लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under महत्वपूर्ण लेख, विविधा.


डॉ. मधुसूदन

प्रवेश: आलेख में (१) व्युत्पत्ति, एटीमॉलॉजी से परिचय करेंगे।

कुछ प्राकृतें और हिंदी/संस्कृत एवं अंग्रेज़ी के उदाहरण देखेंगे।

हमारी शब्द रचना के भी उदाहरण ही दिए जाएंगे। रचना विधि इस आलेख में नहीं समझाई है। सीधे उदाहरण ही दिए हैं।

 

download-11(एक) शब्दमूल हैं संस्कृत के धातु

यदि हम हमारे शब्दों के मूल तक जाने का प्रयास करें तो संस्कृत के धातुओं तक पहुंचते है। इस प्रकार मूल तक पहुंचने की क्रिया-विधि को व्युत्पत्ति का शोध कहा जा सकता है।

यह है वास्तविकता उन शब्दों के लिए, जो हिंदी में, (७० से ८० % ) बहुसंख्य है। ऐसे शब्द, तत्सम और तद्भव कहलाते हैं। तत्सम शब्द सीधे वैसे के वैसे (संस्कृत जैसे) हिंदी में प्रयोजे जाते हैं। तद्भव शब्द मूल संस्कृत के शब्दों में बदलकर प्रादेशिक भाषाओं में प्रचलित हो जाता है।

उदाहरणार्थ: संस्कृत के कुछ शब्द लेकर वे शब्द घिस पिट कर कैसे प्रादेशिक भाषाओं में परिवर्तित हो जाते हैं, इस प्रक्रिया के कुछ उदाहरण देखें।

 

(दो) उदाहरण

(१) क्षत्रिय —> खत्री, (२) क्षेत्र—-> खेतर–>खेत (३) पुष्य—> पूस (४) युद्धते—> जुज्झते –जुझना (५) पृच्छति–पुच्छति—पूंछना (६)मनुष्य —-> मणूस–> माणूस (मराठी)—>माणस (गुजराती) (७) आम्र—> अम्ब –>आम—-> आम्बा(मराठी)—->आम्बो (गुजराती) (८)ऋण–> रिण (९) ऋषि —>रिषि (१०) धर्म—> धम्म (११) ऋद्धि—> रिद्धि (१२) द्वार—> वार—>बार,या—>दार –>दुवार (१३) योगी—->जोगी (१४) कुमारी—>कुंवारी—>कुंवरी (१५) वधू—->वहू(गुजराती)—>बहू (हिंदी) (१६) शाटी—>साडी (१७) भगिनी—>बहिणी या बहिण–> बहिन (१८) गौ—>गउआ —>गउ—>गैया —>गाय (१९) संध्या—>संझा—>संजा (२०) कुम्भकार—>कुम्भआर—>कुम्भार—>कुम्हार (२१) वत्स (गौ का बच्चा)—> वच्छ—>बच्च—>बच्चा (२२) ज्येष्ठ —>जेठ्ठ इत्यादि अनगिनत हैं।

ऐसे प्रादेशिक भाषाओं में पहुंचे, मूल संस्कृत से उद्भूत मानकर ही , इसी प्रकार, आज तक उन को विश्लेषित किया जाता रहा है।(संदर्भ –प्राकृत मार्गोपदेशिका) ऐसे तद्भव शब्द कुछ मात्रा में परिवर्तित होकर प्रादेशिक आर्य भाषाओं में प्रचलित होते रहे हैं। यह कुछ विवादित विषय माना जाता है।

पर, शब्द प्राकृतों से, अर्धमागधी से या पाली से आया, यह बिंदू इस आलेख के लिए, गौण है। सारे शब्द देशज (देश में उत्पन्न हुए हैं) इस लिए वें स्वदेशी ही हैं। उनका यह स्वदेशी गुण और दूसरा उनका विशाल परिवार, जिसके कारण उनका धातुओं के वृक्षोंपर जमे रहना एक असामान्य गुण है।इसी गुण को लेखक अधोरेखित करना चाहता है। यह गुण असामान्य है।

(तीन )

भाष् भाषते धातु से निःसृत शब्द कुछ शब्दों के उदाहरण भाग (एक)में दिये थे। वैसे और भी काफी शब्द हैं, पर संस्कृत में उनका प्रयोग विशेष होता है। वैसे आवश्यकता पडने पर हिंदी में लिये जा सकते हैं।

निम्न सूची मर्यादित रखी है।

(१)परिभाष् —>परिपाटी स्थापित करना, औपचारिक रूप से बोलना”

(२)परिभाषा —-> पाणिनि के सूत्रों में मिला हुआ व्याख़्या सूत्र, “व्याख्यायित शब्द”

(३)परिभाषण—-> “नियम, विधि”

(४)भाषान्तरम् —->”अनुवाद”

(५)बहुभाष्यम् —-> “मुखरता, वाचालता”

(६)प्राच्यभाषा—–>”पूर्वी बोली, भारत के पूर्व में बोली जाने वाली”

(७)भाष्यकृत —–> “भाष्यम्+कृत्” -पतंजलि

(८)कार्णाटभाषा —->”कन्नड़ भाषा”

(९)भाषितम् ——–> “भाषण, उच्चारण, शब्द, बोली”

(१०)भाष्यकारः —–>”भाष्यम्+कारः” (पतंजलि)

(११)शृङ्गारभाषितम् —->”प्रेमालाप, प्रणयकथा”

(१२)मितभाषिन् —->”कम और नपे तुले शब्दों में बोलने वाला”

(१३)प्रतिभाषिन् —->”विरोध करने वाला, असंगत बोलने वाला”

(१४)भाषिका —> “इत्वम्” वक्तृता, भाषा, बोली”

(१५)मञ्जु्भाषिन् —->”मधुर बोलने वाला”

(१६)अल्पभाषिन् —-> “थोड़ा बोलने वाला”

(१७)आकाशभाषितम् —–>”आकाश में कही बात”

(१८)प्रभाषित —->”कथित, उद्धोषित”

(१९)भाषापत्रम् —->”आवेदन पत्र”

(२०)प्रतिभाष् —-> “नाम लेना, पुकारना”

(२१)प्रतिभाषा —->”उत्तर, जवाब”

(२२)जन्मभाषा —->”मातृभाषा”

(२३)म्लेच्छभाषा —->”विदेशी भाषा”

(२४)मधुरभाषिन् —->”मधुरभाषी”

(२५)प्रियभाषिन् —-> “मधुरभाषी”

(२६)भाषासमिति—->”वाणी का नियन्त्रण”

(२७)परभाषा—>”विदेशी भाषा”

(२८)भाषणम् —->”कृपापूर्ण शब्द”

(२९)व्रजभाषा—-> “मथुरा के आस-पास बोली जाने वाली भाषा”

(३०)मृषाभाषिन्—-“झूठा, झूठ बोलने वाला”

(३१) देशभाषा —-> “किसी देश की बोली

(३२)सुभाषितम् —->”अच्छी उक्ति”

(३३)अभाषित —-> “न कहा हुआ”

(३४)महाविभाषा —->”सविकल्प नियम”

(३५)स्पष्टभाषिन् —->”साफ साफ कहने वाला, मुँहफट, खरा, सरल”

(३६)सुभाषित——–>”सुन्दर भाषण करने वाला, वाग्मी”

(३७)कलभाषणम्—->”तुतलाना, बालकलरव”

(३८)मृदुभाषिन्——>”मधुर बोलने वाला”

(३९)विभाष् ——–>”ऐच्छिक नियम के रूप में निर्धारित करना”

(४०)विभाषा —->–“नियम की वैकल्पिकता”

(४१)बहुभाषिन् —->”मुखर, वाचाल”

(४२)भाषित —->”बोला हुआ, कहा हुआ, उच्चारण किया हुआ”

(४३)प्रियभाषणम् —->”कृपा से युक्त या रुचिकर शब्द”

(४४) पारिभाषिक —->”(शब्द आदि) तकनीकी, किसी विशेषार्थ का संकेतक”

(४५)सम्भाष् —–>”मिलकर बोलना, बातचीत करना”

 

(चार) अंग्रेज़ी एटिमॉलॉजी

स्थूल रूपसे कहता हूँ कि अंग्रेज़ी शब्द को इतिहास होता है, व्युत्पत्ति नहीं होती। अंग्रेज़ी शब्द किस किस भाषा में होकर आया, कैसे बदलते बदलते आया यह बताया जाता है।

पर संस्कृत शब्द की व्युत्पत्ति होती है। यह बहुत बडा अंतर है। इस लिए अंग्रेज़ी शब्दों की एक भीड है। अंग्रेज़ी में इस लिए “स्पेलिंग बी” स्पर्धा होती है। शालाओं से स्पर्धकों को महीनो तैयारी कराई जाती है; और स्पर्धा में भेजा जाता है।

(पाँच) अंग्रेज़ी भानुमति का कुनबा।

ऐसे कहा जा सकता है, कि, अंग्रेज़ी भाषा एक भानुमति का कुनबा है। उसने आज तक अपने पिटारे में, विश्वस्त स्रोतों के आधार पर ४९ प्रमुख भाषाओं से उधार के शब्द लिए हैं। इस लिए उच्चारण का कोई नियम नहीं होता। अलग अलग उच्चारण सीखने के बिना कोई उपाय नहीं होता।

अंग्रेज़ी ने, ऑस्ट्रेलियन, अफ्रिकन, आफ्रिकांस, ऍरेबिक, चीनी, ज़ेक, डॅनिश, डच, एट्रुस्कन, फिन्निश, फ्रेंच, ऍंग्लिसाइज़्ड फ्रेंच, जर्मन लातिनी, गौलिश, जर्मन, अंग्रेज़ी जर्मन, छद्म जर्मन, ग्रीक अंग्रेज़ी, हिब्रु, हिंन्दी, हंगेरियन, इन्डोनेशियन, जावानिज़, मलय, सुडानीज़, इत्यादि इत्यादि अनेक १२० तक भाषाओं से उधार शब्द लिए हैं।

(छः) एटिमॉलॉजी अर्थात “अंग्रेज़ी शब्द का इतिहास”

निम्न उदाहरणों से यह एटिमॉलॉजी अर्थात “शब्दका इतिहास” स्पष्ट किया जा सकता है।

पाठकों से अनुरोध: कम से कम दो शब्दों को ध्यान पूर्वक पढें। उसका बदलता हुआ स्पेलिंग देखें, बदलता हुआ अर्थ भी देखें, और देश विदेश से कैसे कैसे उसका परिवर्तन हुआ है, यह भी देखें।

(सात) कुछ उदाहरण

Learn का शब्द इतिहास। स्पेलिंग का देश-विदेश में परिवर्तन देखिए:

पुरानी अंग्रेज़ी Leornian <—–liznojan <—–lernia<—–leeren<—–leren<—-lernen<——-lais —leis—Gleis—laest

देश-विदेश का प्रवास भी देखिए।

 

(१)सीखना = learn (v.) From Dictionary.com

Old English leornian “to get knowledge, be cultivated, study, read, think about,” from Proto-Germanic *liznojan (cf. Old Frisian lernia, Middle Dutch leeren, Dutch leren, Old High German lernen, German lernen “to learn,” Gothic lais “I know”), with a base sense of “to follow or find the track,” from PIE *leis- “track.” Related to German Gleis “track,” and to Old English læst “sole of the foot” (see last (n.)).

————————————————————————————————————————————-

पुरानी अंग्रेज़ी leornian Old Frisian lernia, Middle Dutch leeren, Dutch leren, Old High German lernen, German lernen “to learn,” Gothic lais “I know”)

पुरानी अंग्रेज़ी जो पुरानी फ़्रिशियन –मध्य डच से—पुरानी ऊंची जर्मन से इत्यादि से होकर अंग्रेज़ी में आया हुआ शब्द है।

—————————————————————————————————————————–

बोलना =Speak का शब्द इतिहास

(2)बोलना =speak (v.) Look up speak at Dictionary.com

Old English specan, variant of sprecan “to speak, utter words; make a speech; hold discourse (with others)” (class V strong verb; past tense spræc, past participle sprecen), from Proto-Germanic *sprek-, *spek- (cf. Old Saxon sprecan, Old Frisian spreka, Middle Dutch spreken, Old High German sprehhan, German sprechen “to speak,” Old Norse spraki “rumor, report”), from PIE root *spreg- (1) “to speak,” perhaps identical with PIE root *spreg- (2) “to strew,” on notion of speech as a “scattering” of words.

पुरानी फ़्रीशियन<—मध्य डच<—-पुरानी जर्मन<——पुरानी नोर्स इत्यादि से आया हुआ।

————————————————————————————————————————–

(३)भाषा = Language{late 13c., langage “words, what is said, conversation, talk,” from Old French langage (12c.), from Vulgar Latin *linguaticum, from Latin lingua “tongue,” also “speech, language” (see lingual). The form with -u- developed in Anglo-French. Meaning “a language” is from c.1300, also used in Middle English of dialects:}

शब्द आया <—–पुरानी फ्रेंच <——अशिष्ट लातिनी<—–अलग अलग रूपान्तरों से

———————————————————————————————————————————–

(४)भाषित = Explained, {explain (v.) Look up explain at Dictionary.com

early 15c., from Latin explanare “to make level, smooth out;” also “to explain, make clear” (see explanation).

Originally explane, spelling altered by influence of plain. Also see plane (v.2). In 17c., occasionally used more literally, of the unfolding of material things: Evelyn has buds that “explain into leaves” [“Sylva, or, A discourse of forest-trees, and the propagation of timber in His Majesties dominions,” 1664]. Related: Explained; explaining; explains.Spoken,

अनेक रूपान्तर होकर आया है लातिनी से। अनुरोध: आप ऊपर ही रोमन पढे।

——————————————————————————————————————

(५) भाषण,= Lecture {lecture (n.) Look up lecture at Dictionary.com

late 14c., “action of reading, that which is read,” from Medieval Latin lectura “a reading, lecture,” from Latin lectus, past participle of legere “to read,” originally “to gather, collect, pick out, choose” (cf. election), from PIE *leg- “to pick together, gather, collect” (cf. Greek legein “to say, tell, speak, declare,” originally, in Homer, “to pick out, select, collect, enumerate;” lexis “speech, diction;” logos “word, speech, thought, account;” Latin lignum “wood, firewood,” literally “that which is gathered”).

अनुरोध: रोमन में ऊपर पढें।

———————————————————————————————————————————–

(६)संभाषण= Dialogue,{dialogue (n.) Look up dialogue at Dictionary.com

early 13c., “literary work consisting of a conversation between two or more persons,” from Old French dialoge, from Latin dialogus, from Greek dialogos “conversation, dialogue,” related to dialogesthai “converse,” from dia- “across” (see dia-) + legein “speak” (see lecture (n.)).

Sense broadened to “a conversation” c.1400. Mistaken belief that it can only mean “conversation between two persons” is from confusion of dia- and di- (1). A word for “conversation between two persons” is the hybrid duologue (1864)} .

——————————————————————————————–

(७)बहुभाषी,= Garrulous;(1610s, from Latin garrulus “talkative,” from garrire “to chatter,” from PIE root *gar- “to call, cry,” of imitative origin (cf. Greek gerys “voice, sound,” Ossetic zar “song,” Welsh garm, Old Irish gairm “noise, cry”). Related: Garrulously; garrulousness. multilingual

इसका प्रवास<—– लातिनी,<——-प्रोटोइन्डोयुरोपियन,<——-ग्रीक,<——-वेल्श,<—–पुरानी आयरिश,<——इत्यादि भाषाओं से बताया गया है। cf. Greek gerys “voice, sound,” Ossetic zar “song,” Welsh garm, Old Irish gairm “noise, cry”).

————————————————————————————————————————————-

(८)परिभाषा,= Subject Terminology (1801, from German Terminologie (1786), a hybrid coined by C.G. Schütz of Jena, from Medieval Latin terminus “word, expression” (see terminus) + Greek -logia “a dealing with, a speaking of” (see -logy)}

यह जर्मन, <——मध्ययुगी लातिनी,<—– ग्रीक इत्यादि से दिखाया जाता है।

अंतमें:इस आलेख में मात्र, वास्तविकता ही प्रस्तुत की गयी है; कोई अतिशयोक्ति नहीं। आप बुद्धिमान हैं, विचार करें।

Leave a Reply

9 Comments on "हमारा परमोच्च शब्द रचना शास्त्र, भाग–दो"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Vishwa Mohan Tiwari
Guest
आज जब ांगरेजी भारत के सभी बालकों, युवाों, वयस्कों तथा वृद्धों के दिलो दिमाग पर छाी है, तब संस्कृत या भारतीय बाषाों की बात करना न केवल देशप्रेम की मांग करता है वरन साहस की मांग भी करता है. आपकी यह ुक्ति कि “(२)आज की अवस्था में संस्कृत शब्द प्रचुर (बहुल) हिंदी राष्ट्र-भाषा, या सम्पर्क भाषा बन पाए, तो भी हम शीघ्रता से देशोन्नति कर पाएंगे।” बहुत महत्वपूर्ण है.. ांग्रेजी की कमियां तथा कमजोरियां निकालना भी बहुत आवश्यक है, जैसा कि आप कर रहे हैं ाुर केवल सत्य कह रहे हैं..धन्यवाद हम सभी को विचार कर कुछ ठोस कार्य भी… Read more »
Dr. Dhanakar Thakur
Guest

अच्छा लेख
अंगरेजी या विदेशी भाषा के कोष में भी संस्कृत के शब्द पर अलग आलेख में जोड़ सकते हैं
हस्बैंड भी हस्त बंध से बना है ( पाणिग्रहण में भी ग्रहण हाथ यानी पाणि का है )

डॉ. मधुसूदन
Guest

डॉ. ठाकुर नमस्कार।
अब आपका मिथिला राज्य का समाचार भी पढा ही था, कि, अच्छा हुआ, आपकी टिप्पणी भी आ गयी।
===> वैसे संस्कृत-अंग्रेज़ी के संबंध पर प्रायः ८-१० आलेख डाले हुए हैं। ६ तो शब्द वृक्ष डाले थे। आप ने देखे हुए भी होंगे ही।
कुल ४४ आलेख भाषाओं पर इसी प्रवक्ता में आप देख सकते हैं। मेरे चित्र के नीचे नामपर चटकाने पर सूची निकल आएगी।
बहुत बहुत धन्यवाद। टिप्पणी देते रहें।

Dr. Dhanakar Thakur
Guest
मैं अनेक झंझटों में , प्रवास में फंसा रहता हूँ – आज ही देख पाया – बीचमे मिथिला में एक संस्कृत ग्राम बने इसकी बात चलायी है – लोग मिलें तो.. विश्वमोहन तिवारी से सम्पर्क होने पर एक ‘मिथिला बल परिषद् ‘ भी बनाये एही – २-३ विद्यालयों में ‘ कराग्रे वसते लक्ष्मी … कुछ स्वास्थ्य कुछ करियर बारे में बताया है देश का अंगरेजीकरण हो रहा है लोगो का राजनीतिकरण …राजनीती का संस्कृतिकरण होना चाहिए मेरे बहनोई विवेकानंद झा ने आपके चहेते नरेन्द्र मोदी पर एक किताब लिखी हा राग नमो बेकोंस डेल्ही -( लेकिन मेरा मत पुराना है… Read more »
मुकुल शुक्ल
Guest
मुकुल शुक्ल

अदरणीय मधुसूदन जी,
आपके इन लेखों के द्वारा मिलने वाली जानकारी अद्भुत होती है साथ ही एक नए दृष्टिकोण का निर्माण करने मे मददगार है | अंग्रेज़ी की तुलना मे संस्कृत को रखने पर ये साफ हो जाता है की दुनिया की सबसे वैज्ञानिक और परिपूर्ण भाषा संस्कृत का कोई सानी नहीं है | आने वाले समय मे जब इस देश मे सत्ता परिवर्तन होगा तब शिक्षा व्यवस्था और कामकाज की भाषा संस्कृत बनवाने के लिए हमारा प्रयास होगा और तब आपके ये लेख और उनमे दिये गए तर्क बहुत मददगार सिद्ध होंगे |
बहुत धन्यवाद

डॉ. मधुसूदन
Guest
संस्कृतप्रेमी- मुकुल जी बहुत बहुत धन्यवाद। (१)उत्तर में क्या कहूँ? हमारा भाग्य है, कि हम विश्वकी सर्वोच्च भाषा के अधिकृत स्वामी हैं। उसकी रक्षा तो हमें ही करनी होगी। डर है, कि, बौनी अंग्रेज़ी हमें परास्त ना कर दे? (२)आज की अवस्था में संस्कृत शब्द प्रचुर (बहुल) हिंदी राष्ट्र-भाषा, या सम्पर्क भाषा बन पाए, तो भी हम शीघ्रता से देशोन्नति कर पाएंगे। (३) अंग्रेज़ी,फ्रेंच, चीनी, रूसी, जर्मन, जापानी,इत्यादि में से एक, या और कोई परदेशी भाषा सीखकर –जापान की भाँति सारी भाषाओं के अच्छे अच्छे शोधपत्रों का अनुवाद करनेवाले बुद्धिमान युवाओं से ऐसी अपेक्षा स्वयं महात्मा गांधी जी ने भी… Read more »
Manju Tiwari
Guest

मैं हमेशा से संस्कृत भाषा के शब्द भण्डार की समर्थक रही हूँ । शब्दों की यात्रा का कुछ- कुछ अनुमान था पर विश्लेषण के इस विस्तृत रूप से आप ने उस जानकारी को और साफ़ और गहरा किया है । निःसंदेह यह लेख एक उपलब्धि है| बधाई !

डॉ. मधुसूदन
Guest

नमस्कार मंजु जी, और टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

जैसे जैसे अध्ययन और विचार करता हूँ, मैं ही चकाचौंध और चकित हूँ।
क्या कहूँ? ’देव’-नागरी, –’देव’-वाणी,—- ’परमोच्च शब्दरचना’,—- और’परिपूर्णत’ व्याकरण।
–चारों गुण एक ही भाषा में क्या(Accidently) अकस्मात आ गये?
या यह ईश्वरी वरदान था?

डॉ. मधुसूदन
Guest

डॉ. त्रिदिव-कुमार . राय साहब —धन्यवाद।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेसाचुसेट्स –के प्रॉफेसर का निम्न संदेश इ मैल से आया।

Congratulations! You are making good contributions to popularize Samskrit and to bring its glory it deserves.
TKR

wpDiscuz