लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

पांच राज्यों में हुए चुनाव के जो परिणाम सामने आए हैं, उनसे तय हुआ है कि मतदाता सशक्त और जागरूक हुआ है, जिसके चलते उसने सभी दलों के अतिवाद को नकारा है। इस बार उत्तर-प्रदेश में सबसे ज्यादा निर्लज्जता से कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण और छोटी जातियों के वोट हथियाने का दांव चला, जिसे मतदाता ने खारिज कर दिया। इन परिणामों ने यह भी जाहिर किया है कि देश में अब धर्म और जाति की राजनीति खारिज होने लगी है। इस परिप्रेक्ष्य में जिस उमा भारती को भाजपा ने उत्तर-प्रदेश में उतारकर यह जताने की कोशिश की थी कि उमा राम मंदिर निर्माण में भूमिका निर्वाह के लिए एक विश्वसनीय चेहरा हैं, उसे भी मतदाता ने मध्य-प्रदेश का रास्ता दिखा दिया। इन चुनावों में जहां भ्रष्टाचार और मंहगार्इ के चलते कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है, वहीं मायावती को जनता ने यह सबक दिया है कि देश की जनता प्रस्तर प्रतिमाओं में आस्था जरूर रखती है, लेकिन कोर्इ सरकार बुतपरस्ती को ही विकास का जरिया मान ले, यह स्थिति बर्दाश्त से बाहर है। यह जनादेश केंद्र की संप्रग सरकार के खिलाफ भी अविश्वास का संकेत है। उदारवादी आर्थिक नीतियों को झेलते जाना, अब जनता की वश की बात नहीं रही ? लिहाजा इन नीतियों में बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत है, अन्यथा 2013 में होने वाले छह राज्यों के विधानसभा और 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को ऐसे ही नकारात्मक नतीजों का सामना करना पड़ सकता है।

इन चुनावों में अतिवादी दांव आक्रोश जताने की हद तक कांग्रेस ने खेले। सबसे बड़ा दांव कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने मुस्लिमों को पिछड़े वर्ग के कोटे से 4.5 फीसदी आरक्षण देकर खेला। इससे भी एक कदम आगे बढ़कर मुस्लिमों को चुनावी मंचों से दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद और बेनीप्रसाद वर्मा ने यह भरोसा भी दिया कि यदि उत्तर-प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो इस आरक्षण को बढ़ाकर दुगना कर दिया जाएगा। यही नहीं कांग्रेस ने मुस्लिम मतदाताओं को ललचाने के लिहाज से बटला हाउस में हुर्इ आतंकवादी मुठभेड़ को फर्जी बताकर मारे गए आंतकवादी को निर्दोष साबित करने की जलील कोशिश भी की। ये दोनों ही दांव कांग्रेस को उलटबांसी साबित हुए और हिन्दुओं समेत बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी कांग्रेस के इन घटनाक्रमों को सांप्रदायिकता को तूल देना माना। यहां गौरतलब यह भी है कि जब बटला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी तो दिल्ली और केंद्र में कांग्रेस की सरकारें हैं, उसने सीबीआर्इ जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी क्यों नहीं किया गया? ओबीसी के कोटे से 4.5 फीसदी आरक्षण अल्पसंख्यक वर्ग को दिया जाना, पिछड़ी जातियों को नागवार गुजरा। इस कारण ये जातियां और अन्य सवर्ण जातियां ध्रुवीकृत हुर्इं और सपा के पक्ष में मतदान किया। मतदाताओं के इस सबक को सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि अब मतदाता धर्म और जाति के मुददों से ऊपर उठकर विकास की ओर ताकने लग गया है। यही कारण है कि केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुर्इस फर्नाडिस को भी मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र से हार का मुंह देखना पड़ा।

राहुल गांधी अपनी चुनावी सभाओं में जिन आक्रामक तेवरों के साथ पेश आए, उनकी तुलना में मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव सरल और सादगी से पेश आए। गुस्से की जगह न केवल उनमें विनम्रता थी, बल्कि समाजवादी पार्टी की गुंडर्इ छवि की कालिख साफ करने के प्रति भी सचेत थे। इसलिए डीपी यादव जैसे माफिया सरगना को पूरे चुनाव में दूर रखा। इससे उनकी कथनी और करनी में भेद जनता के देखने में नहीं आया। उन्होंने करीब तीन सौ चुनावी सभाएं कीं, किंतु एक भी सभा में न तो अंहकार दिखाया और न ही दल के वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा की। दूसरी तरफ राहुल ने मंच पर ऐसी ऐकला चलो की एकपक्षीय रणनीति अपनार्इ की विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस उम्मीदवार का परिचय भी मंच से सभा में मौजूद जन समूह को नहीं कराया।

दूसरी तरफ नतीजों की घोषणाओं के बीच अखिलेश ने समाचार चैनलों को दिए साक्षात्कार में विनम्रता बरतते हुए कहा, सपा की सरकार बनी तो कानून व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। पार्टी भयमुक्त वातावरण देगी और चुनावी घोषणा-पत्र के बिन्दुओं पर अमल करेगी। एक युवा नेता यदि यह सोच रहा है कि माफियाराज यदि उत्तर-प्रदेश की हकीकत है, तो इस हकीकत को बदलना चाहिए। यह अच्छी और परिपक्त सोच का संकेत है। कांग्रेस के रणनीतिकार राहुल बाबा को भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देख व पेश कर रहे थे। लेकिन जनता ने राहुल के नेतृत्व को नामंजूर कर दिया। क्योंकि इन चुनावी सभाओं में राहुल की कहीं भी परिपक्व नेतृत्व क्षमता देखने में नहीं आर्इ। लिहाजा फिलहाल राहुल के कंधों पर भविष्य की जिम्मेबारी डालने से कांग्रेस बचकर रहेगी तो यह उसकी सेहत के लिए अच्छा ही होगा।

उत्तर-प्रदेश की दीवारों पर लिखा यह नारा अब सच्चार्इ में बदल चुका है कि ‘जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। लेकिन पिता मुलायम और पुत्र अखिलेश की चुनौती यहीं से शुरू होने वाली है। सरकार बनाने में तो अब उन्हें कोर्इ दिक्कत पेश होने वाली नहीं है, क्योंकि जनता ने उन पर भरोसा कर उन्हें स्पष्ट बहुमत के आंकड़े से नवाज दिया है। इस बहुमत ने यह साबित कर दिया कि मतदाता किसी एक को हराने का मन बना लेता है तो किसी एक दल को जिताने का भी मन बना लेता है। मुलायम सिंह को सरकार चलाने में आसानी होगी, क्योंकि वे अनुभवी हैं। किंतु उनके दल ने घोषणा-पत्र में जो हवार्इ वादे किए हैं, उन पर अमल करना आसान नहीं होगा। सच्चर समिति की सिफारशें लागू करने की बात के साथ मुस्लिम आरक्षण 18 फीसदी तक कर देने का भरोसा मुसिलमों को दिया है। जबकि 18 फीसदी आरक्षण संविधान में संशोधन किए बिना संभव नहीं है ? अब इस वादे को वह कैसे पूरा कर पाती है, यह एक बड़ा सवाल है। कक्षा दसवीं और बारहवीं के छात्रों को लैपटाप भी मुफ्त में देने की बात कही है। इसके साथ ही किसानों के पचास हजार रूपए तक के कर्ज माफ करने की अब ये वादे अर्थव्यवस्था के कौन से नए स्रोत हासिल करके पूरे किए जाएंगे इस मायवी खेल को समझना फिलहाल मुश्किल ही है।

फिलहाल इतना जरूर है कि सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले प्रदेश में राष्ट्रीय दल कांग्रेस और भाजपा ने जिस तरह से अपनी राजनीतिक पूंजी गंवार्इ है, उससे ऐसे हालात निर्मित हो जाने के संकेत मिल रहे हैं कि अब उत्तर-प्रदेश तमिलनाडू की प्रणाली पर आगे बढ़ रहा है। जहां एक बार बसपा को सत्ता नसीब होगी तो दूसरी मर्तबा सपा को। ये हालात निर्मित होते हैं तो आगे चलकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को रायबेरली और अमेठी भी जीतना मुशिकल होंगे। क्योंकि अमेठी की 15 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने महज दो सीटें ही हासिल की हैं। हालांकि सोनिया और राहुल प्रत्येक तीन माह में इन क्षेत्रों का दौरा करके यहां के विकास कार्यों का जायजा तो लेते हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि अमेठी और रायबरेली के बाहर भी उत्तर-प्रदेश का विस्तार है।

पंजाब ने इस बार करबट बदलकर यह इतिहास रचा है कि अच्छा काम करोगे तो जनता दोबारा से भी सत्ता की बागडोर सौंप देगी। अकाली और भाजपा गठबंधन को यहां मिली करिश्मार्इ कामयाबी ने यह संदेश पूरे देश को दे दिया है कि पंजाब में वह हो गया, जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। हालांकि पंजाब में कांग्रेस की यह मजबूरी थी कि उनके पास अमरेन्द्र सिंह के अलावा बतौर मुख्यमंत्री कोर्इ दूसरा चेहरा नहीं था। हालांकि अंबिका सोनी को विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था, लेकिन केंद्रीय संगठन की मंशा नहीं होने के कारण पंजाब में अंबिका को नहीं उतारा जा सका। अमरेन्द्र सिंह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने के साथ पारिवारिक प्रतिद्वंद्विता की लड़ार्इ भी राजनीति के स्तर पर लड़ रहे हैं। सामंती परिवार से होने के कारण भी आम जनता से उनकी दूरी है। इसलिए कांग्रेस को यहां यह सबक भी है कि वह भ्रष्टाचार और सामंतशाही से अब तो मुक्त होने के नए रास्ते तलासे।

उत्तर-प्रदेश में भाजपा की सभी कोशिशें रसातल में समा गर्इं। पहली भूल बनाम हठ तो उसने चुनाव की कमान परदेशी उमा भारती को सौंपकर की और दूसरी भूल भ्रष्टाचार के चलते बसपा से निष्कासित बाबू सिंह कुशवाहा को गले लगाकर की। ये गलतियां ऐसी थीं, जिन्होंने सपा का सत्ता तक पहुंचने का रास्ता प्रशस्त किया। हालांकि संगठन के स्तर पर भाजपा कांग्रेस की तुलना में अच्छी स्थिति में थी। साधु समाज और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठनात्मक ढांचा उसे गति दे रहा था, फिर भी उम्मीदों के अनुरूप परिणाम न ला पाना भाजपा के लिए एक राष्ट्रीय दल होने के नाते चिंता का विषय है। फिर भी भाजपा ने गोवा, पंजाब और उत्तराखण्ड में अच्छा प्रदर्शन कर अपनी साख बचा ली है। बहरहाल इन चुनाव परिणामों से यह तय हुआ है कि देश का मतदाता सशक्त होने के साथ हर प्रकार के अतिवाद को नकारने की स्थिति में पहुंच गया है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छी शुरूआत है।

 

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