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हरिकृष्‍ण निगम

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का 30 सितंबर का ऐतिहासिक निर्णय यद्यपि अनेक पुराने विवादों पर निर्णायक फैसला देने से नहीं चुका है पर लगभग तीनों न्यायधीशों ने उन दुराग्रही अंग्रेजी मीडिया के एक बड़े वर्ग और कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की अयोध्या की रामजन्म स्थान के प्राचीन आस्तित्व को नकारने की निर्लज्जता का भी पर्दाफाश कर दिया है। अंग्रेजी के कुछ प्रमुख पत्र इस दुष्प्रचार नेटवर्क के वर्षों से इस देश में सूत्रधार रहे हैं। इसमें भारत के प्राचीन इतिहास का विद्रुपिकरण करने वाले कुछ इतिहासकार और पुरातत्वविदों की सांठगांठ से ऐसे पत्रकारों का जमावड़ा सारे विश्व को भ्रमित करता रहा था कि असली अयोध्या ही कोई दूसरी थी। कोई इसे बौद्ध धर्म से जुड़ी बताता था। कोई कहता था कि वास्तविक अयोध्या नाम के कई स्थान बृहत्तर भारत के दूर-दराज स्थानों पर हैं, कोई कहता था कि रामजन्म भूमि के बारहवीं या तेरहवीं शताब्दी के भग्नावशेष भी कुछ सिद्ध नहीं करते हैं, आदि आदि! हाल के निर्णय में पुरातात्विक साक्ष्यों को अकाट्य मानते हुए जिस तरह न्यायाधीशों ने प्राचीन मंदिर के अवशेषों के आस्तित्व को नकारने वालों के दावे ध्वस्त कर दिए हैं उसने फिर इस प्राचीन इतिहास के मिथ्याकरण करने वालों को बौखला दिया है। फिर उसी निर्लज्जता से मुंबई और दिल्ली के ही कुछ बड़े अंग्रेजी समाचार-पत्रों ने इस प्रश्न को कि प्राचीन हिंदू मंदिर की नींव के ऊपर ही विवादित ढांचे के रूप में इसे सन् 1582 में बनाया गया था, फिर उसी आधार पर उत्तेजक रूप में भड़काने की कोशिश की है जिसमें इरफान हबीब, रामशरण शर्मा, मंजरी काटजू या दूसरे वामपंथी इतिहासकारों के पुराने राजनीति-प्रेरित विरोध को दोहराया गया है। इस प्रकरण पर न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने स्पष्ट कहा कि बाबरी मस्जिद निस्संदेह उसे पुराने स्थान के ध्वंसावशेषों पर बनी है जहां पर एक विशाल हिंदू मंदिर के अवशेष भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने सत्यापित किए हैं। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल भी उसी स्पष्ट निर्णय पर पहुंचे कि बाबरी मस्जिद का निर्माण हिंदू मंदिर की नींव और भग्नावशेषों पर हुआ था। यहां तक कि खंडपीठ के तृतीय न्यायमूर्ति एस. यू. खान ने भी यह माना कि मस्जिद का निर्माण उन हिंदू मंदिरो के अवशेषों पर हुआ जो वहां पर प्राचीन काल से विद्यमान थे और खंडहरों की प्रस्तर सामग्री उसके निर्माण में भी प्रयुक्त की गई थी।

आस्था, प्राचीन परंपराएं, इतिहास, अंग्रेजों द्वारा अभिलेखित घटनाक्रम, पुरातात्विक साक्ष्य, यह सब रामजन्म भूमि के आस्तित्व के सच को अब उच्च-न्यायालय द्वारा भी सत्यापित किया जा चुका है, पर लगभग पांच शताब्दियों पहले चलें इस मुक्ति अभियान की अंतिम परिणति पर मीडिया के एक बड़े वर्ग का दूराग्रह अशोभनीय हैं। क्या कोई सरकारी आदेश किसी पर पाबंदी लगा सकता है कि वह इस पर हर्ष या उत्साह प्रकट न करे और संयमपूर्ण समरसता को बरकरार रखने की जिद में इसे राष्ट्रीय अस्मिता गर्व या अंतरात्मा की संतुष्टि का उत्तेजक क्षण न माने। क्या आप उन विश्वप्रसिद्ध लेखकों जैसे नोबल पुरस्कार विजेता वी. एस. नयपाल अथवा नीरद चौधरी जैसे दूसरे अनेक लेखकों व पत्रकारों की टिप्पणीयों को दोहराने पर प्रतिबंध लगा सकते हैं जो उस विवादित ढांचे के ध्वंस को इतिहास का प्रतिकार या हिंदू आस्था के पुनर्जागरण का एक नया अध्याय मानते रहे हैं? जनभावना की गहराई और संवेदनशीलता राजनीतिक दलों या सरोकार के औपचारिक निर्देशों से सदैव मापी नहीं जा सकती है।

अब इस मुद्दे को इतने महत्वपूर्ण मौलिक निर्णय के बाद भी अंग्रेजी मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा उसी पुराने चश्मों से देखते हुए कहा जा रहा है कि न्यायालय के इस निर्णय पर वस्तुतः कोई पक्ष नहीं जीता। चाहे कोई पक्ष तुरंत बाद निर्णय के विरूद्ध अपील के विषय में पहले से कुछ नहीं कह रहा था पर हमारे राजनेता और कुछ अन्य पत्रकार उसी दिन से विरोधी पक्षों को उच्चतम न्यायालय में अपील करने के लिए उकसा रहे थेऔर राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की बात उठा रहे थे। ऐसे ही कुछ अन्य लोगों ने इस निर्णय में आस्था, विश्वास और ऐतिहासिक सच की हवाई बहस भी जारी कर दी। मुलायम सिंह यादव और दूसरे कुछ राजनेताओं ने मुसलमानों को भड़काने का काम पूर्ववत् शुरू कर दिया। क्या हमें स्मरण है कि अगस्त सन् 2003 में ही इसी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने जन्मभूमि विवाद से संबंधित पुरातत्व सर्वेक्षण व की गई खुदाई की रिपोर्ट का खुलासा किया था? जिसके तहत ए.एस.आई. की 574 पृष्ठों की रिपोर्ट जो मंदिर के समर्थन में थी मीडिया को उपलब्ध कराई गई थी। ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश में मायावती की एक बड़ी रैली और मुंबई में हुए विस्फोटों ने दृश्य-श्रव्य व मुद्रित मीडिया की सुर्खियों ने एक दूसरा ही मोड़ ले लिया था। इस वजह से इस रिपोर्ट को जो महत्व मिलना चाहिए या वह संयोगवश नहीं मिला। तभी यह तथ्य सत्यापित किए जा चुके थे कि विवादित ढांचे से जुड़े स्थान पर हीं 10 वीं और 12 वीं शताब्दी के विशाल मंदिरों के अवशेषों के विद्यमान होने की पुष्टि की गई थी। इस रिपोर्ट पर उदाहरण के लिए ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ की उस समय कैसी टिप्पणियां हुई थी, उसका उदाहरण निम्नलिखित है –

देखिए, हमारा राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक 27 अगस्त, 2010 के संपादकीय पृष्ठ पर बड़े शीर्षकों सहित क्या लिखता है – मंदिर की जल तरंगों में ज्वार : ए. एस. आई. की रिपोर्ट ने केसरिया को हरी झंडी दी! शीर्षक से व्यंगपूर्ण शैली में यह संपादकीय एक शोकगीत की तरह लिखा गया, जिसमें कहा गया था कि रामजन्म भूमि का हल न्यायालय से नहीं बल्कि, मुस्लिम नेताओं से वार्तालाप निकाला जा सकता है। पर इस प्रक्रिया में अल्पसंख्यक समुदाय के आत्मसम्मान का पूरा ध्यान रखना होगा।

इस संपादकीय के पहले वाक्य में लिखा गया था – हम सब इस पहेली व नाटक को भूल जाएं। ए. एस. आई. की रिपोर्ट जिसने ध्वस्त बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिरों के कथित साक्ष्य भगवा के पक्षधरों को ऐसे ऐतिहासिक चिह्नों के साक्ष्यों के रूप में दिए हैं जहां उन्हें अपने दावों को सही मनवाने के लिए एक और मुंहमांगा अवसर मिलेगा। यद्यपि इतिहासकारों व विशेषज्ञों ने इस रिपोर्ट के निर्णयों की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं पर मंदिर निर्माण के प्रति नए उठते ज्वार में उन्हें शायद ही कोई सुनेगा। उच्च न्यायालय की रिपोर्ट या निष्कर्ष में कोई कानूनी दम नहीं हैं। आदि आदि!

इसी तर्ज पर दूसरे अंग्रेजी समाचार-पत्रों ने भी देश में कानून के राज की स्थिति, हिंदू संगठनों की सांस्कृतिक पुलिस की भूमिका, उनके तालिबानीकरण व उनके संवैधानिक प्रावधानों को लगातार तोड़ने की साजिश का रोना रोया था। वे कहते हैं कि न्यायपालिका के इस तरह के निर्णय हमारे प्रजातंत्र की मूल धारणा पर चोट पहुंचाएंगे। इस पत्रों ने स्वयं अपना एजेंडा फिर जगजाहिर किया है – हमारे मीडिया का यही हिंदू विरोधी वर्ग सबको उच्च न्यायालय की रिपोर्ट को स्वीकार करने की शिक्षा दे रहा था। इससे बड़ा पाखंड क्या हो सकता है कि वही समाचार-पत्र कह रहे थे – द फाइंडिग्ज, ऑफ कोर्स, हैव नो फोर्स ऑफ लॉ! इस जांच रिपोर्ट को मानने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं हैं। क्या यह लिखने से ऐसे बड़े अंग्रेजी पत्रों की विश्वसनीयता पर चोट नहीं पहुंचती थी? यदि यह निष्कर्ष मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पक्ष में होता था तो कोई पत्र यह कह सकता था कि उस निर्णय में कानून की वैधता नहीं हैं। प्रोफेसर मंजरी काटजू तो विक्षिप्त होकर श्रीराम की हिटलर व मुसोलिनी से तुलना भी कर बैठी जिसे हमारे अंग्रेजी के पत्रों ने उध्दृत भी किया था। इस तरह की बौद्धिक जालसाजियों में हमारे वामपंथी प्राध्यापक और लेखक अग्रगण्य रहे हैं।

भूमिगत विशाल प्राचीन प्रस्तर स्तंभों के अवशेषों के आधार पर, जिनकी कार्बन डेटिंग जैसी वैज्ञानिक विधि यह ध्वंसावशेष तभी 10 वीं शताब्दी के सिद्ध हुए थे पर उन्हें उत्खनन के बाद भी अस्पष्ट व अनिश्चित साक्ष्य कहना सच से एक दुराग्रही मुंह मोड़ना था। खंडित मूर्तियाें, उत्कीर्ण स्थापत्य के भग्नावशेष व स्तंभ तत्कालीन उत्तर भारतीय शैली के प्राचीन मंदिरों के सबसे बड़े पुरातात्विक साक्ष्य है-यह रिपोर्ट में खुलकर कहा गया था। अब मंदिर केवल आस्था का प्रश्न ही नहीं रहा था, एक निर्विवाद रूप से मूर्त सत्य था।

यह एक विडंबना है कि हिंदू संगठनों की रामजन्म भूमि विवाद के लिए निरंतर भर्त्सना करने वाले राजनीतिबाज या हर छोटा बड़ा पत्रकार जैसे रातोंरात इतिहास का विशेषज्ञ और पुरातत्वविद बन बैठा था। एक दूसरा वर्ग बहुसंख्यकों से अयोध्या विववद को फिर भूल जाने का आग्रह कर रहा है। न्यायालय के बहुप्रतीक्षिप्त निर्णय के हिंदुओं के पक्ष में जाने की संभवना से अनेक बुद्धिजीवी व्यथित व विचलित थे और शुतर्मुर्ग की तरह सत्य का सामना नहीं करना चाहते हैं-पिछली बातें भूलकर आगे बढ़िए-फॉरगेट ऑर मूव ऑन। सेक्यूलरवादियों का यह नया सुविधावादी नारा था। वे ए. एस. आई. रिपोर्ट को विरोधाभासी कहते रहे थे। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में रॉयडन डी सूजा ने उसी दिन 2003 में लिखा कि वहां जैन मूर्तियां मिली, राम सीता की नहीं। एक कथित पुरातत्वविद् सूरजभान, दिल्ली विश्वविद्यालय के आर. सी. ठकरान और सुप्रिया वर्मा नामक लेखिका को विशेषज्ञ की तरह प्रस्तुत किया गया था। ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ने उनके मंदिर को नकारने वाले वक्तव्यों पर कॉलम खोल दिए थे। जमीन के नीचे की दीवारों, स्तंभों के आधार, फर्शों के कई स्तरों की खोज राडार तरंगों से न्यायालय ने कराई थी और खुदाई में निकले उपकरणों की कार्बन डेटिंग भी की गई थी पर ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ स्वयं संपादकीय स्तर पर ऐसे कथित लेखकों की अगुवाई करें। यह खुदाई पांच महीने से अधिक थी जिसमें धरती के 50 मीटर नीचे 50 मीटर लंबे व 30 मीटर चौड़े क्षेत्र में 10 वीं से 12 वीं शताब्दी के 50 स्तंभों के अवशेषों के साथ मल गर्भगृह का भी आस्तित्व पाया गया था। उस वक्त सन् 2003 में उनका मखौल उड़ाने वाला हमारा मीडिया आज पुनः जब निर्णय द्वारा उच्च न्यायालय ने सत्यापित किया तब हतप्रभ है। निर्णय के इस पक्ष को जो 2003 में ही स्पष्ट था यदि उस समय मीडिया और राजनेता अपना फायदा उठाने के लिए जिस तरह तोड़-मरोड़ रहे थे उनको आज एक अच्छा सबक मिला है। पर कया वे इससे शिक्षा ग्रहण करेंगे?

झूठ का जाल बुनते रहने की जिनकी राजनीतिक विरासत है, ऐसे कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को पिछले एक दशक से ही जिस तरह हमारे अंग्रेजी मीडिया के एक वर्ग ने तर्क की बैसाखियां दी है उसका विहंगावलोकन अपेक्षित हैं। 24 दिसंबर, 2002 को ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोसेफर शीरीन रत्नागर का एक लेख छापा जिसमें कहा गया था कि अयोध्या में मस्जिद के पहले मंदिर होने के उपयुक्त पुरातात्विक प्रमाण नहीं हैं। इस लेखक के एक मित्र ने उपलब्ध साक्ष्यों व अनेक प्रमाणों का उल्लेख करते हुए पत्र लिखा पर इसे न उस समाचार-पत्र ने प्रकाशित किया और न ही कोशिश करने पर भी पत्राचार किया। डॉ. कोनराड एल्स्ट ने उन्हीं दिनों लिखा था कि मस्जिद समर्थक मीडिया अक्सर खुदाई का विरोध करता रहा था जब कि बहुसंख्यक इसकी सदैव मांग करते थे।

सच तो यह है कि प्रमाणों का परीक्षण करने देश के कोने-कोने से 40 पुरातत्वज्ञ आए थे और सभी एकमत थे कि वहां प्राचीन मंदिर था। बहुत पहले ही 1975से 1980 के बीच भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के मुख्य निर्देशक प्रो. बी. बी. लाल ने अयोध्या में मस्जिद जन्मस्थान प 14 खाइयों की खुदाई उसकी प्राचीनता का पता लगाने के लिए की थी, उन्हें तभी पता चल गया था कि अयोध्या का वह स्थान कम-से-कम 3000 वर्षों पुराना था।

श्री बी. बी. लाल ने उन खाइयों में बड़े-बड़े समानांतर चौकोर स्तंभों वाले ईंट और पत्थरों का ढांचा पाया था जिनके दरवाजों पर हिंदू मूर्तियों तथा यक्ष, यक्षी, कमल के फूल, पूर्णघट आदि की प्रतिमाएं उत्कीर्ण थी। वहां किले बंदी के लिए एक दीवार भी मिली जो ईसा से तीन शताब्दियों पहले की थी। क्या ये समाचार उस समय के अर्थात् 18 जून, 1992 के समाचार-पत्रों में नहीं छपे थे। हमारे न्यायालय इन प्रमाणों की उपलब्धि से अनभिज्ञ नहीं थे और उस समय वह बाबरी ढांचा गिरा भी नहीं था। 2 जुलाई, 1992 को पुरातत्वविदों का एक दल वहां पहूंचा था डॉ. वाई. डी. शर्मा जो सर्वेक्षण के उपमुख्य निर्देशक और डा.एस.पी. गुप्ता जो इलाहाबाद संग्रहालय के संचालक थे वे भी वहां पहुंचे थे। उन्होंने जो कुछ निष्कर्ष दिए थे उसमें लगभग सभी मूर्तियों को 10वीं और 12वीं शताब्दि का माना गया। पर हमारा अंग्रजी मीडिया का एक वर्ग उनका माखौल उड़ाने में अगुवाई कर रहा था। उसी समय 10 से 13 अक्टूबर, 1992 के अयोध्या के तुलसी स्मारक भवन में देश के कोने-कोने से आए 40 पुरातत्वज्ञों की राय उपलब्ध थी। उनकी सारी सुनवाई भी 4 नवम्बर, 1992 को समाप्त हो चुकी थी। फिर उन्होंने उस समय न्याय क्यों नहीं दिया? अंग्रेजी मीडिया के एक वर्ग के चीत्कार और अनाप-शनाप तर्कों के कारण जो बात आज प्रामाणिक मानी गई है, उस पर उस समय विचार करना मुश्किल हो गया था। दशकों की अंतहीन मुकदमेबाजी के उपरांत वह ऐतिहासिक क्षण अंततः इसी 30 सितंबर, 2010 को आ गया और अब तक इस विवाद को सुलज्ञाने की अनिच्छा विषाक्त वातावरण बनाने के कारण नहीं आ सकता था। झूठ की बुनियाद पर खड़े प्रचारतंत्र का महल अंततः इसी 30 दिसंबर, 2010 को ढह गया जब उच्च न्यायालय ने सर्वमत से मंदिर के प्राचीन अस्तित्व को स्वीकार किया।

* लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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1 Comment on "उच्‍चन्‍यायालय का ऐतिहासिक निर्णय और सेक्‍यूलरवादी विषवमन"

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Dr.Rajendra
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युरंड पंथियों की मानशिकता से ये ही अपेक्षा की जा सकती हे, लेख अच्छा लगा ,
धन्यवाद

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