लेखक परिचय

अमित राजपूत

अमित राजपूत

जन्म 04 फरवरी, 1994 को उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले के खागा कस्बे में। कस्बे में प्रारम्भिक शिक्षा के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास और राजनीति विज्ञान विषय में स्नातक। अपने कस्बे के रंगमंचीय परिवेश से ही रंग-संस्कार ग्रहण किया और इलाहाबाद जाकर नाट्य संस्था ‘द थर्ड बेल’ के साथ औपचारिक तौर पर रंगकर्म की शुरूआत की। रंगकर्म से गहरे जुड़ाव के कारण नाट्य व कथा लेखन की ओर उन्मुख हुए। विगत तीन वर्षों से कथा लेखन व नाट्य लेखन तथा रंगकर्म के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों में सक्रिय भागीदारी, किशोरावस्था से ही गंगा के समग्र विकास पर काम शुरू किया। नुक्कड़ नाटकों व फ़िल्मों द्वारा जन-जागरूकता के प्रयास।

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अमित राजपूत

अयोध्या.. यानी श्री राम जन्मभूमि स्थल। जी हाँ, यद्यपि श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या आए दिन चर्चा और विवादों का विषय बनी रहती है। तथापि यह व्यक्तिगत मेरे लिए किसी विवाद का विषय नहीं है और न ही हो सकता है। प्रमाण स्वरूप मैने आलेख के आरम्भ में ही अयोध्या को श्री राम जन्मभूमि स्थल मान लिया है। वास्तव में कथित श्री राम जन्मभूमि विवाद ठीक उसी तरह है जैसे इस बात को सिद्ध करना हो कि तुम्हारा बाप कौन है और तुम घर के किस स्थान/कमरे में पैदा हुए थे, जबकि तुम्हारी माता और वह घर सब कुछ सप्रमाण सुरक्षित हो और जानबूझ कर आवश्यक कार्यवाई या प्रक्रियाबद्ध जांच न की जाए जो कि सरलतम प्रक्रिया का हिस्सा है। सारशः यह सिद्ध करना ही अपने आप में दकियानूसी फसाद है। श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के निर्माण का विवाद भी ऐसा ही दकियानूसी फसाद है।

वास्तव में मन्दिर निर्माण के साथ ही हमारी पारम्पिक शिक्षा व्यवस्था, योग व आध्यात्म आदि की व्यवस्था दुबारा स्थापित हो सकेगी। हांलाकि मन्दिरों को नष्ट करने के पीछे संस्कृति विनष्ट करने की मुस्लिम आक्रान्ताओं की चेष्ठा थी। फिर भी आख़िरकार यह विवाद छिड़ा ही सही, तब भी इसका निबटारा जाने कब के हो जाता, लेकिन इससे जुड़े तमाम पक्ष, विपक्ष और ढेरों वैधानिक व गैर-वैधानिक या कथित भावनाओं से लब्धप्रद जनों की बदौलत यह विवाद आज तक विवाद ही बना रहा, इसमें मुस्लिम समुदाय से ज़्यादा इस विवाद को बढ़ाने में तथाकथित सेक्युलरों की भूमिका अव्वल रही है।

इस श्री राम जन्मभूमि मन्दिर विवाद के मूल इतिहास पर एक नज़र डालें तो हमें साफ़ दिखता है कि सन् 1527 ई. में मुस्लिम शासक बाबर फरगना से भारत आया था। उसने चित्तौड़गढ़ के हिंदू राजा राणा संग्राम सिंह को फ़तेहपुर सीकरी में परास्त कर दिया। बाबर ने अपने युद्ध में तोपों और गोलों का इस्तेमाल किया। जीत के बाद बाबर ने इस क्षेत्र का प्रभार मीर बांकी को दे दिया, जो बाबर की सेना का कमॉण्डर इन चीफ़ भी था। मीर बांकी ने उस क्षेत्र में मुस्लिम शासन लागू कर दिया। उसने आम नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए आतंक का सहारा लिया। मीर बांकी सन् 1528 ई. में अयोध्या आया और राज्य के प्रतीक एवं प्रजा की आस्था के केन्द्र श्री राम मंदिर को तोड़कर मस्ज़िद बनवाया।

इससे पहले मस्ज़िद में नमाज अता करने वाले मुसलमानों का भारत में कोई और इतिहास व प्रमाण है ही नहीं। यानी यदि यह प्रमाण हो कि यहां श्री राम जन्मभूमि मन्दिर था तो फिर इस मस्ज़िद सहित तमाम मस्ज़िदों पर प्रश्न चिह्न तो खड़ा ही हो सकता है। मीर बांकी का इतिहास तो सबके सामने ही है। इसके अलावा जितने भी मध्यकाल के इतिहासकार हैं वो सभी एक स्वर में ये कहते हैं कि यहां श्री राम जन्मभूमि में जो बाबरी मस्ज़िद बनाई गई है वो मन्दिर को तोड़ कर बनाई गई है। और पहला सर्वे जो अंग्रज़ों के द्वारा हिन्दुस्तान में किया गया वो सन् 1838 ई. में मार्ट गुमरी ने ‘सर्वे जनरल ऑफ़ इण्डिया’ के नाम से किया था, जिसमें उन्होने अयोध्या को भारत की कुछ प्रमुख नगरियों में शामिल किया है और श्री राम जन्मभूमि मन्दिर की भव्यता का वर्णन करते हुए उसके तमाम प्रमाण दिए हैं। साथ ही ‘नवजीवन’ के भीतर गांधी जी ने भी इन तमाम मस्ज़िदों को जो मन्दिरों को तोड़कर बनाई गई हैं उन्हें मुग़ल काल की ग़ुलामी का प्रतीक मानते हैं। और इसके अलावा भी जिसे अन्य तमाम प्रमाणों का अम्बार चाहिए तो वह अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ या फिर विश्व हिन्दू परिषद से निजी तौर पर प्रमाण मांग सकता है। ज़ाहिर है कि तब ऐसे में अयोध्या में किसी कथित बाबरी मस्ज़िद का प्रश्न ही नहीं है।

वास्तव में यही कारण रहे होंगे कि हमें 20वीं शताब्दी के अन्तिम दशक की शुरुआत के पहले-पहले भारतीय अस्मिता और सनातन संस्कृति के केन्द्र अयोध्या पर अवस्थित श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के पुनर्जागरण हेतु लोगों के मन में उपज रही चेतना के प्रमाण भी मिलने शुरू हो गए थे, जब 30 जनवरी 1990 को हज़ारों रामभक्तों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गई अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। इसके बाद 2 नवम्बर 1990 को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें कोलकाता के राम कोठारी और शरद कोठारी (दोनों भाई) सहित अनेक रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दे दीं।

इन सबके परिणाम स्वरूप समय आया था एक ऐतिहासिक रैली का जब 4 अप्रैल 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर अभूतपूर्व रैली हुई। इसी दिन तब तक कारसेवकों के हत्यारे समझे जाने वाले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया था। मुलायम सिंह के इस्तीफ़े के बाद श्री राम भक्तों के हृदय में उल्लास का भाव पैदा हो गया था और सितम्बर, 1992 में भारत के गांव-गांव में श्री राम पादुका पूजन का आयोजन किया गया और गीता जयंती (6 दिसम्बर 1992) के दिन रामभक्तों से अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया गया। फलस्वरुप लाखों राम भक्त 6 दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और श्री राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वारा बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्ज़िदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।

निःसंदेह हमारे सुशासन और एकता के प्रतीकों के पुनरुद्धार के लिए जब-जब चेतना जन्म लेती है तो कुछ बिखराव अवश्य होता है, क्योंकि हमारे समाज में उन ग़ुलामियों के पैरौकार भी कुछ हद तक ज़रूर बसे होते हैं, शायद जिन्हें अपनी जड़ों से स्नेह नहीं होता है। लिहाजा अब आज स्थित यह है कि हिन्दू समाज के लोग एवं अधिग्रहण की मानसिकता से परे अपने प्रतीकों को पहचानने वाले कथित मुसलमानों का एक बड़ा समुदाय बाबर के उस आतंक के प्रतीक को समाप्त कर पुनः श्री राम मन्दिर के भव्य निर्माण की मंशा रखता हैं और रही बात अयोध्या में मुसलमानों के नमाज अता करने की तो उसके लिए भी यह राष्ट्रवादी भावों से भरा मंतव्य यह मनन करता है कि भारत का एक भी मुसलमान भारतीय माटी को हड़प कर बनाए गए मस्ज़िद में अपनी नमाज नहीं पढ़ेगा। इसलिए भारतीय ख़ुशबू को महसूस करने वाले मुसलमानों के लिए भी श्री राम मन्दिर निर्माण के लिए आगे आने वाले कंधे सरयू नदी के उस पार अपने हाथों से पाक मस्ज़िद का निर्माण करवाएंगे और उसी में हमारे मुसलमान अपनी नमाजें अता करेंगे न कि बाबरी में। इसके अलावा भी इस्लाम स्वयं बाबरी मस्ज़िद को नापाक और नमाज अता न करने योग्य स्थल मानता है क्योंकि इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार ज़ोर-ज़बरदस्ती से प्राप्त की गई भूमि पर पढ़ी गई नमाज अल्लाह स्वीकार नहीं करते हैं और न ही ऐसी सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित (वक़्फ) की जा सकती है। किसी मन्दिर को विध्वंस करके उसके स्थान पर मस्ज़िद के निर्माण करने की अनुमति कुरआन व इस्लाम की मान्यताएं नहीं देती। यानी आप जब तक भूमि के स्वामी नहीं हैं तब तक कोई भी भूमि किसी को कैसे सौंप सकते हैं। बाबर भूमि का स्वामी नही रहा है। इसलिए वह भूमि जिस पर मस्ज़िदनुमा ढांचा (बाबरी) बना है, उसे उसके मूल रूप को प्राप्त करना ही होगा।

लेकिन संकट यहां हैं कि इसे दकियानूसी चोला पहनाकर कोर्ट और मुक़दमेबाजी के फेर में उलझा दिया गया है जो अपने आप में दुनिया का एक रोमांचक मुक़दमा बन गया है। इसके केस पर दृष्टिपात करके देखें तो अब तक मिली सूचना के अनुसार अयोध्या पर मुक़दमा 60 साल से अधिक समय तक चला। माना जा रहा है कि यह अपने आप में पहला ऐसा संवेदनशील मुक़दमा रहा जिसको निपटाने में इतना लम्बा समय लगा। इसमें कुल 82 गवाह पेश हुए। हिन्दू पक्ष की ओर से 54 गवाह और मुस्लिम पक्ष की ओर से 28 गवाह पेश किये गये। हिन्दुओं की गवाही 7128 पृष्ठों में लिपिबद्ध की गयी जबकि मुसलमानों की गवाही 3343 पृष्ठों में कलमबद्ध हुई। पुरातात्विक महत्व के मुद्दों पर हिन्दुओं की ओर से चार गवाह और मुसलमानों की ओर से आठ गवाह पेश हुए। इस मामले में हिन्दू पक्ष की गवाही 1209 तथा मुस्लिम पक्ष की गवाही 3211 पृष्ठों में दर्ज की गयी। हिन्दुओं की ओर से अन्य सबूतों के अलावा जिन साक्ष्यों का संदर्भ दिया गया उनमें अथर्ववेद, स्कन्द पुराण, नरसिंह पुराण, बाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, केनोपनिषद और गजेटियर आदि हैं। मुस्लिम पक्ष की ओर से राजस्व रिकार्डों के अलावा बाबरनामा, हुमायूंनामा, तुजुक-ए-जहांगीरी, तारीख़-ए-बदायूंनी, तारीख़-ए-फ़रिश्ता, आइना-ए-अकबरी आदि का हवाला दिया गया। पूरा फैसला 8189 पृष्ठों में समाहित है। फिर भी इसका केस अभी करीब 60 सालों (ज़िला न्यायलय में 40 साल और उच्च न्यायलय में 20 साल) के बाद भी मुसलिमों द्वारा चुनौती देने के बाद उच्चतम न्यायलय में पिछले पांच सालों से भी अधिक समय से अंटका पड़ा है।

बावजूद इसके भी यदि हम श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के वर्तमान स्वरूप को निहारें तो यह स्थिति है कि आज इसके वर्तमान स्वरूप में कारसेवकों द्वारा तिरपाल की मदद से अस्थायी मंदिर का निर्माण किया गया। यह मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया है जहां ध्वंस से पहले श्री रामलला विराजमान थे। श्री पी.वी.नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन केन्द्र सरकार के एक अध्यादेश द्वारा श्रीरामलला की सुरक्षा के नाम पर लगभग 67 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। यह अध्यादेश संसद ने 7 जनवरी 1993 को एक कानून के जरिए पारित किया था। इसे पहले ही भक्तों द्वारा श्री रामलला की दैनिक सेवा-पूजा की अनुमति दिए जाने के संबंध में अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की। 1 जनवरी 1993 को अनुमति दे दी गई। तब से दर्शन-पूजन का क्रम लगातार जारी है।

चूंकि 7 जनवरी 1993 को तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा 143(ए) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से अपने एक प्रश्न का उत्तर चाहा था। उनका प्रश्न था कि “अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद जिस स्थान पर खड़ी थी, उस स्थान पर इसके निर्माण के पहले कोई हिन्दू धार्मिक भवन अथवा कोई हिन्दू मन्दिर था, जिसे तोड़कर वह ढाँचा खड़ा किया गया?”

सर्वोच्च न्यायालय ने उपर्युक्त प्रश्न पूछने का कारण सरकार से जानना चाहा था, तब भारत सरकार के सॉलिसीटर जनलर ने 14 सितम्बर 1994 को एक शपथ-पत्र के माध्यम से केस [(1994) 6 SCC 383: इस्माईल फ़ारुखी बनाम भारत सरकार] के हवाले से कहा था कि “यदि महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर सकारात्मक आता है अर्थात् एक हिन्दू मन्दिर/भवन को तोड़कर विवादित भवन बनाया गया था तो भारत सरकार हिन्दू समाज की भावनाओं के अनुसार कार्य करेगी। यदि इसके विपरीत प्रश्न का उत्तर नकारात्मक आता है अर्थात् कोई हिन्दू मन्दिर/भवन सन् 1528 ई. के पहले वहां था ही नहीं तो भारत सरकार का व्यवहार मुस्लिम समाज की भावनाओं के अनुसार होगा।”

सर्वोच्च न्यायलय ने इसकी करीब 20 महीने सुनवाई की और 24 अक्टूबर 1994 को अपने निर्णय में कहा ‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विशेष “रेफरेंस” का जवाब देगी।’ लिहाजा लखनऊ खण्डपीठ में तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ ने 1995 में मामले की सुनवाई की। मुद्दों का पुनर्नियोजन किया गया। मौखिक साक्ष्यों को रिकॉर्ड करना शुरू किया गया। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अगस्त, 2002 में राष्ट्रपति के विशेष “रेफरेंस” का सीधा जवाब तलाशने के लिए उक्त पीठ ने उक्त स्थल पर “ग्राउण्ड पेनेट्रेटिंग रडार सर्वे” का आदेश दिया जिसे कनाडा से आए विशेषज्ञों के साथ ‘तोजो विकास इंटरनेशनल’ द्वारा किया गया। अपनी रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने ध्वस्त ढांचे के नीचे बड़े क्षेत्र तक फैले एक विशाल ढांचे के मौजूद होने का उल्लेख किया जो वैज्ञानिक तौर पर साबित करता था कि बाबरी ढांचा किसी खाली जगह पर नहीं बनाया गया था, जैसा कि सुन्नी वक़फ बोर्ड ने दिसम्बर, 1961 में फैजाबाद के दीवानी दंडाधिकारी के सामने दायर अपने मुक़दमे में दावा किया है। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक उत्खनन के जरिए जीपीआरएस रिपोर्ट की सत्यता हेतु अपना मंतव्य भी दिया।

सिर्फ़ इतना ही नहीं सन् 2003 में उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक तौर पर उस स्थल की खुदाई करने और जीपीआरएस रिपोर्ट को सत्यापित करने का आदेश दिया। अदालत द्वारा नियुक्त दो पर्यवेक्षकों (फैजाबाद के दो अतिरिक्त ज़िला दंडाधिकारी) की उपस्थिति में खुदाई की गई। संबंधित पक्षों, उनके वकीलों, उनके विशेषज्ञों या प्रतिनिधियों को खुदाई के दौरान वहां बराबर उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आदेश दिया गया कि श्रमिकों में 40 प्रतिशत मुस्लिम होंगे। परिणाम यह आया कि फोटोग्राफी रिपोर्ट और उत्खनन रिपोर्ट दोनों ने ही ढाँचे के नीचे एक विशाल हिन्दू मन्दिर होने की बात स्वीकार की। इन्ही वैज्ञानिक रिपोर्टों के आधार पर न्यायाधीशों ने लिखा है कि-

“विवादित ढाँचा किसी पुराने भवन को विध्वंस करके उसी स्थान पर बनाया गया था। पुरातत्व विभाग ने यह सिद्ध किया है कि वह पुराना भवन कोई विशाल हिन्दू धार्मिक स्थल था।”

(न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

“तीन गुम्बदों वाला वह ढाँचा किसी खाली पड़े बंजर स्थान पर नहीं बना था बल्कि अवैध रूप से एक हिन्दू मन्दिर/पूजा-स्थल के ऊपर खड़ा किया गया था।”

(न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

“प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध नहीं किया जा सका कि निर्मित भवन सहित सम्पूर्ण विवादित परिसर बाबर अथवा इस मस्ज़िद को निर्माण कराने वाले व्यक्ति अथवा जिसके आदेश से यह भवन बनाया गया, उसकी सम्पत्ति है।”

(न्यायमूर्ति एस. यू. ख़ान)

उक्त तीनों माननीय न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि जो विवादित ढांचा था वह एक बड़े भग्नावशेष पर खड़ा था। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि वह 12वीं शताब्दी के श्री राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि वह किसी बड़े हिन्दू धर्मस्थान को तोड़कर बनाया गया और न्यायमूर्ति ख़ान ने कहा कि वह किसी पुराने ढांचे पर बना। इसके अलावा न्यायमूर्ति ख़ान का उक्त निष्कर्ष विवादित भवन के वक़्फ होने पर भी प्रश्न चिह्न लगाता है।

इसलिए अब श्री राम मन्दिर के निर्माण में हो रही देरी को देखते हुए पुनः जनजागरण हेतु 30 मई 2013 को सन्तों का प्रतिनिध मण्डल भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से मिला और उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ द्वारा 30 सितम्बर 2010 को दिए गए निर्णय से अवगत कराया। जिसमें न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने स्पष्ट लिखा है कि “विवादित स्थल ही भगवान राम का जन्मस्थान है। जन्मभूमि स्वयं में देवता है और विधिक प्राणी है। जन्मभूमि का पूजन भी रामलला के समान ही दैवीय मानकर होता रहा है और हर समय होता रहता है और यह भाव किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप में भक्त की भावनाओं के अनुसार प्रेरणा प्रदान करता है। देवत्व का यह भाव निराकार में भी हो सकता है।”

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि “हिन्दुओं की श्रृद्धा व विश्वास के अनुसार विवादित भवन के मध्य गुम्बद के नीचे का भाग भगवान श्री राम की जन्मभूमि है।”

वहीं न्यायमूर्ति एस.यू. ख़ान ने स्पष्ट किया कि “यह घोषणा की जाती है कि आज अस्थाई मन्दिर में जिस स्थान पर रामलला का विग्रह विराजमान है वह स्थान हिन्दुओं को दिया जाएगा।”

यद्यपि मुस्लिम नेताओं ने भारत सरकार द्वारा जारी किए गए श्वेत पत्र में क्रमांक 2.1, 2.2 व 2.3 के अनुसार सरकार को वचन दिया था कि “..यदि मन्दिर तोड़कर मस्ज़िद बनाने की बात सही पाई जाती है तब मुस्लिम स्वेच्छा से इस विवादित स्थल को हिन्दुओ को सौंप देंगे।” जबकि मुस्लिम अगुवाकारों ने इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के द्वारा 30 सितम्बर 2010 को दिए गए फैसले के बाद पुनः सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे डाली। इसके अलावा उन्होने न सिर्फ़ चुनौती दी बल्कि कहा कि कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष में नहीं आता तो भी हम देख लेंगें। हांलाकि इन्हें चाहिए यह था कि मुस्लिम समाज अपने द्वारा सरकार को दिए गए वचन का पालन कैसे करे इस पर विचार करें और स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप दें एवं भारत सरकार भी अपने शपथ-पत्र का पालन करे और जन-भावनाओं का आदर करते हुए सम्पूर्ण 70 एकड़ भूमि श्री राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु हिन्दू समाज को सौंप दें। लेकिन सितम्बर 2010 के फैसले के बाद न तो सरकार ने इस मामले का संज्ञान लेकर न्यायलय को चेताया और न स्वयं न्यायालय ने ही इसे राष्ट्रहित में ध्यान रखकर इसका जल्द निपटारा किया। लिहाजा अयोध्या के उभरने का अभी इंतज़ार बाकी ही था।

परिणाम स्वरूप वास्तव में उभरती अयोध्या के आग़ाज़ का स्वर्णिम समय हाल ही में देखने को मिला जब दिनांक 9 व 10 जनवरी 2016 को अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘श्री राम जन्मभूमि मन्दिरः उभरता परिदृश्य’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी। इस संगोष्ठी की प्रस्तावना अनुसंधान पीठ के संयोजक डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह के द्वारा रखी गई। उन्होने कहा कि नीतियों के निर्माण के कार्य पूरी तरह से शासन या राज्य के कंधों पर ही नहीं छोड़ देने चाहिए। इस काम को शासन या राज्य के साथ-साथ विश्वविद्यालयों के विद्वानों एवं शोधार्थियों को भी करना होगा।

इसीलिए अबकी बार इस श्री राम जन्मभूमि मुद्दे पर पहली बार साफ़ तौर पर यह देखने को मिलता है कि इसकी प्रक्रिया को संस्थागत रुप दे दिया गया है, जो कि एक बौद्धिक राष्ट्र के लिए आवश्यक था। इस मुद्दे को संस्थागत रूप देने से निश्चित है कि अब तक इस पर होने वाली राजनीति पर भी काफ़ी हद तक अंकुश लग सकेगा। इस पर पीठ का भी साफ़ कहना है कि श्री राम जन्मभूमि का प्रकरण एक राष्ट्रीय मुद्दा है। शताब्दियों से यह भारतीय समाज को प्रभावित करता रहा है। विगत तीन दशकों से भारत की समाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना व्यापक रूप से इससे प्रभावित रही है। हम विरोध करने वालों से पूछना चाहते हैं कि ऐसे मुद्दे के ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं विविध पहलुओं की चर्चा यदि विश्वविद्यालयों में नहीं हो सकती तो और कहाँ होगी?

अपनी संस्थागत बहसों और विधायी शस्त्रों से युद्ध लड़ने के लिए विख्यात डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी इस पीठ के अध्यक्ष हैं। पीठ के संयोजक डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह और अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की जुगलबंदी ही इस दफ़ा उभरती अयोध्या के आग़ाज़ के मुख्य नायक के तौर पर सामने आए हैं। हांलाकि एक बड़े विरोध के बावजूद इस संगोष्ठी में कुल 3200 लोग दिल्ली विश्वविद्यालय में शामिल हुए थे, जिनमें से देशभर के तमाम विश्वविद्यायों से 525 शिक्षक एवं शोधार्थियों ने भाग लिया। 26 लोगों को समयाभाव के बावजूद भी अपने शोधपत्र प्रस्तुत करने का मौका मिला। वास्तव में इस तरह की संस्थागत संगोष्ठियों में सहमत और असहमत दोनों पक्षों के लोगों को अवश्य भाग लेना चाहिए ताकि किसी संश्लेषण की प्रप्ति की जा सके।

वास्तव में संगोष्ठी कई मायनों में ऐतिहासिक व लाभदायक रही। इस संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम सत्र ‘उत्खनन एवं पुरातात्विक साक्ष्य’ में विषय का प्रतिपादन करते हुए अधिवक्ता श्री मदनमोहन पाण्डेय ने जीपीआरएस रिपोर्ट, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया, कार्बन डेटिंग की रिपोर्टों द्वारा प्राप्त निष्कर्षों को सामने रखते हुए यह बताया कि ध्वस्त मन्दिर के अवशेष 10वीं सदी या उससे पहले के हैं। उत्खनन के दौरान उत्तर दिशा से प्राप्त गोलाकार लाईन की बात हो या कसौटी पीलर आदि अवशेषों से प्राप्त निष्कर्षों को सामने रखते हुए उन्होंने उपरोक्त स्थान पर एक भव्य मन्दिर होने के प्रमाण को पुष्ट किया। पुरातत्वविद् एवं छत्तीसगढ़ सरकार के पुरातात्विक सलाहकार डॉ. अरुण कुमार शर्मा ने स्पष्ट किया कि विवादित ढाँचा मस्ज़िद होने के लिए आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता था। न तो वहाँ मीनारें थीं और न ही वहाँ वजू करने का स्थान या टैंक ही था। विवादित ढाँचे में पाए गए स्थापत्य भी हिन्दू मन्दिर होने के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। शिलालेख के अनुवादित पाठ को स्पष्ट करते हुए शर्मा जी ने बताया कि विवादित स्थान पर 11वीं सदी के गहड़वाल वंश के राजा ने मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

सच्चाई यह है कि उक्त प्रमाण-खण्ड प्रमाण के तिनके मात्र हैं। वास्तव में जो भी जन इस संगोष्ठी का हिस्सा रहा है उसने प्रमाणों का दरिया देखा है। तो अब सवाल यह है कि आख़िरकार इतने प्रमाणों के साक्ष्य होते हुए भी फिर श्री राम मन्दिर का भव्य निर्माण अब तक क्यूं नहीं हो सका। निःसंदेह अब तक इस पर भारी राजनीति हुई है और आगे भी होने की सम्भावना है। प्रमाण देखिए, संगोष्ठी के सम्पन्न होने के महज चौथे दिन ही अवस्थित अरुंधती अनुसंधान पीठ के पड़ोसी ज़िले फ़तेहपुर के जहानाबाद क़स्बे में जो कि खाद्य एवं प्रसंस्करण राज्य मंत्री निरंजन ज्योति का संसदीय क्षेत्र है और जहानाबाद क़स्बे में ही उनका निवास स्थान भी है, मकर संक्रन्ति के अवसर पर श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के प्रारूप की शोभायात्रा निकल रही थी और उस पर मुसलमानों ने पत्थरबाजी कर दी जिससे दंगा भड़क गया। परिणामतः कुछ दुकानें और गाड़ियाँ आगजनी का शिकार भी हुईं। यह कोई स्वाभाविक घटना नहीं थी। जानकार इसे पूर्णतः राजनीति से प्रेरित मानते हैं। माने मन्दिर पर फिर से राजनीति। ये घटना उत्तर प्रदेश सरकार के साझ-साथ निरंजन ज्योति पर भी एक प्रश्न चिह्न खड़ा करती है कि उनके गृहनगर में ही श्री राम मन्दिर को लेकर ऐसी घटना कैसे घटी? इसके अलावा इस घटना को सीधे तौर पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह के माथे पर चिन्ता की लकीर बन जानी चाहिए क्योंकि इसमें कोई संहेद नहीं है कि ऐसी घटनाएं उनके श्री राम जन्मभूमि मन्दिर को लेकर किये जा रहे संस्थागत प्रयासों पर सीधे अवरोध का काम करेंगी। ऐसे में पीठ को भी ऐसी घटनाओं पर संवेदनशील होना चाहिए। साथ ही मन्दिर निर्माण के लिए ज़रूरी यह भी है कि इस पर होने वाली राजनीति की सारी सम्भावनाओं के द्वार जल्द से जल्द बंद कर दिए जाएं, जो कि काफी हद तक संस्थागत प्रयासों से ही सम्भव है।

ख़ैर, पीठ को उक्त घटनाओं के नियमन के साथ-साथ 9 व 10 जनवरी की संगोष्ठी के फलस्वरूप लिए गए अपने क़ायदो और संकल्पों को याद रखना होगा कि श्री राम जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण हमारे राष्ट्रीय पुनर्जागरण का हिस्सा है। इसका अर्थ एक ऐतिहासिक क्रूरता को ठीक करना भी है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम मन्दिर का निर्माण एक राष्ट्रीय लक्ष्य बन गया है। यद्यपि यह क़ानूनी रुप से और अधिकतम आम सहमति के साथ पूरा किया जाना चाहिए। चूंकि 10 जनवरी को ही समाचार टीवी चैनल ‘आज तक’ पर श्री राम मन्दिर मुद्दे पर आधारिक कार्यक्रम ‘टक्कर’ में सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी सार्वजनिक रूप से घोषित किया कि वे और अधिवक्ता गिलानी एवं अन्य मुस्लिम हितधारक दिन-प्रतिदिन की सुनवाई का पक्ष लेते हुए शीघ्र निपटारा चाहते हैं। इसलिए अपील की सुनवाई को यथाशीघ्र पूरा होने पर व्यापक सहमति है। इसका अर्थ यह होगा कि इन सभी सिविल सूटों पर सर्वोच्च न्यायालय का सितम्बर, 2016 तक फैसला सम्भव हो सकेगा।

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी अगले क़दम के तौर पर प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर मांग की है कि केन्द्र सरकार को पहल करनी चाहिए कि विभिन्न पक्षों द्वारा दायर सिविल अपील को शीघ्र सूचीबद्ध किया जाए और दिन-प्रतिदिन की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में 15 मार्च, 2016 तक प्ररम्भ की जाए। इसके अलावा उन्होने आश्वस्तता भी जताई कि इस साल के अन्त तक श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम मन्दिर निर्माण प्रारम्भ हो जाएगा।

सही मायनों में देखें तो यह सब लगभग इस संस्थागत बहस का ही परिणाम है। अतः पीठ द्वारा सम्पन्न इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के परिप्रेक्ष्य में उभरती अयोध्या के आग़ाज़ स्वरूप देखना अतिश्योक्ति न होगा।

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