी और उसके उपरान्त फिरंगी द्वारा १८८५ में ऊपजी भारतीय राष्ट्रीय कांगेस तक ही सीमित है| जब कभी लेखक को स्वयं अपने व “डॉटकॉम पोस्टर बोय्ज़” राजेश जैन एवं बी.जी. महेश के बीच समानता समझ आ जायेगी तो भद्र दिखने वाले इस हिपोक्रिटिक लेखक को कबीर का दोहा, “बुरा जो देखण मैं चला, बुरा ना मिलया कोए; जो मन खोजा आपणा तो मुझसे बुरा ना कोए” याद हो आएगा और लेखक को कभी चाय बेचने एवं स्कूल की टीचरी करने वाले और इतालवी वेट्रस में… Read more »
RKTyagi
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न तो इतनी पुस्तके लिखी हैं और आपकी भांति योग्य भी नहीं.. .. इसलिए आपकी सोच पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाने की गलती सकता….. परन्तु सर आप क्या कहना चाहते हैं… वो कतई भी साफ़ नहीं है… यह भाषा दोष है, उलझे विचार या मेरा अज्ञान इसे भी समझ नहीं पा रहा हूँ … पर मेरे अनुसार (जो की आपके विचारों को प्रभावित करने के लिए नहीं) पुस्तकों-लेखों का प्रकाशन आदमी की मानसकिता का आईना हो या उसकी कथनी और करनी में अंतर को साबित न करता हो ऐसा भी नहीं.. दिल मिलाने से पहले, हाथ मिलाने के लिए दो… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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Prof. Mahavir saran Jain
भारत आज विश्व की उभरती हुई ताकत है। हमें भारतीय समाज की एकता को मजबूत करना होगा। तभी हम और आगे बढ़ सकते हैं और हमारे नेताओं ने भारत के सम्बंध में जो स्वप्न देखे थे उनको पूरा कर सकते हैं। इसके लिए देश में साम्प्रदायिकता का जहर घोलने वालों को जड़ से उखाड़ फेंकना जरूरी है। अल कायदा जैसी ताकतें तो चाहती हीं यह हैं कि हमारी एकता कमज़ोर हो जाए। हमें उनके मन्सूबों को और इरादों को ध्वस्त करना है। आशा है, आप मेरी सोच एवं विचारों को बोधगम्य कर सकेंगे। मैंने सीधी सादी भाषा में अपनी बात… Read more »
शैलेन्‍द्र कुमार
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“कीचड़ को कीचड़ से साफ नहीं किया जा सकता। हमारे समाज का ताना बाना मेल मिलाप का है, भाइचारे का है। ” कृपया मार्गदर्शन करें की गीता का उपदेश क्या था, क्यों श्रीकृष्ण ने दो भाइयों को आपस में लड़ाया अगर दुर्योधन का चरित्र अच्छा नहीं था तो युधिष्ठिर कौन से दूध के धुले थे, जो व्यक्ति जुआड़ी था यहाँ तक की सभी भाई मिलकर जुए में अपनी पत्नी तक को हार गए ऐसे लोगो का साथ देने का क्या औचित्य था कृपया भाईचारे की व्याख्या तय कीजिये जिन मुसलमानों ने देश को बाँट दिया और न केवल देश को… Read more »
DR.S.H.SHARMA
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The word secular has a different meaning in India by Indian politicians and it means anti Hindu if you care to study the developments since independence under Nehru and the Nehru-Gandhi dynasty. They have used, abused, misused to humiliate and degrade Hinduism and Hindus and whatever related to Hindus. The ghost of secularism was introduced in Indian constitution in 1976 by Mrs. Indira Priyadashani Nehru- Gandhi -Khan to destroy the roots of Hindus and this is being shamelessly defended by so called secularists- pseudo seculars who do not know the meaning of the word secularism. Secularism is destroying India and… Read more »
RTyagi
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YOU SAID IT RIGHT SIR…. ONE CANT LEAVE ITS NATURAL BEHAVIOR, LIKE ISLAM HAS TO RULE OTHERS. BUT THESE PSEUDO SECULAR ARE DESTROYING THEIR ROOTS. WISE PEOPLE TAKE LESSEN FROM THE PAST BUT SOME ARE BORN TO REPEAT IT AGAIN AND AGAIN, AND GET THEIR DIGNITY DOWN SHAMELESSLY.

THESE ARE NOT READY TO TAKE LESSON FROM THE PAST OR HISTORY.

ALL SHOULD PEEK INTO THE INSIDE STORY OF INDIRA, NEHRU FAMILY. NO ONE SHOULD RELATE THEM GANDHI THEN…

Gyan
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थैंक्स फॉर सच थाट्स . ग्रेट सर .

प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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दुराग्रह का कोई उत्तर देना समय एवं श्रम का अपव्यय है। इस सम्बंध में मेरे अतिरिक्त श्री आर. सिंह अपने दिनांक १५ जुलाई के टिप्पण में तथा मेरे मित्र एयर वाइस मॉर्शल (सेवानिवृत्त) विश्व मोहन तिवारी विस्तार से इस विषय पर विचार व्यक्त कर चुके हैं। यदि कोई यह कहता है कि धर्मनिरपेक्षता संवैधानिक मूल्य नहीं है तो कहावत है कि अज्ञान में आनन्द है। फिर तो कोई बहस हो ही नहीं सकती। भारत देश की महानता यह है कि यह विविध धर्मों, भाषाओं, जातियों, संस्कृतियों का देश है। इसको आत्मसात करें।

इंसान
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विश्व मोहन तिवारी जी व आर सिंह जी द्वारा धर्मनिरपेक्षता पर प्रस्तुत टिप्पणियों में संतुलित व निष्पक्ष दृष्टिकोण की ओर ध्यान बंटा लेखक यहाँ बड़ी धूर्तता से अपने लेख में श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रति संशय व भ्रम को फैलाने के घिनौने उद्देश्य से अपने हाथ धोते दिखाई देता है|

Vishwa Mohan Tiwari
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1. “जिस प्रकार “लोकतंत्र” संवैधानिक जीवन मूल्य है उसी प्रकार “धर्मनिरपेक्ष” संवैधानिक जीवन मूल्य है।” 2. “मैं केवल दो बात कहना चाहता हूँ। जनता को सत्ता लोलुप लोगों को वोट नहीं देना चाहिए। दूसरी बात यह कि परम परमात्मा इन नेताओं को सद् बुद्धि प्रदान करे कि वे आत्मसात कर सकें कि दल से बड़ा देश होता है।” डा. जैन के उपरोक्त दो कथनों से तो शायद ही कोई असहमत हो।मैं तो पूर्ण सहमत हूं। उनके इन कथनों को सिद्ध करने की शैली या उदाहरणों से असहमति हो सकती है। जब वे यही दो बातें कहना चाहते हैं तब इन… Read more »
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
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महावीर सरन जैन
सम्मान्य विश्व मोहन तिवारी जी मैं आपका आभारी हूँ जो आपने मेरी मूल स्थापनाओं के प्रति अपनी सहमति प्रकट की। मैं किसी सरकार या किसी राजनैतिक दल का न तो प्रवक्ता हूँ और न सदस्य। मैंने टॉइम्स ऑफ इंडिया में विगत दिनों अंग्रेजी में एक टिप्पण किया था जिसका भाव केवल यह था कि मैं नरेंद्र मोदी के बारे में कोई टिप्पण नहीं करना चाहता। मेरे इस टिप्पण पर मोदी की डिजीटल पेड टीम के लगभग ४० सदस्यों ने तोबड़तोड़ हमले किए तथा अमर्यादित एवं अभद्र टिप्पणियाँ कीं। मेरे लेख में इस बात की प्रतिक्रिया थी कि टीम के सदस्यों… Read more »
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