लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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baburhumayunबाबर के पश्चात हुमायूं को भी नही मिला हिंदुओं का सम्मान
राकेश कुमार आर्य
क्षत्रिय जातियों का मूल उद्गम एक ही है
‘पंजाब कास्ट्स’ में सर इबट्सन ने लिखा है-‘‘गूजर पंजाब की सबसे बड़ी आठ जातियों में से एक है। ऊंची जातियों में केवल जाट, राजपूत, पठान, आर्य एवं ब्राह्मण तथा नीची जातियों चमार तथा चूहड़े उनसे संख्या में अधिक हैं। यह डील-डौल और शारीरिक बनावट में जाटों से मिलते-जुलते हैं। सामाजिक रीति-रिवाजों में जाटों के समान हैं दोनों जातियां बिना किसी परहेज के परस्पर खान-पान करती हैं।’’

अहीर, जाट, गुर्जर, राजपूत ये सभी क्षत्रिय जातियां हैं और इनका मूल उद्गम भी एक ही है। इसलिए ये स्वयं को राम और कृष्ण की संतानें मानते हैं। यही कारण है कि इन क्षत्रिय जातियों के कई गोत्र परस्पर मेल खाते हैं। इतिहास के सारे मिथ्या प्रमाणों, मनगढ़ंत साक्ष्यों, और काल्पनिक तर्कों को अलग रखकर केवल एक बात विचारने की है, कि सारी क्षत्रिय जातियों के लिए प्राचीन काल में केवल एक शब्द ‘क्षत्रिय’ ही प्रयोग होता था। फिर यह जातियों का विभाजन कब, क्यों और कैसे हो गया? इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

 

बाबर के समय जाट और गूर्जर शब्द का उल्लेख
बाबर के लिए एस.आर. शर्मा अपनी पुस्तक ‘क्रिसेण्ट इन इंडिया’ के पृष्ठ 235 पर लिखते हैं-‘‘जब जब मैंने हिंदुस्थान में प्रवेश किया है जाट तथा गूजर हमेशा पहाडिय़ों तथा वनों से बहुत बड़ी संख्या में बैल तथा भैंसे लेने के लिए आये हैं, जब मैंने समूचे पड़ोसी प्रांत पर अधिकार कर लिया है उन्होंने यही बात दोहराई है।’’

जाट-गूजर से बाबर विशेष रूप से परिचित रहा, क्योंकि इसके द्वारा भारतवर्ष के जितने क्षेत्रों में युद्घ किये गये हैं या सैन्य कार्यवाहियां की गयीं, लगभग उन सभी स्थानों पर गुर्जर और जाटों ने या तो उसका सामना किया या फिर उनसे बाबर का किसी न किसी प्रकार से सामना हुआ। इन दोनों जातियों ने अपने धर्म और इस देश की राष्ट्रीयता व अस्मिता की रक्षार्थ अपने शौर्य का प्रदर्शन किया।

जाते समय की वसीयत
संसार से जाने का समय निकट देखकर बाबर को चिंता रहने लगी थी। वह अभी और कुछ दिन जीवित रहना चाहता था, पर शरीर और स्वास्थ्य साथ नही दे रहे थे। अत: उसने अपनी वसीयत लिखने का मन बनाया।

बाबर ने एक दिन अपने दरबार के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में कहा-‘‘बहुत दिनों से मेरी इच्छा थी कि मैं अपनी बादशाहत हुमायूं को सौंप दूं, और मैं एकांत में रहकर खुदा की इबादत करूं। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मेरा वह समय आ गया है और मुझे अब राज्य के पूरे अधिकार हुमायं को सौंप देना चाहिए।’’

बाबर ने अपनी बात को कुछ देर विराम लेकर निरंतर जारी रखते हुए आगे कहा-‘‘मेरी अंदरूनी दशा अच्छी नही है, इसलिए मुझे अपने इरादे को पूरा कर डालना चाहिए। इस दशा में मैं आप लोगों के सामने वसीयत करता हूं कि आज से आप लोग मेरे स्थान पर हुमायूं को बादशाह समझेंगे और मेरे साथ आप लोगों ने जिन कत्र्तव्यों का पालन किया है उनको हुमायूं के साथ पूर्ण करेंगे। मैं आशा करता हूं कि हुमायूं अपने अच्छे व्यवहारों से आप लोगों को खुश रखने की चेष्टा करेगा।’’

तब बाबर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं को भी निर्देश देते हुए अपनी अंतिम इच्छा से उसे अवगत करा दिया-‘‘तेरे भाईयों और अपने पूरे परिवार को मैं तुझे सौंपता हूं। मैं इस बात पर विश्वास करता हूं कि अब तक जो मैंने तुझे नसीहतें दी हैं उनको तू भूलेगा नही और सभी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करेगा।’’

बाबर ने ये अपने अंतिम वचन कहकर गहरा मौन साधकर गर्दन नीची कर ली। कुछ देर में उसने जब अपनी गर्दन ऊपर उठायी और अपने परिजनों तथा दरबारियों को एक बार देखना चाहा तो सब एक दूसरे को देखकर आश्चर्य चकित रह गये। बाबर की आंखों में भी आंसू थे और सभी दरबारियों की पलकें भी भीग गयी थीं।

दु:ख से भरे ऐसे परिवेश में बाबर ने अपना उत्तराधिकारी अपने ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं को बनाकर राज्य उसे सौंप दिया। सभी लोगों ने अपने नये बादशाह के साथ पूर्ण सहयोग करने का आश्वासन दिया। हुमायूं ने भी बाबर की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसे आश्वस्त किया कि वह उनके सभी निर्देशों का पालन करेगा।

हुमायूं को मिल गया ताज
हुमायूं के लिए देखने में तो ऐसा लगता है कि जैसे हिन्दुस्थान का ताज यूं ही मिल गया और वह उसे फूल समझकर उससे यूं ही खेलने लगा। पर वास्तव में ऐसा नही था। उसे भारत के ताज को पहने रखने के लिए अभी कई चुनौतियों का सामना करना था। भारत के विषय में वह अच्छी प्रकार जानता था कि इस देश की जनता कितनी स्वतंत्रता प्रेमी है? यहां प्रतिदिन और प्रतिक्षण स्वतंत्रता की ज्योति जली रहती है। वह यह भी जानता था कि जिस नये राजवंश की स्थापना करने वाला बाबर उसे यह राज्य सिंहासन सौंप रहा है, हिन्दुस्थान की जनता अभी तक तो उसे ही अपना शासक नही मान पायी है, तो मुझे कब और कैसे मानेगी या क्यों कर मानने लगी है?

बाबर भारत को भोग नही सका
बाबर हिंदुस्थान को जीतते ही जिस स्वर्ग की कामना कर रहा था वह उसे मिला नही, क्योंकि भारत की स्वतंत्रता प्रेमी जनता उसके विरूद्घ विद्रोह पर उतारू रही, और उससे घृणा करती रही। अंतिम समय में बाबर के रोने का भी यही कारण था कि वह जिस स्वर्ग का आनंद लेने अपने देश से इतनी दूर चलकर आया था, अब वह उससे छूट रहा था और यह भी कि उसमें रहने वाले लोगों ने उसे अपनाया नही, अपना बादशाह माना नही। हुमायूं इस स्थिति से भली प्रकार परिचित था कि हिंदुस्थानियों पर शासन करना और उनका हृदय जीतना सर्वथा असंभव है।

हुमायूं को भी नही मिला जनसमर्थन
हुमायूं राज्यसिंहासन पर आरूढ़ हुआ और उसने धीरे-धीरे हिंदुस्थान को समझने का प्रयास करना आरंभ कर दिया। हुमायूं अपने पिता की भांति वीर और साहसी नही था। उसके शासनारूढ़ होते ही बाबर द्वारा स्थापित किये गये साम्राज्य की नींव हिलने लगी। दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकारी लोग और उनके समर्थक हुमायूं को वैसे ही उखाड़ फेंकना चाहते थे, जिस प्रकार पृथ्वीराज चौहान के वंशजों ने बहुत देर तक दिल्ली सल्तनत का विरोध और प्रतिरोध किया था। इसके अतिरिक्त भारत के हिंदू अपने देश को अफगानों और मुगलों दोनों से ही मुक्त कराना चाहते थे। जिन लोगों ने बाबर के आगमन पर उसके आक्रमण जनित दिल्ली की सल्तनत की दुर्बलता का लाभ उठाकर दिल्ली पर अपना अधिकार करने का इसे अच्छा अवसर माना था, उनके लिए बाबर का हिंदुस्थान में रूकना और उसके पश्चात उसके पुत्र का बादशाह बनना सर्वथा असहनीय था। इसलिए देश की हिंदू शक्ति भी उसे पसंद नही करती थी।

हुमायूं की समस्याएं
हुमायूं के सामने सबसे बड़ी समस्या थी-साम्राज्य के विभाजन की। उसके अन्य भाई अस्करी, हिंदाल व कामरान सत्ता चाहते थे। जबकि हुमायूं उन्हें बाबर की इच्छानुसार प्रेम करते हुए अपना गवर्नर बनाकर रखना चाहता था। हुमायूं के लिए परिवार को एक करके चलना भी कठिन हो रहा था-तो देश को एक कैसे रख सकता था? इसलिए आगरा में बैठकर बदख्शां जैसे सुदूरस्थ क्षेत्रों पर उसकी पकड़ में शिथिलता आ गयी। वैसे भी कंधार और काबुल कामरान को मिले थे, वह नही चाहता था कि उसके ऊपर किसी अन्य का शासन हो। वैसे कामरान की इस मानसिकता का एक दूसरा कारण भी था, वह ये भली-भांति जानता था कि हिंदुस्थान के लोग मुस्लिम शासन और शासक को नही चाहते हैं। इसलिए उन पर बलात् शासन करके मारकाट करते -कराते जीवन-यापन करने से उत्तम है-अपने छोटे से राज्य में अपना जीवन-यापन करना।

ऐसी परिस्थितियों में कामरान ने अपने भाई हुमायूं का असहयोग करना ही उचित समझा। कामरान यह मानकर चल रहा था कि काबुल और कंधार ही बाबर का वास्तविक राज्य है और उसी पर अपना शासन स्थापित रखा जाए। हां, एक बात अवश्य थी कि ये राज्य आर्थिक विपन्नता के लिए अवश्य प्रसिद्घ थे, इसलिए कामरान ने लाहौर और मुल्तान पर भी अधिकार कर लिया।

उसके पश्चात कामरान ने हुमायूं का मूर्ख बनाने के लिए उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। हुमायूं भी संतुष्ट हो गया।

पश्चिम में कामरान से संतुष्ट होकर हुमायूं ने अपने साम्राज्य के पूर्वी भाग पर ध्यान देना चाहा, जहां अफगान लोग एकत्र हो रहे थे। 1532 ई. में उसने दोराहा नामक स्थान पर अफगान सेनाओं को हराया। इन अफगानों ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपना आतंक मचा रखा था।

बहादुरशाह था हुमायूं का कट्टर विरोधी
गुजरात का शासक बहादुरशाह मुगल वंश के दूसरे शासक हुमायूं का कट्टर शत्रु था, उसने ऐसे तत्वों को अपने यहां शरण देनी आरंभ कर दी थी जो मुगल वंश के शत्रु थे या किसी भी कारण से असंतुष्ट होकर उसे उखाड़ फेंकना चाहते थे। हुमायूं भी यह जानता था कि बहादुरशाह के यहां उसके विरूद्घ क्या-क्या हो रहा है? यही कारण है कि जब बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई करके उसके दुर्ग का घेराव कर लिया था और चित्तौड़ को लगभग जीत ही लिया था, तो हुमायूं को यह चिंता हुई कि यदि चित्तौड़ जैसा महत्वपूर्ण दुर्ग बहादुरशाह के अधिकार क्षेत्र में आ गया तो बहादुरशाह की शक्ति में अप्रत्याशित वृद्घि हो जाएगी, जिसका परिणाम होगा-मुगलवंश का विनाश।

अत: हुमायूं स्वयं आगरा से चलकर ग्वालियर पहुंच गया और उसके आने की सूचना पाकर बहादुरशाह चित्तौड़ के राणा से संधि कर वहां से भाग गया।

बहादुरशाह भाग तो गया था, पर इसका अभिप्राय यह नही था कि उसके हृदय में हुमायूं के प्रति शत्रुता के स्थान पर मित्रता के भाव उत्पन्न हो गये थे। वह अब भी स्वयं को हुमायूं का शत्रु ही मानता था और वह हुमायूं के प्रति उसी प्रकार की गतिविधियों में संलिप्त रहता था।

शेर खान उभर रहा था, हुमायूं के शत्रु के रूप में
जिस समय बहादुरशाह जैसे स्वजातीय शत्रुओं और अस्करी, कामरान व हिंदाल जैसे स्वबंधुओं से हुमायूं को शत्रुतापूर्ण षडय़ंत्रों का सामना करना पड़ रहा था, उसी समय एक और व्यक्ति उसका प्रमुख शत्रु तैयार हो रहा था, और उसका नाम था-शेरखां। उसने चुनार दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया था, जब हुमायूं को उसकी विद्रोही प्रकृति का ज्ञान हुआ तो उसने चुनार दुर्ग का घेरा जा डाला। यह घेरा चार माह तक चला, पर शेरखां ने अपनी चालों में हुमायूं को फंसा लिया, उसने हुमायूं के प्रति निष्ठावान रहने का वचन दिया, अपने पुत्र को हुमायूं के दरबार में एक प्रतिभूति के रूप में रख दिया। ुहुमायंू शेरखां पर विश्वास करके वहां से चला आया।

बहादुरशाह और हुमायूं
बहादुरशाह ने एक बार हुमायूं को बड़ी कठिनाई में डाल दिया था। उसने इब्राहीम लोदी के चचेरे भाई तातार खां को सैनिक सहायता दी और 40,000 की सेना के साथ आगरा पर आक्रमण करा दिया। इससे बहादुरशाह की कूटनीति का पता चलता है। उसने तातारखां और हुमायूं दोनों को ही अपना शत्रु माना और युद्घ के माध्यम से दोनों शत्रुओं को दुर्बल करना चाहा। उसके दोनों हाथों में लड्डू थे। यदि तातार खां दुर्बल होता तो वह दिल्ली की ओर बढ़ सकता था, और यदि हुमायूं दुर्बल होता है तो वह आगरा की ओर बढ़ सकता था। परंतु उसकी इच्छानुसार परिणाम नही आया। हुमायूं की मुगल सेना ने तातार खां की सेना को मार भगाया और तातार खां स्वयं भी युद्घ करते हुए मारा गया। इससे हुमायूं को तो क्या लाभ मिलना था, पर बहादुरशाह का एक ‘शत्रु’ जिसे वह मित्र के रूप प्रदर्शित कर रहा था, अवश्य समाप्त हो गया। पर हुमायूं ने भी बहादुरशाह को समाप्त करने के लिए अब मालवा की ओर प्रस्थान कर दिया। बहादुरशाह को जब हुमायूं के आक्रमण की सूचना मिली तो वह भयाक्रांत हो उठा।

बहादुरशाह भागता रहा और छिपता रहा
बहादुरशाह ने भागकर मंदसौर के निकट एक किले में स्वयं को बंद कर लिया। पर हुमायूं ने यहां जिस प्रकार के शौर्य साहस और स्वयं के एक रणनीतिकार होने का परिचय दिया, उससे बहादुर शाह अपने सैन्य सामान को मंदसौर में छोडक़र मांडू की ओर भाग गया। पर हुमायूं माण्डू भी पहुंच गया। उसने माण्डू दुर्ग का घेरा डाला और उसे जीत लिया। तब बहादुरशाह भागकर चांपानेर पहुंचा और वहां के किले में छुप गया। हुमायूं वहां भी पहुंच गया तो बहादुरशाह किसी प्रकार उससे बचकर वहां से भी भाग निकला और अहमदाबाद जहां पहुंचा। वहां से वह अंत में काठियावाड़ चला गया।

बहादुरशाह नही कायरशाह
हुमायूं जहां भी जाता था, वहीं के दुर्ग के कोष को लूट लेता था। इस प्रकार बहादुरशाह तो ‘कायरशाह’ बनता इधर-उधर भाग रहा था पर हुमायूं ‘माल लूट’ रहा था। उसे शत्रु को छकाने में आनंद तो आ ही रहा था साथ ही उसे पर्याप्त धन भी मिलता जा रहा था।

गुजरात और मालवा को हुमायूं ने अपने भाई असकरी को दे दिया और स्वयं मांडू चला गया। असकरी के विरूद्घ शीघ्र ही विद्रोह होने लगे। बहादुरशाह ने भी अपनी शक्ति का संचय किया और वह असकरी को आंखें दिखाने लगा। असकरी अनुभवहीन था, उसे जनता के आक्रोश तथा बहादुरशाह की शक्ति ने भयभीत कर दिया, फलस्वरूप वह भाग निकला और आगरा की ओर चल दिया। उसके आगरा की ओर आने को हुमायूं ने शंका की दृष्टि से देखा और उसे लगा कि वह आगरा पर अधिकार करना चाहता है। इसलिए हुमायूं ने असकरी को राजस्थान में जा पकड़ा। पर दोनों भाइयों में वार्ता होने पर संधि हो गयी।

बहादुरशाह की शक्ति क्षीण हो गयी
गुजरात अभियान से बहादुरशाह की शक्ति क्षीण हो गयी और उसने इसके पश्चात पुन: कभी हुमायूं की ओर देखने या उसके विरूद्घ किसी गंभीर षडय़ंत्र में सम्मिलित होने का दुस्साहस नही किया। कुछ समय पश्चात उसकी मुठभेड़ पुर्तगालियों से हुई, जब वह अपने जहाज पर सवार था। पर मुठभेड़ के चलते वह समुद्र में ही डूबकर मर गया। जो भागते हैं-वे डूबते हैं और जो युद्घ क्षेत्र में डटते हैं वे या तो वीरगति को प्राप्त करते हैं, या फिर धरती का उपभोग करते हैं।

बहादुरशाह ने पहली वाली बात को सत्य सिद्घ कर दिया। इससे हुमायूं को ऊर्जा मिल गयी और जो व्यक्ति हर कदम पर संकटों और चुनौतियों से संघर्ष कर रहा था, उसके लिए एक बड़ी चुनौती स्वत: समाप्त हो गयी। हुमायूं को उसके जाने से असीम प्रसन्नता हुई।

हुमायूं खेलने लगा कबड्डी
हुमायूं के शत्रु अनेक थे। वह उन्हें शांत और नष्ट करने के लिए इधर से उधर भाग रहा था। उसके निरंतर इस भागमभाग के दृश्य को देखकर लगता है कि जैसे वह कबड्डी खेलने लगा था। वह पूरब में जाता तो पश्चिम में विद्रोह हो जाता और उत्तर में जाता तो दक्षिण में विद्रोह हो जाता। कहना न होगा कि उसे उसके शत्रुओं ने निश्चिंत होकर बैठने नही दिया। अत: अब जो व्यक्ति स्वयं शांत नही बैठ सका, उससे जनता के कष्ट निवारण की कैसे अपेक्षा की जा सकती है? जिसे स्वयं को खुजली हो जाए वह दूसरों का क्या उपचार करेगा? हुमायूं के प्रारंभिक वर्ष इसी खुजली रोग से उसे व्याकुल हुआ सा प्रदर्शित करते हैं।

हुमायूं के शासनकाल का विभाजन
हुमायूं के काल को हम दो भागों में बांट सकते हैं-एक वह जब उसने शासन अपने पिता से ेलेकर करना आरंभ किया और एक वह जब उसे शेरशाह सूरी के मरणोपरांत पुन: शासन करने का अवसर मिला। हुमायूं 1530 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ और 1539 ई. तक शासन करता रहा। परंतु शेरशाह (शेरखान) ने उसे 1539 ई. में भारत छोडक़र भागने के लिए विवश कर दिया।

हुमायूं इतना निराश और हताश होकर हिंदुस्थान छोडक़र भागा था कि वह अपने हरम की भी अफगानों से सुरक्षा नही कर पाया था। उसका पूरा का पूरा ‘हरम’ अफगानों ने हड़प लिया और उसका उपभोग किया।

इसके पश्चात हुमायूं 1555 ई. की जुलाई में भारत लौटा। इस प्रकार 16 वर्ष तक वह हिंदुस्थान से बाहर रहा। भला हो शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों का जिनकी अयोग्यता और अकर्मण्यता के कारण हुमायूं को भारत लौटकर पुन: राज्यसिंहासन मिल गया।

यहां से उसका दूसरा शासन काल प्रारंभ हुआ जो अधिक देर नही चला, क्योंकि 1556 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी थी और तब उसका लडक़ा अकबर हिंदुस्थान में उसके राज्य का उत्तराधिकारी बना।

शेरखान की शक्ति का उत्कर्ष
जब हुमायूं दक्षिण में उलझा हुआ था तब शेरखां ने बिहार में स्वयं को सुदृढ़ करना आरंभ कर दिया था। अफगानों को उस समय एक सक्षम और समर्थ नेतृत्व की आवश्यकता थी, जिसे शेरखां ने पूर्ण कर दिया। शेरखां प्रारंभ में हुमायूं से आंख मिचौली करता रहा, उसने हुमायूं का मूर्ख भी बनाया। शेरशाह के पुत्र ने रोहताश दुर्ग (बंगाल) पर अपना नियंत्रण कर लिया। शेरशाह ने हुमायूं के पास संदेश भेजा कि यदि उसे बंगाल का शासक मान लिया जाए तो वह बिहार प्रांत हुमायूं को दे सकता है।

उसने यह भी कहला भेजा कि वह हुमायूं को प्रतिवर्ष दस लाख रूपये भी देता रहेगा। हुमायूं को बंगाल के शासक महमूद ने चेतावनी दी कि वह शेरशाह की बातों में न आये। परंतु हुमायूं को शेरशाह मूर्ख बनाने में सफल हो ही गया। जब वह बंगाल पहुंचा तो शेरशाह ने उसकी अधीनता स्वीकार करने का ऐसा नाटक किया कि हुमायूं ने उसका पूर्ण विश्वास कर लिया। शेरशाह ने हुमायूं को चार माह तक अपने जाल में फंसाये रखा। हुमायूं विषयभोग के साधनों में भटका पड़ा रहा और शेरशाह ने उसके सैनिकों को मारना आरंभ कर दिया। शेरशाह ने 700 मुगल मारकर बनारस पर अपना अधिकार कर लिया, उसने कन्नौज पर अधिकार करने के लिए सेना भेज दी। हुमायूं के कितने ही लोगों को रोहताशगढ़ की जेल में डाल दिया। हिंदुओं की पवित्र नगरी बनारस को हुमायूं के द्वारा भी लूटा गया था, और यहां पर उसने हिंदुओं के साथ क्रूरता पूर्ण व्यवहार किया था।

शेरशाह का साम्राज्य विस्तार
शेरशाह ने बड़ी सावधानी से अपना साम्राज्य विस्तार करना आरंभ किया। उसने बनारस बहराइच, संभल पर अपना वर्चस्व स्थापित किया और जौनपुर पर भी अधिकार कर लिया। अंत में चौसा के युद्घ में शेरशाह ने हुमायूं को निर्णायक रूप से पराजित किया। हुमायूं की भुजा में एक तीर लगा और वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसने अपने सैनिकों को शत्रु का नाश करने के लिए ललकारा, परंतु उसकी ललकार में घबराहट थी, कोई तेज उसमें नही था। इसलिए उसकी ललकार का कोई प्रभाव उसके सैनिकों पर नही हुआ। अंत में वह युद्घ क्षेत्र से भाग लिया। उसका पीछा एक अफगान सैनिक दूर तक करता रहा। रास्ते में आयी नदी में जब उसने घोड़ा ऐसे ही उतार दिया तो घोड़ा अधिक जल होने के कारण उसमें डूबकर मर गया। जबकि हुमायूं अपनी प्राण रक्षा के लिए हाथ पैर मारने लगा। तब एक भिश्ती ने उसे अपनी मुशक फुलाकर दे दी जिससे उसकी प्राण रक्षा हो गयी, अन्यथा ‘कबड्डी खेलता हुआ हुमायूं’ इसी नदी में डूबकर मर जाने वाला था। जब वह युद्घ क्षेत्र से भागा था तो उसके पीछे-पीछे उसकी सेना के आठ हजार लोग भी भाग लिये थे। इसी को कहते हैं-कायरता। उनमें से अधिकांश की मृत्यु इस नदी पर आकर डूबने से हो गयी थी।

इससे शेरशाह की शक्ति बढ़ गयी और उसकी सेना हुमायूं के राज्य के साथ छेड़छाड़ करने लगी।

शेरशाह से पुन: युद्घ
हुमायूं और उसके पिता बाबर के साथ रहने वाले कितने ही मुगल सैनिकों को पहले दिन से ही हिंदुस्थान में सुख नही मिला था, इसलिए अब वे उसका साथ छोडक़र भागने लगे। शेरशाह से अब अगली लड़ाई की तैयारी हुमायूं ने करनी आरंभ कर दी, परंतु उसका साथ छोडक़र अब उसके विश्वसनीय लोग या तो शेरशाह से मिल गये थे या स्वदेश लौटने लगे थे, यहां तक कि आपत्ति के इस काल में उसका साथ छोडक़र उसका सगा भाई कामरान भी लाहौर भाग गया। दूसरी लड़ाई में हुमायूं पराजित होकर आगरा की ओर भागा। परंतु शेरशाह को पीछा करते देख वह लाहौर की ओर चल दिया, वहां से भी उसे खदेड़ा गया तो फिर भक्कर की ओर भाग गया। हिंदुस्थान एक बार हुमायूं विहीन हो गया। क्रमश:

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