लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कश्मीर घाटी में पिछले दो तीन दशकों से कुछ लोग पाकिस्तान व अन्य विदेशी शक्तियों की सहायता से भारत विरोधी आन्दोलन चला रहे हैं । इनकी सहायता करने वाले समूह दो हिस्सों में बाँटे जा सकते हैं । पहला समूह सीधे बन्दूक़ के बल पर भारत को परास्त करना चाहता है । इसलिए वह हथियारों के बल पर स्थानीय लोगों को डराता धमकाता है । जो उनके साथ नहीं चलता उन्हें गोली मार देता है । इससे आम जनता में दहशत फैलती है । हाथ में बन्दूक़ लेकर घूमने वाला यह समूह सुरक्षा बलों पर भी आक्रमण करता है । इसका आम लोगों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है । उसे लगता है बन्दूक़ वाला यह समूह , सुरक्षा बलों से डरने की बात तो दूर , उनसे दो दो हाथ कर रहा है , तो सुरक्षा बल हमारी क्या रक्षा करेंगे ? इस प्रकार आम जनता इन बन्दूक़ वाले दहशतगर्दों के आगे असहाय अनुभव करती है । इसके बावजूद पर्दे के पीछे से दहशतगर्दों को संचालित करने वाली ताक़तें जानती हैं कि बन्दूक़ लेकर घूमने वाले इन छोटे छोटे गिरोहों के बल पर घाटी में कश्मीरियों को परास्त नहीं किया जा सकता । कुछ देर के लिए डराया तो जा सकता है । कश्मीर घाटी में जो भारत का विरोध कर रहे हैं , वह अल्पसंख्या में हैं , लेकिन मुखर हैं क्योंकि उन्हें दहशतगर्दों की बंदूक़ का समर्थन प्राप्त है । बहुसंख्या दहशतगर्दों और दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ है लेकिन वह साईलैंट मायजोरिटी है , इसलिए दिखाई नहीं देती । घाटी में जब आतंकवादी आम कश्मीरियों को चुनाव में हिस्सा न लेने की चेतावनी देते हैं तो उसका उद्देष्य साफ़ है कि वे बन्दूक़ के बल पर बहुसंख्यक कश्मीरियों को डराते हैं । बन्दूक़ की गोली दूर से ही सबको सुनाई देती है लेकिन उसका मौन विरोध न तो किसी को सुनाई दे सकता है और न ही दिखाई दे सकता है । परन्तु बन्दूक़ की गोली से कश्मीर घाटी को भारत से तोड़ा नहीं जा सकता , इतना तो दहशतगर्दों और अलगाववादियों को पर्दे के पीछे से संचालित करने वाले भी जानते हैं । उनके अभियान को किसी न किसी रुप में सिविल सोसायटी का भी समर्थन चाहिए । उस समर्थन के कारण पूरा आन्दोलन आतंकवादी आन्दोलन न होकर जन आन्दोलन का आभास देने लगता है ।
जाने अनजाने में देश में सिविल सोसायटी के नाम पर ऐसे कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं जिनकी हरकतों से आतंकवादियों को लाभ पहुँचता है और घाटी में उनका विरोध करने वाले बहुसंख्यक कश्मीरियों का मनोबल टूटता है । सुरक्षाबलों में निराशा फैलती है । कश्मीर घाटी में भी यही कुछ हो रहा है । घाटी के अलगाववादी समूह तो खुले आम आतंकवादियों के उद्देश्यों का समर्थन करते हैं । हुर्रियत कान्फ्रेंस इसका जीता जागता उदाहरण है । यह ठीक है कि घाटी में इसकी ज़्यादा पैठ नहीं है । लेकिन आतंकवादियों का संचालन करने वाली विदेशी शक्तियों को भी चेहरे चाहिएँ , पैठ नहीं । हुर्रियत कान्फ्रेंस उनकी इस माँग की पूर्ति तो करती ही है । लेकिन कहीं न कहीं हुर्रियत कान्फ्रेंस भी आतंकवादियों की गोली के साए में की जा रही सभाओं में ही मुखर होती है । कान्फ्रेंस में जो अलग भाषा बोलने की हिम्मत करता है उसे गोली से जन्नत पहुँचा दिया जाता है । घाटी के एक जाने पहचाने मीरवायज जनाब मोहम्मद फारुक को आतंकवादियों ने इसी लिए गोली मार दी थी । और लगभग दस साल बाद उनकी क़ब्र पर चन्द अकीदत के फूल चढ़ाने के लिए गए अब्दुल गनी लोन की भी हत्या कर दी थी । इसलिए कहा जा सकता है कि हुर्रियत कान्फ्रेंस ऐसे लोगों का जमावड़ा है, जिसका पिछवाड़ा आतंकवादी खेमे में रहता है और उसका मुँह सिविल सोसायटी में जाकर खुलता है । सिविल सोसायटी में घूमने वाले दूसरे समूहों में एक समूह या परिवार आसानी से पहचान में आता है । यह महरूम शेख़ अब्दुल्ला का कुनबा है । इन समूहों की हरकतों से आम कश्मीरी को लगता है कि अलगाववादियों की ताक़त बहुत बढ़ गई है और सरकार भी इनसे डरती है । जब गिलानियों और मीरवाइजों के आगे पीछे सुरक्षा बलों की गाड़ियाँ चलती हैं तो आम कश्मीरी में उनका रुआब बढ़ता है । तब बकरा पार्टी ही बाघ पार्टी दिखाई देने लगती है । इतना ही नहीं , इससे सुरक्षा बलों को लगता है कि जिन कश्मीरियों की सुरक्षा के लिए हम सीमा पर अपना ख़ून बहा रहे हैं , वही हमें गालियां दे रहे हैं , पत्थर फेंक रहे हैं ।
तीसरा समूह उनका है जो अमेरिका में जाकर ग़ुलाम नबी फ़ाई के यहाँ दावत उड़ाते हैं । होटलों में दावते उड़ाने को वे सैमीनार का नाम देते हैं । इसमें भारत के पत्रकार भी शामिल होते हैं और सारे संसार के आगे चीख़ चीख़ कर कहते हैं कि कश्मीर घाटी में भारतीय सेना आम कश्मीरियों के मानवाधिकारों का हनन कर रही है । घाटी में यह बात आम कश्मीरी भी नहीं कहता । व्यक्तिगत बातचीत में वह यही कहता है कि गिलानियों ने विदेशी आतंकवादियों के साथ मिल कर घाटी को नर्क बना दिया है । लेकिन फ़ाई के एअर टिकट पर होटल में उसी के पैसे से मुर्ग़ मुस्ललम हलाल करने वाले भारतीय सैमीनेरियन कश्मीर को कश्मीरियों से भी ज़्यादा जान लेने का दावा करते हुए वही भाषा बोलते हैं जो उसी दावतनुमा सैमीनार में पाकिस्तान के छद्म बुद्धिजीवी बोलते हैं । यहाँ यह बताने की जरुरत नहीं कि इन आयोजनों का तमाम ख़र्चा इस्लामाबाद देता है ।
लेकिन इन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी न तो आम कश्मीरी ने और न ही सुरक्षा बलों ने हिम्मत हारी । इस लिए अब चौथी पार्टी मैदान में उतरी है । यह पार्टी सोनिया कांग्रेस की है , जिसके 550 की लोक सभा में फ़क़त 44 सदस्य हैं । इस चौथी पार्टी ने बिना लाग लपेट के सीधा सीधा हमला बोला । यह पार्टी जानती है कि यदि अब भी हमला न बोला गया तो घाटी में आम कश्मीरी और सुरक्षा बलों की स्थिति मज़बूत हो जाएगी । यदि ऐसा हो गया तो कांग्रेस के पास मोदी सरकार पर आक्रमण करने के लिए क्या बचेगा ? मणि शंकर अय्यर पाकिस्तान में जाकर टी वी चैनल पर ही कहने लगे कि यदि पाकिस्तान भारत के साथ मधुर रिश्ते चाहता है तो उसे मोदी सरकार को भारत की सत्ता से हटाना पड़ेगा । कार्यक्रम को संचालित कर रहे एंकरों को भी समझ नहीं आया कि इसमें पाकिस्तान क्या भूमिका अदा कर सकता है । इस गहरी योजना के पीछे के रहस्य और सच के बारे में तो केवल और केवल मणि शंकर एय्यर ही बता सकते हैं । लेकिन शायद चौथी पार्टी को लगा कि मणिशंकर की योजना को पाकिस्तान ने स्वीकार नहीं किया । अब क्या रणनीति हो सकती थी ? अब केवल एक ही उपाय बचता था कि सीधा सीधा भारतीय सेना पर ही हमला किया जाए । विदेशी आतंकवादी यह काम अपने हथियारों के बल पर करते हैं लेकिन चौथी पार्टी तो ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि वह तो सिविल सोसायटी का हिस्सा है । उसे सेना का मनोबल गिराने के लिए केवल शब्दों का प्रयोग करना था । इस काम के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रवक्ता और सांसद संदीप दीक्षित को मंच पर उतारा गया। दीक्षित दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सुपुत्र है । सुपुत्र ने कहा कि भारतीय सेना के सेनापति कश्मीर में सड़क छाप गुंडे जैसा प्रलाप कर रहे हैं । संदीप बाबू इतना तो जानते होंगे कि अपने सेनापति को गुंडा कहे जाने से सैनिक प्रसन्न तो नहीं होंगे । अलबत्ता इससे पाकिस्तान और अलगाववादी-आतंकवादी अवश्य प्रसन्न होंगे । कांग्रेस कश्मीर घाटी में आख़िर क्या देखना चाहती है ? जब देश भर में सोनिया कांग्रेस की इस नीति को लेकर हल्ला शुरु हो गया तो उसके एक प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी सेनापति पर किए गए इस हमले से अपने आप को अलग करती है । राहुल गान्धी को पप्पू भर कह देने से मेरठ के एक कांग्रेसी नेता को पार्टी से बाहर कर दिया गया लेकिन सेनाध्यक्ष को सड़क छाप गुंडा कहने पर पार्टी ने केवल स्वयं को बयान से ही अलग किया । इस हो हल्ले में ही राहुल गान्धी इटली में अपनी नानी के पास चले गए हैं । मणिशंकर अय्यर से लेकर संदीप दीक्षित तक बरास्ता दिग्विजय सिंह , कांग्रेस की कश्मीर नीति का रहस्य सचमुच सिहरन पैदा करता है ।

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