लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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डाँ. रमेश प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तावना:

देश को स्वतंत्र हुए 63 साल पूर्ण हो चके है लेकिन महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का प्रयास कर रही है लेकिन 90 फासिदी महिलाएं आज भी उपेक्षा के शिकार है, उनकी तरफ देखने का समाज का नजरिया पूरी तरह बदला ही नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि महिलाएं आर्थिक व मानसिक रूप से आत्मनिर्भर नही है, जब तक उन्हें आर्थिक और मानसिक आजादी नही होगी तब तक वे आत्म विश्वास के साथ समाज एवं राष्ट्र निर्माण में सकि्रय रूप से भूमिका नही निभा सकेगी।

भारतीय संविधान में पुरूषों और महिलाओं को समान स्थान प्रदान किया गया है लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक स्तर की दृष्टि से महिलाओं को अभी भी पुरूषों पीछे रहना पड़ रहा है और यह भी कहना अशयोक्ति नहीं होगी कि  अभी भी विकास व राजनीतिक सहभागिता से कोसों दूर है। राजनीतिक सहभागिता के क्षेत्र में पुरूष और महिलाओं की स्थिति में काफी अंतर दिखता है। इस अंतर को कम करने के लिए प्रति वर्ष 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर को वृहत रूप देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2000 में विश्व महिला वर्ष की घोषणा की, किन्तु भारत ने इसे और अधिक महत्व देते हुए वर्ष 2001 को राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय किया। इस दरम्यान शासकीय एवं अशासकीय स्तर पर महिलाओं को मजबूत एवं अधिकार संपन्न बनाने के लिए अनेकों योजनाएं बनाई है। संविधान में वर्णित पंचायती राज व्यवस्था ने सभी को सामाजिक समानता, न्याय, आर्थिक विकास एवं व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आधारित ग्रामीण जीवन को नया रूप देने का एक सामूहिक प्रयास है। इसी संदर्भ में पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी ब़ाने का शासन द्वारा समय समय पर निरन्तर प्रयास चलता रहा है।

महिला प्रतिनिधयों के सिद्यांतिक स्थिति :

बलवंत राय मेहता समिति से लेकर 73वां संविधान तक विभिन्न समितियों के माध्यम से इन पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की सहभागिता के बारे में कई उतारच़ाव देखने को मिलता है। 73वां संविधान संशोधन के पश्चात महिलाओं की पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर उनकी सहभागिता ब़ने का अवसर प्रदान किया है। भारत में महिलाओं के राजनैतिक शसक्तीकरण के लिए 73 वां संविधान संशोधन के अनुच्छेद 243 ॔डी’ में संशोधन कर कुछ राज्य जैसे बिहार पंचायती राज अधिनियम 2006, छत्तीसग़ पंचायती राज संशोधन अधिनियम 2008, मध्यप्रदेश पंचायती एवं ग्राम स्वराज्य अधिनियम 1993 में संशोधन, राजस्थान, केरल व उत्तराखंड आदि राज्यों ने महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का तोहफा प्रदान कर सराहनीय कार्य किया है। बिहार राज्य को इस कानून के कि्रयान्वयन के संदर्भ में सर्वप्रथम श्रेय जाता है। कुछ राज्यों में पंचायत चुनाव भी संपन्न कराये जा चुके है और महिलाओं को पंचायती राज व्यस्था में सिद्यांतिक रूप से कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ है। जिससे देश की ग्रामीण जनसंख्या में से आधी जनसंख्या महिलाओं की है इसके साथ ही आधी जनसंख्या से अधिक महिलाओं को पंचायती राज व्यवस्था के विविध स्तरो जैसे ग्राम पंचायत पंचायत समिति एवं जिला परिषद में महिलाओं की संवैधानिक सहभागिता के अवसर प्राप्त

हुआ है जिससे पंचायती राज के विविध पदों पर महिलाएं पदासीन होकर कार्य भी कर रही है।

2008 के आकड़ों के आधार पर भारतीय पंचायती राज व्यवस्था के तीनों स्तर में कम्रशः 232855 ग्राम पंचायत, 6096 पंचायत समिति एवं 633 जिला पंचायत है तथा ग्राम पंचायत स्तर पर 1645883, पंचायत समिति/मध्य स्तर पर 156794 एवं जिला परिषद स्तर पर 15613 को लेकर कुल 2818290 निर्वाचित प्रतिनिधि है। इन निर्वाचित प्रतिनिधयों में से क्रमशः 975057, 58191 व 5810 को लेकर कुल 103958 महिला प्रतिनिधि निर्वाचित हुई है।

 

महिला प्रतिनिधयों की व्यवहारिक स्थिति :

इस पुरूष प्रधान समाज में लम्बे समय से उपेक्षा की शिकार तथा उन्हीं के निर्देश पर चलने वाली उपेक्षित महिलाओं के लिए पंचायतों एवं स्थानीय निकायों में आरक्षित पदों के माध्यम से निर्वाचित होना एक सुखद आश्चर्य है। पंचायती राज को लगभग 17 वर्ष पूरे हो जाने के बाद इन प्रतिनिधियों में राजनीतिक जागरूकता का विकास नहीं हुआ है। अध्ययन के दौरान ग्रामीण महिलाओं से उनकी समस्या के बारे में चर्चा की गई तो उनका उत्तर पानी, नाली, अस्पताल, सड़क मकान, बिजली, शिक्षा होता है। महिला विकास जैसा चिंतन उसके दिमाग में है ही नहीं, यही महिलाओं के शोषण का कारण है। वर्तामन स्थिति में समस्या के उन बिन्दुओं की पहचान करना आवश्यक है जो नवीन पंचायती व्यवस्था में देखने को मिल रहा है। इसमें से प्रमुख यह है कि पंचायत की बैठको में महिला के स्थान पर उसके पति जाते हैं। महिला प्रतिनिधियों से आवश्यक दस्तावेजों पर हस्ताक्षर या अगूठे लगवा लिया जाता है। पंचायती राज व्यव्स्था में आये दिन महिला प्रतिनिधियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार व अपराध के मामले सामने आ रहे है, इसका कारण शिक्षा का अभाव, जागरूकता की कमी, संकोच की भावना, पर्दा प्रथा, पुरूषों का दबाव आदि है। प्रायः यह देखा जाता है कि वे तो केवल अंगूठा लगा रही है महिला सरपंचों एवं अन्य प्रतिनिधियों के पुरूष द्वारा उनके अधिकारों का दुरूपयोग किया जा रहा है। इस अध्ययन के दौरान महिला पंचायत प्रतिनिधियों से प्रश्न किया गया कि क्या आप पंचायत का अगला चुनाव लड़ना चाहती हैं तब तथ्य सामने आया कि आधे से अधिक उत्तरदाताओं को इस बारे में कुछ पता ही नहीं है, अगर परिवार के सदस्य चाहेगें तो वे लड़ लेंगी। उनकी अशिक्षा, संकुचित स्वभाव, पूर्णतः पुरूषों पर निर्भरता, स्वचेतना का अभाव झलकता है। अपने अधिकारों के लिए इच्छा शक्ति एवं संघर्ष की कमी के कारण वे पुरूषों के निर्णय को अधिक मान्यता देती है। अधिकांश महिलाओं ने स्वीकार किया है कि सरकार ने महिला सीट आरक्षित कर दी है, इसी कारण हमें खड़ा किया गया है। महिलाओं का विचार है कि पंचायत की राजनीति में हमारा कोई कार्य नहीं है क्योंकि हम तो खेतो में कार्य करने वाली महिलाएं है हम अपने बच्चों को पालनपोषण करे या पंचायत में जाकर राजनीति करेगें। अतः स्पष्ट है कि अधिकतर महिलाएं स्वतंत्रता एवं स्वेच्छा से पंचायत का कार्य करने में असमर्थ प्रतीत होती है, लेकिन इसके साथ यह भी स्वीकार करना होगा कि आरक्षण की इस व्यवस्था में महिलाओं की समस्याओं के निराकरण हेतु एक आंदोलन प्रारंभ हो गया है।

निष्कर्षतः

पंचायती राज में महिला प्रतिनिधयों के संदर्भ में अध्ययन से स्पष्ट है कि व्यवहार में महिला साश्क्तीकरण की सिद्यांतिक एवं व्यवहारिक में धरती आसमान का अंतर है। शासन ने पंचायतों में आरक्षण के कारण महिलाओं की सहभागिता सुनिश्चित तो कर दी है। यह सत्य है कि आरक्षण की व्यवस्था के कारण पंचायती राज में ही नही वल्कि देश के सभी वर्गों की महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक, प्रशासनिक क्षेत्रों में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ है, लेकिन अभी पंचायती राज में महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक रूप से सशस्त करने की आवश्कता है, अन्यथा व्यवहारिकता केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।

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