लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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railway1निर्मल रानी

भारतीय रेल की गिनती दुनिया के गिने-चुने सबसे बड़े रेल नेटवर्क में की जाती है। परंतु आज़ादी के 6 दशक पार कर जाने के बावजूद अभी तक भारतीय रेल जोकि आधुनिकता की ओर अग्रसर तो है परंतु यही रेल व्यवस्था तमाम खामिओं व कमियों का शिकार भी है। और निश्चित रूप से भारतीय रेल व्यवस्था में पाई जाने वाली कमियां ही इस विभाग के घाटे का कारण बनती हैं। भारतीय रेल व्यवस्था को गर्त में ले जाने की रही-सही कसर उन क्षेत्रीय नेताओं द्वारा पूरी कर दी जाती है जो समय-समय पर भारतीय रेल मंत्रालय की कमान संभालते रहे हैं। गोया ऐसे क्षेत्रीय लोकप्रियता प्राप्त नेता रेल विभाग का कल्याण या उसकी तरक्की के बारे मे सोचने के बजाए आमतौर पर इस फिक्र में ही लगे रहे कि रेल मंत्रालय उनके पास रहते हुए किस तरह अमुक क्षेत्र विशेष की जनता को खुश किया जाए तथा अमुक वोट बैंक को रेलवे के माध्यम से किस तरह प्रभावित किया जाए। परिणामस्वरूप कभी वर्षों तक रेल किराया नहीं बढ़ाया गया तो कहीं स्थानीय जनता को खुश करने के लिए क्षेत्र विशेष में नए रेल ज़ोन अथवा मंडलीय कार्यालय खोले गए। क्षेत्रीय मतदाताओं को लुभाने के लिए कई क्षेत्र विशेष से तमाम नई रेलगाडिय़ां चलाई गईं। नए स्टेशन बनाए गए,नए रेल स्टॉपेज घोषित किए गए या फिर नई रेलगाडिय़ों के नामकरण पर ही राजनीति की गई।

परंतु रेल मंत्रालय के लगभग ऐसे सभी पूर्व सिपहसालारों ने इस बात की ओर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया कि भारतीय रेल का सुचारू रूप से संचालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाए। इसमें चलने वाले यात्रियों को हर संभव सुविधाएं कैसे मुहैया कराई जाएं तथा रेल यात्रियों सहित रेल संपत्ति की संपूर्ण सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? पिछला लगभग एक दशक तो रेल विभाग ने कुछ ऐसे रेल मंत्रियों की सरपरस्ती में गुज़ार दिया जो जनता पर बोझ न डालने के नाम पर रेल का किराया नहीं बढ़ाना चाह रहे थे। परिणामस्वरूप आमतौर पर घाटे में चलने वाला रेल विभाग आर्थिक रूप से और भी अधिक कमज़ोर होता गया। इस का एक और प्रमुख कारण यह भी था कि अब तक प्राय: रेल मंत्रालय की कमान बिहार, बंगाल या उत्तर प्रदेश से संबंध रखने वाले नेताओं के हाथों में रहा करती थी। ज़ाहिर है कि देश की सबसे अधिक आबादी वाले इन राज्यों के जनप्रतिनिधि नेताओं को रेल विभाग के कल्याण के अतिरिक्त अपने क्षेत्र की जनता को लुभाने के विषय में तथा अपने अगले चुनाव के बारे में भी सेाचना होता है। लिहाज़ा कहा जा सकता है कि मार्च 2004 से अब तक रेल का किराया न बढ़ा कर पूर्व रेल मंत्रियों ने रेल विभाग के नुकसान की शर्त पर जनता को खुश रखने की कोशिश की। परंतु पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए फेरबदल के बाद जब पहली बार चंडीगढ़ जैसे छोटे केंद्रशासित प्रदेश से चुनकर आने वाले सांसद पवन कुमार बंसल को संसदीय कार्यमंत्री की जगह पर रेल मंत्रालय की कमान सौंपी गई उसी समय यह विश्वास हो गया था कि प्रधानमंत्री द्वारा पवन बंसल को इसी वजह से रेल मंत्रालय सौंपा गया है ताकि वे भारतीय रेल के लिए अधिक से अधिक राजस्व की वसूली करने की योजना बनाएं। और हुआ भी वही। पवन बंसल ने रेलमंत्री का पद संभालते ही सबसे पहला काम रेल यात्री किराए में 20 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी का ही किया। हालांकि बीस प्रतिशत बढ़ाए गए रेल किराए के बाद रेलमंत्री ने यह वादा किया था कि अब नए रेल बजट में किराए की कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। परंतु ऐसे संकेत मिलने शुरु हो गए हैं कि संभवत: रेल बजट में भी तीन से लेकर पांच पैसे प्रति किलोमीटर की दर से रेल यात्री किराया और बढ़ाया जा सकता है। पिछले दिनों डीज़ल के दाम बढऩे के बाद इस प्रकार के संकेत मिलने शुरु हुए हैं। इस समय रेल विभाग को बाज़ार की दर से डीज़ल खरीदने पर तीन हज़ार तीन सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का नुकसान हो रहा है।

भारतीय रेल की आर्थिक स्थिति पहले से ही ठीक नहीं है। परंतु प्रश्र तो यह है कि रेल यात्री किराए में इज़ाफ़ा करने के बाद भी रेल विभाग मात्र अपना आर्थिक घाटा ही पूरा करने की कोशिश कर रहा है या भारतीय रेल यात्रियों को सुचारू रूप से निर्धारित समय पर चलने वाली सुरक्षित एवं सुविधाजनक भारतीय रेल भी उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है? भारतीय रेल के घाटा उठाने के जो प्रमुख कारण है उनमें बेरोक-टोक बिना टिकट यात्रियों का देश के कोने-कोने में यात्रा करने का चलन,भिखारियों व साधूवेशधारियों का देश के तमाम स्टेशन,प्लेटफार्म व रेलगाडिय़ों पर कब्ज़ा, ऐसे ही अवांछित व अराजक तत्वों द्वारा चलती हुई ट्रेनों के डिब्बों से लेकर रेलवे लाईन व रेलवे स्टेशन के आसपास पड़ी रेल सामग्री व रेल संपत्ति की बेतहाशा चोरी और इस प्रकार की चोरियों के प्रति रेलवे के सुरक्षा विभाग, रेल कर्मचारियों विशेषकर रेलवे सुरक्षा बल द्वारा या तो अपनी आंखें मूंदे रखना या अपनीजिम्मेदारिओं के प्रति निष्क्रिय रहना और तमाम जगहों पर ऐसी चोरियों में हिस्सेदार बनना या इन्हें संरक्षण देना भी शामिल है।

और ऐसे अराजक तत्वों, लुटेरों व अपराधी प्रवृति के लोगों द्वारा रेलवे को न केवल विभागीय स्तर पर नुक़्सान पहुंचाया जा रहा है बल्कि चोरी व हरामखोरी की कमाई पर पलने वाला यही वर्ग रेल में यात्रा करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए भी ख़तरा बना हुआ है। देश में कहीं भी चले जाईए अवांछित तत्व कहीं भीख मांगने के नाम पर, कहीं गाना-बजाना करते हुए, कहीं तालियां ठोकते हुए हिजड़े तो कहीं यात्री डिब्बों में अनधिकृत रूप से खाने-पीने का सामान या चोरी-छिपे सिगरेट-बीड़ी व माचिस आदि बेचने की आड़ में प्रवेश कर जाते हैं। और यात्रियों की नज़र हटते ही अपने हाथ लगने वाली कोई भी चीज़ उठाकर ले जाते हैं। सवाल यह है कि इस प्रकार के आसामाजिक तत्व रेल के डिब्बों में आख़िर प्रवेश ही क्यों और कैसे पाते हैं? नए रेलमंत्री पवन बंसल को रेल यात्री किराया बढ़ाने के साथ-साथ रेल यात्रियों की सुरक्षा के विषय में भी गंभीरता से सोचना चाहिए तथा इसके बारे में बाकायदा चीन की रेल व्यवस्था की तजऱ् पर ऐसी योजना तैयार करनी चाहिए जिससे रेल विभाग को क्षति पहुंचाने वाले आसामाजिक तत्व भारतीय रेल में प्रवेश करना तो दूर रेलवे के प्लेटफार्म या रेलवे लाईन के किनारों तक भी न पहुंच सकें। भारतीय रेल में बड़े पैमाने पर खु$िफया कैमरे लगाए जाने की भी ज़रूरत है।

इसके अतिरिक्त रेलगाडिय़ों में सफाई, शौचालय, पानी, कूड़ेदान, पर्याप्त मात्रा में मोबाईल चार्जिंग सॉकेट, आरामदेह सीटें व बर्थ आदि भी पूरी तरह से सुचारू व व्यवस्थित रखने की ज़रूरत है। नए रेल मंत्री को उत्तरप्रदेश, बिहार व बंगाल जैसे राज्यों की तरफ खासतौर पर तवज्जो देनी चाहिए क्योंकि इन इलाक़ों में रेलगाडिय़ंा प्राय: देरी से चला करती हैं। कारण कहीं सिंगल रेल लाईन का होना है तो कहीं आम लोगों में जगह-जगह चेन खींचकर गाड़ी रोकने की प्रवृति शामिल है। ऐसी समस्या के समाधान के लिए तेज़ी से रेलवे लाईन के दोहरीकरण के साथ-साथ चेन खींचने वालों के विरुद्ध स त कार्रवाई किए जाने की भी ज़रूरत है। भले ही इसके लिए रेल विभाग को नए व स त कानून क्यों न बनाने पड़ें। बिहार में तो लेहरिया सराय जैसे कई प्रमुख रेलवे स्टेशन ऐसे भी हैं जो बावजूद इसके कि जि़ला मु यालय के रेलवे स्टेशन हैं परंतु आज़ादी से लेकर अब तक वहां केवल एक ही प्लेटफार्म है। वहां रेलगाडिय़ों की क्रासिंग भी होती है। नतीजतन दूसरी लाईन पर आने वाली अपनी गाड़ी पर सवार होने के लिए यात्रियों को गैरकानूनी तरीके से लाईन पार करनी पड़ती है, अपनी जान को जोखिम में डालकर पथरीली बजरियों पर दौडक़र अपने निर्धारित डिब्बों तक पहुंचना होता है। ऐसी हालत में कई यात्री अपनी यात्रा से वंचित रह जाते हैं तो कई बूढ़े व बीमार या महिलाएं अपने डिब्बों तक या तो पहुंच नहीं पाते या अधिक ऊंचाई होने की वजह से डिब्बे में नहीं चढ़ पाते। ऐसे स्टेशन पर दो व तीन नंबर के प्लेटफार्म यथाशीघ्र बनाए जाने की भी बहुत स त ज़रूरत है। रेल के देरी से चलने जैसी पारंपरिक समस्या से छुटकारा पाने के लिए तथा रेल को और अधिक गति देने के लिए रेलवे लाईन के दोहरीकरण व विद्युतीकरण का काम भी युद्धस्तर पर पूरा किये जाने की ज़रूरत है। शहीद एक्सप्रेस व सरयू यमुना जैसी कई रेलगाडिय़ां ऐसी भी हैं जिनकी गति तो बढ़ा दी गई है परंतु उनकी समयसारिणी परिवर्तित नहीं हुई है। लिहाज़ा ऐसी गाडिय़ों की समयसारिणी की पुनर्समीक्षा किए जाने की भी ज़रूरत है। कई वर्षों बाद रेल मंत्री पवन बंसल द्वारा रेल किराया बढ़ाए जाने का जनता ने कोई ख़ास विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि बढ़ती मंहगाई व रेलवे की आर्थिक स्थिति से न केवल रेलमंत्री बल्कि रेल यात्री भी बखूबी वाकिफ थे। परंतु यही रेल यात्री अब अपने नए रेल मंत्री से सुचारू, सुरक्षित एवं सुविधाजनक भारतीय रेल के संचालन की भी पूरी उम्मीद रख रहे हैं।

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