लेखक परिचय

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार

स्वतंत्र लेखक, कहानीकार व् टिप्पणीकार

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prosअश्वनी कुमार

दिल्ली का चांदनी चौक रोज की तरह आज भी कुछ सनसनीखेज करने के चाह अपने अंतस में छिपाए अनिल कुमार निकल बड़े अपने दफ्तर की राह पर… दफ्तर उनके घर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर था. तो रोजाना पैदल ही वहां तक का सफ़र तय किया करते थे. इसी दौरान अपने पत्रकारों वाले दिमाग से दुनिया को देखते चलते थे. उसे आत्मसात किया करते थे. देखा करते थे क्या हो रहा है. इसी दौरान उन्हें समाचार पत्र को चाट लेने का भी शोक था, चाहते थे कि दफ्तर तक पहुँचते पहुँचते मुझे लगभग हर खबर की जानकारी होनी चाहिए. सम्पादक साहब ने कुछ पूछा तो क्या कहेंगे… इसके अलावा उन्हें बड़ा पसंद था समाचार पत्र का अध्ययन. लगता है न जैसे किसी 50 की उम्र पर कर चुके व्यक्ति की बात हो रही है. नहीं यार अनिल जी केवल 26 साल के हैं अभी परन्तु अपनी गहनता और विवेकीपन के कारण हम उन्हें उनकी उम्र से चार गुना आंका करते थे. दफ्तर पहुंचे और सीधा गए अपने सम्पादक महोदय के पास…

 

सर नमस्कार… अनिल जी ने अपने संपादक के पास जाकर कहा.

 

नमस्कार कुमार साहब कैसे हैं…?

 

सुनने में आया है कि काफी कुछ लिख दिया है आपने व्यवस्था को लेकर, चाहते क्या हो बरखुरदार…? संपादक महोदय ने अपने ही हंसमुख अंदाज़ में अनिल से पूछा.

 

सर मैं नहीं देख पाता हूँ किसी के साथ बुरा होते, किसी को किसी से झगड़ते, मार काट करते, अपने दुखों के साथ रोते बिलखते… अनिल ने जवाब दिया.

 

ये तो हर जगह हो रहा है भाई… फिर व्यवस्था से क्या चाहते हो…?

 

सर आप तो सब जानते हैं फिर भी मुझे इस तरह का सवाल कर रहे हैं. अनिल ने फिर जवाब देते हुए कहा.

 

जानता हूँ दोष प्रशासन का है पर नहीं बदल सकते हूँ. माना हम हमारे देश का चौथा महत्त्वपूर्ण अंग हैं. पर आज हमारा भी बाजारीकरण हो गया है. जानते नहीं हो क्या…? संपादक महोदय ने कहा.

 

हाँ सर जानता हूँ. आज हर खबर के पैसे लगते हैं. हर खबर बिकाऊ बन गई है. होता कुछ है दिखाया कुछ जाता है. अनिल ने फिर जवाब दिया.

 

तुम्हारे लिए एक बुरी खबर है… संपादक ने इतना कहते हुए अपने आप को रोका.

 

क्या… क्या सर बताइए न सर अब तो आदत हो गई है. अनिल ने बेखोफ़ी से उनसे उत्तर माँगा.

 

जिस मुद्दे को लेकर कल की रिपोर्ट थी तुम्हारी उसे लेकर हमारे मालिक के पास चले गए वह महाशय… मुझे सख्त तौर पर कहा गया है कि तुम्हें इस तरह की बीट पर कम न करने दिया. संपादक महोदय ने अनिल से कहा.

 

ठीक है सर मैं चलता हूँ. इतना कहते हुए अनिल पीछे मुड़ा ही था कि उसे उसके संपादक की आवाज़ आई.

 

रुको यार कुमार साहब आप तो जल्दी ही सेंटी हो जाते हैं. इतना सच और अच्छा लिखते हैं. उसे छोड़कर चले जायेंगे…? संपादक महोदय ने अनिल से एक सवाल करते हुए ये पूछा.

 

नहीं सर जाना नहीं चाहता हूँ पर करू भी तो क्या कई संस्थान बदल चूका हूँ इसी चक्कर में. अनिल ने जवाब दिया.

 

ये नहीं बदलना पड़ेगा जब तक मैं हूँ… संपादक महोदय ने अनिल से कहा. मेरे जाने के बाद बदल देना.

 

अब एक काम करो…

 

क्या सर…? अनिल ने कहा…

 

आज तुम्हें एक ऐसी जगह भेजना चाहता हूँ. जहां शायद तुम कई बार जा चुके होंगे. पर आज एक सवाल लेकर वहां जाओ और वहां की महिलाओं से बात करके एक लेख मुझे दो… संपादक महोदय ने अनिल से अपना समझकर ये काम करने को कहा…

 

क्या सवाल सर और जाना कहाँ है…? अनिल ने उनसे पलटकर पूछा.

 

हमारे देश के कई रेड लाइट इलाकों में जाना है तुम्हें और वहां की यौन कर्मियों से उनकी आप बीती को अपने शब्दों में मुझे देना है.

 

ये तो ठीक है सर पर सवाल क्या है जिसका जिक्र आपने अभी किया. अनिल ने उस सवाल को जानने की इच्छा जताई.

 

सवाल है, क्या एक यौन कर्मी का बलात्कार हो सकता है? और क्या उसके खिलाफ कोई कारवाई होगी? संपादक महोदय में अनिल से कहा.

 

क्या…??? अनिल का पहला रिएक्शन यही था.

 

क्या कह रहे हैं सर, ये कैसा सवाल है… अनिल ने सवाल करते हुए संपादक महोदय से पूछा…

 

ये आपकी प्रतिभा को सबके सामने सही से लाने का मेरा प्रयास है. क्या कर सकते हो ये… संपादक महोदय ने अनिल के सवाल का जवाब न देकर अपना सवाल उसपर दाग दिया.

 

मैं आपकी प्रतिभा जानता हूँ, इसलिए आपको यह काम दे रहा हूँ आपके पास 15 का समय है मैं आपसे 15 दिन बाद मिलूँगा. दरवाज़ा उधर है… इतना कहकर संपादक महोदय अपने काम में व्यस्त हो गए.

 

क्या कर सकता हूँ इसपर मैं…?

 

ये कैसा काम दे दिया है मुझे गुरु जी ने… ऐसा तो मैं पहली बार ही सुन रहा हूँ कि एक यौन कर्मी का बलात्कार हो सकता है…?

 

क्या सवाल है ये…?

 

कोई राजनैतिक मुद्दा होता तो मैं आसानी से कर सकता था. अनिल ऐसे ही कई सवालों से जद्दोजहद कर रहा था.

 

फिर कुछ समय के लिए शोर शराबे भरे ऑफिस में बैठ जाता है. और सोचने लगता है कि क्या करना चाहिए. योजनायें बनाने में लगा था. तभी उसके अंतस ने उससे कहा क्या इस मुद्दे को तू राजनैतिक मुद्दा समझ कर कम नहीं कर सकता…?

 

अरे हाँ… मैं ऐसा ही करने वाला हूँ. राजनैतिक मुद्दा मेरा पसंदीदा मुद्दा…

 

चलो कुमार साहब अब चलते हैं. और काम पर लगते हैं.

 

एक दिन के गहन चिंतन के पश्चात् अनिल जी सबसे पहले उन्हें के शहर के रेड लाइट इलाके में घुमते-घुमाते पहुंचे. वहां बैठे बहुत से दलाओं की नज़र थी अनिल पर…

 

आज गया अपना ग्राहक… एक दलाल कहता हुआ दलालों की चोकड़ी से उठा और अनिल के पास जा पहुंचा.

 

माल… माल… माल… चाहिए क्या…?

 

इस बात को सुनकर अनिल जी ने कहा हम पत्रकार हैं. बताओ माल देना है…

 

दलाल का लहजा बदला और वह कहने लगा सर सर… बताइए न क्या खबर चाहिए आपको…?

 

खबर नहीं दोस्त हम कुछ महिलाओं से मिलना चाहते हैं जो यहाँ अपने जिस्म को बेचने पर मजबूर हैं. मजबूर हैं खुद की बोली लगाने पर. अपने आप को रुन्दता देखने पर. क्या मिला सकते हो हमें कुछ महिलाओं से…? अनिल ने दलाल से पूछा.

 

दलाल ने कहा हाँ सर बहुत हैं यहाँ आइये मेरे साथ.

 

अपनी नाक पर कपड़ा रखकर बिना कुछ पूछे ही अनिल दलाल के पीछे चल दिया.

 

अँधेरा रास्ता… अरे यहाँ दिया नहीं जलाते तुम लोग… अनिल ने उससे पूछा.

 

नहीं सर हमारा धंधा अँधेरे का ही है. दलाल ने हंसकर जवाब दिया.

 

एक आदमी के निकलने से भी कम अँधेरे रास्ते को पर करने के बाद… दोनों एक बड़े मकान ने आ पहुंचे…

 

अच्छा ये है वो दलदल… जहां गिरने के बाद कोई भी महिला वापस नहीं निकल पाती… अनिल ने अपने मन में सोचा…

 

रोजाना इ जाने कितने ही जिस्म यहाँ नंगा नाच करते होंगे… न जाने कितनी आबरू यहाँ हर रात रुसवा हो जाती होंगी. न चाहते हुए भी न जाने कितनी यातना सहती होंगी यहाँ महिलाएं. ना जाने कितने ही लोग अपनी हवस का पिटारा यहाँ खोलकर कितनी ही जिंदगियों को बर्बाद कर देते होंगे… ये सोचते सोचते और माकन की दीवारों से आती चिल्लाहट की आवाजों को सुन पा रहा था अनिल… जो चीख चीख कर उसे अपने दर्द को बयां कर रही थी. किसी बूचड़ खाने से कम नहीं थे यहाँ के हालात. बस अंतर यहाँ इतना था कि वहां चारों ओर खून के छींटे होते हैं और यहाँ आंसुओं का अम्बार, जिन्हें न जाने क्यों हमारा समाज नहीं देख पाता है. अनिल अपने सवालों में खोया था तभी आवाज़ आती है… आ गये सर….

 

हाँ… क्या आ गए हम… अनिल ने कहा.

 

बड़ा अन्दर आना पड़ता है भाई…

 

हाँ सर करना पड़ता है काम है हमारा… दलाल ने कहा.

 

उस मकान का एक छोटा सा कमरा अनिल के सामने था…

 

अन्दर गया तो देखता है कि उस छोटे से कमरे में 5 कमरे और हैं. कहने का तात्पर्य है कि उस मकान के दायें हाथ की तरफ एक कमरा था और उस कमरे में लकड़ी के बोर्डों से बने 6/3 के छोटे छोटे कमरे थे. जहाँ केवल आबरू उतारी जा सकती थी. जहां रात भर एक अबला को नोंच नोंचकर खाया जा सकता है. इतनी जगह में आसानी से हो सकता था ये सब.

 

देखकर और सब सोचने के बाद अनिल बोला… ये क्या है बंधू…?

 

क्या मारना चाहते हो यहाँ लड़कियों को…?

 

क्या सर अभी आपने कहाँ देखा है सब… दलाल

 

फिर अनिल को दलाल ने एक ऐसे कमरे में आने को कहा जहां न जाने कितने ही दरवाज़े खोलने के बाद लकड़ी के बोर्ड पर लगे पेंच खोलने के बाद एक छोटा सा तहख़ाना नज़र आया जहां लगभग 12 लड़कियों को उन्होंने कैद करके रखा हुआ था. या ऐसा भी कह सकते हैं कि वो लडकियां अपने आप को छिपाने के लिए यहाँ खुद अपनी मर्ज़ी से थी.

 

अनिल ने कहा ये सब किसलिए भाई…?

 

दलाल ने तुरंत जवाब दिया ये करना पड़ता है. उसकी बातों से लग रहा था कि उनके लिए बड़ा स्वाभाविक है ये सब. रोजाना का काम है. पर अनिल के लिए ये बात स्वीकारने योग्य भी नहीं थी. वह अचरज में पद गया था. आखिर पेट पालने के लिए कोई यहाँ कैसे आ सकता है. पर एक लड़की से बात करने के बाद मालूम पड़ा यहाँ आना ही शायद उनके लिए सही था. वरना सड़क पर गुमनाम मौत…? ही उनके हिस्से आनी थी. यहाँ कम से कम अपना और अपने बच्चों के पेट तो पाल रही है. वहां फैली पीड़ा और कोतुहल को देखते ही अनिल अपने मन ही मन ये सब सोचने लगा था.

 

अनिल ने देखा कि वहां इतनी बैचनी है कि हम चाह कर भी इस बैचैनी को दूर नहीं कर सकते, बच्चा नहीं सकते यहाँ फंसी महिलाओं को हम मजबूर हैं. कुछ यहाँ से जाना चाहती है, जबरदस्ती यहाँ लाई गई महिलाएं और बच्चियां यहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहती. और कुछ है जो अपने अप को इस माहौल में ढाल चुकी हैं. खुश है वह.

 

अनिल ने दलाल से कहा अरे सुनो क्या तुम मेरी बात करा सकते हो, यहाँ मौजूद कुछ लड़कियों महिलाओं से…???

 

हाँ हाँ जरुर साब आइये न… दलाल ने हंसकर कहा, उसे लग रहा था कि अनिल उसका भी इंटरव्यू लेगा और वह टीवी पर दिखाया जाएगा पर शायद दलाल जानता नहीं था कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है. पर अनिल भी उसे उसके स्वप्न में रहने देना चाहता था. अनिल नहीं चाहता था कि वह मना कर दे, लड़कियों से मिलवाने से.

 

एक लड़की से पूछने पर उसने मना कर दिया…! दूसरी ने भी, तीसरी ने भी… शायद उन्हें बहुत डर लग रहा था. अपनी रोज़ी रोटी के खोने का… परन्तु एक लड़की ने हिम्मत दिखाई. किन्तु इससे पहले जब कोई लड़की बात करने के लिए तैयार नहीं हो रही थी. तो अनिल ने अपने मन में सोचा कि किसी और शहर में जाना पड़ेगा शायद… राज्य में भी.

 

पर जब वह लड़की तैयार हो गई, उस लड़की के दिलेरी दिखाने पर अनिल ने उससे कहा क्या मैं जान सकता हूँ कि आपके साथ कितनी बार यौन सम्बन्ध बनाए गए हैं और कितनी बार आपकी मर्ज़ी से और कितनी बार मर्ज़ी के खिलाफ. अनिल शायद जानता था कि यहाँ हर लड़की किसी न किसी मजबूरी में आई है तो उसने यह सब जानना जरुरी नहीं समझा.

 

लड़की इससे पहले कि कुछ कह पाती, वह रोने लगी जोर जोर से…

 

और फिर उसने कहा, “न जाने कितनी ही बार मैं अपने को बेचने पर मजबूर हुई हूँ न जाने कितनी ही बार.” और हर बार अपनी मर्ज़ी के खिलाफ… इसमें कोई मर्ज़ी नहीं हो सकती… ज़रा सोचकर देखिये हमारी पीड़ा हमें न जाने कितने ही लोगों के सामने अपनी आबरू को उतारना पड़ता है. कैसा लग सकता है हमें…??? लड़की ने अनिल ने पूछा…

 

देखिये मैं इसका जवाब तो नहीं दे सकता पर आपनी पीड़ा आपकी आवाज़ को उन लोगों तक जरुर पहुंचा सकता हूँ. अनिल ने उस लड़की को आश्वासन देते ही उससे कहा…

 

अच्छा एक आखिरी सवाल… क्या आपको लगता है कि आपके साथ जो सब हुआ है वो एक बलात्कार था…???

अनिल ने अपनी आवाज़ को धीमा करते हुए लड़की से फिर पूछा.

 

लड़की ने कहा ये तो मुझे पता नहीं और न ही मैं इतनी पढ़ी लिखी हूँ… पर एक वाकिया जो मेरे साथ कुछ दिनों पहले ही हुआ था बता सकती हूँ… लड़की ने अनिल से इतना कहकर अपनी बात को कहना आरम्भ किया.

 

इस घटना की शुरुआत उसने रोते हुए की. उसने कहा एक बार मुझे एक व्यक्ति ने अपनी भूख मिटाने के लिए पैसों का आश्वासन दिया.

 

मैं तैयार हो गई.

 

हमारी बात लगभग 700 रुपये में तय हुई.

 

मुझे उसके साथ जाना था पर मैं यह नहीं जानती थी कि वहां उसके 6 दोस्त और हैं.

 

वहां मैं अकेली थी, मेरी आबरू को बचाने वाला कोई नहीं था. बारी बारी उन्होंने मेरे साथ सम्बन्ध बनाए. जबकि मेरी बात केवल एक आदमी की हुई थी. परन्तु सातों ने जबरदस्ती मेरे साथ सम्बन्ध बनाये.

 

मैं असमर्थ थी,

 

कोई चारा नहीं था मेरे पास, करती भी क्या.

 

बस मैंने उनसे अपने पैसों की मांग की. इसपर उन्होंने मेरे साथ मार पिटाई करना आरम्भ कर दिया. मुझे प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया. क्या करती, वहां से भाग जाने के अलावा कोई चारा नहीं था मेरे पास. तो मैंने खिड़की से कूदकर वहां से भागना ही सही समझा.

 

विडंबना यह है कि मैं किसी से शिकायत भी नहीं कर सकती, किसी को अपनी आप बीती भी नहीं सुना सकती क्योंकि मैं एक यौन कर्मी हूँ न.

 

उस लड़की के इतना कहते ही अनिल बैठा का बैठा रह गया. अब उसके पास कोई सवाल बचा नहीं था. वह वहां से ऐसे ही लौट आया. बस एक सवाल आज तक उसे परेशान कर रहा है. क्या एक यौन कर्मी का बलात्कार हो सकता है…?

 

अपना लेख पूरा करके वह तय समय के मुताबिक़ अपने संपादक महोदय के पास पहुंचा तो संपादक महोदय भी काफ़ी भावुक हो गए.

उनके पास भी कोई सवाल या जवाब या कहने को कुछ नहीं था. अनिल तो जैसे किसी सदमे में आ चुका था. चुपचाप रहने लगा था. उन महिलाओं के बारे में चिंता थी उसे जो किसी भी हालत में अपने को बचा नहीं सकती. और उनके बारे में जो चाह कर भी उनकी मदद नहीं कर सकते थे. लेख प्रकाशित हुआ सारे शहर में जैसे बवाल मच गया हो… हर तरफ नारे बाजी… हर तरफ लोगों जैसा सैलाब सडकों पर आ गया हो. एक आन्दोलन का रूप ले लिया था अनिल के लेख ने.

हर तरफ विरोध होने लगा था, महिलाओं को उस स्थान से निकालने और सही स्थान पर जाकर बसाने और उनके पुनर्वास पर जोर दिया जाने लगा था. कुछ दिन तो यह मुद्दा हर समाचार पत्र और टीवी चैनल के लिए गर्म खबर रही परन्तु अचानक ही किसी राजनैतिक दबाव के कारण मुद्दा अचानक से थम गया और सभी शांत हो गये. पर ऐसा हुआ क्यों आज तक यह न तो अनिल को मालूम पड़ा और न ही उसके संपादक महोदय

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