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निशीथ सकलानी

उत्तराखण्ड में वर्ष 2013 में आयी विनाशकारी आपदा से पिथौरागढ़ जिले के धारचूला-मुनस्यारी का क्षेत्र भी सर्वाधिक प्रभावित रहा। अभी तक सरकार आपदा पीड़ितों के लिए मुआवजा, पुर्नवास की व्यवस्था नहीं कर पायी है। पैदल मार्ग तथा पुल निर्माण तक नहीं हो पाये हैं ।  जबकि करोड़ों रूपये आपदा के मद में खर्च हो चुके हैं । उसके बावजूद आपदा प्रभावितों को अभी तक राहत नहीं मिल पायी है।

माननीय उच्चतम न्यायालय नैनीताल द्वारा वर्ष 2013 की भीषण एवं विनाशकारी आपदा से प्रभावित आम जन के हितों के संरक्षण के लिए जिला न्यायालय पिथौरागढ़ में कमेटी का गठन भी किया गया था। लेकिन उसके बावजूद भी आपदा प्रभावितों की समस्या यथावत हैं। राज्य सरकार के उपेक्षित रवैये को देखते हुए आपदा प्रभावितों ने पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय को पत्र लिखकर कहा है कि राज्य सरकार से मांग करते हुये आपदा प्रभावित अब थक व हार चुके हैं ।  आन्दोलन करने पर राज्य सरकार के दबाव में पुलिस और प्रशासन द्वारा आपदा प्रभावितों के खिलाफ झूठ पर आधारित मुकदमें किये जा रहे हैं ।  इसलिए आपदा प्रभावितों के पास माननीय न्यायालय के संरक्षण में जाने के अलावा और कोई मार्ग नहीं बचा है।

ज्ञात हो कि आपदा प्रभावित तहसील मुनस्यारी के 13 गांवों के क्षेत्र को गोरीपार के नाम से जाना जाता है। 16-17 जून 2013 को आयी आपदा ने गोरीनदी में बने झूलापुल को बहा दिया। तब से ढ़ाई वर्ष का समय बीत चुका है। गोरीपार क्षेत्र की आम जनता, जन प्रतिनिधियों द्वारा लगातार सरकार के सम्मुख गोरी नदी में पुल बनाये जाने की मांग उठाई जा रही है। गोरीनदी में सरकार द्वारा कच्ची पुलिया बनायी गयी जो नदी में जल स्तर के बढ़ते ही बह गयी। वर्तमान में गरारी लगायी गयी है। कच्चे पुल तथा गरारी से अभी तक कई राहगीर गोरी नदी में गिरकर मर चुके हैं। आपदा के बाद गरारी एक वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था थी जो अभी तक जारी है। राज्य सरकार ने आपदा मद में वर्ष 2013 से 2015 तक करोड़ांे रूपये खर्च कर दिये हैं लेकिन गोरीपार क्षेत्र के 13 गांवों की 5 हजार से अधिक की आबादी के आवागमन के लिए एक पक्की पुलिया का निर्माण तक नहीं किया गया है। लम्बे इन्तजार और असुरक्षित गरारी के कारण गोरी पार क्षेत्र की जनता ने 3 अगस्त 2015 को उप जिलाधिकारी मुनस्यारी के साथ उक्त समस्या के समाधान के लिए वार्ता आयोजित की। 15 दिन की समय अवधि बीत जाने के बाद उक्त समस्या का समाधान नहीं होने की दशा में आपदा प्रभावितों ने 21 अगस्त, 2015 को उप जिलाधिकारी कार्यालय मुनस्यारी के सम्मुख शान्तिपूर्वक धरना-प्रदर्शन किया।

आपदा प्रभावितों का कहना है कि गांधीगिरी के तहत किये गये प्रदर्शन से बौखलाकर राज्य सरकार ने दबाव में तथा राजनीतिक द्वेष भावना से ग्रसित होकर आन्दोलन का संचालन कर रहे व्यक्ति के खिलाफ प्रभारी तहसीलदार खुशाल राम द्वारा 21 अगस्त 2015 को उत्तराखण्ड पुलिस के मुनस्यारी थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 353, 117, 504 के अन्तर्गत आपदा प्रभावितों के खिलाफ मुकदमें दर्ज किये गये। आपदा प्रभावित क्षेत्र में आपदा प्रभावितों की समस्याओं को प्रशासन के स्तर पर लगातार उठाने के कारण परगना मजिस्टेªट मुनस्यारी द्वारा वाद संख्या 16, दिनांक 25 अगस्त 2015 के अनुसार धारा 107/116 के अन्तर्गत प्रार्थी को नोटिस दिया गया।

आपदा प्रभावितों का कहना है कि परगना मजिस्ट्रेट मुनस्यारी द्वारा दिये गये नोटिस तथा शान्तिपूर्वक प्रदर्शन के खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कर मानवाधिकार का हनन किया गया है। आपदा प्रभावितों को लोकतन्त्र में यह अधिकार भारतीय संविधान द्वारा दिया गया है कि जब लोक प्रशासक और राज्य सरकार उनके द्वारा बार-बार दिये गये पत्रों, ज्ञापनों, वार्ताओं में उठायी गयी समस्याओं का समाधान न करे तो वे शान्तिपूर्वक, कानून के दायरे में धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं। आपदा प्रभावितों के इस अधिकार को छीना जा रहा है। मुनस्यारी तहसील के आपदा प्रभावितों का कहना है कि उन्हे झूठे मुकदमों में फंसाकर लोकतान्त्रिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। उन्होने माननीय न्यायालय से गुहार लागाई है कि उत्तराखण्ड में आयी विनाशकारी आपदा के बाद प्रभावित हो चुके लोगों को

राज्य सरकार बिना किसी बिलम्ब के तुरंत राहत पहंुचाये और उनके विरूद्ध दबाव में पुलिस और प्रशासन के द्वारा दर्ज किये गये झूठे मुकदमों को समाप्त करते हुए उनके हितों को संरक्षित किया जाये।

(लेखक पूर्व में दैनिक सीमान्त वार्ता के सम्पादक एवं हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा लि. दिल्ली में फीचर सम्पादक रहे हैं। पिछले दस वर्षां से उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून से ‘अनंत आवाज’, राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका, का प्रकाशन कर रहे हैं। )

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