लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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sher-shah-suriहम रहे हैं मोक्ष और लोक की स्वतंत्रता के सनातन साधक
राकेश कुमार आर्य
इतिहासकार कानूनगो का कथन
इतिहासकार कानूनगो ने शेरशाह के विषय में लिखा है –“ऐतिहासिक दस्तावेजों की कमी के उपरांत जो कुछ सामग्री उपलब्ध है वह यह बात स्पष्ट कर देती है कि अकबर और उसके उत्तराधिकारियों के साम्राज्य जिन विचारों पर आधारित थे, उनका स्रोत शेरशाह के विचारों में पाया जाता है, मध्यकालीन भारत के शासकों में शेरशाह ही ऐसा शासक था जो नवीन भारत के लिए आदर्श बन सकता है, वह भारत जो हिंदू और मुसलमान दोनों का हो, और जिसमें दोनों के बीच एकता रहे…।”

शेरशाह के विषय में इस लेखक कानूनगो की लेखनी इतने पर संतोष करके ही नही रूकी, उसने उसकी प्रशंसा में यह भी लिख दिया-“शेरशाह और अकबर दोनों के मध्य इस दावे के लिए विवाद हो सकता है कि किसने सबसे पहले परस्पर विरोधी धर्म मतों के मानने वालों के बीच मेल-मिलाप करवाकर एक सबल भारत राष्ट्र के निर्माण का प्रयत्न किया था। शेरशाह ने देश को एक ओजस्वी न्यायप्रिय तथा बुद्घिमत्ता पूर्ण सरकार दी, हिंदुओं के राजनीतिक पुनरूद्घार तथा आर्थिक समृद्घि के लिए कार्य किया एवं दोनों समुदायों को बाह्य एकता की रक्षा करने तथा साथ मिलकर काम करने के लिए बाध्य किया। एक शिशु राष्ट्रीयता के विकास के लिए जो प्राथमिकता आवश्यक है उन्हें उसने पूरा किया, अर्थात उसने जमीन इकसार की और बीज बो दिया।”
सारे तथ्यों को एक ओर रखकर प्रशंसा का ऐसा अतिवादी लेखन सचमुच तिरस्करणीय होता है।

शेरशाह मुगलों का आदर्श भी बना
भारत में जिस मुगलवंश की स्थापना जहीरूद्दीन बाबर ने लोदीवंश को समाप्त कर १५२६ ई. में की उसी मुगलवंश के आगामी बादशाहों के लिए शेरशाह किसी न किसी रूप में आदर्श भी बना, और यह आदर्श उसके भीतर हिंदुओं के विरूद्घ ‘जिहादी’ भावना रखने का था।

हमें ज्ञात होता है कि शेरशाह के शेख निजाम ने कालिंजर के बाहर शिविर में नाश्ता करते समय एक बार कहा था-“इन काफिरों के विरूद्घ जिहाद छेडऩे के समान कुछ भी नही है। यदि आप मर जाते हैं तो शहीद कहलाएंगे, यदि जीवित रहते हैं तो गाजी।”
(संदर्भ: ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ भाग-२ पृष्ठ ८४)

शेख के इन शब्दों ने शेरशाह को उत्तेजित कर दिया। उसने दरयाखां को गोले लाने के आदेशित किया। जब दरया खां ने गोले लाने में कुछ देर कर दी तो शेरशाह की उत्तेजना में और भी अधिक वृद्घि हो गयी। उससे रहा नही गया और वह एक टीले पर चढक़र स्वयं ही बाण चलाने लगा। वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दरया खां पर क्रोधित होते हुए चिल्ला रहा था,-“दरया खां आता नही, वह बहुत देर लगा रहा है।”

मृत्यु की ओर स्वयं चला आया शेरशाह
कुछ देर में गोले ला दिये गये। शेरशाह को कुछ चैन आया। वह टीले से नीचे आ गया और वहीं आकर खड़ा हो गया, जहां गोले रखे थे। उसके लोग उन्हें हिंदुओं के विरूद्घ चलाने लगे। शेरशाह गोले फेंकते अपने लोगों को देखकर अति प्रसन्न हो रहा था, वह नही जानता था कि वह जिहादी बनकर शहीद हो जाने के कितने निकट खड़ा है? कालचक्र स्वयं उसकी मृत्यु बनकर उसे प्रातराश (नाश्ता) के आसन से उठा लाया था और उसे सही उस स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से उसे शहादत मिल जानी थी।

हिंदूवीर के फेंके गये गोले से मरा था शेरशाह
जब शेरशाह निश्चिंत होकर गोले फेंकते अपने सैनिकों को देख रहा था, तभी एक ओर से किसी हिंदूवीर का फेंका हुआ गोला आया और वह शेरशाह के गोलों के ढेर पर आकर पड़ गया। जिससे वहां बारूद में आग लग गयी। भयंकर विस्फोट हुआ। इस विस्फोट में शेरशाह भयंकर रूप से झुलस गया, वह किसी प्रकार अपने शिविर तक तो पहुंच गया, परंतु बच नही पाया। ‘शहीद’ हो गया। जिहादी बनकर ऐसी शहादत पाने की इच्छा हर मुगल बादशाह की रही। इसलिए शेरशाह उनके लिए आदर्श बन गया।

कालिंजर का वीर राजा कीरत सिंह
कालिंजर वह पवित्र स्थान है जहां हिंदू भक्षक शेरशाह सूरी का अंत हुआ था। अपने प्राणों पर खेलकर हिंदू योद्घा अपनी इंच-इंच भूमि के लिए संघर्ष कर रहे थे, और बलिदानों की झड़ी लगी हुई थी। कालिंजर के राजा कीरतसिंह और उनकी सेना बड़ी वीरता से शत्रु का सामना कर रही थी। क्षण भर का भी प्रमाद युद्घ का पासा पलट सकता था, इसलिए योद्घा अदम्य साहस का परिचय देते हुए शेरशाह की सेना पर गोले बरसा रहे थे।

कालिंजर का वह वीर राजा कीरत सिंह था, जिसने कालिंजर में शेरशाह का बड़ी वीरता से सामना किया था और जिसके किसी परम देशभक्त और जिहादी से टक्कर लेकर हुतात्मा हो जाने के लिए कृतसंकल्प सैनिक ने शेरशाह को शहादत की नींद सुला दिया।

शेरशाह के प्रशंसकों ने छिपा लिया तथ्य
शेरशाह के प्रशंसकों ने केवल इतना लिखा है कि कालिंजर में युद्घ के समय बारूद के ढेर में लगी आग से झुलसकर शेरशाह की मृत्यु हो गयी। वह मृत्यु कैसे हुई किसने की, ओर क्यों की? ये सारे प्रश्न उन्होंने अनुत्तरित ही छोड़ दिये। हमने आज तक अपने उस वीर राजा कीरतसिंह की कीर्ति को अपकीत्र्ति बनाया हुआ है, जिसके कारण मुगलों के ‘मार्गदर्शक’ शेरशाह का अंत हो गया था। कीरतसिंह ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए युद्घ किया और उसे अपने शत्रु को समाप्त करने में सफलता भी मिल गयी। उसके लिए अब्बास खां ‘तारीखे शेरशाही’ में लिखता है-

कीरतसिंह की स्त्रियों में एक पातर बालिका थी। शेरशाह ने उसकी अत्यधिक प्रशंसा सुनी थी, वह उसे प्राप्त करने की ही सोचता रहा, क्योंकि उसे भय था कि-“कहीं ऐसा न हो कि वह जौहर कर ले।”

ईश्वर ने कर दिया न्याय
ईश्वर कितना न्यायकारी है कि जिस राजा की पुत्री को वह प्राप्त करना चाहता था और जिसके प्रति वह चिंतित था कि वह कहीं आत्महत्या ही न कर ले, उसी के अभिशाप से शेरशाह स्वयं अवांछित आत्मदाह का शिकार हो गया।

पता नही हमने आज तक ईश्वर के इस न्याय को इतिहास में उचित स्थान क्यों नही दिया? कितनी अच्छी बात समझायी गयी है-

‘एक शिष्य ने अपने गुरू से सहज रूप में पूछ लिया-गुरूजी! ईश्वर कहां है?’
गुरू ने कहा-“वत्स! ईश्वर सर्वव्यापक है सब में है?” इसी संवाद के चलते वहां एक पागल हाथी आ गया। हाथी अनियंत्रित था, और उसका महावत पीछे पीछे भागता हुआ शोर मचा रहा था-रास्ते से हट जाओ, यह हाथी हानि पहुंचा सकता है, क्योंकि यह पागल हो गया है।’ महावत की इस चेतावनी को सुनकर गुरू ने हाथी के लिए रास्ता छोड़ दिया। पर शिष्य गुरूजी की इस बात पर विश्वास करके कि ईश्वर तो सबमें है, मुझमें भी है और हाथी में भी है, इसलिए वह मुझसे क्या कहेगा? रास्ते से नही हटा। पलक झपकते हाथी शिष्य के निकट आ गया। हाथी ने अपने पागलपन का परिचय देते हुए शिष्य को अपनी सूंड से उठाकर दूर झाडिय़ों में फेंक दिया।

शिष्य हाथी के कृत्य से गंभीर रूप से घायल हो गया। गुरूजी ने जब यह दृश्य देखा तो वह तुरंत अपने शिष्य के पास पहुंचे, उसे खड़ा किया। पूछा कि-“हाथी को तुमने रास्ता क्यों नही दिया था?”

शिष्य ने कहा-“आपने ही तो कहा था कि ईश्वर सब में हैं। इसका अभिप्राय था कि भगवान हाथी में भी हैं, और मुझमें भी हैं, परंतु हाथी तो इसके उपरांत भी…। शिष्य की बात पूर्ण होने से पूर्व गुरूजी ने कहा-“अरे मूर्ख ! ईश्वर तो उस महावत में भी था, जो हाथी के पीछे-पीछे भाग रहा था और आवाज लगा रहा था कि मार्ग से हट जाओ, हाथी पागल है। तुमने उसकी बात पर ध्यान क्यों नही दिया था?”

यहां शिष्य है-हमारी युवा पीढ़ी, इसी प्रकार हमारे लिए गुरू है-हर राष्ट्रवादी चिंतक, हाथी है-विकृत इतिहास और महावत है इतिहास के वास्तविक तथ्य जो चाहते हैं बिना किसी लागलपेट के अपना यथावत अपना प्रस्तुतीकरण।

युवा पीढ़ी को विकृत-मदोन्मत्त इतिहास चोटिल कर रहा है, घायल कर रहा है, क्योंकि वह महावत की चेतावनी और गुरू की सच्ची शिक्षा से वंचित रखी जा रही है।

सडक़ बनाने का झूठ भी अब्बास ने लिखा
शेरशाह का दरबारी लेखक अब्बास खां था। जिसने ‘तारीखे-शेरशाही’ लिखी। उसने अपने नायक की प्रशंसा में लिखा है-“उसने सर्वत्र न्यायालय खोले, तथा अपने ही जीवन तक के लिए नही, अपनी मृत्यु के पश्चात तक के लिए अनेक धार्मिक संस्थाओं की स्थापना की। हर मार्ग पर यात्रियों की सुविधा के लिए हर दो कोस पर उसने एक सराय बनायी…तथा एक सडक़ तो उसने पंजाब से बंगाल तक बनायी।”

इसके अतिरिक्त अब्बास खां ने एक सडक़ आगरे से बुरहानपुर, एक आगरे से जोधपुर तथा चित्तौड़ तक और एक लाहौर से मुल्तान तक बनाये जाने का उल्लेख किया है। इतनी बड़ी सडक़ परियोजनाएं आज के युग में भी १०-१५ वर्षों में जाकर तैयार होंगी। उस समय तो देश में सर्वत्र अशांति और उपद्रव का राज्य था और ऐसी परियोजनाएं शांतिकाल में ही संपन्न होती हैं।

शेरशाह ने पांच वर्ष शासन किया और उसमें भी वह कभी निरंतर चार माह भी शांतिपूर्वक शासन नही कर पाया। इसके अतिरिक्त एक तथ्य ये भी है कि अशोक के काल में भी कई राजमार्गों का निर्माण किया गया था तो कई जीर्णोद्घार किया गया था। देश में महाभारतकालीन भी कई राजमार्गों के अवशेष मिले हैं। वैसे भी भारत की सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है, जिसकी उत्कृष्टता की झलक हड़प्पा और मोहनजोदड़ो हमें भली प्रकार देते हैं, जिनमें पूर्णत: एक नगरीय सभ्यता के दर्शन हमें होते हैं। ऐसी उत्कृष्ट भारतीय व्यवस्था की कल्पना को साकार रूप देने वाले भारत के लोगों के लिए राजमार्गों का निर्माण करना और उन पर आश्रय स्थली (सराय) का स्थान-स्थान पर निर्माण कराया जाना कोई बड़ी बात नही थी।

ऐसी परिस्थितियों में शेरशाह को इतने राजमार्गों का श्रेय देना उसके दरबारी लेखक की चाटुकारिता का ही प्रमाण है। कहीं पर भी इतनी सडक़ों के निर्माण के लिए आवंटित किये गये धन के विषय में कोई सूचना हमें नही मिलती।

शेरशाह की प्रशंसा
‘वाकयात-ए-मुश्तकी’ से हमें ज्ञात होता है-“जिस किसी को भोजन की इच्छा होती शेरशाह की रसोई में जाता और प्राप्त कर लेता। उसके शासन काल में देश में इतनी सुरक्षा थी कि चोरी डकैती तथा लूटपाट का तो नाम भी नही था। गोंड देश से लेकर अपनी राज्य सीमा तक प्रत्येक दिशा में, हर कोस पर उसने सरायें तथा आरामगाहें बनाये। गोंड देश से अवध प्रांत तक एक सडक़ का निर्माण कराया, जिसके किनारे सरायें, बगीचे तथा छायायुक्त फलदार वृक्ष थे। बगीचों तथा सरायों समेत दूसरी सडक़ उसने बनारस से बुरहानपुर तथा एक आगरा से जोधपुर बनायी। इन सडक़ों पर कुल १७०० सरायें थीं और प्रत्येक सराय पर अश्वयुग्म तैयार रहता था, फलत: एक दिन में ३०० कोस तक समाचार पहुंच जाता। हर दिशा से प्रार्थना पत्र आते तथा उसके उत्तर भेजे जाते थे।”

तनिक बगीचा शब्द पर ध्यान दें
सुबुद्घ पाठक वृन्द! तनिक बगीचा शब्द पर ध्यान दें। किसी भी सडक़ के बनाये जाने पर बगीचे तथा छायायुक्त फलदार वृक्ष २-४ वर्ष में तो लग नही पाते और ना ही इतने बड़े हो सकते कि उन्हें बगीचा कहा जा सके।

शेरशाह के लिए ये दावे कितने असत्य या भ्रमोत्पादक हो सकते हैं, इसके लिए अब्बास खां का यह कथन मननीय है-“उसका विजयी सैन्यदल लोगों की खेती बाड़ी न उजाड़ दे और जब वह सेना के साथ कूच करता था तो स्वयं खेतीबाड़ी की व्यवस्था देखता जाता था, और घुड़सवारों को चारों ओर यह देखने के लिए फैला देता था कि सेना के जवान किसानों की खेती को क्षतिग्रस्त न करें, ऐसे व्यक्ति को कठोर दण्ड दिया जाता था, जो उसके इन निर्देशों का उल्लंघन करता था। इन सभी बातों का सैनिकों पर चमत्कारिक प्रभाव हुआ।”

यह कथन अब्बास खां के ही उस कथन के विपरीत है, जिसमें उसने लिखा है कि शेरशाह ने किस प्रकार हिंदू गांवों को नष्ट कर वहां मुस्लिम लोग बसाये तथा हिंदुओं के खेतों की फसल को वह कैसे नष्ट करा देता था। या तो अब्बास खां का वह कथन झूठा है या फिर यह कथन उसने केवल शेरशाह के राज्य के मुस्लिम किसानों के लिए कहा है?

मुगलों को नष्ट करने का लिया संकल्प
शेरशाह सूरी का उदय भारत में पुन: अफगान राज्य स्थापित करने के लिए हुआ था। इससे अपने देश भारतवर्ष के हिंदू समाज का कोई लाभ होने वाला नही था। हिंदू समाज की स्थिति तो वही रहनी थी जो दो पाटों के बीच में दाने की हो जाती है। मुगलों को वह भारत की राज्यसत्ता का दावेदार नही मानता था, उसे उठते बैठते अपने साम्राज्य की स्थापना करने और मुगलों को मार-मार कर देश से बाहर भगा देने की चिंता रहती थी। यह हिंदुओं या मुगलों का नही, उसका स्वयं का कहना था-”अगर किस्मत ने मेरा साथ दिया तो मैं इन मुगलों को हिंदुस्थान से खदेड़ दूंगा। वे हमसे बेहतर योद्घा नही हैं, किंतु हमारे आपसी मतभेदों के कारण सत्ता हमारे हाथों से खिसककर उनके हाथों में चली गयी। मैं मुगलों के बीच रहा हूं। उनके व्यवहार को मैंने सूक्ष्मता से देखा है और मैंने पाया है कि उनमें व्यवस्था और अनुशासन की कमी है। उनकी अगुवाई का दम भरने वाले, ऊंचे कुल और पद के घमण्ड में चूर रहने के कारण निगरानी के फर्ज को ठीक से अंजाम नही देते, और सब कुछ मातहतों पर छोड़ देते हैं, जिन पर वे आंखें मूंद कर भरोसा करते हैं। ये मातहत अत्यंत भ्रष्ट हैं। उन्हें अपने निजी लाभ की चिंता होती है और वे सिपाही और शहरी दुश्मन और दोस्तों में अंतर नही करते।”
(संदर्भ : ‘मध्यकालीन भारत’ खण्ड-२ संपादक हरीशचंद वर्मा पृष्ठ ८)

शेरशाह चाहता था भारत में अफगान राज्य की स्थापना
इस कथन से स्पष्ट है कि शेरशाह को भारत में अपने अफगान राज्य की पुन: स्थापना की चिंता थी। वह मुगलों को अत्यंत शिथिल और अफगानों की अपेक्षा हीन योद्घा मानता था।

हिंदू संन्यासी भी राष्ट्र चिंतक होता है
हिंदू के लिए स्वतंत्रता जीवन का ध्येय है। अंतिम ध्येय मोक्ष भी स्वतंत्रता का ही समानार्थक है। हमने स्वतंत्रता और राष्ट्रसाधना को एक दूसरे का पूरक माना है, राष्ट्र का अभिप्राय है-प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने जीवन की उन्नति के लिए सभी अवसरों का उपलब्ध होना और स्वतंत्रता का अभिप्राय है-इन सभी अवसरों का उपयोग जगत (राष्ट्र) के उद्घार के लिए करना।

इस्लाम की व्यवस्था भारत की इस व्यवस्था के विपरीत दिशा में बहती है। वहां राष्ट्रों का विध्वंस कर स्वतंत्रता का हनन और व्यक्ति की सर्वांगीण उन्नति को बाधित करने हेतु राजनीति में उत्पात, उन्माद और उग्रवाद उसके चरित्र के रूप में स्पष्ट झलकता है। उत्पाद, उन्माद और उग्रवाद की इस त्रिवेणी के अतिरिक्त जब भारतीयों को इस्लामी शासन में कुछ नही दिख रहा था, तब उन्होंने उस शासन के विरूद्घ विद्रोह का रास्ता अपना लिया और सदियों तक उसी रास्ते पर चलते रहें।

स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग
स्वामी विवेकानंद के जीवन का एक प्रसंग हमारी इस बात को स्पष्ट करेगा कि यहां संन्यासी भी राष्ट्रचिंतक होता है। कहा जाता है कि एक बार स्वामी जी भारत भ्रमण करते हुए दक्षिण में रामनाड राज्य के केन्द्र मदुरा में पहुंचे। यह स्थान अब तमिलनाडु प्रांत में आता है। वहां स्वामी जी का राजा भास्कर सेतुपति से परिचय हुआ। राजा विद्वान था। वे स्वामी जी के वात्र्तालाप से बहुत प्रभावित हुए और उनके शिष्य भी बन गये। राजा सेतुपति ने स्वामी जी से एक दिन प्रश्न किया-

महाराज! आपने संसार से वैराग्य लिया हुआ है, फिर भी आप देश के जनसाधारण की स्थिति से चिंतित तथा व्यथित रहते हैं, और इसे उन्नत बनाने के लिए शिक्षा का विस्तार हो कृषि उन्नत हो, आदि विषयों पर चर्चा करते रहते हैं। ऐसा क्यों? स्वामी जी ने राजा से कहा-‘मोक्ष अवश्य ही संन्यासी के जीवन का लक्ष्य है, परंतु मुझे मेरे गुरूदेव से यही आदेश प्राप्त हुआ है कि भारतवर्ष की जनता की उन्नति करने की चेष्टा करना भी मोक्ष प्राप्ति का एक साधन है। त्याग और सेवा इस देश के राष्ट्रीय गुण हैं। राजा यह सुनकर इस ‘सर्वजनहिताय’ संन्यासी के प्रति और भी नतमस्तक हो गये।’

संन्यासी को मोक्ष तभी शोभायमान होता है, जब उसके जीवन में लोकोपकार की प्रधानता रही हो और हर व्यक्ति तथा हर प्राणी को अपनी स्वतंत्रता के उपभोग का पूरा-पूरा अधिकार प्राप्त हो, इसका निरीक्षण करना हर संन्यासी का पवित्र उद्देश्य होता है। संन्यासी या ऋषि लोगों के मंतव्य को पूर्ण करने का दायित्व हमारे देश में प्राचीन काल से ही क्षत्रिय वर्ग पर रहा है।

स्वतंत्रता में वैश्य वर्ग के अर्थ की महत्ता
ऋषि जो बोलेगा या जो निर्देश देगा-उसमें लोककल्याण अथवा हर जीव की नैसर्गिक स्वतंत्रता के उपभोग की अनिवार्यता अवश्य होगी। इस प्रकार हर व्यक्ति के और हर प्राणी के द्वारा नैसर्गिक स्वतंत्रता के उपभोग की अनिवार्यता को सुनिश्चित करना हर क्षत्रिय का पावन कत्र्तव्य है। क्षत्रिय के इस कत्र्तव्य की पूर्ति में सहायक होता है-वैश्य का अर्थ। लोकोपकार के लिए दान देना वैश्य अपना अहोभाग्य मानता है। इसी प्रकार शूद्र इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण करने हेतु अपनी सेवा देने को अपना सौभाग्य मानता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही जीवन और जगत का समन्वय इस प्रकार बैठाया गया है कि उनमें पग-पग पर स्वतंत्रता ही दृष्टिगोचर होती है।

ऐसा पवित्र भारत अपने इन्हीं राष्ट्रीय गुणों के कारण ही सल्तनत काल और मुगलकाल में निरंतर स्वतंत्रता की साधना कर रहा था। गीता का सार है-निष्काम भाव से कर्म करना, और वेद का आदेश है सौ वर्ष तक कर्मशील बने रहकर मोक्ष की प्राप्ति करना। ये दोनों बातें बहुत बड़ी जीवन साधना की ओर संकेत करती हैं। संसार के कथित प्रगतिशील और सभ्य देश भारत की जीवन साधना के इस अद्भुत रहस्य को अभी तक समझ नही पाये हैं।

हमारी स्वतंत्रता के अर्थ
कहने का अभिप्राय है कि मध्यकाल में जिस स्वतंत्रता के लिए हम संघर्षरत थे-उसका अभिप्राय केवल राजनीतिक ही नही था-उसका अर्थ मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति और सर्वांगीण स्वतंत्रता से संबद्घ था। उस संघर्ष का अर्थ था-संपूर्ण मानवता को दानवता से मुक्त रखना। यह दुर्भाग्य हमारा तो है ही कि हम अपने स्वतंत्रता सैनानियों के अभिप्राय को समझने में चूक करते रहे-साथ ही संसार के लिए तो यह स्थिति और भी अधिक लज्जास्पद रही है कि उसने भारत के स्वातंत्र्य समर खण्ड को पराधीनता का काल कहकर पुकारा। जिस काल को संपूर्ण मानवता के हितार्थ लड़ी गयी सबसे दीर्घकालीन लड़ाई के नाम से विश्व इतिहास में स्थान मिलना चाहिए था- हमने उसकी हत्या कर दी। कृतघ्नता भी हमारी कृतघ्नता को देखकर लज्ज्ति होकर रह गयी।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस का प्रवचन अभी अभी समाप्त नही हुआ था कि एक प्रश्न किसी श्रद्घालु ने कर दिया-“संसार के कार्यों में व्यस्त रहते हुए ईश्वर की आराधना संभव है, या नही?”

स्वामी जी ने कहा-“ग्रामीण स्त्री को चूड़ा बनाते तो देखा होगा। वह अपने एक हाथ से चूड़ा हटाई जाती है, दूसरे हाथ से बच्चे को गोद में लेकर दूध पिलाती है। यदि कोई पड़ोसिन आ जाए या अन्य व्यक्ति उस समय उसके पास आ जाता है, तब वह उससे बातें भी करती जाती हैं। खरीददार आ जाने पर वह उससे अपना हिसाब भी करती है। इस प्रकार नाना प्रकार के कार्यों को निपटाते हुए भी उसका ध्यान अपने कार्य की ही ओर लगा रहता है। उसका मन हर समय ओखली और मूसल में ही रहता है। वह जानती है कि यदि चूक हुई तो मूसल से अनिष्ट हो जाएगा। अत: इन सब कार्यों को करते हुए भी वह अपना ध्यान भंग नही होने देती।
इस प्रकार संसार में रहते हुए सभी काम करो, किंतु मन को एक पल के लिए भी प्रभु चरणों से इधर-उधर न करो। सच्ची आराधना का यही सार है।”
हमारी यह उत्कृष्ट आराधना जीवन के हर क्षेत्र में हमारा मार्गदर्शन करती रही है हमने मोक्ष की परम स्वतंत्रता के लिए लोक की वैयक्तिक स्वतंत्रता की आराधना की साधना की है, और यह साधना हमारी थाती है, जिसे खोने का अर्थ होगा स्वयं को खो देना।

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