लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

images (1)किसी भी देश के इतिहास में साढ़े छह दशक का काल खंड अपने पड़ोसी देशों के साथ अपनी सीमा समस्याओं के समाधान के लिए कम नहीं होता. भारत में स्वाधीनता प्राप्ति की ६७वीं वर्षगाँठ के अवसर पर उत्साह और उमंग के साथ राष्ट्र ध्वज तिरंगे के फहराए जाने की रस्म पूरी कर ली गई. प्रति वर्ष देश और विदेश में बसे भारतीय और भारतवंशी गर्व और जयहिन्द के घोष के साथ राष्ट्र आराधन करते हैं. मन ही मन यह कामना भी करते हैं कि देश की सीमाओं पर शांति रहे, पड़ोसी देशों के साथ मधुर सम्बन्ध बनें और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में सहजता के वातावरण में समस्त जन सांझेपन में सुरक्षा, सम्पन्नता और विकास के विश्व कीर्तिमान स्थापित करें. यह है भारत की सांस्कृतिक अन्तरात्मा का अमर सन्देश.

निस्संदेह भारत ने इस लम्बे कालखंड में अपनी अन्तरात्मा के इसी निर्देश के अनुरूप पड़ोसी देशों पाकिस्तान और चीन के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने की दिशा में बार बार प्रयत्न किया है. लेकिन बेहद कड़ुआ सच यही है कि भारत को इन दोनों ही देशों से इस दिशा में कोई सहयोग नहीं मिला. उनका रवैय्या भारत के प्रति सौहाद्रपूर्ण नहीं रहा है. दोनों ही विस्तारवादी प्रवृति के सिद्ध हुए हैं जिनकी कथनी और करनी में अंतर निरंतर स्पष्ट होता चला गया है. पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर की कथित नियंत्रणरेखा का बार बार उल्लंघन करने से बाज़ नहीं आता. उसके द्वारा भारत में घुसपैठ और जिहादी आतंकवाद की बढ़ती व्यापकता उसके नापाक इरादों को स्पष्ट करती है. चीन भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि पहले ही हड़प किए बैठा है और अरुणांचल प्रदेश पर भी अपना हक़ जताने से बाज़ नहीं आता. पिछले कुछ महीनों में कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में उसकी घुसपैठ और भारतीय सैनिकों के साथ दादागिरी की घटनाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि चीन भारत के सामर्थ्य और आत्मरक्षा के संकल्प की थाह लेने की निरंतर चेष्ठा में है. पाकिस्तान की भारतविरोधी योजनाओं को सहायता देने की कोशिश भी करता है. उसके साथ लद्दाख सीमा पर हुईं घटनाओं के कुछ ही दिन के अन्दर कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान के सैनिकों के द्वारा अकस्मात हमले में पांच भारतीय जवानों की हत्या कर दी जाती है. पाकिस्तान की धरती पर पल बढ़ रहे भारतविरोधी उग्रपंथियों के द्वारा भारत में और अधिक आतंकवादी हमलों की धमकियां मिलती हैं. किश्तवाड़ में पाकिस्तान संप्रेरित साम्प्रदायिक दंगों से पुन: अराजकता उत्पन्न करने की कुचेष्ठा सामने आती है. नियंत्रण रेखा का पाकिस्तानी सेना के द्वारा अनवरत उल्लंघन और अविराम गोलाबारी शुरू हो जाती है और भारतीय क्षेत्रों में हज़ारों जिहादी विध्वंसवादियों की घुसपैठ से आतंक मचाने की कोशिशें सामने आती हैं. ये सब तथ्य क्या सिद्ध करते हैं? निश्चय ही इनसे यह संकेत तो नहीं मिलता कि पाकिस्तान भारत के साथ शांति चाहता है.

इस समस्त घटनाचक्र के प्रारंभिक चरण में नियंत्रणरेखा पर पाकिस्तान के सैनिकों ने छद्मवेश में हमला करके जिस प्रकार भारत के पांच सैनिकों की हत्या की वह उसके नापाक इरादों के जारी रहने का संकेत था. इसकी गंभीरता की उपेक्षा करते हुए भारत के रक्षा मंत्री ने बिना सोचे समझे और सेनाध्यक्ष से पूरी रिपोर्ट प्राप्त होने से पूर्व ही संसद में जैसी असमंजसपूर्ण बयानबाजी की वह अचंभित करने वाली थी. इस मामले में संसद के दोनों सदनों और मीडिया में जैसी बहस को बल मिला उससे भारत की छवि एक सतर्क और आत्मरक्षा के लिए सक्षम राष्ट्र के रूप में नहीं उभरी. देश की सीमाओं पर हमले जारी रहें और भारतसरकार के रक्षामंत्री पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी देने और प्रत्युत्तर में उसकी सफाई देने की प्रतीक्षा किए बिना उसके निर्दोष होने की वकालत करते नज़र आएं यह समझ में आने वाली बात नहीं है. सत्ताभारी कांग्रेसपार्टी और उसके साथी दलों के प्रवक्ताओं ने तब तक अपना रुख नहीं बदला जब तक मुख्य विपक्षीदल भाजपा ने संसद में जम कर उनकी खिंचाई नहीं की. ऐसे असमंजसपूर्ण माहौल में आक्रान्ता पाकिस्तान के हौंसले पस्त होने की बजाए बुलंद होने की ही संभावना थी. जब उसे अनपेक्षित रूप से हाथोंहाथ भारत सरकार से क्लीनचिट मिल गयी तो उसने भी यह पुष्टि कर दी कि सीमा पर पांच भारतीय सैनिकों की हत्याओं में पाकिस्तान की सरकार का कोई उलझाव नहीं था. लेकिन पाकिस्तानी सेना ने जब इसके जल्द बाद ही जम्मूकश्मीर में संघर्षविराम की धज्जियां उड़ाते हुए नियंत्रण रेखा का उल्लंघन शुरू कर दिया तो सच्चाई स्वयमेव सामने आ गई. भारत के जवानों की धोखे से की गईं हत्याओं पर पाकिस्तान के साथ अपनी तीव्र प्रतिक्रिया जतलाने से सरकार झिझकी क्यों? बिहार में नीतीश सरकार के तीन मत्रियों ने चार जवानों के शव राज्य में पहुँचने पर उनके प्रति उपेक्षा प्रदर्शित करते हुए जैसे बयान दिए उनसे उनकी कैसी देशभक्ति की पुष्टि होती है?

स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को अपने संबोधन में भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहनसिंह ने पाकिस्तान को कोई कड़ी चेतावनी नहीं दी. देशवासियों की यह अपेक्षा थी कि लाल किले से भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तान और चीन को हुंकारभरी चेतावनी देंगे. लेकिन उन्होंने मात्र उपदेश के लहजे में पाकिस्तान से अनुरोध किया कि “वह अपनी ज़मीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ न होने दे.” जो पाकिस्तान भारत के साथ हुए चार युद्धों में पराजय का मुख देखने के बाद भी लगातार छद्मयुद्ध में लिप्त है क्या वह मशविरे की ऎसी भाषा समझेगा? सच यह है कि वह एक ऐसा हठधर्मी आक्रान्ता देश है जो शांतिवार्ताओं का तानाबाना बुन कर कश्मीर को बार बार एक मुद्दा बनाते हुए भारत को ठगने की चेष्ठा में सतत संलिप्त है. उसका व्यवहार उसकी वाणी से मेल नहीं खाता. वह भरोसे लायक सिद्ध नहीं हुआ है. वर्तमान घटनाक्रम में भी उसने भारत को ही दोषी ठहराने की पहल करने की होशियारी दिखाई है. इस्लामाबाद में भारत के राजदूत को अपने विदेश मंत्रालय में बुला कर पाकिस्तान की सरकार ने नियंत्रण रेखा के उल्लंघन का आरोप भारत पर मढ़ दिया. उहपोहग्रस्त भारत सरकार के द्वारा कुछ भी प्रतिक्रिया देने से पूर्व पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेम्बली में प्रस्ताव पास करके वर्तमान गोलाबारी के लिए भारत को दोषी ठहराया. इसके जवाब में ही भारत के संसद में एक प्रस्ताव पारित करके पाकिस्तान की निंदा करने की सूझ सांसदों के मन में उभरी.

नवाज़ शरीफ के पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उम्मीद की जाने लगी थी कि उपमहाद्वीप में माहौल बदलेगा. राजनीतिक विश्लेषकों ने कयास लगाने में देरी नहीं की थी कि पाकिस्तान दोस्ताना कदम उठाएगा क्योंकि चुनावों के दौरान नवाज़ शरीफ ने भारत के साथ रिश्ते सुधारने का एलान किया था. यह भी कहा था कि पाकिस्तान कि फौज जो वहां के राजनीतिक नेताओं के नियंत्रण में नहीं रही है नवाज़ शरीफ उसमें बदलाव लाएंगे. लेकिन कुछ भी नहीं बदला है. पाकिस्तानी फ़ौज पूर्ववत राजनीतिकों पर हावी है. पाकिस्तान के उग्रपंथी इस्लामी तत्व फौज की शक्तिशाली खुफिया एजेंसी आई. एस. आई पर हावी हैं. भारत की सरकार भले ही यह जायज़ा लेने की कोशिश में रही हो कि हवा क्या रुख लेती है लेकिन ऐसे कोई भी संकेत दिखाई नहीं देते कि जिस ढर्रे पर पाकिस्तान अब तक चलता आया है उसमें कोई भी बड़ा परिवर्तन होगा.

ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि पाकिस्तान हमेशा दोहरी चाल चलता है. नियंत्रण रेखा के उल्लंघन और भारतीय चौकियों पर पाकिस्तानी हमलों के जारी रहते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने विश्वभर को यह सुनाते हुए भारत का आह्वान किया कि “हम मिल बैठ कर सभी मुद्दों को मैत्रीपूर्ण ढंग से हल करें. हमें अच्छे दोस्त बनना चाहिए. एक दूसरे का हाथ थामें, खुले दिल से बात करें.” लेकिन यह सब कहने के बावजूद नवाज़ शरीफ ने पाकिस्तानी सेना को संघर्ष विराम रेखा के उल्लंघन, गोलाबारी और बहुत बड़ी संख्या में घुसपैठ के लिए तैयार किए गए जिहादी उग्रपंथियों की भारत में घुसपैठ को रोकने की कोई कोशिश नहीं की. ऐसा मानना कतई युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता कि पाकिस्तानी सेना अपनी मनमानी कर रही है. यदि कर रही है तो इससे यही स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान का कथित लोकतंत्रवादी ढांचा और नेतृत्व सेना के महत्वाकांक्षी जनरलों को नियंत्रण में रखने के काबिल नहीं हैं. सीमाओं पर गोलियों की बौछारों के बीच शांति और मैत्री की गुहार भारत और विश्व के लिए एक ऐसा बड़ा धोखा है जो पाकिस्तान ६६ वर्षों से यानि अपने जन्म से लेकर देता चला आ रहा है. नवाज़ शरीफ जब पिछली बार पकिस्तान के प्रधानमंत्री थे तो भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके दोस्ताना बयानों पर भरोसा करके भारत की ओर से दोस्ती का हाथ सहर्ष आगे बढ़ा दिया था. लेकिन नवाज़ शरीफ सरकार की उपेक्षा करते हुए पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल मुशरफ ने अपनी सोची समझी योजना के तहत कारगिल में हमला कर दिया था. पता लगने पर इसके जवाब में भारत ने श्री वाजपेयी के नेतृत्व में सही समय पर इस आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब देकर पकिस्तान को पीछे धकेल दिया. भारत की वीर सेना ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी लेकिन शांति के लिए राजनीतिकों के प्रयास अब तक असफल ही होते आए हैं.

पाकिस्तान बार बार शांति की आड़ में भारत के विध्वंस के षड्यंत्र रचता ही चला आया है. *अप्रैल १९८८ में, पाकिस्तान के सैनिक शासक जनरल ज़िया उल हक ने आई. एस. आई के अधिकारियों की एक सामरिक महत्व की बैठक को संबोधित करते हुए कश्मीर को हथियाने के उद्देश्य से ‘ऑपरेशन टोपाज़’ के नाम से एक गुप्त योजना उनके समक्ष रखी थी. उन्हें संबोधित करते हुए जनरल ने कहा था “यह स्पष्ट रहे कि हमारा लक्ष्य एकदम साफ़ और पुष्ट है कि कश्मीर को आज़ाद कराना है. हम और अधिक समय के लिए अपने मुस्लिम भाइयों को भारत के साथ बंधे नहीं रहने दे सकते. हमें लड़ाई के ऐसे तरीके अपनाने होंगे जिन्हें कश्मीरी मानस ग्रहण कर सके और हम उनका उपयोग कर सकें. सीधी सैनिक कार्रवाई के स्थान पर ऐसे नैतिक और दल बल निर्माण की आवश्यकता है जिनसे दुश्मन की संकल्पशक्ति के हनन के साथ साथ उसकी राजनीतिक क्षमता को भी क्षति पहुंचे. विश्व में एक दमनकारी देश के रूप में भारत की छवि बिगड़े.” इसके लिए उन्होंने ‘कोड टोपाज़’ प्रस्तुत करते हुए अपनी इस त्रिसूत्री योजना के मुख्य चरणों को रेखान्कित किया था. उनके द्वारा घोषित इसके मुख्य उद्देश्य थे – (१) भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर में शासन के विरुद्ध छोटे स्तर पर विद्रोह को भड़काना ताकि उसका घेराव तो हो लेकिन वह टूटे नहीं, (२) महत्व के सभी स्थानों पर चुनिन्दा लोगों को पहुंचाना ताकि वे पुलिस बल, वित्तीय संस्थानों, संचार साधनों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में विध्वंसक कार्रवाई करें, (३) विध्वंसवादी तत्वों और सक्षम सशस्त्र गिरोहों का गठन और उन्हें प्रशिक्षण, (४) जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के अंदर बल प्रयोग के बिना चोरीछुपे संचार साधनों को काटने के तरीके सोचे और अपनाए जाएं, (५) कश्मीर घाटी में उन स्थानों पर नियंत्रण जहाँ भारतीय सैनिकों की उपस्थति नहीं है….”. जनरल जिया उल हक ने इस गुप्त बैठक में यह भी कहा था कि “जहाँ तक हमारे चीनी दोस्तों का सवाल है, फ़िलहाल वे यह सुनिश्चित करने से अधिक और कुछ नहीं कर सकते कि उनके विरुद्ध जिन भारतीय सैन्यबलों को तैनात किया हुआ है उन्हें वहां से हटने न दें. निस्संदेह, यदि हम किसी गंभीर मुसीबत में होंगे तो चीनी और हमारे अन्य शक्तिशाली मित्रदेश किसी न किसी ढंग से हमारी सहायता के लिए तत्पर होंगे.” तभी उन्होंने पाकिस्तान के पास परमाणु अस्त्रों और अपने इन इरादों को अंजाम देने के लिए अधिक से अधिक धन जुटाने के साधन निर्माण की आवश्यकता को भी रेखांकित किया था.

क्या बदला है तबसे अब तक? जहाँ तक पाकिस्तान का सम्बन्ध है कुछ भी तो नहीं. भारत अपनी शांतिप्रियता का परिचय देने के लिए सदैव तत्पर है. पाकिस्तान भारत की सदाशयता का लाभ उठाने को सदा उत्सुक उसकी कूटनीतिक, राजनीतिक और सामरिक किसी भी भूल का नाजायज़ फायदा उठाने के लिए तत्पर खड़ा है. इन पंक्तियाँ को विराम देते हुए मेरी नज़र बार बार टेलेविज़न पर दी जा रहीं उन सचित्र खबरों पर भी केन्द्रित है जो वर्तमान में जम्मूकश्मीर संघर्षविराम रेखा पर युद्ध के तेज़ होने की पुष्टि कर रही हैं. किश्तवाड़ पाकिस्तान प्रायोजित साम्प्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा है. ये सब एक बड़ी योजना के तहत पाकिस्तान के द्वारा भारत के विरुद्ध उठाए जाने वाले कदम हैं. यह सोचना कि पाकिस्तान की वर्तमान नवाज़ शरीफ सरकार इससे बेखबर है सरासर मूर्खता ही होगी. एक तरफ चीन जो पाकिस्तान का मित्र देश है भारत के साथ सीमाओं पर अपनी गिद्धदृष्टि गड़ाए हुए तैयार बैठा है. ऐसे में त्वरित शांति की कोई गुंजाइश ही कहाँ बचती है. भारत आए दिन पाकिस्तान के इस छद्मयुद्ध से उभरती इन चुनौतियों की उपेक्षा करते नहीं रह सकता. हमारे सीमारक्षक सीमाओं पर लड़ रहे हैं. उनके मनोबल को बनाए रखना और कूटनीतिक स्तर पर मजबूती के साथ पाकिस्तान के साथ जूझने की आवश्यकता स्पस्ट दिखती है. समूचा देश इस उभरते संकट की घड़ी में पुनरपि एकजुटता का प्रदर्शन करने को तत्पर खड़ा है.

*[उपरोक्त ‘ऑपरेशन टोपाज़’ पर विस्तार के साथ चर्चा और विश्लेषण मैंने वर्ष २००६ में साहित्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आतंकवाद’ के ‘आई. एस. आई कुचक्र’ अध्याय में पृष्ठ ९८-१०० पर की है.]

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