लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता पाने को इतनी आतुर हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेक खो दिया है। ज्ञानेश्वरी रेल दुर्घटना के आरोपी उमाकांत महतो और उससे पूर्व आंध्र के एक कुख्यात नक्सली आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर भी वे प्रश्न उठा रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि प्रणव मुखर्जी जैसा जिम्मेदार व्यक्ति भी उनकी हां में हां मिला रहा है।

ये दोनों क्रूर नक्सली चाहे जैसे मारे गये हों; वे मुठभेड़ में मरे हों या सुरक्षा बलों ने उन्हें पकड़कर पास से गोली मारी हो, यह हर दृष्टि से उचित है। हमारे शास्त्र हमें शठे शाठ्यम समाचरेत् (जैसे को तैसा) का पाठ पढ़ाते हैं। अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार उचित है।

जो नक्सली, कम्युनिस्ट, माओवादी या मजहबी आतंकवादी निरपराध लोगों को निशाना बना रहे हैं, उन्हें मारने को हत्या नहीं, वध कहते हैं। कंस ने हजारों निरपराध ब्रजवासियों की हत्या की; पर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। रावण ने हजारों ऋषियों की हत्या की; पर श्रीराम ने उसका वध किया। हत्या सदा अनुचित है और वध सदा उचित। हत्यारे को दंड दिया जाता है, जबकि वध करने वाले को पुरस्कार; और वध के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसे सब तरीके भारतीय शास्त्रों ने उचित बताये हैं।

श्रीराम का जीवन यदि देखें, तो उन्होंने छिपकर बाली का वध किया। उन्होंने विभीषण के माध्यम से रावण के आंतरिक भेद जानकर फिर उसका वध किया। हनुमान ने अहिरावण को पाताल में जाकर मारा। क्योंकि रावण अधर्मी था; और अधर्मी को अधर्मपूर्वक मारना गलत नहीं है। महाभारत युद्ध में भी श्रीकृष्ण ने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन जैसे महारथियों को ऐसे ही छल से मरवाया; इसके बाद भी पूरा देश इन दोनों को अपराधी नहीं, भगवान मानता है।

इसलिए जिन वीर सुरक्षाकर्मियों ने आजाद, महतो या उन जैसे किसी भी आतंकी का वध किया हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। यदि शासन न करे, तो जनता उनका सम्मान करे। केवल आतंकी ही क्यों, उनके लिए साधन और समर्थक जुटाने वाले लेखक, पत्रकार, वकील, आतंकाधिकारवादी, साधुवेश आदि को भी यदि इसी तरह जहन्नुम पहुंचा दिया जाए, तो बहुत शीघ्र आतंकवाद की कमर टूट जाएगी।

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8 Comments on "शठे शाठ्यम समाचरेत्"

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डॉ. राजेश कपूर
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अभिषेक जी कुछ दिन के लिए बाहर गया था अतः संपर्क टूटा रहा. आपकी बात से लगा की आज दुनिया में जो चल रहा है वह कई लोगों के अभी ध्यान में नहीं आया है. * ये कागजी करेंसी कभी भी बेकार हो सकती है. असली सम्पत्ती जल, जंगल और ज़मीन है.बहुराष्ट्रीय कम्पनियां सारे संसार के इस असली धन पर कब्जा करने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपना रही हैं. भारत में भी वही चल रहा है. भारत की सभी सरकारें इन कंपनियों की एजेंट के रूप में काम कर रही हैं. बाँध, खदान उद्योग, माल के नाम पर… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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भाई सहाब जी मैं अपकी एस बात से सहमत हुं कि जमीन से उखडने कि पीडा बहुत कष्ट कारी होती है,यधपि मेने एसको नही देखा पर अनेक किताबो में पढा है और अपने सिन्धि दोस्तो के बुजर्गों की आंखो मे महसुस भी किया है,किसि को उसके स्थान से कभी नहि हटाना चाहिये सही बात है,लेकिन सहाब अगर कल को पता चले की मेरे घर के निचे लोहे के अयस्क भरे पडॆ है तो मे जरुर हटुंगा,एससे ना केवल देश को फ़ायदा होगा बल्कि पहले मेरा ही फ़ायदा होगा,कुछ एस तरिके की ही बात हर जगह होती है,बस लोग बदल जाते… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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अभिषेक पुरोहित जी में आप से सिद्धांत रूप से सहमत होते हुए निवेदन करता हूँ की -आप ने उजाड़े जा रहे रहे लाखों निर्धनों की असलियत को नहीं देखा-समझा है.उनकी पीड़ा, बर्बादी व मुसीबतों को अनुभव नहीं किया है. – दंड तथा वध के भागीदार वे हैं जो इन बेचारों को उजाड़ने का काम कर रहे हैं. – दुसरे अपराधी व देश के शत्रु वे हैं जो इन भोले-भाले निर्धनों की दुर्दशा का उपयोग करके देश को तोड़ने का काम कर रहे हैं. -तीसरे अपराधी मैं, आप और हम सब भी हैं जिन्होंने इन भूख व बदहाली से बिलखते लोगों… Read more »
अभिषेक पुरोहित
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आप सभी से मेरा निवेदन है कि आप लोग “चाणक्य” को पढे,कैसे उसने कुटिलता पुर्वक सभी राष्ट्र विघातियो का नाश करवाया और फ़िर राज्य त्याग दिया.दुख कि बात है कपुर सहाब जैसे विध्वान भी नक्सल्वादियो के छ्दम प्रचार मे ये समझ बैथे है कि गरिबि के कारण नक्सल बनते है.हमारे भगवान ने बहुत ही क्रुरता पुर्वक हिरण्य्कशय्प,रावण,कंस,दुर्योधन,सह्स्त्र्बाहु आधि का नाश किया,अहिंसा-हिसां कुच नही होति है,जहा जैसा धर्म के लिये उचित लगे वैसा करना चाहिये,अरे कृष्ण ने तो भीष्म का बध करने के लिये अप्नि प्रतिग्या तक तोड दि,जबकि भिश्म प्रतिग्या से चिपके अधर्म का संरकक्षण करते रहे,हमें चिंतन करना पडेगा… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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“शठे शाठ्यम समाचरेत्”
शीर्षक विषय भ्रम करने वाला है।बिनती: आगे ध्यान रखे।
समयाभाव में हर लेख पढना संभव नहीं।

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