लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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प्रस्तुति: अरुण तिवारी

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

मां गंगा के संबंध मंे अपनी मांगों को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद द्वारा किए कठिन अनशन को करीब सवा दो वर्ष हो चुके हैं और ’नमामि गंगे’ की घोषणा हुए करीब डेढ़ बरस, किंतु मांगों को अभी भी पूर्ति का इंतजार है। इसी इंतजार में हम पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी से की लंबी बातचीत को सार्वजनिक करने से हिचकते रहे, किंतु अब स्वयं बातचीत का धैर्य जवाब दे गया है। अतः अब यह बातचीत को सार्वजनिक कर रहे हैं। हम, प्रत्येक शुक्रवार को इस श्रृंखला का अगला कथन आपको उपलब्ध कराते रहेंगे यह हमारा निश्चय है।
इस बातचीत की श्रृंखला में पूर्व प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिए यहंा क्लिक करें।

आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए प्रस्तुत है:
स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – 15वां कथन
प्रोग्रेसिव सोच के ज़्ामीदार परिवार में जन्म
1932 में मेरा जन्म हुआ। उत्तर प्रदेश, जि़ला मुजफ्फरनगर, तहसील कांधला के एक खेतिहर परिवार में मैं जन्मा। मेरे बाबा श्री बुधसिंह जी आर्यसमाजी थे। उनके ससुर डिप्टी कलक्टर और ससुर के छोटे भाई बैरिस्टर थे। सो, मेरे बाबाजी भी इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टर बनना चाहते थे। उन्होने घर से पैसा निकाल लिया। जहाज का टिकट लेकर इंग्लैण्ड रवाना हो गये। परिवार के लोग यह नहीं चाहते थे कि वह इंग्लैण्ड जायें। लिहाजा, उनके ससुर को कम्पलेन्ट की कि वह चोरी करके गये हैं। परिणाम यह हुआ कि उन्हे जहाज में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच एक अंग्रेज से उनकी दोस्ती हो गई। उसने कहा – ’’तुम्हारे पास तो खेती है। तुम तो राजा हो।’’ यह बात उनके मन को लग गई। वह वापस लौटे और तय किया वह खुद खेती करेंगे। पङदादा भी बङे ज़मीदार थे। बाबा ने करीब 400 एकङ भूमि, दूसरों को दे दी थी। जितनी खुद कर सकते थे, उतनी ही अपने पास रखी; यही कोई 100 एकङ। यह उनकी प्रोग्रेसिव सोच थी। हमारे यहां ब्रह्मचार्य का भी पालन होता था।
10 साल की उम्र तक घर में ही पढे.
मेरी मां अधिकारी परिवार से थी। वह मुझे अधिकारी बनाना चाहते थे। बाबा चाहते थे कि मैं खेती करुं। 10 साल की आयु तक मुझे स्कूल नहीं भेजा गया। 10 साल की उम्र तक मैने घर पर रहकर ही संस्कृत व शास्त्र पढ़ा। सात साल का था, तो मुझे घर पर ही गणित-भूगोल पढ़ाना शुरु कर दिया था। 10 साल का होने के बाद सीधे छठी क्लास में मेरा एडमीशन हुआ। कुछ महीने बाद ही परीक्षा हुई। मैने टाॅप किया। मेरा विश्वास है कि संस्कृत पढें़, तो मस्तिष्क का विकास होता है।
अच्छा वैज्ञानिक बनाने में प्राइवेट ट्युटर की भूमिका 95 प्रतिशत
1946 में मैने कांधला से ही हाईस्कूल किया। मेरे एक प्राइवेट ट्युटर थे – बनारसी दास वैश्य। आज यदि मैं अच्छा वैज्ञानिक बन पाया हूं, तो उसमें 95 प्रतिशत भूमिका बनारसी दास जी की है। हमारे समय में अंग्रेजी, गणित, हिंदी कम्पलसरी विषय थे। संस्कृत आॅपशनल थी। इतिहास और भूगोल में एक चुनना था। मैने भूगोल चुना। मैने हाईस्कूल में भूगोल की परीक्षा इंग्लिश मीडियम से दी। मुझे भरोसा था। ननिहाल में मेरे मामा इंजीनियर थे। वे चाहते थे कि मैं भी इंजीनियर बनूं। इंटर में मैने विज्ञान पढ़ना शुरु किया। मैने पहले कभी विज्ञान नहीं पढ़ा था, लेकिन विज्ञान पढ़ने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई। रसायन विज्ञान में तो मैं अपनी क्लास में सबसे अच्छा माना जाता था।
बीएचयू का आकर्षण: पार्टीशन की सीख
मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बीएचयू (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) में पढ़ूं। मालवीय जी के प्रति आकर्षण था। मन में कहीं राष्ट्रभक्ति भी थी। 1948 में बी. एससी. पढ़ने बीएचयू चला गया। हाॅस्टल में रहता था। यूनिवर्सिटी के उन दिनों में मैने खूब पिक्चरें देखीं; खूब ताश खेला। उसी दौर में पार्टीशन हुआ। आज़ादी, पार्टीशन, शरणार्थी और पंजाबी परिवारों के दर्द कहानियां उस वक्त सुनते थे। आज मैं मानता हूं कि यदि अब इंडिया में मुसलमानों को रहना है, तो बराबरी से रहना होगा।
बाबा-दादी-शास्त्रीे सानिध्य ने गढ़ा व्यक्तित्व
जब बीएचयू गया, तो आर एस एस पर प्रतिबंध था। आर एस एस में न रहते हुए भी मुझे उनके प्रति सहानुभूति थी। मेरे बाबा कांग्रेसी थे, किंतु मेरे मित्रों में कई लोग आर एस एस से जुङे थे। मेरे बाबा जी कट्टर आर्यसमाजी थे। दादी जी कट्टर सनातनी थी। फिर भी दोनो साथ थे। बाबा जी, हवन संध्या करते थे। पूजा का प्रसाद लेते थे, लेकिन मूर्ति पूजा नहीं करते थे। शायद यही वजह है कि आज मैं दो मतभेद वाले लोगों के बीच भी आसानी से रह लेता हूं।

मेरा व्यक्तित्व जो कुछ.. जैसा भी बना, वह बाबा जी, दादी जी के सानिध्य से बना। मेरे चाचा जी ने एक शास्त्री जी को लगाया था, उन्हे मैं अलग नहीं करता; इस सब की वजह से बना। मैं जेल तो नहीं गया, लेकिन स्कूल के ऊपर झंडा लहराने के लिए चार बेंतें जरूर खाई थीं। हमने रात में तिरंगा लहराया था। चैकीदार से जब पूछा गया, तो उसने चार लङकों के नाम बता दिए। चार-चार बेंतें सभी को मारी गई।
गीता लेक्चर सुनना एक उपलब्धि
जब मैने बीएचयू ज्वाइन की, तो डाॅ. राधाकृष्णन वहां के वाइस चांसलर थे। वह हर सप्ताह रविवार को गीता लेक्चर देते थे। मेरे ज्वाइन करने के 15 दिन बाद वह रूस के राजदूत बनकर चले गये। हालांकि मैं उनके दो ही गीता लेक्चर सुन सका, लेकिन उसे मैं अपनी उपलब्धि मानता हूं। उसके बाद अमरनाथ झा वाइस चांसलर बने। फिर वह गीता लेक्चर देते थे।
पण्डित मदन मोहन मालवीय जी का न्याय
जब फाइनल में था, तो एक साल तक कोई वाइस चांसलर नहीं था। तब गोविंद मालवीय प्रो वी सी बनाये गये। उस समय एक किस्सा खूब प्रचलित था कि गोविंद जी को किसी सिंधी लङकी से प्रेम हो गया है। वह वीमैन हाॅस्टल में रहती थी। गेट के पास ही वीमैन हाॅस्टल था। सख्ती इतनी थी कि बाउंडरी के भीतर किसी को मिलने नहीं दिया जाता था। एक दिन गोविंद मालवीय जी वहीं पकङे गये। तभी किसी ने सुन लिया। वह भागे। गेट की तरफ से जा नहीं सकते थे। जहां से गंदा पानी निकल रहा था, वह उसी तरफ से निकलने की कोशिश कर रहे थे। वहां जमादारों के क्वाटर्स थे। उन्होने पकङ लिया। पहचाना कि अरे यह तो मालवीय जी के बेटे हैं। वे लोग उन्हे पकङ मदनमोहन मालवीय जी के पास ले गये। मालवीय जी ने मालूम क्या कहा ? उन्होने कहा – ’’मेरे प्राणांत के बाद यह मेरी अर्थी भी न छू पाये।’’ यह कहकर मालवीय जी ने उसी वक्त उन्हे निकाल दिया।
ईश्वर ने यूं कराई गंगा काम की तैयारी
अब वही गोविंद जी जब प्रो वी सी बने, तो हम इसे सहन न कर सके। देखते ही देखते इसे लेकर बीएचयू में एक आंदोलन शुरु गया। मैं भी उन आंदोलनकारियों में शामिल था।
एक और घटना बताता हूं। बी. एससी. फाइनल की है। बीएचयू में एक नियम था। जिसके कारण धर्म भी एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता था। नियमानुसार डिग्री तब तक नहीं दी जाती थी, जब तक कि विद्यार्थी धर्म विषय का पर्चा पास न कर लें। यह भी नियम था कि धर्म विषय में सबसे ज्यादा अंक हासिल करने वाले को एक सौ रुपये दिए जाते थे। वह मुझे मिले।
1948 में गंगाजी में एक रिकाॅर्ड बाढ़ आई थी। महाराज बनारस ने बीएचयू को गंगा इस पार के 16 गांव दे दिए थे। एक तरह से बीएचयू उन 16 गांवों को ज़मीदार हो गया था। सो बाढ़ आई, तो यूनिवसिर्टी में बाढ़ राहत के लिए टीमें बनी। मैं भी उसमें गया। मेरा धर्म विषय को पढ़ना, गंगा बाढ़ राहत के काम में जाना, आंदोलनकारी होना और अब सन्यास लेना; मैं समझता हूं कि ईश्वर ने इस सबके जरिए एक तरह से गंगाजी के काम के लिए मेरी तैयारी कराई।

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